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मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2026-27 मौद्रिक नीति समिति का संकल्प 6 से 8 अप्रैल 2026

8 अप्रैल 2026

मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2026-27
मौद्रिक नीति समिति का संकल्प
6 से 8 अप्रैल 2026

मौद्रिक नीति निर्णय

मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 60वीं बैठक 6 से 8 अप्रैल 2026 तक श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक की अध्यक्षता में आयोजित की गई। एमपीसी के सदस्य डॉ. नागेश कुमार, श्री सौगत भट्टाचार्य, प्रो. राम सिंह, डॉ. पूनम गुप्ता और श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य बैठक में शामिल हुए।

2. उभरते समष्टि-आर्थिक और वित्तीय घटनाक्रमों तथा संभावना का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद, एमपीसी ने सर्वसम्मति से चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5.00 प्रतिशत, तथा सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) दर और बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर बनी रहेगी। एमपीसी ने तटस्थ रुख बनाए रखने का भी निर्णय लिया।

संवृद्धि और मुद्रास्फीति की संभावना

वैश्विक संभावना

3. पश्चिम एशिया में संघर्ष छिड़ने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारी रुकावट आई है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने एक अभूतपूर्व चुनौती खड़ी हो गई है – कीमतें बढ़ गई हैं और वैश्विक संवृद्धि कम हो गई है। ऐसे माहौल में, मौद्रिक नीति के सामने एक मुश्किल दुविधा है – नीतिगत सख्ती करके मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं को नियंत्रित रखना, और साथ ही संवृद्धि पर पड़ने वाले इसके प्रभाव को कम से कम रखना। प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में लंबे समय तक राजकोषीय स्थिरता को लेकर चिंताओं के कारण सॉवरेन बॉन्ड प्रतिफल पहले से ही उच्च थे; अब मुद्रास्फीति के डर से वे और भी बढ़ गए हैं। इसके अलावा, इक्विटी मूल्यांकन (वैल्यूएशन) में भी सुधार देखने को मिला है। वैश्विक वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल के चलते, अमेरिकी डॉलर में तेज़ी आई है; 'सेफ हेवन' (सुरक्षित निवेश) की मांग से इसे बल मिला है, जिससे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है। संघर्ष का और अधिक तेज़ होना, इसका लंबे समय तक चलना और इसका भौगोलिक दायरा बढ़ना – ये सभी वैश्विक संभावना के लिए प्रमुख नकारात्मक जोखिम बने हुए हैं।

घरेलू दृष्टिकोण

4. घरेलू स्थिति के संबंध में, भारतीय अर्थव्यवस्था 2025-26 में आघात-सह बना रहा। नए जीडीपी शृंखला (आधार वर्ष 2022-23) के दूसरे प्रारंभिक अनुमानों (एसएई) के अनुसार, वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के वर्ष-दर-वर्ष 7.6 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है। निजी उपभोग और स्थिर निवेश ने समग्र संवृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जबकि निवल बाह्य मांग नरम बनी रही। आपूर्ति के संबंध में, अनुमानित वास्तविक जीवीए संवृद्धि 7.7 प्रतिशत रही, जो उत्साहित सेवा क्षेत्र और मजबूत विनिर्माण गतिविधि से प्रेरित थी।

5. आगे चलकर, ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतों के साथ-साथ स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में विघटन के कारण आपूर्ति आघात, 2026-27 में घरेलू उत्पादन पर एक बाधा के रूप में कार्य करेगा। वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ी हुई अस्थिरता और इसके घरेलू वित्तीय परिस्थितियों पर प्रभाव- विस्तार, संवृद्धि की संभावनाओं पर दबाव डालेगा। बाह्य स्थिति के संबंध में, यदि संघर्ष लंबे समय तक चलता है, तो प्रमुख जहाज यात्रा मार्गों में विघटन और इसके साथ आने वाली माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि के कारण वस्तुओं के निर्यात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, सेवा क्षेत्र में बने रहने वाली गति, जीएसटी सुधार का लगातार प्रभाव, विनिर्माण में बढ़ता क्षमता उपयोग, तथा वित्तीय संस्थानों और कॉर्पोरेट के स्वस्थ तुलन- पत्र को घरेलू मांग को समर्थन देते रहना चाहिए। इस परिदृश्य में, केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित कई कार्यनीतिक और अग्रणी क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ाने पर सरकार का ध्यान, भारत के आगामी संवृद्धि पथ के लिए शुभ संकेत है। इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए और यह मानते हुए कि संघर्ष का नकारात्मक प्रभाव आगे के समय तक सीमित रहेगा, 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि 6.9 प्रतिशत अनुमानित है, जिसमें पहली तिमाही में 6.8 प्रतिशत; दूसरी तिमाही में 6.7 प्रतिशत; तीसरी तिमाही में 7.0 प्रतिशत; और चौथी तिमाही में 7.2 प्रतिशत (चार्ट 1) होगी। इसके अलावा, संघर्ष के आगे बढ़ने, इसके व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में जारी रहने और ऊर्जा के बुनियादी ढांचे की क्षति के संबंध में अनिश्चितता, साथ ही मौसम से संबंधित घटनाओं के कारण घरेलू संवृद्धि की संभावना पर नकारात्मक जोखिम बना हुआ है।

6. नए सीपीआई शृंखला (2024=100) के अनुसार, फरवरी 2026 में हेडलाइन मुद्रास्फीति जनवरी के 2.7 प्रतिशत से बढ़कर 3.2 प्रतिशत हो गई। यह वृद्धि मुख्य रूप से अनुकूल न होने वाले आधार प्रभावों के कारण हुई, भले ही गति निर्बल बनी रही। जबकि फरवरी में खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई, मूल (खाद्य और ईंधन को छोड़कर) मुद्रास्फीति यथावत् बनी रही। मूल्यवान धातुओं को छोड़कर, जनवरी और फरवरी में मूल मुद्रास्फीति 2.1 प्रतिशत पर मध्यम बनी रही, जो अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबावों की कमजोरी को सुझाती है।

7. चल रहे संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की कीमतों में बड़ी अस्थिरता उत्पन्न की है, जिससे निकट अवधि की मुद्रास्फीति संभावना में काफी अनिश्चितता आई है। वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का प्रभाव चुनिंदा ईंधनों, जैसे प्रीमियम पेट्रोल, एलपीजी और औद्योगिक उपयोग के लिए डीजल, संबंधी कीमतों में वृद्धि के रूप में दिखाई दिया है। दूसरी ओर, मजबूत रबी फसल के कारण निकट अवधि में खाद्य आपूर्ति की संभावनाएं बढ़ी हैं, जिससे कुछ राहत मिली है। इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें पहली तिमाही में 4.0 प्रतिशत; दूसरी तिमाही में 4.4 प्रतिशत; तीसरी तिमाही में 5.2 प्रतिशत; और चौथी तिमाही में 4.7 प्रतिशत होगा। पश्चिम एशिया संघर्ष और संभावित एल नीनो की स्थितियों (जो दक्षिण-पश्चिम मानसून पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं) के कारण लगातार उच्च ऊर्जा कीमतें, मुद्रास्फीति पर ऊधर्वगामी जोखिम उत्पन्न करती हैं (चार्ट 2)। 2026-27 के लिए मूल मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, और मूल्यवान धातुओं को छोड़कर यह और भी कम है, जो यह संकेत देता है कि अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबाव नियंत्रित रहने की आशा है।

Chart 1 and 2

मौद्रिक नीति संबंधी निर्णयों का औचित्य

8. पिछली नीतिगत बैठक के बाद से, भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं काफी बढ़ गई हैं। हेडलाइन मुद्रास्फीति नियंत्रण में है और लक्ष्य से नीचे है, लेकिन मुद्रास्फीति संभावना के लिए ऊर्ध्वगामी जोखिम बढ़ गया है; इसका कारण ऊर्जा की कीमतों के दबाव में बढ़ोतरी और मौसम में संभावित गड़बड़ियां हैं, जो खाद्य मूल्यों को प्रभावित कर रहा है। मूल मुद्रास्फीति का दबाव कम बना हुआ है, हालांकि आपूर्ति शृंखला में रुकावटें और दूसरे दौर के प्रभाव (सेकंड-राउंड इफ़ेक्ट) का जोखिम, भविष्य में मुद्रास्फीति पथ को अनिश्चित बना देते हैं।

9. फरवरी 2026 तक के उच्चावृति संकेतक से पता चलता है कि आर्थिक गतिविधियों में मज़बूत गति बनी रहेगी। संवृद्धि के आवेग को मज़बूत निजी उपभोग और निवेश की मांग से लगातार समर्थन मिल रहा है। हालाँकि, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का संवृद्धि पर बुरा असर पड़ेगा। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी, अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि से जुड़ी अधिक इनपुट लागत, और साथ ही आपूर्ति शृंखला में रुकावटों के कारण डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के लिए प्रमुख इनपुट की उपलब्धता सीमित हो सकती है, जिससे संवृद्धि बाधित होगी। सरकार ने निर्यात को बढ़ावा देने और आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से कई कदम उठाए हैं, जिनसे इस संघर्ष के बुरे असर को कम करने में मदद मिलनी चाहिए।

10. एमपीसी ने यह पाया कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष की तीव्रता और अवधि, तथा इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा और अन्य बुनियादी ढांचों को होने वाला नुकसान, मुद्रास्फीति और संवृद्धि की संभावनाओं के लिए जोखिम उत्पन्न करता है। हालाँकि, भारतीय अर्थव्यवस्था के मूल आधार अब अधिक मज़बूत स्थिति में हैं, जिससे इसमें अतीत की तुलना में अब आघात- सहनीयता बढ़ ई है। अर्थव्यवस्था इस समय आपूर्ति आघातों का सामना कर रही है। बदलते हालात और उभरती संवृद्धि -मुद्रास्फीति संभावना पर नज़र रखते हुए इंतज़ार करना ही समझदारी है। तदनुसार, एमपीसी ने नीतिगत दरों को यथावत् रखने के पक्ष में वोट किया; साथ ही वह पूरी तरह सतर्क बनी हुई है, प्राप्त सूचनाओं पर बारीकी से नज़र रख रही है और जोखिमों के संतुलन का आकलन कर रही है। एमपीसी ने तटस्थ रुख को जारी रखने का भी निर्णय लिया, ताकि प्राप्त सूचनाओं के आधार पर विवेकपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया देने का सहूलियत बना रहे।

11. एमपीसी की बैठक के कार्यवृत्त 22 अप्रैल 2026 को प्रकाशित किए जाएंगे।

12. एमपीसी की अगली बैठक 3 से 5 जून 2026 के दौरान निर्धारित है।

(ब्रिज राज)   
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/36


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