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मिन्ट स्ट्रीट मेमो (एमएसएम) समकालीन विषयों पर संक्षिप्त रिपोर्ट और विश्‍लेषण के रूप में दस्तावेजों की एक श्रृंखला है जिसे रिज़र्व बैंक और उन्नत वित्तीय अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्र (सीएएफआरएएल) के स्टाफ द्वारा तैयार किया जाता है अथवा बैंक के हाल के किसी प्रकाशन से लिया जाता है।

मई 2018

भारत में सकल घरेलू उत्पाद आंकड़ों में संशोधनों की जांच करना

भारत में राष्ट्रीय समग्र लेखों से संबंधित आंकड़ों में संशोधनों का विश्लेषण पहले प्रकाशनों या अग्रिम अनुमानों (एई) से संबंधित वृद्धि दरों में ऊपरी ओर संशोधन के प्रति सामान्य पूर्वाग्रह दर्शाता है। इस प्रकार, अर्थव्यवस्था की स्थिति का अधिक यथार्थ आकलन करने के लिए अग्रिम अनुमानों को रियल सेक्टर के अन्य उच्च बारंबारता संकेतकों के साथ जोड़ने की आवश्यकता है।

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अप्रैल 2018

सीपीआई मुद्रास्फीति पर आवास किराया भत्ता में वृद्धि का प्रभाव

यह पेपर 7वें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) की सिफारिशों के बाद आवास किराया भत्ते (एचआरए) में वृद्घि का हेडलाइन मुद्रास्फीति पर प्रभाव का अध्ययन करता है। यह देखा गया है कि एचआरए वृद्धि ने आकलित आवास मुद्रास्फीति को काफी बढ़ा दिया जिसका शीर्ष प्रभाव लगभग 35 आधार अंक तक है। यह प्रभाव अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में देखा गया है। पेपर दर्शाता है कि अभी तक हेडलाइन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर एचआरए वृद्धि का वास्तविक प्रभाव वैसा ही रहा है जैसा रिज़र्व बैंक द्वारा अपने पांचवे द्विमासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य, दिसंबर 2017 में पूर्वानुमान आकलन में किया गया था।

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फरवरी 2018

कार्यशील पूंजी की चुनौतियां और निर्यातः जीएसटी रोलआउट से साक्ष्य

ऐसा प्रतीत होता है कि वस्तु और सेवाकर (जीएसटी) की नई कर व्यवस्था के अंतर्गत कार्यान्वयन और रिफंड से फर्मों के लिए कार्यशील पूंजी चुनौतियां बढ़ गई हैं जो आगे अक्तूबर 2017 में उनके निर्यात को हानि पहुचांई होगी। इस अनुमान के समर्थन में हम साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं जिसमें निर्यात पर क्षेत्रकीय आंकड़ों का उपयोग किया गया है और ऐसे क्षेत्र ढूंढ़ते हैं जिनमें कार्यशील पूंजी उच्च रही और जो इस अवधि के दौरान उच्च स्तर पर रहे। तथापि, ऐसा प्रतीत होता है कि तब से सरकार द्वारा किए गए विभिन्न प्रयासों से निर्यातकों की चिंता काफी कम हुई है जो नवंबर और दिसंबर 2017 में हुई निर्यात वृद्धि में प्रतिलक्षित हुआ।

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जनवरी 2018

बैंकों की क्रेडिट गैर-मध्यस्थता – क्या कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार परिपक्व हो गया है?

म्यूचुअल फंडों में निवेश में महत्वपूर्ण वृद्धि और बाद में जिस प्रकार से उस निवेश का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे भारत में मध्यस्थहीनता की संभावना बदलती जा रही है। हम इस विकासशील परिवेश और इसके प्रभाव को बैंक मध्यस्थता के लिए सामान्य रूप से और बैंकों के क्रेडिट पोर्टफोलियो में विशेष रूप से देखते हैं । यहाँ हम यह पाते हैं कि (i) कोरपोरेट्स उधार लेने के लिए धीरे-धीरे बैंकों से म्यूचुअल फंडों की ओर बढ़ रहे हैं जो कि निकट-निवेश ग्रेड के लिए कॉर्पोरेट स्प्रेड के संकुचन में परिलक्षित होता है; और (ii) जोखिम मुक्त दर और बैंकों के लिए बेंचमार्क उधार दर के बीच अत्यधिक अंतर पैदा हो गया है, जो कि निधि आधारित उधार दर (एमसीएलआर) की सीमांत लागत, जिसने गुणवत्तापूर्ण कॉर्पोरेट के लिए बैंक ऋण की मध्यस्थहीनता को बढ़ावा दिया है ।

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दिसंबर 2017

राज्‍य सरकार के प्रतिफल में स्‍प्रेड – क्‍या राजकोषीय मैट्रिक्‍स असर डालते हैं

तदनरूपी परिपक्‍वता वाली केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों की अपेक्षा राज्‍य विकास ऋण (एसडीएल) का स्‍प्रेड अ-तरलता और मौजूदा बाजार स्थितियों के कारण उत्‍पन्‍न हुआ है। तथापि, अंतर-राज्यीय घटबढ़ प्राथमिक नीलामियों में ऋणों के बाजार मूल्य-निर्धारण में बहुत कम देखा गया है। इससे राज्‍य सरकारों को अपनी राजकोषीय स्थितियां सुधारने एवं अपने कर्ज कम करने में थोड़ा-बहुत सहूलियत मिली है।

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नवंबर 2017

नकदी से नकदी रहित तथा चेक से डिजिटल: भारतीय भुगतान प्रणालियों में उभरती क्रांति

इलेक्ट्रानिक माध्यमों तथा कैपिंग सर्विस प्रभारों के प्रगतिशील प्रयोग की पृष्ठभूमि में अंतर बैंक भुगतान और निपटान प्रणाली पर नोटबंदी के प्रभाव का अनुभवजन्य मूल्यांकन, इस अध्ययन का निष्कर्श है कि (i) नोटबंदी के पहले चेक का प्रयोग में घटाव आया था; तथा (ii) नोटबंदी के बाद, खुदरा इलेक्ट्रानिक भुगतान प्रणालियों, बिक्री के बिन्दु टर्मिनल और चेक के माध्यम से नकदी लेन-देन सतत रूप से नकदी रहित भुगतान प्रणालियों की ओर अग्रसर हुआ है।

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सितंबर 2017

बैंक से इतर निधीयन के स्रोत और भारतीय कंपनियां

पिछले दशक में भारतीय कंपनी क्षेत्र (कॉरपोरेट सेंटर) में बैंक से इतर (नॉन-बैंक) फ़ंडिंग के स्रोत का महत्त्व बढ़ता देखा गया। यही वो समय रहा जब भारतीय बैंकिंग उद्योग को लगातार बढ़ती अनर्जक आस्तियों (एनपीए) ने काफ़ी परेशान किया जिसने बैंक क्रेडिट की प्रभावी आपूर्ति घटा दी है। इस अध्ययन का उद्देश्य इन दोनों घटनाओं के बीच की कड़ी को समझना है।

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सितंबर 2017

कृषि ऋण बैंक खाते – ऋण माफी परिदृश्य का विश्लेषण

कई राज्य सरकारों ने विभिन्न विशेषताओं / कवरेज सहित कर्जदार किसानों को राहत देने के लिए कृषि ऋण माफी योजनाओं की घोषणा की है। यह नोट, बैंक ऋण पर खाता स्तर के डेटा का उपयोग करते हुए ऋण माफी के संभावित आकार के परिदृश्य-आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। माफी योजनाओं के तहत कवरेज की सीमा के आधार पर अनुमानित अनुमान ₹ 2.2 लाख करोड़ से लेकर ₹ 4.2 लाख करोड़ तक है। सभी मामलों में, हालांकि, राज्यों द्वारा की जाने वाली ऋण माफी उनकी वित्तीय स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

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कृषि ऋण माफी, राजकोषीय घाटा एवं मुद्रास्फीति

कतिपय भारतीय राज्यों ने हाल ही में कृषि ऋण चुकाने की घोषणा की है, जो मध्य अवधि के दौरान राज्यों के वित्तीय बोझ के लिए जटिलता बनी हुई है। अनुभवजन्य अनुमान बताते हैं कि राजकोषीय घाटे में मुद्रास्फीति का प्रभाव पड़ सकता है। विशेषकर, यह प्रभाव एक सीधी रेखा में नहीं है क्योंकि राजकोषीय घाटा, मुद्रास्फीति को राजकोषीय घाटे तथा मुद्रास्फीति के उच्च स्तर से अधिक बढ़ाती है। यदि 2017-18 के लिए संयुक्त राजकोषीय घाटे में कृषि ऋण छूट (वास्तविक और उद्देश्य दोनों) के कारण 40 बीपीएस तक की वृद्धि हुई है, तथा 2017-18 के लिए लगभग 5.9 प्रतिशत के लिए बजट की संयुक्त राजकोषीय घाटे के साथ और मुद्रास्फीति की गति अनुकूल हो,और अन्य बातें पूर्ववत रहें तो यह 2017-18 की शुरुआत से मुद्रास्फीति में लगभग 20 बीपीएस की स्थायी वृद्धि हो सकती है।

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अगस्त 2017

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अध्यादेश, 2017 पर बाजार प्रतिक्रिया

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अध्यादेश 2017 पर शेयर बाजार प्रतिक्रिया, बैंकों और उनके उच्च गुणवत्ता वाले उधारकर्ताओं के लिए सकारात्मक रही है, परंतु समस्याग्रस्त फर्मों के लिए नकारात्मक है, बैंकिंग क्षेत्र की हालत को जीवंत करने की इसकी क्षमता और समग्र फर्मों के पूंजी आबंटन में सुधार के लिए सुझावात्मक है।

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अगस्त 2017

विमुद्रीकरण और बैंक जमा वृद्धि

अध्ययन यह अनुमान लगाता है कि विमुद्रीकरण के बाद बैंक जमाराशियों में ‘आधिक्य’ वृद्धि 3.0-4.7 प्रतिशत बिंदुओं के दायरे में रही है। सांकेतिक मामलों में, इन अनुमानों का अभिप्राय जमाराशियों के आधिक्य से है जो विमुद्रीकरण के कारण बैंकिंग प्रणाली में ₹ 2.8-4.3 ट्रिलियन के दायरे में रही हैं। विशिष्ट प्रकार के खातों जो साधारणतया निम्न स्तरीय गतिविधि से चिह्नित होते हैं, में नकद जमाराशियों की असामान्य वृद्धि के सूक्ष्म-स्तरीय विश्लेषण भी निष्कर्षों में सहायता करता है। बैंक जमाराशियों में परिवर्तन से संबंधित ऐसे अभिलाभ, यदि टिकाऊ रहे, तो इनका बचतों के वित्तीयकरण के रूप में लाभदायक प्रभाव हो सकता है।

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बचतों का गैर-बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थ संस्थाओं में वित्तीयकरण

अध्ययन दर्शाता है कि विमुद्रीकरण का एक महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव यह रहा है कि इसने परिवारों द्वारा की जाने वाली बचतों के औपचारिक चैनलों का विशेषकर इक्विटी/ऋण उन्मुखी म्यूच्युअल फंडों तथा जीवन बीमा पॉलिसियों में परिवर्तन को बढ़ावा दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। आगे की चुनौती इन निधियों को अर्थव्यवस्था के उत्पादक खंडों में चैनेलाइज करने की रहेगी।

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अस्वीकरण - मिन्ट स्ट्रीट मेमो (एमएसएम) में व्यक्त विचार और राय लेखकों की होती है और आवश्यक नहीं है कि ये भारतीय रिज़र्व बैंक के विचार हों।


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