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भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – ऋण सुविधाएँ) संशोधन निदेश 2026 (संशोधित)

भारिबैं/2025-26/254
विवि.सीआरई.आरईसी.446/07-01-001/2025-26

30 मार्च 2026

भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – ऋण सुविधाएँ) संशोधन निदेश 2026 (संशोधित)

कृपया भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – ऋण सुविधाएँ) निदेश 2025 (जिसे आगे ‘निदेश’ कहा गया है) का संदर्भ लें।

2. समीक्षा करने पर और बैंककारी विनियमन अधिनियम 1949 की धारा 21 और 35ए द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए तथा इस संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक (जिसे आगे रिज़र्व बैंक कहा जाएगा) को सक्षम करने वाले अन्य सभी कानूनों के अनुसार, रिज़र्व बैंक इस बात से संतुष्ट है कि ऐसा करना सार्वजनिक हित में आवश्यक और समीचीन है, एतद्द्वारा, इसके बाद विनिर्दिष्ट संशोधन निदेश (संशोधित) जारी करता है।

3. संशोधन निदेश (संशोधित) निदेशों में निम्नलिखित आशोधन करते हैं:

3(1) निदेश के ‘अध्याय I - प्रारंभिक’ के पैरा 4(1) में निम्नलिखित आशोधन किए जाएंगे:

3(1)(i) उप-पैरा (i) को (iबी) के रूप में पुनः क्रमांकित किया जाएगा।

3(1)(ii) उप-पैरा (vii) को निम्नलिखित से प्रतिस्थापित किया जाएगा:

(vii) संपार्श्विक प्रतिभूति” या “संपार्श्विक” का अर्थ है ऐसी आस्ति है जिस पर ऋण सुविधा रक्षित करने के लिए ऋणदाता के पक्ष में प्रतिभूति प्रभार सृजित किया जाता है।

3(1)(iii) निम्नलिखित उप-पैरा जोड़े जाएँगे:

(iए) "अधिग्रहण वित्त" का अर्थ है किसी पात्र उधारकर्ता इकाई को दी जाने वाली वित्तीय सुविधा या सहायता, जिसका उद्देश्य किसी लक्ष्य कंपनी का नियंत्रण हासिल करना हो (जिसमें समामेलन या विलय की योजना के द्वारा किया गया अधिग्रहण भी शामिल है)। इस तरह के निधीयन में लक्ष्य कंपनी के मौजूदा कर्ज का पुनर्वित्त भी शामिल हो सकता है यदि पुनर्वित्त अधिग्रहण वित्त का अभिन्न अंग है।

(ivए) "पूरक वित्त " का अर्थ होगा वैध कारोबार प्रयोजन के लिए उधारकर्ता को अंतरिम अवधि, जो एक वर्ष से अधिक न हो, के लिए वित्तपोषण करना, जहां उधारकर्ता के पास इक्विटी, कर्ज या हाइब्रिड लिखतों को जारी करने के माध्यम से या अंतरिम अवधि के भीतर मौजूदा कारोबार/आस्तियों के एक हिस्से के विनिवेश/अलग करने के माध्यम से वित्तीय संसाधन जुटाकर ऐसे ऋणों को चुकाने की एक दृढ़ योजना और क्षमता है।

(v) पूंजी बाजार मध्यस्थों (सीएमआई)" का अर्थ पूंजी बाजारों में व्यापार निष्पादन और बाजार अवसंरचना सेवाएं करने वाली विनियमित संस्थाएं होंगी, जिनमें ब्रोकिंग, समाशोधन, अभिरक्षा, बाजार निर्माण या अन्य आकस्मिक सेवाएं शामिल हैं।

बशर्ते कि सीएमआई में एकल प्राथमिक व्यापारी और अर्हताप्राप्त केंद्रीय प्रतिपक्षकार (क्यूसीसीपी) शामिल नहीं होंगे।

(vबी) 'नकदी और नकदी समकक्ष' में नकदी, ऋणदात्री बैंक के पास रखी गई मांग और सावधि जमा में रखी गई शेष राशि, और एक दिवसीय पारस्परिक निधि की इकाइयों में निवेश (न्यूनतम 10 प्रतिशत के हेयरकट के साथ) शामिल होंगे।

(viiiए) "नियंत्रण" का वही अर्थ होगा जो कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 2(27) में परिभाषित किया गया है।

(xivए) "पात्र प्रतिभूतियों" में निम्नलिखित प्रतिभूतियां शामिल होंगी:

(ए) सूचीबद्ध समूह-1 इक्विटी शेयर और वरीयता शेयर;

स्पष्टीकरण: भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा जारी अनुदेशों के तहत परिभाषित समूह 1 प्रतिभूतियां

(बी) सरकारी प्रतिभूतियां, जिनमें खजाना बिल और राष्ट्रिक स्वर्ण बॉन्ड शामिल हैं;

(सी) संपरिवर्तनीय क़र्ज़ प्रतिभूतियों सहित सूचीबद्ध कर्ज प्रतिभूतियां, जिनकी रेटिंग बीबीबी या उच्चतर हो;

स्पष्टीकरण: समय-समय पर अद्यतन दिनांक 9 अगस्त 2021 की सेबी (गैर-संपरिवर्तनीय प्रतिभूतियों का निर्गम और सूचीबद्धता) विनियमावली 2021 की धारा 2(1)(के) के तहत परिभाषित कर्ज प्रतिभूतियाँ।

(डी) पारस्परिक निधि योजनाओं की इकाइयां जो सूचीबद्ध हैं या जहां इक्विटी, इक्विटी से संबंधित लिखतों या कर्ज लिखतों में अंतर्निहित निवेश के साथ आस्ति प्रबंधन कंपनी के माध्यम से ऐसी इकाइयों के लिए पुनर्खरीद/मोचन सुविधा उपलब्ध है।

(ई) एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) की इकाइयाँ (सोने, चांदी और किसी भी अन्य कमोडिटी ईटीएफ को छोड़कर)

(एफ) भू-संपदा निवेश न्यास (आरईआईटी) और अवसंरचना निवेश न्यास (इनविट) की इकाइयाँ।

(xxiiए) "मूल्य की तुलना में ऋण (एलटीवी)" का अर्थ होगा किसी भी दिन के लिए प्रतिभूतियों के मूल्य की तुलना में बकाया ऋण राशि का अनुपात।

(xxiiबी) "मार्जिन" का अर्थ उधारकर्ता के अंशदान से होगा, जो नकदी या अन्य तरल आस्तियों के रूप में, बैंक वित्त के माध्यम से प्रतिभूति खरीदने या उधार लेने या बैंक से गैर-निधि-आधारित सुविधा प्राप्त करने के प्रयोजन हेतु दिया जाता है ।

(xxiiसी) "गैर-वित्तीय कंपनी" का अर्थ ऐसी इकाई से होगा जो मुख्य रूप से वित्तीय गतिविधियों में संलग्न नहीं है और घरेलू इकाइयों के संदर्भ में, गैर-बैंकिंग संस्थान को संदर्भित करेगी जो एक कंपनी है, लेकिन आरबीआई अधिनियम 1934 के अनुसार 'वित्तीय संस्थान' या 'गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी' की परिभाषा में शामिल नहीं है।

(xxxए) “प्राथमिक प्रतिभूति” का अर्थ उन आस्तियों पर सृजित प्रतिभूति से होगा जिन्हें उधारकर्ता को दी गई ऋण सुविधा से वित्तपोषित किया गया है।

3(2) निदेशों के 'अध्याय II - बोर्ड की भूमिका' में, निम्नलिखित संशोधन किए जाएंगे:

3(2)(i) उप-पैरा 5(11) निम्नलिखित के साथ प्रतिस्थापित किया जाएगा:

“पात्र प्रतिभूतियों सहित वित्तीय आस्तियों पर ऋण।”

3(2)(ii) उप- पैरा 5(13) को निम्नलिखित के साथ प्रतिस्थापित किया जाएगा:

“पूरक वित्त”

3(2)(iii) उप-पैरा 14 के बाद, निम्नलिखित उप-पैरा जोड़े जाएंगे:

“(15) अधिग्रहण वित्तपोषण, जिसमें भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं द्वारा दिया गया वित्तपोषण भी शामिल है।

(16) पूंजी बाजार मध्यस्थों (सीएमआई) को ऋण सुविधाएं”

3(3) निदेश के ‘अध्याय IX – अवसंरचना वित्तपोषण’ में निम्नलिखित आशोधन किए जाएंगे:

3(3)(i) पैरा 137 हटा दिया जाएगा।

3(3)(ii) उप-पैरा 137ए (4) में निम्न प्रकार से आशोधन किया जाएगा:

“अन्य संस्थाओं की इक्विटी प्राप्त करने के लिए इनविट को बैंक का वित्त, अध्याय XI - अधिग्रहण वित्त में दी गई प्रासंगिक शर्तों के अधीन होगा।”

3(4) निदेश केअध्याय XI - अधिग्रहण वित्त’ में, निम्नलिखित आशोधन किए जाएंगे:

3(4)(i) खंड ए से सी तक, और तदनुसार पैराग्राफ 158 से 170 तक, हटा दिए जाएंगे।

3(4)(ii) पैरा 170 के बाद, निम्नलिखित नए खंड और पैरा जोड़े जाएँगे:

170ए. विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम 1999 के प्रावधानों और उसके तहत बनाए गए नियमों और विनियमों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बैंक द्वारा भारतीय गैर-वित्तीय कंपनी पर 'नियंत्रण' प्राप्त करने के लिए या रणनीतिक निवेश- अर्थात, अल्पकालिक लाभ के लिए केवल वित्तीय पुनर्गठन के बजाय संभावित तालमेल के माध्यम से अधिग्रहणकर्ता के लिए दीर्घकालिक मूल्य बनाने के मूल उद्देश्य से संचालित निवेश, के रूप में घरेलू या विदेशी गैर-वित्तीय लक्ष्य कंपनी को 'नियंत्रण' प्राप्त करने की दिशा में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए अधिग्रहण वित्त दिया जा सकता है।

170बी. ऐसे मामलों में जहां लक्ष्य कंपनी में नियंत्रण प्राप्त करने से लक्ष्य कंपनी द्वारा ऐसी कंपनियों के नियंत्रण के कारण कई कंपनियों पर नियंत्रण होता है, ऐसी सभी कंपनियों को ध्यान में रखते हुए संभावित तालमेल के मानदंडों का उपयुक्त मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

बशर्ते कि, अधिग्रहण वित्त को गैर-वित्तीय लक्ष्य कंपनी के अधिग्रहण के लिए ऐसी अधिग्राहक कंपनी को नहीं दिया जाएगा, जिस लक्षित कंपनी में सहायक कंपनियों या संयुक्त उद्यमों के रूप में एक या अधिक वित्तीय संस्थाएं हैं।

170सी. अधिग्रहण वित्त बैंकों द्वारा अधिग्राहक कंपनी के मौजूदा अधिग्रहण कर्ज को पुनर्वित्त करने के लिए भी प्रदान किया जा सकता है, जो पुनर्वित्त के समय इन निदेशों के प्रावधानों और विवेकपूर्ण आवश्यकताओं के अनुपालन के अधीन है, पैरा 6(12) भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - तनावग्रस्त आस्तियों का समाधान) निदेश 2025 में निर्दिष्ट है।

बशर्ते कि, अधिग्रहण वित्त का पुनर्वित्त केवल तभी हो सकता है जब अधिग्रहण वित्त सभी प्रकार से पूर्ण हो चुका हो, जिसके परिणामस्वरूप अधिग्रहण करने वाली कंपनी द्वारा लक्ष्य कंपनी का नियंत्रण लिया गया हो।

बशर्ते यह भी कि, पुनर्वित्त का उपयोग अधिग्रहण करने वाली कंपनी के अंशदान के पुनर्भुगतान के लिए या अधिग्रहण वित्त कर्ज के शोधन के अलावा किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं किया जाएगा।

डी. बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीति

170डी. बैंक अधिग्रहण वित्त पर बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीति लागू करेंगे, जिसमें ऐसे लेनदेन, विशेष रूप से जोखिम सीमा, इक्विटी अंशदान, लीवरेज गुणक और नकदी-प्रवाह निश्चितता से संबंधित, की संरचनात्मक जटिलताओं को संबोधित करने वाले हामीदारी बेंचमार्क को उपयुक्त रूप से शामिल किया जाएगा।

ई. पात्र संस्थाएं और शर्तें

170ई. अधिग्रहण वित्त निम्न को दिया जा सकता है:

(1) अधिग्रहण करने वाली कंपनी को इसके द्वारा सीधे लक्ष्य कंपनी के अधिग्रहण के लिए; या

(2) अधिग्रहण करने वाली कंपनी को, ऐसी सहायक कंपनी द्वारा लक्ष्य कंपनी के अधिग्रहण के लिए भारत या विदेशों में निगमित गैर-वित्तीय सहायक कंपनी को आगे उधार देने के लिए; या

(3) अधिग्रहण करने वाली कंपनी की भारत या विदेशों में निगमित मौजूदा गैर-वित्तीय सहायक कंपनी को, अधिग्रहण करने वाली कंपनी के आधार पर; या

(4) अधिग्रहण करने वाली कंपनी द्वारा भारत में या विदेशों में विशेष रूप से इस प्रयोजन के लिए किसी अन्य गैर-वित्तीय कंपनी के साथ अकेले या संयुक्त रूप से स्थापित किए गए उप-अनुषंगी विशेष प्रयोजन माध्यम (एसपीवी) के लिए, बशर्ते कि एसपीवी का लक्ष्य अधिग्रहण और धारण के अलावा कोई अन्य कारोबारिक उद्देश्य नहीं है। यह कोर निवेश कंपनियों से संबंधित मौजूदा मानदंडों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा।

बशर्ते कि, जहां अधिग्रहण करने वाली कंपनी के पास एसपीवी या उसकी सहायक कंपनी में बहुमत से कम मताधिकार है, जिसके माध्यम से अधिग्रहण किया जा रहा है, अधिग्रहण वित्त की अनुमति केवल तभी दी जाएगी जब:

(ए) अधिग्रहण करने वाली कंपनी एसपीवी या सहायक कंपनी, जैसा भी मामला हो, में सबसे बड़ा वोटिंग ब्लॉक रखती है तथा

(बी) कोई अन्य शेयरधारक या शेयरधारकों का समूह जो एक साथ काम कर रहा है, ऐसे अधिकार नहीं रखता है जो एसपीवी या सहायक कंपनी पर अधिग्रहण करने वाली कंपनी के नियंत्रण को रद्द कर सकता है या वीटो कर सकता है।

170एफ. अधिग्रहण वित्त निम्नलिखित शर्तों के अधीन होगा:

(1) अधिग्रहण करने वाली कंपनी का वित्तीय मानदंड:

170जी. अधिग्रहण करने वाली कंपनी (या, जहां अधिग्रहण एसपीवी या सहायक कंपनी के माध्यम से होता है, ऐसी एसपीवी या सहायक कंपनी को नियंत्रित करने वाली अधिग्रहण करने वाली कंपनी) अधिग्रहण वित्त को मंज़ूरी देते समय निम्नलिखित वित्तीय मानदंडों को पूरा करेगी:

(i) यदि भारत में किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध है: (ए) न्यूनतम निवल मूल्य ₹500 करोड़ है; और (बी) पिछले तीन लगातार वित्तीय वर्षों में से प्रत्येक में रिपोर्ट किए गए करों के बाद निवल लाभ।

(ii) यदि असूचीबद्ध है: (ए) न्यूनतम निवल मूल्य ₹500 करोड़; (बी) पिछले तीन लगातार वित्तीय वर्षों में से प्रत्येक में रिपोर्ट किए गए करों के बाद निवल लाभ, और (सी) क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से निवेश ग्रेड रेटिंग (बीबीबी- या उससे ऊपर)। यदि मंज़ूरी के समय अधिग्रहण करने वाली कंपनी के लिए कोई रेटिंग उपलब्ध नहीं है, तो इसे अधिग्रहण वित्त के संवितरण से पहले प्राप्त करना होगा।

स्पष्टीकरण:

(i) अधिग्रहण करने वाली कंपनी के उपर्युक्त वित्तीय मानदंडों की समेकित और साथ ही एकल स्तरों पर जांच की जानी चाहिए।

(ii) निवल मूल्य की गणना कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 2(57) के प्रावधानों के अनुसार की जाएगी।

(2) ऋण मूल्यांकन और वित्तपोषण की शर्तें

170एच. ऋण मूल्यांकन प्रो-फॉर्मा समेकित आधार पर किया जाएगा, जिसमें अधिग्रहण करने वाली कंपनी के वित्तीय और समेकित आधार पर लक्ष्य कंपनी के वित्तीय शामिल होंगे।

170आई. बैंक वित्तपोषण का कुल मूल्य अधिग्रहण मूल्य के 75 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, जैसा कि बैंक द्वारा स्वतंत्र रूप से निम्नानुसार मूल्यांकन किया गया है:

(1) सूचीबद्ध कंपनी: सेबी (शेयरों का पर्याप्त अर्जन और अधिग्रहण) विनियमावली 2011 ('सेबी एसएएसटी विनियम') के पैरा 8 (2) (ई) के अनुसार, अक्सर कारोबार नहीं किए जाने वाले शेयरों का मूल्यांकन करने के लिए स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ता (बैंक द्वारा नियुक्त किया जाएगा) द्वारा निर्धारित मूल्यांकन, (मूल्यांकन मापदंडों का उपयोग करके, जिसमें शामिल है, बही मूल्य, तुलनीय व्यापार गुणक और ऐसे अन्य मापदंड जो ऐसी कंपनियों के शेयरों के मूल्यांकन के लिए प्रथागत हैं);

(2) असूचीबद्ध कंपनी: सेबी एसएएसटी विनियमावली 2011 के पैरा 8 (2) (ई) के अनुसार, अक्सर कारोबार नहीं किए जाने वाले शेयरों का मूल्यांकन करने के लिए दो स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ताओं (बैंक द्वारा नियुक्त) द्वारा निर्धारित मूल्यांकन में से कम (मूल्यांकन मापदंडों का उपयोग करके, जिसमें शामिल है, बही मूल्य, तुलनीय व्यापार गुणक और ऐसे अन्य मापदंड जो ऐसी कंपनियों के शेयरों के मूल्यांकन के लिए प्रथागत हैं)।

170जे. अधिग्रहण करने वाली कंपनी को अपनी निधि से शेष राशि का अंशदान करना होगा।

स्पष्टीकरण

(i) इस उद्देश्य के लिए, स्वयं की निधि का अर्थ होगा कि अधिग्रहण करने वाली कंपनी के आंतरिक उपचय, आस्तियों की बिक्री या निवेश के मोचन या नई इक्विटी जारी करने से प्राप्त निधि।

(ii) किसी भी उधार की आय; या कोई भी लिखत जो नियत पुनर्भुगतान दायित्व या निवेशक द्वारा प्रयोग करने योग्य विक्रय विकल्प रखता है; या कोई भी अंत:-समूह निधियन जहां स्रोत इकाई ने स्वयं अंशदान करने के लिए उधार लिया है, स्वयं की निधि नहीं मानी जाएगी।

बशर्ते कि, अधिग्रहण करने वाली कंपनी, यदि सूचीबद्ध है, तो निम्नलिखित के अधीन न्यूनतम स्वयं की निधि की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पूरक वित्त का उपयोग कर सकती है:

ए. पूरक वित्त का पुनर्भुगतान केवल आंतरिक उपचय या इक्विटी इश्यू या आस्ति की बिक्री के माध्यम से एक निर्दिष्ट अवधि (अधिकतम 12 महीने) के भीतर होना चाहिए।

बी. यदि पूरक वित्त किसी बैंक द्वारा प्रदान किया जाता है, तो यह सुरक्षित आधार पर होगा।

सी. पूरक वित्त के परिणामस्वरूप अधिग्रहण वित्त के लिए प्रतिभूति कवरेज का अवमिश्रण नहीं किया जाना चाहिए।

170के. अधिग्रहण करने वाली कंपनी की सहायक कंपनी या एसपीवी को दिए गए अधिग्रहण वित्त के मामलों में अधिग्रहण करने वाली कंपनी से कॉर्पोरेट गारंटी अनिवार्य होगी।

170एल. अधिग्रहण के बाद, अधिग्रहण करने वाली कंपनी के समेकित तुलन-पत्र स्तर पर कर्ज इक्विटी अनुपात निरंतर आधार पर 3: 1 से अधिक नहीं होगा।

(3) नियंत्रण अधिग्रहण आवश्यकताएं

170एम. जिन लिखतों के माध्यम से इस तरह के नियंत्रण को प्राप्त करने की मांग की जाती है, उनमें इक्विटी शेयर, अनिवार्य रूप से संपरिवर्तनीय अधिमान शेयर और लक्ष्य कंपनी पर नियंत्रण प्रदान करने वाले अनिवार्य रूप से संपरिवर्तनीय डिबेंचर शामिल हो सकते हैं।

बशर्ते कि, लक्ष्य कंपनी पर अधिग्रहण करने वाली कंपनी या उसकी समूह संस्थाओं के सभी कर्ज दावे ऋण सुविधा की पूरी अवधि के लिए अधिग्रहण वित्त देने वाले बैंक (बैंकों) के दावों के गौण होंगे।

170एन. नियंत्रण एकल लेनदेन, या इंटर-कनेक्टेड लेनदेन की एक श्रृंखला के माध्यम से किया जा सकता है, लेकिन अधिग्रहण वित्त के पहले संवितरण की तारीख से 12 महीने के भीतर पूरा किया जाएगा ।

बशर्ते कि, जहां अधिग्रहण करने वाली कंपनी पहले से ही अधिग्रहण वित्त लेने से पहले लक्षित कंपनी पर नियंत्रण रखती है, अधिग्रहण वित्त को केवल ऐसी अतिरिक्त हिस्सेदारी प्राप्त करने के लिए दिया जा सकता है जो 26 प्रतिशत, 51 प्रतिशत, 75 प्रतिशत, 90 प्रतिशत मताधिकारों, जो प्रत्येक लागू कानून के तहत भौतिक रूप से उन्नत अभिशासन या नियंत्रण अधिकार प्रदान करते हों, की पर्याप्त प्रारंभिक सीमा को पार करती है।

(4) संबंधित पक्षकार प्रतिबंध:

170ओ. अधिग्रहण करने वाली कंपनी और लक्ष्य कंपनी संबंधित पक्षकार नहीं होंगे, जहां "संबंधित पक्षकार" का अर्थ है:

(i) कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 2(76) के तहत परिभाषित संबंध रखने वाली संस्थाएं; या

(ii) सामान्य नियंत्रण, सामान्य प्रबंधन या सामान्य प्रमोटर समूह के तहत, चाहे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, संस्थाएं।

बशर्ते कि, उपर्युक्त प्रतिबंध 170एन के परंतुक के तहत निर्धारित अतिरिक्त हिस्सेदारी के अधिग्रहण के वित्तपोषण के लिए लागू नहीं होंगे।

जी. प्रतिभूति सृजन और मूल्यांकन

170पी. अधिग्रहण वित्त के लिए प्रतिभूति कवर की सीमा और प्रकृति का निर्धारण बैंक कर सकता है।

बशर्ते कि, अधिग्रहण वित्त को वित्तीय लिखतों द्वारा प्रतिभूत किया जाएगा जो लक्ष्य कंपनी के माध्यम से जारी किए गए हैं जिसके माध्यम से अधिग्रहण करने वाली कंपनी द्वारा बीआर अधिनियम 1949 की धारा 19(2) के प्रावधानों के प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उस पर नियंत्रण हासिल किया जाता है।

बशर्ते यह भी कि, अधिग्रहणकर्ता और/या लक्ष्य कंपनी की अन्य भाररहित आस्तियां और प्रवर्तक की व्यक्तिगत गारंटी को बैंक की नीति के अनुसार अतिरिक्त संपार्श्विक के रूप में लिया जा सकता है।

170क्यू. पैरा 170एम में अनुमत अधिग्रहण करने वाली कंपनी द्वारा अधिग्रहीत किए गए लिखत किसी भी ऋण-भार से मुक्त होंगे।

एच. अन्य शर्तें

170आर. समूहन व्यवस्था के हिस्से के रूप में किसी भारतीय बैंक की विदेशी शाखाओं द्वारा किया गया अधिग्रहण वित्त इस अध्याय में दिए गए निदेशों के अधीन नहीं होगा, बशर्ते कि, किसी विशेष सौदे के लिए ऐसी समूहन व्यवस्था के तहत किसी बैंक का वित्त निधीयन अंशदान, इसकी सभी विदेशी शाखाओं में, सौदे के तहत कुल निधीयन का 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।

170एस. बैंक अधिग्रहण वित्त के प्रति अपने समग्र एक्सपोजर के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – संकेन्द्रण जोखिम प्रबंधन) निदेश 2025 के अध्याय V में निर्दिष्ट विनियामक सीमा के भीतर सीमा तय करेंगे।

3(5) निदेश के 'अध्याय XIII - वित्तीय आस्तियों पर ऋण' में, निम्नलिखित संशोधन किए जाएंगे:

3(5) (i) सभी खंड और पैरा - खंड एम और खंड ओ और पैरा 215, 216 और 218 को छोड़कर - हटा दिए जाएंगे।

3(5) (ii) पैरा 219 के बाद एक नया खंड 'क्यू. पात्र प्रतिभूतियों पर ऋण' को डाला जाएगा, जैसा कि नीचे दिया गया है:

क्यू. पात्र प्रतिभूतियों पर ऋण

क्यू.1 सामान्य शर्तें

219ए. बैंक इस अध्याय में अनुमत पात्र प्रतिभूतियों की संपार्श्विक पर अपनी अनुमोदित नीति (जिसे इसके बाद नीति कहा जाएगा) के अनुसार ऋण सुविधाएं दे सकते हैं। नीति में, कम से कम, संपार्श्विक के रूप में प्रतिभूतियों के चयन के लिए मानदंड; एकल उधारकर्ता/समूह उधारकर्ता सीमाओं के साथ-साथ पोर्टफोलियो-स्तर का निर्धारण; एकल प्रतिभूतियों के जोखिम के लिए संकेन्द्रण सीमा; एलटीवी/मार्जिन और विभिन्न प्रतिभूतियों के लिए हेयरकट; और निरंतर मूल्यांकन और मार्जिन कॉल के लिए नियम निर्दिष्ट किए जाएँगे।

219बी. उपर्युक्त के बावजूद, बैंक द्वारा निम्नलिखित ऋणों की अनुमति नहीं दी जाएगी:

(1) अपनी प्रतिभूतियों पर ऋण;

बशर्ते कि, बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - संसाधन जुटाने संबंधी मानदंड) निदेश 2025 के प्रावधानों के तहत अवसंरचना वित्तपोषण के लिए उसके द्वारा जारी किए गए दीर्घकालिक बांडों पर व्यक्तियों को ऋण दे सकता है। बैंक का बोर्ड इस संबंध में एक नीति तैयार करेगा, जिसमें उपयुक्त मार्जिन, ऋण का उद्देश्य और अन्य आवश्यक रक्षोपाय का निर्धारण किया जाएगा। इस तरह के ऋण प्रति उधारकर्ता ₹10 लाख की सीमा के अधीन होंगे; और ऋण की अवधि अंतर्निहित बांडों की परिपक्वता अवधि से अधिक नहीं होगी। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि बैंक अन्य बैंकों द्वारा जारी किए गए ऐसे बॉन्ड के लिए ऋण नहीं देगा।

बशर्ते यह भी कि, बैंक सीडी पर उधार दे सकता है और अपनी स्वयं की सीडी की पुनर्खरीदकर सकता है जहां ऐसी सीडी पारस्परिक निधि द्वारा रखी जाती है, जो सेबी (पारस्परिक निधि ) विनियमावली 2026 के पैराग्राफ 42 (1) के प्रावधानों के अधीन है। इसके अलावा, यदि इस तरह का वित्त इक्विटी-उन्मुख पारस्परिक निधि को दिया जाता है, तो बैंकों के पूंजी बाजार के जोखिम का हिस्सा बनेगा, जैसा कि अब तक था।

(2) आंशिक रूप से भुगतान किए गए शेयरों पर ऋण;

(3) प्रतिभूतियों पर ऋण जो किसी लॉक-इन आवश्यकताओं के अधीन हैं;

(4) भारतीय निक्षेपागार रसीदों (आईडीआर) की संपार्श्विक पर ऋण;

(5) ऐसी संस्थाओं की प्रतिभूतियों पर ऋण, जिनके लिए बैंकों को ऋण और अग्रिम देने की अनुमति नहीं है;

(6) भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - ऋण जोखिम प्रबंधन) निर्देश, 2025 के पैराग्राफ 23 में निर्दिष्ट शेयरों/प्रतिभूतियों की वापसी-खरीद के लिए कंपनियों को ऋण;

(7) मूल या प्रारंभिक परिपक्वता के एक वर्ष तक के वाणिज्यिक पत्रों और गैर-संपरिवर्तनीय डिबेंचरों पर ऋण;

219सी. इस अध्याय के प्रावधानों के तहत उधार देने की गतिविधियों को करते समय, बैंक निम्नलिखित कार्य करेगा:

(1) निधियों के अंतिम उपयोग की निगरानी के लिए मजबूत तंत्र स्थापित करें।

(2) अन्य बातों के अलावा प्रतिभूतियों की कीमत में तरलता, अस्थिरता और संभावित तनाव अवधि सुधारों को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त जोखिम सीमा निर्धारित करें।

(3) सुनिश्चित करें कि प्रतिभूतियों की अवशिष्ट परिपक्वता, जो शुरू में संपार्श्विक के रूप में ली गई थी, या बाद में मूल संपार्श्विक प्रतिभूतियों के लिए प्रतिस्थापित की गई थी, ऋण की अवधि के बराबर या उससे अधिक है।

स्पष्टीकरण: अवशिष्ट परिपक्वता की शर्त गैर-स्थायी प्रतिभूतियों के मामलों में लागू होती है।

(4) सुनिश्चित करें कि शेयर रखने पर बैंककारी विनियमन अधिनियम 1949 की धारा 19(2) के प्रावधानों का पालन किया जाए।

(5) यह सुनिश्चित करें कि इन निदेशों के तहत निर्धारित विवेकपूर्ण सीमाओं का पालन किया जाए, भले ही प्रतिभूतियों के संयुक्त धारकों को संयुक्त रूप से मंज़ूरी ऋण की आनुपातिक राशि का लाभ उठाने वाले के रूप में मानते हुए ऋण दिया जाए।

(6) सरकारी प्रतिभूति अधिनियम 2006 की धारा 28, सरकारी प्रतिभूति विनियमावली 2007 के अध्याय- VII के अनुसार सरकारी प्रतिभूतियों पर गिरवी/दृष्टिबंधक/ग्राहणाधिकार का सृजन और सक्रियण; ऐसी प्रतिभूतियों के लिए सरकार द्वारा जारी किए गए किसी अन्य विशिष्ट आवश्यकताएं; और समय-समय पर रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किए गए प्रासंगिक दिशानिर्देश।

(7) यह सुनिश्चित करें कि सरकारी स्वर्ण बॉन्ड (एसजीबी) पर लिए गए ऋण भारत सरकार द्वारा जारी एसजीबी अधिसूचना में निर्दिष्ट अनुदेशों के अनुसार हैं और गिरवी/दृष्टिबंधक/ग्रहणाधिकार के सृजन और सक्रियण से संबंधित परिचालन अनुदेश समय-समय पर संशोधित 'भारत सरकार (जीओआई) की सरकारी स्वर्ण बॉन्ड योजना - प्रक्रियात्मक दिशानिर्देश - समेकित' पर 22 अक्तूबर 2021 के परिपत्र के पैरा 11 के अनुसार हैं।

219डी. इस अध्याय के तहत पात्र प्रतिभूतियों पर ऋण से उत्पन्न सभी एक्सपोजर सीएमई के रूप में शामिल किए जाएंगे, जैसा कि भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – संकेन्द्रण जोखिम प्रबंधन) निदेश 2025 में निर्दिष्ट है, सिवाय जहां भी विशेष रूप से छूट दी गई है।

क्यू.2. व्यक्तियों को ऋण देना

क्यू.2.1 दायरा

219ई. वाणिज्यिक संस्थाओं के रूप में नहीं होने वाले व्यक्तियों, जिनमें हिंदू अविभक्त परिवार (एचयूएफ) शामिल हैं, को दिए गए ऋण इस खंड के अंतर्गत कवर किए जाएंगे।

219एफ. बैंक यहां निर्दिष्ट एलटीवी और विवेकपूर्ण सीमा के अधीन, पात्र प्रतिभूतियों पर व्यक्तियों को उधार दे सकते हैं।

क्यू.2.2 एलटीवी आवश्यकताएं

219जी. बैंक अपनी ऋण नीति के अनुसार व्यक्तियों को पात्र प्रतिभूतियों पर ऋण के लिए एलटीवी निर्धारित करेंगे, जो निम्नलिखित सीमाओं के अधीन है:

पात्र प्रतिभूतियाँ एलटीवी सीमा
सरकारी प्रतिभूतियाँ (खजाना बिल सहित) बैंक की नीति के अनुसार
सरकारी स्वर्ण बॉण्ड (एसजीबी) जैसा कि सोना और चांदी संपार्श्विक पर ऋण के मामले में लागू होता है
सूचीबद्ध शेयर और सूचीबद्ध संपरिवर्तनीय कर्ज प्रतिभूतियाँ 60 प्रतिशत
पारस्परिक निधि (क़र्ज़ पारस्परिक निधि को छोड़कर), ईटीएफ की इकाइयां और आरईआईटी/इनविट की इकाइयां 75 प्रतिशत
क़र्ज़ पारस्परिक निधि 85 प्रतिशत
रेटिंग के साथ सूचीबद्ध कर्ज प्रतिभूतियाँ:
एएए
एए – बीबीबी
85 प्रतिशत
75 प्रतिशत

219एच. एलटीवी की निगरानी लगातार आधार पर की जाएगी और बैंक ऐसे उल्लंघनों के घटित होने के दिन से सात कार्य दिवसों के भीतर उल्लंघनों को तुरंत सुधारने के लिए कदम उठाएगा।

219आई. एलटीवी के प्रयोजन के लिए संपार्श्विक के रूप में ली गई प्रतिभूतियों का मूल्यांकन निम्नलिखित मानदंडों के अनुसार होगा:

(1) कर्ज प्रतिभूतियों का मूल्यांकन भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - वर्गीकरण, मूल्यांकन और निवेश पोर्टफोलियो का परिचालन) निदेश 2025 के अनुसार किया जाएगा, जिसे समय-समय पर अद्यतन किया जाता है।

(2) सूचीबद्ध शेयर और पारस्परिक निधि /ईटीएफ/आरईआईटी/इनविट्स का मूल्यांकन पिछले छह महीनों के औसत दैनिक अंतिम मूल्यों/एनएवी या पिछले कारोबारी दिन के अंतिम मूल्य/एनएवी में से कम पर किया जाएगा।

क्यू.2.3 विवेकपूर्ण सीमाएं

219जे. बैंक सरकारी प्रतिभूतियों (खजाना बिल सहित), सूचीबद्ध कर्ज प्रतिभूतियों और क़र्ज़ पारस्परिक निधि योजनाओं की इकाइयों के संपार्श्विक पर व्यक्तियों को ऋण देने के लिए अपनी अनुमोदित नीति के संदर्भ में अपनी स्वयं की विवेकपूर्ण सीमाएं तय कर सकते हैं।

बशर्ते कि, ऋण की अवधि के दौरान, यदि विशेष कर्ज प्रतिभूति की क्रेडिट रेटिंग बीबीबी (-) से कम हो जाती है, तो बैंक यह सुनिश्चित करेंगे कि उन प्रतिभूतियों को तीस कार्य दिवसों की अवधि के भीतर किसी अन्य पात्र प्रतिभूति के साथ बदल दिया जाए या एक्सपोजर के आनुपातिक हिस्से का भुगतान किया जाता है।

219के. ऊपर पैराग्राफ 219जे में उल्लिखित प्रतिभूतियों के अलावा, पात्र प्रतिभूतियों पर व्यक्तियों को दी जा सकने वाली बैंकिंग प्रणाली से ऋण की राशि प्रति व्यक्ति 1 करोड़ रुपये तक सीमित होगी।

219एल. उपर्युक्त पैराग्राफ 219जे और 219के में निर्धारित उपरोक्त सीमाओं के भीतर, द्वितीयक बाजारों में प्रतिभूतियों के अधिग्रहण के उद्देश्य से प्रति व्यक्ति 25 लाख रुपये तक का ऋण दिया जा सकता है।

क्यू.2.4 आईपीओ/एफपीओ/ईएसओपी वित्तपोषण

219एम. बैंक प्रारंभिक सार्वजनिक प्रस्ताव (आईपीओ), अनुवर्ती सार्वजनिक प्रस्ताव (एफपीओ), या कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ईएसओपी) के तहत शेयरों की सदस्यता के लिए सम्यक जांच सुनिश्चित करने के बाद बैंकिंग प्रणाली स्तर पर प्रति व्यक्ति 25 लाख रुपये तक के ऋण दे सकते हैं।

बशर्ते कि ऋण राशि अभिदान मूल्य के 75 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, अर्थात, उधारकर्ता न्यूनतम 25 प्रतिशत नकद मार्जिन का योगदान करेंगे।

बशर्ते यह भी कि कोई भी ऋण, चाहे वह रक्षित हो या अरक्षित, बैंक द्वारा अपने स्वयं के कर्मचारियों या आईपीओ/एफपीओ/ईएसओपी के तहत अपनी स्वयं की प्रतिभूतियों को खरीदने के लिए बैंक द्वारा स्थापित कर्मचारी ट्रस्ट या द्वितीयक बाजार से नहीं दिया जाएगा।

219एन. यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आईपीओ/एफपीओ/ईएसओपी के तहत आवंटित किए जाने वाले शेयरों पर ग्रहणाधिकार सृजित किया जाएगा और आवंटन पर ऐसे शेयरों को ऋणदाता के पास गिरवी रखा जाएगा।

क्यू.3 गैर-व्यक्तियों को ऋण देना (सीएमआई के अलावा)

क्यू.3.1 सामान्य कारोबार उद्देश्यों के लिए ऋण

219ओ. बैंक अपनी अनुमोदित नीति के अनुसार, अन्य संपार्श्विक के अलावा, अपनी कार्यशील पूंजी के वित्तपोषण के लिए या अन्य उत्पादक उद्देश्यों के लिए पात्र प्रतिभूतियों पर गैर-वित्तीय संस्थाओं को वित्त प्रदान कर सकता है।

क्यू.3.2 नई कंपनियों में प्रमोटर की हिस्सेदारी के वित्तपोषण के लिए पूरक वित्त

219पी. बैंक बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीति बना सकते हैं, ताकि उनके द्वारा रखी गई पात्र प्रतिभूतियों या नई कंपनियों की स्थापना के लिए प्रमोटरों की हिस्सेदारी के वित्तपोषण के लिए अचल संपत्तियों के संपार्श्विक पर गैर-वित्तीय कॉरपोरेट्स को पूरक वित्त प्रदान किया जा सकें।

219क्यू. पैरा 219ओ और 219पी के तहत ऐसा उधार पात्र प्रतिभूतियों पर इन निदेशों के पैराग्राफ 219जी में निर्दिष्ट एलटीवी सीमा के अधीन दिया जाएगा। बैंक यह सुनिश्चित करेंगे कि ऐसे सभी मामलों में धन का अंतिम उपयोग सट्टेबाज़ी के उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाता है।

क्यू.3.3. अप्रतिसंहरणीय भुगतान प्रतिबद्धताओं का निर्गमन

219आर. अभिरक्षक बैंक अपने ग्राहकों की ओर से स्टॉक एक्सचेंज के समाशोधन निगम के पक्ष में अप्रतिसंहरणीय भुगतान प्रतिबद्धताएं (आईपीसी) जारी कर सकता है, जो निम्नलिखित शर्तों में से किसी एक को पूरा करने के अधीन है:

(1) आईपीसी जारीकर्ता बैंक का अपने ग्राहक के साथ एक करार है जो बैंक को किसी भी निपटान में भुगतान के रूप में प्राप्त होने वाली प्रतिभूतियों पर एक अविच्छेद्य अधिकार देता है; या,

(2) इस तरह के लेनदेन पूरी तरह से पूर्व-निधिक होते हैं, अर्थात या तो ग्राहक के खाते में स्पष्ट आईएनआर निधि उपलब्ध होती हैं या, एफपीआई से जुड़े एफएक्स सौदों के मामले में, बैंक के नोस्ट्रो खाते में आईपीसी जारी करने से पहले ही धन जमा कर दिया जाता है।

3(6) एक नया अध्याय 'XIII ए - पूंजी बाजार मध्यस्थों (सीएमआई) को ऋण सुविधाएं' नीचे दिए गए अनुसार जोड़ा जाएगा:

“अध्याय XIII ए – पूंजी बाजार मध्यस्थों (सीएमआई) को ऋण सुविधाएं

ए. दायरा

219एस. इन निदेशों के तहत परिभाषित सीएमआई को ऋण देने के लिए इस अध्याय के प्रावधान लागू होते हैं।

बी. सामान्य शर्तें

219टी. ऋण सुविधाएं केवल सीएमआई को दी जा सकती हैं जो वित्तीय क्षेत्र के विनियामक द्वारा पंजीकृत और विनियमित हैं और ऐसे विनियामक द्वारा निर्धारित विवेकपूर्ण मानदंडों का अनुपालन करते हैं।

219यू. सीएमआई के प्रति सभी एक्सपोजर सीएमई के रूप में शामिल किए जाएंगे, सिवाय जहां विशेष रूप से छूट दी गई है।

219वी. बैंक सीएमआई के लिए प्रतिपक्षकार-वार एक्सपोजर सीमाएं तथा समग्र एक्सपोजर सीमाएं निर्धारित करेंगे। ये सीमाएं सीएमई के लिए समग्र विवेकपूर्ण सीमाओं तथा भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – संकेन्द्रण जोखिम प्रबंधन) निदेश, 2025 के अंतर्गत बृहत् एक्सपोजर ढांचा (एलईएफ) और अंतः-समूह लेनदेन एवं एक्सपोजर (आईटीई) के संबंध में निर्धारित प्रासंगिक सीमाओं के भीतर होंगी।

सी. अनुमेय और निषिद्ध ऋण सुविधाएं

219डब्ल्यू. बैंक सीएमआई को उनके दिन-प्रतिदिन के कार्यों के लिए वित्तपोषण के लिए आवश्यकता-आधारित ऋण सुविधाएं प्रदान कर सकता है, जिसमें सामान्य कार्यशील पूंजी सुविधाएं और स्टॉक ब्रोकरों द्वारा मार्जिन ट्रेडिंग के लिए वित्तपोषण; स्टॉक ब्रोकरों/कमोडिटी ब्रोकरों/निपटान संबंधी समय विसंगतियों को पूरा करने के लिए समाशोधन सदस्यों को ओवरड्राफ्ट/क्रेडिट लाइन सुविधा; और बाजार निर्माण (इक्विटी के साथ-साथ राज्य और केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों सहित ऋण प्रतिभूतियों के लिए) जैसी विशिष्ट सुविधाएं शामिल हैं।

219एक्स. बैंक ब्रोकरों या पेशेवर समाशोधन सदस्यों की ओर से और विनिमय या समाशोधन गृहों के पक्ष में, यथा लागू, निम्न की जगह गारंटी भी जारी कर सकता है:

(1) स्टॉक एक्सचेंज द्वारा निर्धारित रूप में बैंक गारंटी के रूप में स्वीकार्य सीमा तक सुरक्षा जमाराशि;

(2) एक्सचेंज विनियमों के अनुसार मार्जिन आवश्यकताएं।

219वाई. ऐसी गारंटियों को न्यूनतम 50 प्रतिशत संपार्श्विक द्वारा रक्षित किया जाएगा, जिसमें से 25 प्रतिशत नकद में होगा।

219जेड. बैंक सीएमआई को उसके स्वयं के खाते पर प्रतिभूतियों के अधिग्रहण के लिए सीएमआई को ऋण सुविधाएं प्रदान नहीं करेंगे, जिसमें स्वपूंजी ट्रेडिंग या निवेश शामिल हैं।

बशर्ते कि:

(1) बैंक पूरी तरह से रक्षित आधार पर इक्विटी और कर्ज प्रतिभूतियों में अनुमोदित बाजार निर्माताओं को वित्त प्रदान कर सकता है।

(2) बैंक अपने ग्राहकों से फर्म की मांग/अनुरोध को पूरा करने के लिए अधिकतम 45 दिनों की अवधि के लिए सरकारी प्रतिभूतियों सहित कर्ज प्रतिभूतियों के भंडारण के लिए सीएमआई को कार्यशील पूंजी वित्त प्रदान कर सकता है। ऐसी वित्तपोषण प्रतिभूतियों पर उचित हेयरकट के साथ पूरी तरह से रक्षित आधार पर होनी चाहिए।

(3) बैंक नकद, नकद समकक्ष और सरकारी प्रतिभूतियों (खजाना बिल सहित) के 100 प्रतिशत संपार्श्विक पर अन्य कार्यशील पूंजी सुविधाएं प्रदान कर सकता है।

219जेडए. बैंक सीएमआई द्वारा स्वपूंजी ट्रेडिंग के लिए पैराग्राफ 219एक्स के संदर्भ में गारंटी दे सकता है, जो नकदी, नकदी समकक्ष और सरकारी प्रतिभूतियों (खजाना बिल सहित) के संपार्श्विक द्वारा पूरी तरह से रक्षित सुविधा के अधीन है, जिसमें से न्यूनतम 50 प्रतिशत नकदी या उधारदात्री बैंक के साथ रखी गई सावधि जमाराशि होनी चाहिए। बैंकों को उचित तंत्र के माध्यम से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गैर- स्वपूंजी उद्देश्यों के लिए जारी गारंटी का उपयोग स्वपूंजी ट्रेडिंग को सुविधाजनक बनाने के लिए नहीं किया जाता है।

डी. प्रतिभूति कवरेज

219जेडबी. पैरा 219जेड और 219जेडए पर प्रतिकूल प्रभाव के बिना, सीएमआई को सभी ऋण सुविधाएं, इंट्राडे सुविधाओं सहित, जब तक अन्यथा उल्लेख न किया गया हो, पूरी तरह से रक्षित (अर्थात, 100 प्रतिशत संपार्श्विक) आधार पर प्रदान की जाएंगी। सीएमआई को ऋण सुविधाएं इन निदेशों में परिभाषित पात्र प्रतिभूतियों या अन्य संपार्श्विक जैसे नकदी, अन्य अनुमेय वित्तीय आस्तियां (वाणिज्यिक पत्र और एक वर्ष तक की मूल या प्रारंभिक परिपक्वता के गैर-संपरिवर्तनीय डिबेंचर को छोड़कर), अचल आस्तियां, प्राप्य, बैंक गारंटी और आपाती साख पत्र (एसबीएलसी) द्वारा रक्षित की जा सकती हैं।

स्पष्टीकरण: इस संदर्भ में प्राप्य में मार्जिन ट्रेडिंग सुविधा (एमटीएफ) लेनदेन के अलावा पूंजी बाजार लेनदेन के कारण उत्पन्न नकदी और प्रतिभूतियों की आय भी शामिल होगी।

बशर्ते कि:

(1) सीएमआई के लिए दी गई इंट्राडे सीमाओं के मामले में, 50 प्रतिशत की शिथिल न्यूनतम संपार्श्विक आवश्यकता लागू होगी यदि इंट्राडे सीमा का उपयोग ग्राहकों की ओर से केंद्रीय रूप से समाशोधित ट्रेड में निपटान समय अंतर के कारण होने वाली कमी को पूरा करने के लिए किया जाता है, बशर्ते कि सीएमआई को क्यूसीसीपी से अपेक्षित प्राप्य पूरी तरह से ऐसे इंट्राडे ड्रॉडाउन को कवर करता हो।

(2) सेबी विनियमावली के अनुसार अपने ग्राहकों को मार्जिन ट्रेडिंग सुविधा (एमटीएफ) के लिए ब्रोकरों को वित्तपोषण के संबंध में, सुविधा पूरी तरह से नकदी, नकदी समकक्ष और सरकारी प्रतिभूतियों (खजाना बिल सहित) की संपार्श्विक द्वारा रक्षित की जाएगी, जिसमें से न्यूनतम 50 प्रतिशत नकदी होगी।

(3) बैंक विभिन्न प्रकार की प्राथमिक प्रतिभूतियों और संपार्श्विक प्रतिभूतियों, जिसमें पात्र प्रतिभूतियाँ भी शामिल हैं, पर उपयुक्त हेयरकट लागू करेगा, जो इक्विटी शेयरों के मामले में न्यूनतम 40 प्रतिशत कटौती के अधीन होगा।

219जेडसी. इन निदेशों के ‘अध्याय XVI - गैर-निधि आधारित (एनएफबी) ऋण सुविधाएं' के पैरा 414 के अनुसार, बैंक किसी अन्य आरई के पक्ष में गारंटी जारी नहीं कर सकते हैं ताकि वे किसी बाध्यताधारी को कोई निधि-आधारित ऋण सुविधा प्रदान कर सकें। इस प्रावधान के बावजूद, अन्य भारतीय बैंकों द्वारा जारी प्रति-गारंटी और प्रतिष्ठित विदेशी बैंकों द्वारा जारी एसबीएलसी, जिसमें सीएमआई का विदेशी मूल बैंक भी शामिल है, को भी इस अध्याय के प्रयोजन के लिए जहां भी अनुमति दी गई है, पात्र गैर-नकद संपार्श्विक के रूप में माना जा सकता है। बशर्ते कि यह मौजूदा फेमा विनियमावली के प्रतिकूल नहीं होगा।

219जेडडी. संपार्श्विक कवर, जैसा लागू हो, को निरंतर आधार पर बनाए रखा जाएगा और कमी की स्थिति में मार्जिन कॉल के लिए सुविधा करार में स्पष्ट प्रावधान होंगे।

219जेडई. बैंक यह सुनिश्चित करेगा कि इस तरह के वित्तपोषण के लिए रखी गई संपार्श्विक आम तौर पर उधारकर्ता सीएमआई से संबंधित है। सीएमआई के समूह इकाई/प्रमोटर से संबंधित संपार्श्विक भी स्वीकार किया जा सकता है, बशर्ते कि यह भार-रहित हो, विशेष रूप से इस सुविधा के लिए प्रभारित हो और कानूनी रूप से लागू हो।“

4. उपर्युक्त संशोधित संशोधन 1 जुलाई 2026 या इससे पहले की तारीख से लागू होंगे जब किसी बैंक द्वारा पूरी तरह से अपनाया जाएगा और दिनांक 13 फरवरी 2026 के भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – ऋण सुविधाएं) संशोधन निदेश 2026 का स्थान लेगा। इस तारीख तक किसी भी बकाया ऋण/गारंटी को उनकी संबंधित परिपक्वता तक जारी रखने की अनुमति दी जाएगी; हालांकि, इन निदेशों को अपनाने/लागू होने की तारीख से नए ऋण/गारंटी या मौजूदा ऋण/नवीनीकृत गारंटी इन निदेशों का पालन करेंगे।

5. उपर्युक्त संशोधनों के परिणामस्वरूप, अन्य संशोधन निदेश, अर्थात् भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - पूंजी पर्याप्तता पर विवेकपूर्ण मानदंड) द्वितीय संशोधन निदेश 2026 (संशोधित); भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – संकेन्द्रण जोखिम प्रबंधन) संशोधन निदेश 2026 (संशोधित); भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - वित्तीय विवरण: प्रस्तुतिकरण और प्रकटीकरण) – तृतीय संशोधन निदेश 2026 (संशोधित); और भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - वित्तीय सेवाओं का उपक्रम) - संशोधन निदेश 2026 (संशोधित) अलग से जारी किए गए हैं।

(वैभव चतुर्वेदी)
मुख्य महाप्रबंधक


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