8 अप्रैल 2026
गवर्नर का वक्तव्य: 8 अप्रैल 2026
सुप्रभात और नमस्कार। मैं आप सभी का 2026-27 की पहली पॉलिसी में स्वागत करता हूँ, जिसका आयोजन एक ऐसे समय में किया गया है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था को बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में आई बाधाओं के कारण अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
2. संघर्ष शुरू होने से पहले, भारत के समष्टि-आर्थिक मूलभूत सिद्धांत सुदृढ़ संवृद्धि और कम मुद्रास्फीति के साथ आत्मविश्वास दिखा रहे थे। मार्च में हालात तब बिगड़ गए, जब संघर्ष और बढ़ गया तथा उसमें और तीव्रता आ गई। मौजूदा समय में भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी तत्व, पिछले संकटों के मुकाबले और साथ ही कई अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में ज़्यादा मज़बूत स्थिति में हैं, जिससे इसकी आघात-सहनीयता और बढ़ जाती है।
3. वैश्विक संवृद्धि को अब बढ़ते हुए अधोगामी जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि ऊर्जा की कीमतों में आई भारी तेज़ी और विभिन्न उद्योगों के लिए इनपुट की कमी ने मुद्रास्फीति की आशंकाओं को बढ़ा दिया है, और तेल बाज़ारों में भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम को बढ़ा दिया है। चल रहे संघर्ष के कारण उत्पन्न हुई बढ़ती अनिश्चितता, भावी संभावनाओं को प्रभावित कर रही है। सुरक्षित निवेश स्थलों (Safe haven) की ओर हो रहे प्रवाह ने प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर अवमूल्यन का दबाव डाला है, क्योंकि अमेरिकी डॉलर मज़बूत हुआ है। जहाँ एक ओर धातु और सोने जैसी कमोडिटी की कीमतें नरम पड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर वित्तीय बाज़ार अधिक अस्थिर हो गए हैं। इक्विटी बाज़ार में बड़े पैमाने पर सुधार देखने को मिला है। सॉवरेन बॉन्ड प्रतिफल, जो पहले से ही दीर्घकालिक राजकोषीय स्थिरता संबंधी चिंताओं के कारण उच्च स्तर पर थे, अब मुद्रास्फीति के डर के कारण, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में और भी बढ़ गए गए हैं।
मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के निर्णय
4. मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने 6, 7 और 8 अप्रैल को बैठक करके नीतिगत रेपो दर पर विचार-विमर्श किया और इससे संबंधित निर्णय लिया। बदलते समष्टि-आर्थिक और वित्तीय घटनाक्रमों तथा भावी संभावनाओं का विस्तार से आकलन करने के बाद, एमपीसी ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर ही यथावत् रखा जाए; इसके परिणामस्वरूप, स्थाई जमा सुविधा (एसडीएफ़) दर 5.00 प्रतिशत पर और सीमांत स्थाई सुविधा (एमएसएफ़) दर तथा बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर ही बने रहेंगे। एमपीसी ने तटस्थ रुख को जारी रखने का भी निर्णय लिया।
5. अब मैं संक्षेप में इन निर्णयों का औचित्य प्रस्तुत करूँगा।
6. एमपीसी ने यह पाया कि पिछली पॉलिसी बैठक के बाद से, भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं काफी बढ़ गई हैं। हेडलाइन मुद्रास्फीति काबू में है और तय लक्ष्य से नीचे है। हालांकि, मुद्रास्फीति संभावना के लिए ऊर्ध्वगामी जोखिम बढ़ गए हैं; इसकी वजह ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव और मौसम में संभावित गड़बड़ियां हैं, जो खाद्य पदार्थों की कीमतों पर असर डाल सकती हैं। मूल मुद्रास्फीति का दबाव कम बना हुआ है, हालांकि आपूर्ति शृंखला में रुकावटें और 'सेकंड-राउंड इफ़ेक्ट' का जोखिम मुद्रास्फीति संबंधी भावी रुख को अनिश्चित बना देते हैं।
7. एमपीसी ने आगे यह भी कहा कि फरवरी 2026 तक के उच्च आवर्ती संकेतक से पता चलता है कि आर्थिक गतिविधियों में मज़बूत रफ़्तार बनी रहेगी। संवृद्धि को मज़बूत निजी खपत और निवेश की मांग से लगातार समर्थन मिल रहा है। हालाँकि, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से संवृद्धि की गति में रुकावट आने की संभावना है। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी, अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि से जुड़ी ज़्यादा इनपुट लागत, और आपूर्ति शृंखला में आने वाली रुकावटें, जिनसे डाउनस्ट्रीम सेक्टरों के लिए ज़रूरी इनपुट की उपलब्धता सीमित हो जाएगी, संवृद्धि को नुकसान पहुँचा सकती हैं। सरकार ने निर्यात को बढ़ावा देने और आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से कई कदम उठाए हैं। इससे संघर्ष के नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद मिलनी चाहिए।
8. एमपीसी का मानना है कि संघर्ष की तीव्रता और अवधि, और इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा और अन्य बुनियादी ढांचे को होने वाला नुकसान, मुद्रास्फीति और संवृद्धि की संभावनाओं के लिए जोखिम पैदा करता है। हालाँकि, भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद अब ज़्यादा मज़बूत है, जिससे अतीत की तुलना में इसकी आघात-सहनीयता और बढ़ जाती है। अर्थव्यवस्था को आपूर्ति में अचानक आई कमी का सामना करना पड़ रहा है। बदलते हालात और संवृद्धि-मुद्रास्फीति के बदलते अनुमानों पर नज़र रखना और इंतज़ार करना ही समझदारी है। इसलिए, एमपीसी ने नीतिगत दरों को अपरिवर्तित रखने के पक्ष में वोट दिया; साथ ही वह सतर्क भी बनी हुई है, प्राप्त सूचनाओं पर बारीकी से नज़र रख रही है और जोखिमों के संतुलन का आकलन कर रही है। एमपीसी ने तटस्थ रुख बनाए रखने का भी निर्णय लिया, और प्राप्त सूचनाओं पर सोच-समझकर प्रतिक्रिया देने की अपनी सहूलियत को बरकरार रखा।
संवृद्धि और मुद्रास्फीति का आकलन
भारतीय अर्थव्यवस्था पर पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का प्रभाव
9. इससे पहले कि मैं संवृद्धि और मुद्रास्फीति संबंधी आकलन प्रस्तुत करूँ, मैं संक्षेप में उन माध्यमों पर प्रकाश डालना चाहूँगा जिनके ज़रिए मौजूदा संघर्ष का भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। पहला, कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोत्तरी के कारण आयातित मुद्रास्फीति में वृद्धि हो सकती हैं और यह चालू खाता घाटे को और बढ़ा सकती हैं। दूसरा, ऊर्जा बाज़ारों, उर्वरकों और अन्य वस्तुओं में आने वाली बाधाएँ उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं, जिससे घरेलू उत्पादन में कमी आ सकती है। तीसरा, बढ़ती अनिश्चितता, जोखिम से बचने की बढ़ती प्रवृत्ति और सुरक्षित निवेश की मांग से घरेलू चलनिधि की स्थिति, आर्थिक गतिविधियों, उपभोग और निवेश पर असर पड़ सकता है। चौथा, वैश्विक संवृद्धि की कमजोर संभावनाओं से बाहरी मांग कम हो सकती है और रेमिटेंस का प्रवाह घट सकता है। अंत में, वैश्विक वित्तीय बाजारों से पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों से घरेलू वित्तीय स्थितियां सख्त हो सकती हैं और इससे उधार लेने की लागत बढ़ सकती है। कुल मिलाकर, अगर आपूर्ति शृंखला की बहाली में देरी होती है, तो शुरुआती आपूर्ति आघात मध्यम अवधि में मांग आघात में बदल सकता है।
संवृद्धि
10. नई जीडीपी शृंखला (आधार वर्ष 2022-23) के अनुसार, 2025-26 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि1 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह आर्थिक गतिविधियों में अंतर्निहित मज़बूत गति की पुष्टि करता है, जिसे सहायक नीतिगत उपायों, चल रहे संरचनात्मक सुधारों और अनुकूल वित्तीय स्थितियों के बीच, मज़बूत उपभोग और निवेश2 का समर्थन प्राप्त है।
11. आगे चलकर, ऊर्जा और दूसरी कमोडिटी की बढ़ी हुई कीमतें, साथ ही होर्मुज़ जलडमरूमध्य में रुकावटों की वजह से इनपुट की उपलब्धता में आने वाली दिक्कतें, 2026-27 में संवृद्धि पर असर डाल सकती हैं। हालाँकि, सरकार ने आपूर्ति शृंखला में व्यावधानों के असर को कम करने के लिए, आवश्यक क्षेत्रों में इनपुट की सप्लाई सुनिश्चित करने में पहले से ही सक्रियता दिखाई है।3 दूसरी ओर, सेवा क्षेत्र में लगातार बनी गति, जीएसटी के युक्तिकरण का प्रभाव, और वित्तीय संस्थानों तथा कंपनियों का मज़बूत तुलन-पत्र, आर्थिक गतिविधियों को लगातार सहारा देती रहेंगे। कृषि क्षेत्र की संभावनाओं को जलाशयों के अच्छे जल स्तर से बल मिल रहा है।4 कारोबारी उम्मीदें आशावादी बनी हुई हैं,5 और प्रमुख संकेतक विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्रों में निरंतर सुदृढ़ता की ओर इशारा कर रहे हैं।6 इसके अलावा, कई कार्यनीतिक और उभरते क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने पर सरकार का विशेष ध्यान भारत की आगामी संवृद्धि यात्रा के लिए शुभ संकेत है।
12. मांग के स्तर पर, 2026–27 में निजी उपभोग को विवेकाधीन खर्च से सहारा मिलने की उम्मीद है। ग्रामीण मांग मज़बूत बनी हुई है।7 कृषि के लिए अनुकूल स्थितियों और एक स्वस्थ श्रम बाज़ार के चलते इसमें और तेज़ी आने की संभावना है।8 जीएसटी की युक्तिकरण के लाभदायक प्रभाव और सेवा क्षेत्र की मज़बूत गतिविधियों की मदद से, शहरी खपत के और मज़बूत होने की संभावना है। जहाँ एक तरफ़ सरकार अवसंरचना संबंधी व्यय पर ज़ोर दे रही है9, वहीं दूसरी तरफ़, ज़्यादा क्षमता के इस्तेमाल10, सुदृढ़ ऋण संवृद्धि11 और अनुकूल वित्तीय स्थितियों के चलते, निजी क्षेत्र के निवेश में आई तेज़ी के बने रहने की उम्मीद है। बाहरी मोर्चे पर, मुख्य शिपिंग रास्तों में रुकावटों, माल ढुलाई और बीमा की लागत में बढ़ोतरी, और संघर्ष के कारण वैश्विक माँग में कमी आने से, माल के निर्यात पर बुरा असर पड़ सकता है। हालाँकि, माल के निर्यात को हाल के व्यापार समझौतों से फ़ायदा मिल सकता है, जबकि सेवा निर्यात12 के मज़बूत बने रहने की उम्मीद है।
13. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है; जिसमें पहली तिमाही में 6.8 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.7 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 7.0 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 7.2 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। हालाँकि, संघर्ष का और बढ़ना और उसका व्यापक रूप से फैलना, वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ी हुई अस्थिरता और मौसम से जुड़ी घटनाएँ घरेलू संवृद्धि की संभावना पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। आधारभूत अनुमानों के लिए जोखिम अधोगामी हैं, और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण अत्यंत अनिश्चितता बनी हुई है।
मुद्रास्फीति
14. जनवरी–फरवरी के दौरान, खाद्य समूह में मुद्रास्फीति13 के साथ, हेडलाइन मुद्रास्फीति लक्ष्य से नीचे बनी रही (क्रमशः 2.7 प्रतिशत और 3.2 प्रतिशत), जबकि पिछले चार महीनों में इसमें अपस्फीति देखी गई थी14। ईंधन संबंधी वस्तुओं में मुद्रास्फीति15 मध्यम रही। मूल मुद्रास्फीति 3.7 प्रतिशत16 रही और अंतर्निहित मूल्य दबाव स्थिर रहे, जैसा कि बहुमूल्य धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति के 2.1 प्रतिशत के काफी निम्न स्तर से स्पष्ट है।
15. मुद्रास्फीति-संभावना की बात करें तो, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण ऊर्जा कीमतों में हालिया उछाल एक जोखिम के रूप में सामने आया है। यद्यपि पेट्रोल और डीज़ल के खुदरा मूल्य अब तक अपरिवर्तित रहे हैं, उच्च वैश्विक ऊर्जा कीमतों के संचरण के परिणामस्वरूप कुछ अन्य ईंधन संबंधी वस्तुओं में मूल्य वृद्धि हुई है17। निकट भविष्य में, सुदृढ़ रबी उत्पादन, पर्याप्त जलाशय स्तर तथा खाद्यान्नों के पर्याप्त सुरक्षित भंडारण18 के कारण, खाद्य मूल्य संबंधी संभावना स्थिर बना रहेगा। एल नीनो की स्थितियों के उभरने की संभावना जोखिम उत्पन्न करती है19। इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, 2026-27 के लिए 4.6 प्रतिशत सीपीआई मुद्रास्फीति का अनुमान किया गया है, जिसमें पहली तिमाही में 4.0 प्रतिशत; दूसरी तिमाही में 4.4 प्रतिशत; तीसरी तिमाही में 5.2 प्रतिशत; तथा चौथी तिमाही में 4.7 प्रतिशत मुद्रास्फीति रहने का अनुमान है। मूल मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत पर अनुमानित है। बहुमूल्य धातुओं को हटा दें तो, मूल मुद्रास्फीति अनुमान और भी कम हो जाता है, जो संकेत करता है कि अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबाव नियंत्रित बने रहने की उम्मीद है। मुद्रास्फीति बढ़ने के जोखिम बने हुए हैं।
बाह्य क्षेत्र
16. वैश्विक व्यापार में 2025 की तुलना में 2026 के दौरान संवृद्धि की गति में मंदी आने की संभावना है, जिसका कारण शुल्क-संबंधी अनिश्चितताओं का बने रहना, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष तथा उच्च ऊर्जा कीमतें हैं।20 भारत के माल निर्यात में वर्ष-दर-वर्ष (वाई-ओ-वाई) आधार पर जनवरी–फरवरी 2026 के दौरान 0.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो प्रमुख बाजारों में निर्यात की कमी से प्रभावित थी।21 माल आयात में 22.2 प्रतिशत की द्वि-अंकीय वृद्धि दर्ज की गई, जो मुख्यतः स्वर्ण आयात में वृद्धि22 से प्रेरित थी, और परिणामस्वरूप व्यापार घाटा बढ़ा।23 वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही के दौरान सेवा निर्यात24 तथा अंतर्वाह विप्रेषण प्राप्तियों25 में अपेक्षित मज़बूती दिखी जिससे 2025-26 में भारत का चालू खाता घाटा मध्यम एवं संधारणीय स्तर के भीतर बने रहने की उम्मीद है। वैश्विक अनिश्चितताओं में वृद्धि तथा प्रमुख ऊर्जा वस्तुओं की ऊँची कीमतें 2026-27 में भारत के चालू खाता घाटे के बढ़ने का जोखिम उत्पन्न करती हैं। प्रमुख व्यापारिक भागीदारों के साथ हाल के द्विपक्षीय एवं क्षेत्रीय व्यापार समझौतों से भारत के व्यापार एवं निवेश अवसरों को प्रोत्साहन मिलने, व्यापारिक भागीदारों का विस्तार एवं विविधीकरण होने तथा भारत के वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकरण को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।26
17. बाह्य वित्तपोषण के क्षेत्र में, सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) में सुदृढ़ वृद्धि दर्ज की गई, जबकि निवल एफ़डीआई में सुधार देखा गया।27 ग्रीनफील्ड एफ़डीआई परियोजनाओं के लिए भारत एक आकर्षक गंतव्य बना हुआ है।28 भारत में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफ़पीआई) में, इक्विटी खंड से बहिर्वाह के कारण, 2025-26 में 16.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवल बहिर्वाह दर्ज किया गया, जिसके पश्चात 2026-27 (6 अप्रैल तक) में 5.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर का बहिर्वाह हुआ।29 बाह्य वाणिज्यिक उधार तथा अनिवासी जमाओं के अंतर्गत प्रवाह 2024-25 की तुलना में संयत रहे।30 3 अप्रैल 2026 तक की स्थिति के अनुसार भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 697.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर है। मानक भंडार पर्याप्तता मानकों, जिनमें आयात अवधि (लगभग 11 माह) तथा बाह्य ऋण (91.1 प्रतिशत) शामिल हैं, के संदर्भ में उक्त भंडार पर्याप्त है। समग्र रूप से, भारत के बाह्य क्षेत्र के संकेतक अनुकूल बने हुए हैं।31 तथापि, वैश्विक भू-राजनीतिक, व्यापार एवं निवेश संबंधी अनिश्चितताओं के उच्च स्तर को देखते हुए, बदलते परिदृश्य पर सतत निगरानी अपेक्षित है।
18. सुदृढ़ समष्टि आर्थिक मूल-तत्वों के बावजूद, 2025-26 में भारतीय रुपया पिछले वर्षों के औसत की तुलना में अधिक अवमूल्यित हुआ। इस संदर्भ में, मैं पुनः दोहराना चाहूँगा कि हमारी विनिमय दर नीति यथावत् बनी हुई है। विशेष रूप से, विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप का उद्देश्य विनिमय दर के किसी विशिष्ट स्तर या दायरे को लक्षित किए बिना अत्यधिक एवं विघटनकारी अस्थिरता को कम करना है। यह हमारी दीर्घकालिक नीति के अनुरूप है, जिसके अनुसार विनिमय दरें बाज़ार द्वारा निर्धारित होती हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक इस नीति के प्रति प्रतिबद्ध है और अत्यधिक अथवा विघटनकारी अस्थिरता को विवेकपूर्ण ढंग से नियंत्रित करेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्व-पूर्ति अपेक्षाएँ, मूलभूत कारकों से परे जाकर, मुद्रा संबंधी गतिविधियों को और अधिक न बढ़ाएँ।
चलनिधि एवं वित्तीय बाज़ार स्थिति
19. प्रणालीगत चलनिधि, जिसे चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ़) के अंतर्गत निवल स्थिति के अनुसार मापा जाता है, पिछली एमपीसी बैठक के बाद से औसतन प्रतिदिन ₹2.3 लाख करोड़ के अधिशेष पर रही।32 इसके पश्चात, भारित औसत मांग दर (डबल्यूएसीआर), सिवाय मार्च महीने के अंत में, कॉरिडोर के निचले अर्धभाग में कारोबार करती रही33। अल्पावधि मुद्रा बाज़ार दरें, विशेषकर वाणिज्यिक पत्रों और जमा प्रमाणपत्रों की दरें, उच्च स्तर पर बनी रहीं34। फरवरी में आए गिरावट के रुझान के साथ जी-सेक प्रतिफल अधिकांशतः स्थिर बने रहे किन्तु पश्चिम एशिया संघर्ष, वैश्विक प्रतिफल में वृद्धि तथा ऊर्जा मूल्यों में वृद्धि के कारण पुनः सुदृढ़ हो गए।35 ऋण बाज़ार में संचारण संतोषजनक बना रहा।36
20. बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त चलनिधि सुनिश्चित करने हेतु, रिज़र्व बैंक ने सक्रिय रूप से स्थायी एवं अस्थायी चलनिधि प्रयास किए।37 आगे, हम चलनिधि प्रबंधन में सक्रिय एवं पूर्व-निवारक बने रहेंगे तथा अर्थव्यवस्था की उत्पादक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त चलनिधि सुनिश्चित करेंगे।
वित्तीय स्थिरता
21. अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) की पूंजी पर्याप्तता, चलनिधि, आस्ति गुणवत्ता एवं लाभप्रदता संबंधी प्रणाली-स्तरीय वित्तीय मानक सुदृढ़ बने हुए हैं।38 इसी प्रकार, एनबीएफसी के प्रणाली-स्तरीय मानक भी मज़बूत हैं, जिनमें पर्याप्त पूंजी स्थिति तथा बेहतर सकल एनपीए अनुपात शामिल हैं।39
22. उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, सभी स्रोतों से ऋण 14.3 प्रतिशत (वर्ष-दर-वर्ष) की दर से बढ़ा, जबकि एक वर्ष पूर्व यह 11.7 प्रतिशत (वर्ष-दर-वर्ष) था40। बैंक ऋण वृद्धि ने अपनी उर्ध्वगामी प्रवृत्ति बनाए रखी41 तथा यह वैविध्यपूर्ण बनी रही।
अतिरिक्त उपाय
23. अब मैं कारोबार-सुगमता, पूंजी पर्याप्तता तथा बाज़ार विकास संबंधी कुछ उपायों की घोषणा करूँगा।
कारोबार-सुगमता को प्रोत्साहन देना
24. कारोबार-सुगमता को प्रोत्साहन देने के लिए तीन उपाय प्रस्तावित हैं।
25. सर्वप्रथम, बैंक के निदेशक मंडल के समय-सदुपयोग को सुगम बनाने हेतु, हमारे सभी विद्यमान अनुदेशों की व्यापक समीक्षा के उपरांत, हम उन विषयों को संशोधित एवं युक्तिसंगत बनाने का प्रस्ताव करते हैं जिन पर ध्यान अपेक्षित है।
26. द्वितीय, आपको स्मरण होगा कि हमने हाल ही में एक विस्तृत अभ्यास किया था जिसके अंतर्गत 9000 से अधिक विनियामकीय अनुदेशों को समेकित कर उन्हें 238 मास्टर निदेशों में रूपांतरित किया गया था। इसी प्रकार का एक समेकन अभ्यास अब हमारे सभी पर्यवेक्षी अनुदेशों के लिए भी पूर्ण कर लिया गया है।
27. तृतीय, एमएसएमई में कारोबार-सुगमता को बढ़ावा देने हेतु, हम टीआरईडीएस(TReDS) प्लेटफॉर्म पर उनके ऑनबोर्डिंग के समय समुचित सावधानी की आवश्यकता को समाप्त करने का प्रस्ताव करते हैं।
पूंजी पर्याप्तता का समर्थन
28. बैंकों की पूंजी पर्याप्तता के संबंध में दो उपाय प्रस्तावित हैं।
29. सर्वप्रथम, सीआरएआर की गणना में त्रैमासिक लाभ को शामिल करने हेतु एनपीए प्रावधान संबंधी शर्त को हटाने का प्रस्ताव है।
30. द्वितीय, गत वर्षों के दौरान विवेकपूर्ण ढांचे में हुए परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए, निवेशों के मूल्य में होने वाली गिरावट से बचाव के लिए एक अतिरिक्त बफर के रूप में निवेश उतार-चढ़ाव रिज़र्व (आईएफ़आर) के रखरखाव की आवश्यकता को समाप्त करने का प्रस्ताव है।
मुद्रा बाज़ार का विकास
31. मीयादी मुद्रा बाज़ार के और विकास के लिए, हमने इस बाज़ार खंड में गैर-बैंक संस्थाओं की कुछ अतिरिक्त श्रेणियों को अनुमति देने का निर्णय लिया है। वर्तमान में, केवल बैंक और एकल प्राथमिक व्यापारी (एसपीडी) ही इस बाज़ार में भाग लेने के पात्र हैं। हम मीयादी मुद्रा बाज़ार में एसपीडी की उधार-सीमा को भी बढ़ा रहे हैं।
समापन टिप्पणियाँ
32. अंत में, पश्चिम एशिया संघर्ष बढ़ने से वैश्विक आर्थिक परिस्थितियाँ एवं रुझान प्रतिकूल हुए हैं। इनका संवृद्धि-मुद्रास्फीति संभावना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। जैसा कि पूर्व में दोहराया गया है, हम बदलती हुई स्थिति पर पूरी तरह से नज़र रखेंगे और ऐसी नीतियां लागू करेंगे जिनमें अर्थव्यवस्था के सर्वोत्तम हितों को प्राथमिकता दी जाए।
33. धन्यवाद। नमस्कार और जय हिन्द।
(ब्रिज राज)
मुख्य महाप्रबंधक
प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/37
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