अधिसूचनाएं

मास्‍टर निदेश – सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को उधार (29 जुलाई 2022 को अद्यतन)

आरबीआई/विसविवि/2017-18/56
मास्‍टर निदेश विसविवि.एमएसएमई एण्ड एनएफएस.12/06.02.31/2017-18

24 जुलाई 2017
(29 जुलाई 2022 को अद्यतन)
(25 अप्रैल 2018 को अद्यतन)

अध्यक्ष/प्रबंध निदेशक/मुख्‍य कार्यपालक अधिकारी
सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक
(क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर)

महोदया / महोदय,

मास्‍टर निदेश – सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को उधार

भारतीय रिज़र्व बैंक ने समय-समय पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को उधार देने के संबंध में बैंकों को कई अनुदेश/दिशानिर्देश जारी किए हैं। संलग्न मास्टर निदेश में इस विषय पर अद्यतन अनुदेश/दिशानिर्देश समाविष्ट किए गए हैं। इस मास्टर निदेश में समेकित परिपत्रों की सूची परिशिष्ट में दी गई है।

भवदीया

(निशा नम्बियार)
मुख्य महाप्रबंधक


मास्‍टर निदेश – भारतीय रिज़र्व बैंक [सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को उधार] – निदेश, 2017

बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 21 और 35 ए द्वारा प्रदत्‍त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक इस बात से संतुष्ट होने पर कि जनहित में ऐसा करना आवश्‍यक और समीचीन है, एतद्द्वारा, इसके बाद विनिर्दिष्‍ट किए गए निदेश जारी करता है।

अध्‍याय - I
प्रारंभिक

1.1 संक्षिप्‍त नाम और प्रारंभ

क) ये निदेश भारतीय रिज़र्व बैंक [सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को उधार] – निदेश, 2017 कहलाएंगे।

ख) ये निदेश भारतीय रिज़र्व बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर रखे जाने के दिन से प्रभावी होंगे।

1.2 प्रयोज्‍यता

इन निदेशों के उपबंध सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों {क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) को छोड़कर} पर लागू होंगे।

1.3 परिभाषा/स्‍पष्‍टीकरण

इन निदेशों में, जब तक कि प्रसंग से अन्‍यथा अपेक्षित न हो, दिए गए शब्‍दों (टर्म्स) के अर्थ वही होंगे जो नीचे विनिर्दिष्ट हैं:

  1. एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 का अर्थ हैं ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006’ जैसा कि भारत सरकार द्वारा दिनांक 16 जून 2006 को अधिसूचित किया गया है तथा भारत सरकार द्वारा उसमें समय-समय पर किया गया संशोधन, यदि कोई हो।

  2. ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम’ का तात्पर्य एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 में परिभाषित उद्यमों से है तथा भारत सरकार द्वारा उसमें समय-समय पर किया गया संशोधन, यदि कोई हो।

  3. 'प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र' का अर्थ है वे क्षेत्र जो दिनांक 4 सितंबर 2020 के मास्टर निदेश – प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार (पीएसएल) – लक्ष्य और वर्गीकरण, समय-समय पर अद्यतन, में निर्दिष्ट किए गए है।

  4. 'समायोजि‍त नि‍वल बैंक ऋण (एएनबीसी)' का वही अर्थ होगा जो दिनांक 4 सितंबर 2020 के मास्टर निदेश – प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार (पीएसएल) – लक्ष्य और वर्गीकरण, समय-समय पर अद्यतन, में दिया गया है।

अध्‍याय – II

2 सूक्षम, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006

2.1 दिनांक 26 जून 2020 की राजपत्र अधिसूचना एस.ओ. 2119 (ई) के अनुसार, एक उद्यम को निम्नलिखित मानदंडों के आधार पर सूक्ष्म, लघु या मध्यम उद्यम के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा

  1. ऐसा सूक्ष्म उद्यम, जहां संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर मे विनिधान 1 करोड़ रुपए से अधिक नहीं है और आवर्तन 5 करोड़ रुपए से अधिक नहीं है;

  2. ऐसा लघु उद्यम, जहां संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर मे विनिधान 10 करोड़ रुपए से अधिक नहीं है और आवर्तन 50 करोड़ रुपए से अधिक नहीं है; तथा

  3. ऐसा मध्यम उद्यम, जहां संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर मे विनिधान 50 करोड़ रुपए से अधिक नहीं है और आवर्तन 250 करोड़ रुपए से अधिक नहीं है।

2.2 उपरोक्त सभी उद्यमों को उद्यम पंजीकरण पोर्टल पर ऑनलाइन पंजीकरण करना और 'उद्यम पंजीकरण प्रमाणपत्र' प्राप्त करना आवश्यक है।

2.3 खुदरा और थोक व्यापार को प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को उधार देने के सीमित उद्देश्य के लिए एमएसएमई के रूप में शामिल किया गया है और उन्हें उद्यम पंजीकरण पोर्टल पर पंजीकृत होने की अनुमति है।

2.4 वर्गीकरण के लिए विनिधान और आवर्तन के संबंध में सम्मिश्र मापदंड

  1. किसी उद्यम को सूक्ष्म, लघु या मध्यम के रूप में वर्गीकरण के लिए विनिधान और आवर्तन का एक सम्मिश्र मापदंड लागू होगा।

  2. यदि कोई उद्यम अपनी वर्तमान श्रेणी के लिए विनिधान या आवर्तन के दोनों मापदंड में से किसी एक की अधिकतम सीमा को पार करता है, तो वह उस श्रेणी में अस्तित्वहीन हो जाएगा तथा उसे अगली उच्चतर श्रेणी में रखा जाएगा किंतु किसी भी उद्यम को तब तक निम्नतर श्रेणी में नहीं रखा जाएगा जब तक वह विनिधान तथा आवर्तन के दोनों मापदंडों में अपनी वर्तमान श्रेणी के लिए विनिर्दिष्ट सीमा के नीचे नहीं चला जाता हो।

  3. वस्तु और सेवा कर पहचान संख्या (जीएसटीआईएन) सहित सभी इकाइयां, जिन्हें समान स्थाई खाता संख्या (पैन) के लिए सूचीबद्ध किया गया है, को सामूहिक रूप से एक उद्यम के रूप में माना जाएगा और ऐसी सभी इकाइयों के लिए विनिधान और आवर्तन संबंधी आंकड़ों पर सामूहिक रुप से ध्यान दिया जाएगा तथा सूक्ष्म, लघु या मध्यम के रूप में श्रेणी का विनिश्चय करने के लिए केवल कुल मूल्य पर विचार किया जाएगा।

2.5 संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर में विनिधान की गणना

  1. संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर में विनिधान की गणना को आयकर अधिनियम, 1961 के तहत फाइल किए गए पूर्ववर्ती वर्षों के आयकर रिटर्न (आईटीआर) से जोड़ा जाएगा। उद्यम पंजीकरण के लिए ऑनलाइन फॉर्म प्रासंगिक पूर्ववर्ती वर्ष के प्रत्येक वर्ष 31 मार्च को मूल्यह्रास लागत को कैपचर करता है। अत: दिनांक 26 जून 2020 की अधिसूचना संख्या एस.ओ. 2119 (ई) और सभी उद्यमों के लिए आयकर अधिनियम में परिभाषित वित्तीय वर्ष के अंत में अवलि‍खि‍त मूल्य (डब्ल्यूडीवी) का अर्थ होगा।

  2. नए उद्यम की दशा में, जहां कोई पूर्व आईटीआर उपलब्ध नहीं है, वहां उद्यम के संप्रवर्तक के स्व-घोषणा के आधार पर विनिधान किया जाएगा और ऐसी छूट उस वित्त वर्ष में 31 मार्च के पश्चात समाप्त हो जाएगी जिसमें वह उद्यम अपना पहला आईटीआर फाइल करता है।

  3. उद्यम के ‘’संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर’’ का वही अर्थ होगा जो आयकर अधिनियम, 1961 के अधीन विरचित आयकर नियम, 1962 में संयंत्र और मशीनरी में उसका है और इसमें सभी मूर्त आस्तियाँ (भूमि और भवन, फर्नीचर और फिटिंग से भिन्न) शामिल होंगी।

  4. यदि उद्यम बिना किसी आईटीआर का नया है, तो संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर की खरीद (इनवॉइस) मूल्य, चाहे पहली बार या दूसरी बार खरीदा गया हो, माल और सेवा कर (जीएसटी) को छोड़कर, स्व-प्रकटीकरण के आधार पर हिसाब में लिया जाएगा।

  5. एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 की धारा 7 की उप-धारा (1) के स्पष्टीकरण I में निर्दिष्ट कुछ वस्तुओं की लागत को संयंत्र और मशीनरी में विनिधान की राशि की गणना से बाहर रखा जाएगा।

2.6 आवर्तन की गणना

  1. वर्गीकरण के प्रयोजन के लिए कोई उद्यम, चाहे वह सूक्ष्म, लघु या मध्यम हो, के आवर्तन की गणना करते समय माल या सेवाओं या दोनों के निर्यात को बाहर रखा जाएगा।

  2. उद्यम के लिए आवर्तन और निर्यात आवर्तन के संबंध में जानकारी आयकर अधिनियम या केंद्रीय माल और सेवा अधिनियम (सीजीएसटी अधिनियम) और जीएसटीआईएन से संबद्ध होगी।

  3. ऐसे उद्यम के आवर्तन संबंधी आंकड़े, जिनके पास पैन नहीं है, को 31 मार्च 2021 तक की अवधि के लिए स्व-घोषणा के आधार पर माना जाएगा और उसके पश्चात, पैन और जीएसटीआईएन अनिवार्य होगा।

2.7 उच्चतर/निम्नतर प्रवासन के मामले में उद्यमों का वर्गीकरण

संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर में विनिधान या आवर्तन अथवा दोनों में उच्चतर परिवर्तन तथा परिणामस्वरूप पुनः वर्गीकरण की स्थिति में उद्यम रजिस्ट्रीकरण के वर्ष के समाप्त होने से लेकर एक वर्ष की समाप्ति तक अपने वर्तमान स्तर को बरकरार रखेगा। किसी उद्यम के क्रमिक ह्रास की स्थिति में, चाहे वह पुनः वर्गीकरण के परिणामस्वरूप हुआ हो या संयंत्र और मशीनरी अथवा उपस्कर में विनिधान या आवर्तन में वास्तविक परिवर्तन अथवा दोनों के कारण हुआ हो तथा चाहे उद्यम अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत हो अथवा नहीं, उद्यम वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक अपनी वर्तमान श्रेणी में बना रहेगा तथा उसे ऐसे परिवर्तन वाले वर्ष के पश्चात के वित्तीय वर्ष के 1 अप्रैल से परिवर्तित स्तर का लाभ प्रदान किया जाएगा। उद्यमों के रजिस्ट्रीकरण, शिकायत निवारण, आदि से संबंधित अन्य पहलुओं का उल्लेख दिनांक 26 जून 2020 के राजपत्र अधिसूचना एस.ओ. 2119(ई), में किया गया है।

अध्‍याय – III

3 एमएसएमई क्षेत्र को ऋण देने हेतु लक्ष्य/उप-लक्ष्य

3.1 एमएसएमई क्षेत्र हेतु प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र संबंधी दिशानिर्देश

अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक एमएसएमई क्षेत्र को उधार देने के लिए लक्ष्यों/उप-लक्ष्यों का पालन करेंगे और संबंधित पहलुओं जैसा कि दिनांक 4 सितंबर 2020 के मास्टर निदेश – प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार (पीएसएल) – लक्ष्य और वर्गीकरण, समय-समय पर अद्यतन, में निर्धारित किया गया है।

3.2 एमएसएमई पर प्रधान मंत्री टास्क फोर्स की सिफारिशों के अनुसार बैंकों को निम्‍नलिखित को प्राप्त करने हेतु सूचित किया जाता है:

  1. सूक्ष्म और लघु उद्यमों को ऋण में 20 प्रतिशत वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि,

  2. सूक्ष्म उद्यम खातों की संख्या में 10 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि और

  3. पिछले वर्ष के तदनुरूपी तिमाही के अनुरूप सूक्ष्म उद्यमों को एमएसई क्षेत्र के कुल उधार का 60 प्रतिशत

अध्‍याय – IV

4. एमएसएमई क्षेत्र को उधार देने के लिए सामान्य दिशा-निर्देश/अनुदेश

4.1 एमएसएमई उधारकर्ताओं को ऋण आवेदनपत्रों की प्राप्ति सूचना जारी करना

बैंकों को सूचित किया जाता है कि वे अपने एमएसएमई उधारकर्ताओं द्वारा व्यक्तिगत रूप से अथवा ऑनलाइन प्रस्तुत किए गए सभी ऋण आवेदनपत्रों की प्राप्ति सूचना अनिवार्य रूप से दें तथा यह सुनिश्चित करें कि आवेदन फॉर्म साथ ही साथ प्राप्ति सूचना रसीद पर रनिंग क्रम संख्या दर्ज की जाती है। साथ ही, बैंकों को सूचित किया जाता है कि वे ऋण आवेदनपत्रों की केंद्रीकृत पंजीकरण प्रणाली, ऋण आवेदनपत्रों को ऑनलाइन प्रस्तुत करने की प्रणाली तथा ऋण आवेदनपत्रों की ऑनलाइन ई-ट्रैकिंग की प्रणाली विकसित करें।

4.2 संपार्श्विक

बैंकों को आदेश दिया गया है कि एमएसई क्षेत्र में इकाइयों को ₹10 लाख तक दिए गए ऋणों के मामलों में संपार्श्विक जमानत स्वीकार न करें। बैंकों को यह भी सूचित किया जाता है कि केवीआईसी द्वारा संचालित प्रधान मंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के अंतर्गत वित्तपोषित सभी इकाइयों को ₹10 लाख तक संपार्श्विक-रहित ऋण प्रदान किया जाए। एमएसई इकाइयों का अच्छा ट्रैक रिकार्ड तथा वित्तीय स्थिति के आधार पर बैंक (उचित प्राधिकारी के अनुमोदन से) ₹25 लाख तक के ऋण हेतु संपार्श्विक अपेक्षाओं में छूट की सीमा को बढ़ा सकते हैं। बैंकों को सूचित किया जाता है कि वे अपने शाखा स्तरीय पदाधिकारियों को ऋण गारंटी योजना कवर का उपभोग कराने हेतु प्रभावशाली ढंग से प्रोत्साहित करें तथा इस सबंध में कार्य-निष्पादन को उनके फील्ड स्टाफ के मूल्यांकन में मापदंड के रूप में शामिल करें।

4.3 सम्मिश्र ऋण

बैंकों द्वारा ₹1 करोड़ तक की सम्मिश्र ऋण सीमा स्वीकृत की जा सकती है ताकि एमएसई उद्यमी एक ही स्थान पर अपनी कार्यशील पूंजी और मीयादी ऋण अपेक्षा प्राप्त कर सके।

4.4 संशोधित सामान्य क्रेडिट कार्ड (जीसीसी) योजना

समग्र प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र दिशा-निर्देशों के भीतर सभी उत्पादक गतिविधियों के लिए उच्चतर ऋण संबद्धता को सुनिश्चित करने के लिए जीसीसी योजना की व्याप्ति को बढ़ाने और बैंकों द्वारा कृषितर उद्यमी गतिविधि के लिए व्यक्तियों को दिए गए समस्त क्रेडिट को कैप्चर करने की दृष्टि से जीसीसी दिशा-निर्देशों को 2 दिसंबर 2013 को संशोधित किया गया था।

4.5 सूक्ष्म और लघु उद्यमों (एमएसई) को उनके ‘जीवन चक्र’ के दौरान समय पर और पर्याप्‍त ऋण सुविधा देने के लिए ऋण प्रवाह का सरलीकरण

वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहे सूक्ष्म और लघु उद्यमों (एमएसई) को उनके ‘जीवन चक्र’ के दौरान समय पर वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाने के लिए, बैंकों को उपर्युक्त विषय पर दिनांक 27 अगस्त 2015 के परिपत्र विसविवि.एमएसएमई एण्‍ड एनएफएस.बीसी.सं.60/06.02.31/2015-16 के द्वारा दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। बैंकों को सूचित किया जाता है कि वे एमएसई क्षेत्र से संबंधित अपने मौजूदा उधार नीतियों में निम्नलिखित प्रावधानों को समाहित करते हुए उसकी समीक्षा कर उसे अनुरूप बनाएं ताकि अर्थक्षम एमएसई उधारकर्ताओं को, खासतौर पर अनपेक्षित परिस्थितियों में निधि की आवश्यकता के दौरान, समय पर और पर्याप्त ऋण सुविधा उपलब्ध हो सके:

  1. मीयादी ऋणों के मामले में अतिरिक्त ऋण सुविधा का विस्तार

  2. एमएसई इकाइयों की आकस्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अतिरिक्त कार्यशील पूंजी

  3. ऐसे मामलों में पिछले वर्ष की वास्तविक बिक्री के आधार पर प्रति वर्ष नियमित कार्यशील पूंजी सीमा की मध्‍यावधि समीक्षा जहां बैंक आश्‍वस्‍त हो कि एमएसई उधारकर्ताओं की मांग के स्‍वरूप में परिवर्तनों के लिए एमएसएमई की मौजूदा उधार की सीमा बढ़ाना आवश्यक है।

  4. ऋण निर्णयों के लिए सामयिकता

4.6 एमएसएमई हेतु ऋण पुनर्संरचना तंत्र

i) बैंकों को सूचित किया जाता है कि वे एमएसएमई से संबंधित ऋण पुनर्संरचना पर दिशानिर्देशों/अनुदेशों का पालन करें, जो ‘मास्टर परिपत्र - अग्रिमों के संबंध में आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण तथा प्रावधानीकरण से संबंधित विवेकपूर्ण मानदंड’, समय-समय पर अद्यतन, में निहित हैं।

ii) साथ ही, सभी वाणिज्यिक बैंकों को दिनांक 4 मई 2009 के हमारे परिपत्र ग्राआऋवि.एसएमई. एंड एनएफएस.बीसी.सं.102/06.04.01/2008-09 द्वारा सूचित किया जाता है कि वे निम्न कार्य करें:

  1. निदेशक मंडल के अनुमोदन से ऋण सुविधाएं प्रदान करने की नियंत्रक ऋण नीति, संभाव्य रूप से अर्थक्षम रुग्ण इकाइयों/ उद्यमों के पुनरुज्जीवन के लिए पुनर्संरचना/ पुनर्वास नीति (अब इसे दिनांक 17 मार्च 2016 को ‘सूक्ष्‍म (माइक्रो), लघु और मध्यम उद्यमों के पुनरुज्‍जीवन और पुनर्वास के लिए ढांचा’ पर जारी दिशा-निर्देशों के साथ पढ़ा जाए) तथा एमएसई क्षेत्र के लिए अनर्जक ऋण की वसूली के लिए नॉन-डिसक्रीशनरी एकबारगी निपटान योजना लागू करें तथा

  2. बैंक उनके द्वारा कार्यान्वित एकबारगी निपटान योजना बैंक की वेबसाइट पर डालकर तथा अन्य संभावित प्रचार विधि के माध्यम से उसका प्रचार करें। वे उधारकर्ताओं को आवेदन प्रस्तुत करने तथा देय राशि की चुकौती करने के लिए भी पर्याप्त समय दें ताकि पात्र उधारकर्ताओं को योजना के लाभ प्रदान किए जा सकें।

  3. एमएसई क्षेत्र को समय पर तथा पर्याप्त ऋण उपलब्ध कराने के संबंध में सिफारिशों को कार्यान्वित करें।

4.7 एमएसएमई के पुनरुज्‍जीवन और पुनर्वास के लिए ढांचा

सूक्ष्‍म (माइक्रो), लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार ने दिनांक 29 मई 2015 की राजपत्र अधिसूचना द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के खातों में दबाव दूर करने के लिए सरल और त्‍वरित प्रणाली उपलब्‍ध कराने तथा एमएसएमई के संवर्धन और विकास को सुसाध्‍य बनाने के लिए ‘सूक्ष्‍म (माइक्रो), लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के पुनरुज्‍जीवन और पुनर्वास के लिए ढांचा’ अधिसूचित किया था। इसे रिज़र्व बैंक द्वारा ‘अग्रिमों से संबंधित आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण और प्रावधानीकरण’ पर बैंकों को जारी वर्तमान विनियामक दिशा-निर्देशों के अनुरूप करने के लिए उपर्युक्त ढांचे में भारत सरकार, एमएसएमई मंत्रालय के साथ परार्मश करते हुए कतिपय परिवर्तन करने के बाद दिनांक 17 मार्च 2016 को उक्त ढांचे पर परिचालनात्मक अनुदेशों के साथ बैंकों को दिशा-निर्देश जारी किए गए। इस ढांचे के अंतर्गत ₹25 करोड़ तक की ऋण सीमा वाली एमएसएमई इकाइयों के पुनरुज्‍जीवन और पुनर्वास पर कार्य किया जाएगा। इस संशोधित ढांचे से रुग्‍ण सूक्ष्म और लघु उद्यमों के पुनर्वास पर दिनांक 1 नवंबर 2012 को जारी हमारे परिपत्र ग्राआऋवि.केंका.एमएसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी.40/06.02.31/2012-13 में निहित पूर्ववर्ती दिशा-निर्देश, उक्‍त परिपत्र में संभाव्‍य रूप से अर्थक्षम इकाइयों के पुनर्वास और एकबारगी निपटान के लिए राहत और रियायतों से संबंधित दिशा-निर्देशों को छोड़कर, अधिक्रमित हुए हैं।

ढांचे की मुख्य विशेषताएं निम्नानुसार हैं:

  1. एमएसएमई के ऋण खाता अनर्जक आस्ति (एनपीए) में परिवर्तित होने से पूर्व, बैंकों या ऋणदाताओं को चाहिए कि वे विशेष उल्लिखित खाते (एसएमए) के अधीन तीन उप-श्रेणियाँ, जैसा कि ढांचा में दिया गया है, सृजित कर खाते में आरंभिक दबाव की पहचान करें।

  2. इस ढांचे के तहत कोई भी एमएसएमई उधारकर्ता स्वेच्छा से कार्यवाही प्रारंभ कर सकता है।

  3. सुधारात्मक कार्य योजना के निर्णय हेतु समिति दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

  4. ढांचे के अंतर्गत विभिन्न निर्णय लेने हेतु समय सीमा का निर्धारण किया गया है।

4.8 एमएसई क्षेत्र के लिए ऋण वृद्धि पर निगरानी के लिए संरचित तंत्र

एमएसई क्षेत्र के लिए ऋण की वृद्धि में कमी के कारण उत्‍पन्‍न चिंताओं को देखते हुए, इस क्षेत्र में ऋण संबंधी सभी मुद्दों की निगरानी के लिए बैंकों द्वारा सुनियोजित कार्यविधि का सुझाव देने के लिए भारतीय बैंक संघ की अगुवाई में एक उप-समिति (अध्यक्ष: श्री के.आर.कामथ) गठित की गई थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर बैंकों को सूचित किया गया है कि:

  • इस क्षेत्र के लिए ऋण वृद्धि पर निगरानी के लिए वर्तमान प्रणालियों को सुदृढ़ करें और प्रत्‍येक पर्यवेक्षी स्‍तर (शाखा, क्षेत्र, अंचल, प्रधान कार्यालय) पर व्‍यापक निष्‍पादन प्रबंध सूचना प्रणाली (एमआईएस) स्‍थापित करें जिसका नियमित आधार पर विश्लेषणात्मक मूल्यांकन किया जाए;

  • बैंकों में ऋण आवेदन निपटान प्रक्रिया की निगरानी तथा एमएसई ऋण आवेदन की ई-ट्रैकिंग सिस्‍टम स्‍थापित की जाए, जिसमें शाखा-वार, क्षेत्र-वार, अंचल-वार और राज्य-वार स्थिति दी जाए। इस संबंध में, स्थिति को बैंकों द्वारा उनकी वेबसाइट पर दिखाया जाए, और

दिनांक 9 मई 2013 के हमारे परिपत्र ग्राआऋवि.एमएसएमई एण्ड एनएफएस. बीसी.सं.74/06.02.31/2012-13 द्वारा सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को विस्‍तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए थे।

अध्‍याय – V

5 संस्थागत व्यवस्थाएँ

5.1 एमएसएमई की विशेषीकृत शाखाएं

सरकारी क्षेत्र के बैंकों को सूचित किया जाता है कि वे प्रत्येक जिले में कम से कम एक विशेषीकृत शाखा खोलें। साथ ही, बैंकों को अनुमति दी गई है कि वे एमएसएमई क्षेत्र को 60 प्रतिशत या उससे अधिक अग्रिम देने वाली अपनी सामान्य बैंकिंग शाखाओं को विशेषीकृत एमएसएमई शाखाओं के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं ताकि वे समग्र रूप से इस क्षेत्र को बेहतर सेवा उपलब्ध कराने हेतु और अधिक विशेषीकृत एमएसएमई शाखाएं खोल सकें। एमएसएमई क्षेत्र के लिए ऋण में वृद्धि हेतु भारत सरकार द्वारा घोषित पॉलिसी पैकेज के अनुसार सरकारी क्षेत्र के बैंक लघु उद्यमों की अधिकता वाले पहचाने गये समूहों/ केन्द्रों में विशेषीकृत एमएसएमई शाखाएं सुनिश्चित करेंगे ताकि उद्यमी आसानी से बैंक ऋण ले सकें तथा बैंक कार्मिक आवश्यक विशेषज्ञता विकसित कर सकें। हालांकि उनकी महत्वपूर्ण क्षमता का उपयोग एमएसएमई क्षेत्र को वित्त और अन्य सेवाएं प्रदान करने हेतु किया जाएगा, पर उनके पास अन्य क्षेत्रों/ उधारकर्ताओं को वित्त/ अन्य सेवाएं प्रदान करने का परिचालनात्मक लचीलापन भी रहेगा। बैंक, ऐसी शाखाओं में तैनात अधिकारियों के लिए उचित प्रशिक्षण का ध्यान रखें।

5.2 माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के लिए अधिकार-प्राप्त समिति

भारतीय रिज़र्व बैंक के क्षेत्रीय कार्यालयों में यूनियन वित्त मंत्री द्वारा की गई घोषणा के अनुसार क्षेत्रीय निदेशकों की अध्यक्षता में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों पर अधिकार-प्राप्त समितियां गठित की गई हैं। इन समितियों में राज्य स्तरीय बैंकर समिति संयोजक के प्रतिनिधि, दो बैंकों, जिनका राज्य में माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम को वित्तपोषण में सर्वाधिक हिस्सा हो, के वरिष्ठ स्तर के अधिकारी, सिडबी क्षेत्रीय कार्यालय के प्रतिनिधि, राज्य सरकार के एमएसएमई या उद्योग के निदेशक, राज्य में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम संघ के एक या दो वरिष्ठ स्तर के प्रतिनिधि तथा एसएफसी/एसआईडीसी से एक वरिष्ठ अधिकारी सदस्य के रूप में होते हैं। इस समिति की बैठक आवधिक रूप से होगी तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम के वित्तपोषण में हुई प्रगति और तनावग्रस्त माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम इकाइयों के पुनर्वास और पुनरुज्‍जीवन की भी समीक्षा करेगी। यह क्षेत्र को सहज ऋण उपलब्धता सुनिश्चित करने में आने वाली बाधाओं, यदि कोई हों, के निवारण हेतु अन्य बैंकों/वित्तीय संस्थानों और राज्य सरकार के साथ समन्वय करेगी। ये समितियां समूह/जिला स्तर पर ऐसी ही समितियां गठित करने की आवश्यकता का निर्णय ले सकती है।

5.3 भारतीय बैंकिंग संहिता और मानक बोर्ड (बीसीएसबीआई)

बीसीएसबीआई ने भारतीय बैंक संघ (आईबीए), भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) और सदस्य बैंकों के सहयोग से 'सूक्ष्म और लघु उद्यमों के प्रति बैंक के प्रतिबद्धता कोड' विकसित किये है - जो सदस्य बैंकों के अनुपालन हेतु, जब वे सूक्ष्म और लघु उद्यमों के साथ व्यवसाय कर रहे हों, के लिए बैंकिंग प्रथाओं के न्यूनतम मानकों को निर्धारित करती है। कोड (संहिता) का उद्देश्य बेहतर बैंकिंग प्रथाओं को बढ़ावा देना, सदस्यों के लिए न्यूनतम मानक स्थापित करना, पारदर्शिता बढ़ाना, उच्च परिचालन मानकों को प्राप्त करना और सबसे महत्वपूर्ण, एक सौहार्दपूर्ण बैंकर-ग्राहक संबंध को बढ़ावा देना है जो बैंकिंग प्रणाली में विश्वास को मजबूत करेगा। कोड (संहिता) किसी उत्पाद या सेवा को बेचने से पहले पारदर्शिता और ग्राहक को पूरी जानकारी प्रदान करने पर बहुत बल देता है। सबसे महत्वपूर्ण, बीसीएसबीआई के सदस्य बैंकों ने स्वेच्छा से कार्यान्वयन के लिए कोड (संहिता) को अपनाया है। चूंकि, बीसीएसबीआई ने उसके विघटन की प्रक्रिया शुरू कर दी है, फिर भी बैंक सूक्ष्म और लघु उद्यमों के प्रति बैंक के प्रतिबद्धता कोड के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करना जारी रख सकते हैं।

5.4 माइक्रो और लघु उद्यम क्षेत्र – वित्तीय साक्षरता और परामर्शी सहायता की अनिवार्यता

एमएसएमई क्षेत्र में वित्तीय वंचन (एक्‍सक्‍लूजन) के काफी अधिक परिमाण को देखते हुए बैंकों के लिए यह अनिवार्य है कि उक्त वंचित यूनिटों को औपचारिक बैंकिंग क्षेत्र के भीतर लाया जाए। लेखाकरण तथा वित्त, कारोबारी आयोजना आदि सहित वित्तीय साक्षरता, परिचालनगत कौशल का अभाव एमएसई के उधारकर्ताओं के लिए कठिन चुनौती बनी है, जिसके कारण इन जटिल वित्तीय क्षेत्रों में बैंकों द्वारा सुविधा प्रदान किए जाने की जरूरत अधोरेखित हो जाती है। साथ ही साथ, एमएसई उद्यम माप (स्केल) एवं आकार के अभाव के कारण इस संबंध में और असहाय बन जाते हैं। इन कमियों को कारगर ढ़ंग से तथा निर्णायक रूप से दूर करने के लिए अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को दिनांक 1 अगस्त 2012 के हमारे परिपत्र ग्राआऋवि.सं.एमएसएमई एण्ड एनएफएस. बीसी.20/06.02.31/2012-13 द्वारा सूचित किया गया कि बैंक या तो अपनी शाखाओं में अपनी तुलनात्मक सुविधानुसार अलग से विशेष कक्ष स्थापित करें अथवा उनके द्वारा स्थापित वित्तीय साक्षरता केंद्रों में इसके लिए अलग कार्य मद (वर्टिकल) बनाएं। इस क्षेत्र की विशिष्ट जरुरतों को पूरा करने के लिए बैंक के स्टाफ को भी अनुकूलित प्रशिक्षण के माध्यम से प्रशिक्षित कराया जाए। साथ ही, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा संचालित वित्‍तीय साक्षरता केंद्रों को दिनांक 02 मार्च 2017 के हमारे परिपत्र विसविवि.एफएलसी.बीसी.सं.22/12.01.018/2016-17 द्वारा सूचित किया गया है कि वे, ऐसे स्थान पर जहां लघु उद्यमी एक लक्ष्य समूह है, लक्ष्य विशेष वित्तीय साक्षरता कैम्प का आयोजन करें।

5.5 समूह (क्लस्टर) दृष्टिकोण

सभी एसएलबीसी संयोजक बैंकों को सूचित किया गया है कि वे अपनी वार्षिक ऋण योजनाओं में सूक्ष्म (माइक्रो), लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पहचाने गए समूहों की ऋण आवश्यकताओं को दर्ज करें। साथ ही, उन्हें ऐसे क्लस्टरों/समुदायों को बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है जो नवनिर्मित हैं तथा जिन्हें एसएलबीसी/डीसीसी सदस्यों द्वारा बाद में विनिर्दिष्ट किया गया है।

(i) गांगुली समिति की सिफारिशों (4 सितंबर 2004) के अनुसार, बैंकों को सूचित किया गया है कि वे 4 – C दृष्टिकोण अपनाकर - अर्थात् ग्राहक फोकस (Customer focus), लागत नियंत्रण (Cost control), प्रति बिक्री (Cross selling) तथा जोखिम रोकथाम (Contain risk) - पहचाने गए एमएसई समूहों को बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने के माध्यम से एसएसआई क्षेत्र (अब एमएसई क्षेत्र) की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संपूर्ण-सेवा दृष्टिकोण प्राप्त करें। उधार हेतु समूह आधारित दृष्टिकोण निम्नलिखित में अधिक लाभकारी होगा:

क. सुपरिभाषित तथा मान्यता-प्राप्त समूहों से संव्यवहार;

ख. जोखिम निर्धारण हेतु उपयुक्त जानकारी की उपलब्धता; तथा

ग. उधारदाता संस्थानों द्वारा निगरानी।

समूहों को व्यापार रिकार्ड, प्रतिस्पर्धात्मकता तथा वृद्धि संभावनाओं और/ या अन्य समूह विशिष्ट डेटा के आधार पर पहचाना जा सकता है।

(ii) सभी एसएलबीसी संयोजक बैंकों को दिनांक 8 मई 2007 के पत्र ग्राआऋवि. पीएलएनएफएस.सं.10416/06.02.31/2006-07 द्वारा सूचित किया गया था कि वे एमएसएमई क्षेत्र को ऋण प्रदान करने हेतु अपने संस्थागत व्यवस्था की समीक्षा करें, विशेषकर देश के विभिन्न भागों में 21 राज्यों में फैले 388 समूहों में जो युनाइटेड नेशन औद्योगिक विकास संघ (यूएनआईडीओ) द्वारा पहचाने गए हैं। यूएनआईडीओ द्वारा पहचाने गए एसएमई समूहों की सूची अनुबंध I में दी गई है।

(iii) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय ने पारंपरिक उद्योगों के पुनर्सृजन हेतु निधि योजना (एसएफयूआरटीआई) तथा माइक्रो एवं लघु उद्यम समूह विकास कार्यक्रम (एमएसई-सीडीपी) के अंतर्गत 121 अल्पसंख्यक बहुल जिलों में स्थित समूहों की सूची अनुमोदित की है। तदनुसार, देश के अल्पसंख्यक बहुल जिलों में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदायों में से माइक्रो और लघु उद्यमियों के पहचाने गए समूहों को ऋण उपलब्ध कराने हेतु उचित उपाय किये गये हैं।

(iv) एमएसएमई पर प्रधान मंत्री टास्क फोर्स की सिफारिशों के अनुसार बैंकों को विभिन्न एमएसई समूहों में एमएसई केन्द्रित अधिक शाखा कार्यालय खोलने चाहिए जो एमएसई के लिए परामर्श केन्द्रों के रूप में भी कार्य कर सकें। जिले के प्रत्येक अग्रणी बैंक द्वारा कम से कम एक एमएसई समूह को अपनाया जाए।

5.6 विलंबित भुगतान

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम (एमएसएमईडी), 2006 में लघु एवं अनुषंगी औद्योगिक उपक्रमों के लिए विलंबित भुगतान पर ब्याज अधिनियम, 1998 के प्रावधानों को मजबूत किया गया है जो निम्नानुसार हैं:

(i) क्रेता को उसके और आपूर्तिकर्ता के बीच लिखित रूप में सहमत तारीख को या उससे पूर्व आपूर्तिकर्ता को भुगतान करना होगा और यदि कोई करार नहीं हुआ हो तो नियत दिन से पूर्व भुगतान करना होगा। आपूर्तिकर्ता और क्रेता के बीच की सहमत अवधि स्वीकरण की तारीख अथवा माने गए स्वीकरण की तारीख से 45 (पैंतालीस) दिनों से अधिक नहीं होगी।

(ii) यदि क्रेता आपूर्तिकर्ता को राशि का भुगतान नहीं कर पाया तो वह राशि पर नियत दिन या निर्धारित तारीख से रिज़र्व बैंक द्वारा अधिसूचित बैंक दर का तीन गुना चक्रवृद्धी ब्याज, मासिक आधार पर भुगतान करने हेतु बाध्य होगा।

(iii) आपूर्तिकर्ता द्वारा माल की आपूर्ति या दी गई सेवा के लिए क्रेता उक्त (ii) में सूचित ब्याज के भुगतान हेतु बाध्य होगा।

(iv) देय राशि में विवाद होने पर संबंधित राज्य सरकार द्वारा गठित सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा सेवा परिषद से संपर्क किया जाएगा।

साथ ही, बैंकों को सूचित किया गया है कि वे विशेषतः एमएसएमई से खरीद से संबंधित भुगतान बाध्यता की पूर्ति हेतु बड़े उधारकर्ताओं के लिए समग्र कार्यकारी पूंजी सीमाओं के भीतर उप-सीमाएं निर्धारित करें।

अध्‍याय – VI

6. माइक्रो और लघु उद्यम (एमएसई) क्षेत्र को ऋण उपलब्ध कराने के लिए समितियां

अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक एमएसई को उधार प्रदान करते समय निम्नलिखित परिपत्रों में दी गई विषय वस्तु द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं:

6.1 लघु उद्योग (अब एमएसई) को ऋण पर उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट (कपूर समिति)

सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को दिनांक 28 अगस्त 1998 के परिपत्र ग्राआऋवि.सं. पीएलएनएफएस. बीसी.सं.22/06.02.31/98-99 द्वारा कपूर समिति की सिफारिशों को लागू करने हेतु सूचित किया गया है।

6.2 लघु उद्योग क्षेत्र (अब एमएसई) को संस्थागत ऋण की पर्याप्तता और संबंधित पहलुओं की जाँच हेतु समिति की रिपोर्ट (नायक समिति)

सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को दिनांक 2 मार्च 2001 के परिपत्र ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस/बीसी.सं.61/06.02.62/2000-01 द्वारा नायक समिति की सिफारिशों को लागू करने हेतु सूचित किया गया है।

6.3 लघु उद्योग (अब एमएसई) क्षेत्र को ऋण उपलब्ध कराने पर कार्यकारी दल की रिपोर्ट (गांगुली समिति)

बैंकों को, समिति की सिफारिशों को कार्यान्वित करने हेतु दिनांक 4 सितंबर 2004 के परिपत्र ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस.बीसी.28/06.02.31(डब्ल्यूजी)/2004-05 द्वारा सूचित किया गया है।

6.4 रुग्ण एसएमई के पुनर्वास पर कार्यकारी दल (अध्यक्ष: डॉ. के.सी.चक्रवर्ती)

बैंकों को 4 मई 2009 के परिपत्र ग्राआऋवि.एसएमई एंड एनएफएस.बीसी.सं.102/06.04.01/2008-09 द्वारा सूचित किया गया था कि वे अन्य बातों के साथ-साथ ₹2 करोड़ तक के सभी अग्रिमों के मामले में स्कोरिंग मॉडल के आधार पर उधार देने संबंधी सिफारिशों को लागू करने पर विचार करें।

6.5 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम पर प्रधान मंत्री का टास्क फोर्स

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) द्वारा उठाए विभिन्न मामलों पर विचार करने हेतु भारत सरकार द्वारा जनवरी 2010 में एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स (अध्यक्ष: श्री टी.के.ए.नायर) गठित किया गया था। टास्क फोर्स ने एमएसएमई के कार्य अर्थात् ऋण, विपणन, श्रम, निकास नीति, मूलभूत सुविधाएं/ प्रौद्योगिकी/ कौशल उन्नयन तथा कर-निर्धारण से संबंधित विभिन्न उपायों की सिफारिश की। व्यापक सिफारिशों में वे उपाय जिन पर तुरंत कार्रवाई आवश्यक है तथा विधि और विनियामक ढांचे सहित मध्यावधि संस्थागत उपाय भी तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों और जम्मू और कश्मीर के लिए सिफारिशें शामिल हैं।

बैंकों को टास्क फोर्स द्वारा की गई सिफारिशों को ध्यान में रखकर एमएसई क्षेत्र, विशेषतः सूक्ष्म उद्यमों को ऋण उपलब्धता बढ़ाने हेतु प्रभावी कदम उठाने के लिए आग्रह किया जाता है। एमएसएमई पर प्रधान मंत्री टास्क फोर्स की सिफारिशों के कार्यान्वयन की सूचना देते हुए सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को दिनांक 29 जून 2010 का परिपत्र ग्राआऋवि. एसएमई एंड एनएफएस.बीसी.सं.90/06.02.31/2009-10 जारी किया गया था।

6.6 सूक्ष्म और लघु उद्यम (एमएसई) के लिए ऋण गारंटी योजना की समीक्षा करने हेतु कार्यकारी दल

भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा सीजीटीएमएसई की ऋण गारंटी योजना (सीजीएस) के कार्य की समीक्षा करने, उसके प्रयोग को बढ़ाने के उपाय सुझाने तथा एमएसई को संपार्श्विक रहित ऋण में वृद्धि को सुगम बनाने हेतु श्री वी.के.शर्मा, कार्यपालक निदेशक की अध्यक्षता में एक कार्यकारी दल गठित किया गया था। कार्यकारी दल की सिफारिशों में अन्य बातों के साथ-साथ, सूक्ष्म और लघु उद्यम (एमएसई) क्षेत्र को संपार्श्विक रहित ऋण सीमा को ₹5 लाख से ₹10 लाख तक अनिवार्यतः दुगुना करना तथा बैंकों के मुख्य कार्यपालक अधिकारियों को आदेश देना कि वे सीजीएस कवर का उपभोग करने हेतु शाखा स्तर के पदाधिकारियों को प्रभावशाली ढंग से प्रोत्साहित करें तथा इससे संबंधित कार्य-निष्पादन को अपने फील्ड स्टाफ आदि के मूल्यांकन में एक मापदंड बनाने के लिए सभी बैंकों को सूचित किया गया है। उक्त हेतु सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को दिनांक 6 मई 2010 का परिपत्र ग्राआऋवि. एसएमई एंड एनएफएस.बीसी.सं.79/06.02.31/2009-10 जारी किया गया है।


परिशिष्ट

मास्टर परिपत्र में समेकित परिपत्रों की सूची

सं. परिपत्र सं. तारीख विषय पैराग्राफ सं.
1. विसविवि.एमएसएमई एवं एनएफएस.बीसी.सं.13/06.02.31/2021-22 07 जुलाई 2021 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम की नई परिभाषा - खुदरा और थोक व्यापार का समावेश 2.3
2. मास्टर निदेश विसविवि.केंका.प्लान.बीसी.5/04.09.01/2020-21 04 सितंबर 2020 प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार (पीएसएल) – लक्ष्य और वर्गीकरण 3.1
3. विसविवि.एमएसएमई एवं एनएफएस.बीसी.सं.4/06.02.31/2020-21 21 अगस्त 2020 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम की नई परिभाषा – स्पष्टीकरण

2.1-2.2
2.4-2.7

4. विसविवि.एमएसएमई एवं एनएफएस.बीसी.सं.3/06.02.31/2020-21 2 जुलाई 2020 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र में ऋण प्रवाह
5. विसविवि.एमएसएमई एण्‍ड एनएफएस.बीसी.सं.10/06.02.31/2017-18 13/07/2017 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के रूप में वर्गीकरण के उद्देश्य के लिए संयंत्र और मशीनरी में निवेश - दस्तावेजों पर निर्भर होना 2.1
6. विसविवि.एफएलसी.बीसी.सं.22/12.01.018/2016-17 02/03/2017 एफएलसी (वित्‍तीय साक्षरता केंद्र) और ग्रामीण शाखाओं द्वारा वित्‍तीय साक्षरता - नीति समीक्षा 5.4
7. विसविवि. एमएसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी.सं.21/06.02.31/2015-16 17/03/2016 सूक्ष्‍म (माइक्रो), लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के पुनरुज्‍जीवन और पुनर्वास के लिए ढांचा 4.7
8. विसविवि.एमएसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी.सं.60/06.02.31/2015-16 27/08/2015 माइक्रो और लघु उद्यमों (एमएसई) को उनके ‘जीवन चक्र’ के दौरान समय पर और पर्याप्‍त ऋण सुविधा देने के लिए ऋण प्रवाह का सरलीकरण 4.5
9. ग्राआऋवि.एमएसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी.सं.61/06.02.31/2013-14 02/12/2013 संशोधित सामान्य क्रेडिट कार्ड (जीसीसी) योजना 4.4
10. ग्राआऋवि.एमएसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी.सं.74/06.02.31/2012-13 09/05/2013 एमएसई क्षेत्र को ऋण की वृद्धि पर निगरानी के लिए संरचित तंत्र 4.1, 4.8
11. ग्राआऋवि.केंका.एमएसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी.सं. 40/06.02.31/2012-13 01/11/2012 रुग्ण माइक्रो (सूक्ष्म) और लघु उद्यमों के पुनर्वास के लिए दिशानिर्देश 4.7
12. ग्राआऋवि. एमएसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी. सं 20/06.02.31/2012-13 01/08/2012 माइक्रो और लघु उद्यम क्षेत्र – वित्तीय साक्षरता और परामर्शी सहायता की अनिवार्यता 5.4
13. ग्राआऋवि. एमएसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी.सं.53/06.02.31/2011-12 04/01/2012 एमएसएमई उधारकर्ताओं को ऋण आवेदन की प्राप्ति-सूचना जारी करना 4.1
14. ग्राआऋवि.एसएमई एण्ड एनएफएस सं.90/06.02.31/2009-10 29/06/2010 एमएसएमई पर प्रधानमंत्री उच्च स्तरीय टास्क फोर्स की सिफारिशें 3.2, 6.5
15. ग्राआऋवि.एसएमई एण्ड एनएफएस.बीसी.सं.79/06.02.31/2009-10 06/05/2010 माइक्रो और लघु उद्यम (एमएसई) हेतु ऋण गारंटी योजना की समीक्षा के लिए कार्य-दल - एमएसई को संपार्श्विक रहित ऋण 6.6
16. ग्राआऋवि.एसएमई एण्ड एनएफएस सं.9470/06.02.31(पी)/2009-10 11/03/2010 माइक्रो और लघु उद्यम (एमएसई) क्षेत्र को संमिश्र ऋण स्वीकृति 4.3
17. ग्राआऋवि.एसएमई एंड एनएफएस सं.13657/06.02.31(पी)/2008-09 18/06/2009 पीएमईजीपी के अंतर्गत वित्तपोषित इकाईयों को संपार्श्विक रहित ऋण 4.2
18. ग्राआऋवि.एसएमई एण्ड एनएफएस सं.102/06.04.01/2008-09 04/05/2009 माइक्रो और लघु उद्यम क्षेत्र को ऋण प्रदान कराना 6.4
19. ग्राआऋवि.एसएमई एण्ड एनएफएस सं.12372/06.02.31(पी)/2007-08 23/05/2008 ऋण सहलग्न पूंजी सब्सिडी योजना  
20. ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस. बीसी.सं.63/06.02.31/2006-07 04/04/2007 माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को ऋण उपलब्ध कराना - माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006 लागू करना 5.6
21. ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस. बीसी.28/06.02.21(डब्लूजी)/2004-05 04/09/2004 लघु उद्योग क्षेत्र को ऋण उपलब्धता पर कार्यकारी दल 6.3
22. ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस. बीसी.39/06.02.80/2003-04 03/11/2003 लघु उद्योग को ऋण सुविधाएं - संपार्श्विक मुक्त ऋण 4.2
23. डीबीओडी.सं.बीएल.बीसी. 74/22.01.001/2002 11/03/2002 सामान्य बैंकिंग शाखाओं का विशेषीकृत लघु उद्योग शाखाओं में परिवर्तन 5.1
24. ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस. बीसी.61/06.02.62/2000-01 02/03/2001 नायक समिति की सिफारिशों का कार्यान्वयन – बैंकों द्वारा की गई प्रगति – विशेषीकृत एसएसआई शाखाओं का अध्ययन 6.2
25. आईसीडी.सं.5/08.12.01/2000-01 16/10/2000 लघु उद्योग क्षेत्र को ऋण उपलब्धता- मंत्रियों के समूह का निर्णय 5.6
26. ग्राआऋवि.पीएलएनएफएस. बीसी.22/06.02.31(ii)–98/99 28/08/1998 लघु उद्योग पर उच्च स्तरीय समिति -कपूर समिति- सिफारिशों का कार्यान्वयन 6.1

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