मास्टर निदेशों

मास्‍टर निदेश – भारतीय रिज़र्व बैंक (प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपाय) निदेश 2018

आरबीआई/विसविवि/2018-19/65
मास्‍टर निदेश विसविवि.केंका.एफएसडी.बीसी.सं.10/05.10.001/2018-19

17 अक्तूबर 2018

अध्‍यक्ष
सभी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक‍

महोदया/महोदय,

मास्‍टर निदेश – भारतीय रिज़र्व बैंक (प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपाय) निदेश 2018

प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपाय पर सर्वप्रथम अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को 2016 में मास्टर निदेश जारी किए गए थे।

2. प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में राहत उपाय प्रदान करने हेतु क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों पर लागू दिशानिर्देश अब मास्टर निदेश के रूप में जारी किए जा रहे हैं।

3. इस मास्‍टर निदेश में इस विषय पर आज की तारीख तक जारी दिशानिर्देशों को समेकित किया गया है। इस मास्‍टर निदेश में समेकित परिपत्रों की सूची परिशिष्‍ट में दी गई है।

कृपया प्राप्ति सूचना दें।

भवदीय,

(जी.पी.बोरा)
प्रभारी मुख्‍य महाप्रबंधक


भारतीय रिज़र्व बैंक (प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपाय) निदेश, 2018

बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 21 और 35ए द्वारा प्रदत्‍त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक इस बात से संतुष्ट होने पर कि जनहित में ऐसा करना आवश्‍यक और समीचीन है, एतद्द्वारा, इसके बाद विनिर्दिष्‍ट किए गए निदेश जारी करता है।

अध्‍याय - I
प्रारंभिक

1.1 संक्षिप्‍त नाम और प्रारंभ

(क) ये निदेश भारतीय रिज़र्व बैंक (प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपाय) निदेश, 2018 कहलाएंगे।

(ख) ये निदेश भारतीय रिज़र्व बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर रखे जाने के दिन से प्रभावी होंगे।

1.2 प्रयोज्‍यता

इन निदेशों के उपबंध भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा भारत में कार्य करने के लिए लाइसेंसीकृत प्रत्‍येक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) पर लागू होंगे।

अध्‍याय - II
पृष्ठभूमि

2.1 हमारे देश में किसी न किसी क्षेत्र में कुछ अन्तरालों पर लेकिन बार-बार होने वाली प्राकृतिक आपदाओं से भारी मात्रा में जान-माल का नुकसान होता है तथा इससे जनमानस को आर्थिक रूप से भारी हानि होती है। इन प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली हानि की पूर्ति के लिए सभी एजेंसियों द्वारा बड़े पैमाने पर पुनर्वास का प्रयास करना जरूरी होता है। प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों के आर्थिक पुनर्वास के लिए केंद्रीय, राज्य और स्थानीय प्राधिकरण कार्यक्रम तैयार करते हैं। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) को सौंपी गई विकासात्मक भूमिका प्राकृतिक आपदा से प्रभावित आर्थिक गतिविधियों के पुनरूज्जीवन के लिए उनके सक्रिय समर्थन की गारंटी देता है।

2.2 आपदा प्रभावित क्षेत्रों में राहत उपलब्‍ध कराने हेतु, राष्‍ट्रीय आपदा प्रबंधन फ्रेमवर्क के अनुसार - राष्‍ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया निधि (एनडीआरएफ) और राज्‍य आपदा प्रतिक्रिया निधि (एसडीआरएफ) नामक दो निधियां गठित की गई हैं। वर्तमान में इस फ्रेमवर्क द्वारा 12 प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं को मान्‍यता प्रदान की गई है, यथा चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओला-वृष्टि, भूस्‍खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीट-आक्रमण और शीत लहर/ तुषारापात या पाला पड़ना। इन 12 आपदाओं में से 4 आपदाओं अर्थात् सूखा, ओला-वृष्टि, कीट-आक्रमण, शीत लहर/तुषारापात या पाला पड़ना के संबंध में कृषि मंत्रालय नोडल मंत्रालय है तथा शेष 8 आपदाओं में गृह मंत्रालय द्वारा यथोचित प्रशासनिक व्‍यवस्‍थाएं करना अपेक्षित है। सार्वभौमिक सरकार (केंद्र/ राज्‍य सरकार) राहत संबंधी कई सारे उपाय करती है ताकि प्रभावित व्‍यक्तियों को राहत उपलब्‍ध हो सके, जिनमें अन्‍य बातों के साथ साथ इनपुट सब्सिडी के लिए प्रावधान और लघु और सीमांत किसानों सहित कृषकों को वित्‍तीय सहायता शामिल है।

2.3 राहत उपलब्ध कराने में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, राज्य स्तरीय बैंकर समिति (एसएलबीसी) के सदस्य के रूप में, की भूमिका है ऋणकर्ताओं की उभरती आवश्यकताओं के अनुसार बैंक वर्तमान ऋणों का पुनर्निर्धारण करते हुए और नये ऋण मंजूर करते हुए योगदान देना। बैंकों को एकसमान तथा सम्मिलित कार्रवाई तेजी से करने में सक्षम बनाने के लिए चार पहलूओं अर्थात संस्‍थागत व्‍यवस्‍था (अध्याय III), वर्तमान ऋणों की पुनर्संरचना (अध्याय IV), नए ऋण उपलब्‍ध कराना (अध्याय V) और अन्‍य अनुषंगी राहत उपाय (अध्याय VI) को शामिल करते हुए ये दिशानिर्देश जारी किए जा रहे हैं।

अध्‍याय - III
संस्थागत व्यवस्था

3.1 प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए नीति/क्रियाविधि का निरुपण

प्राकृतिक आपदाओं का समय और स्थान तथा गंभीरता अप्रत्याशित होती है। अतः यह अत्यावश्यक है कि बैंकों के पास ऐसी घटनाओं के बाद की जानेवाली कार्रवाई के संबंध में निदेशक बोर्डों द्वारा विधिवत अनुमोदित योजनाएँ (ब्‍लू प्रिंट) होनी चाहिए जिससे अपेक्षित राहत और सहायता बहुत ही तेज़ी से एवं अविलंब उपलब्ध कराई जा सके। साथ ही, बैंकों की सभी शाखाएँ एवं उनके क्षेत्रीय कार्यालयों को इन स्‍थायी अनुदेशों की जानकारी होनी चाहिए। जिला/राज्‍य प्राधिकारियों द्वारा अपेक्षित घोषणा किए जाने के तत्‍काल बाद ये स्‍थायी अनुदेश लागू होंगे। यह आवश्यक है कि ये अनुदेश राज्य सरकारी प्राधिकारियों तथा सभी जिलाधिकारियों के पास भी उपलब्ध हों ताकि सभी संबंधितों को पता हो कि प्रभावित क्षेत्रों में संबंधित प्राधिकारियों द्वारा क्या कार्रवाई की जाएगी।

3.2 बैंकों की क्षाखा / क्षेत्रीय कार्यालयों को विवेकाधिकार

बैंकों की शाखा / क्षेत्रीय प्रबंधकों को कतिपय विवेकाधीन शक्तियाँ प्रदान की जानी चाहिए ताकि जिला परामर्शदात्री समिति /राज्य स्तरीय बैंकर समितियों द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार कार्रवाई करने के लिए उन्हें अपने प्रधान कार्यालयों से नए अनुमोदन लेने की आवश्यकता न हो। अन्‍यों के साथ कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां ऐसी विवेकाधीन शक्तियों की जरूरत होगी वे हैं वित्त के स्‍तर, ऋणों की आवश्यकता आधारित पुनर्संरचना, ऋण अवधि विस्‍तार, मार्जिन, जमानत, ऐसे पुराने ऋण जहाँ वित्तपोषित आस्ति प्राकृतिक आपदा के कारण क्षतिग्रस्‍त या नष्ट हो गई हो, साथ ही ऐसी आस्ति (आस्तियों) के सृजन /की मरम्मत के लिए दिए गए नए ऋण के कारण उधारकर्ता की कुल देयता के मद्देनजर नए ऋण की स्वीकृति।

3.3 राज्य स्तरीय बैंकर समिति (एसएलबीसी) / जिला परामर्शदात्री समिति (डीसीसी) की बैठक

3.3.1 राज्य का बड़ा भाग प्राकृतिक आपदा की चपेट में आने पर राज्य स्तरीय बैंकर समिति के संयोजक बैंक को चाहिए कि वह आपदा के तुरन्त बाद एक विशेष एसएलबीसी बैठक आयोजित करें। इस समिति को राज्य सरकार के प्राधिकारियों के सहयोग से राहत कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए समन्वित कार्रवाई योजना तैयार करनी होगी। यदि आपदा से राज्य का केवल थोड़ा-सा भाग/ कुछ ही जिले प्रभावित हुए हों तो प्रभावित जिले (जिलों) की जिला परामर्शदात्री समिति के संयोजक को तुरन्त एक बैठक आयोजित करनी चाहिए। राज्य स्तरीय बैंकर समिति / जिला परामर्शदात्री समिति की ऐसी विशेष बैठक में प्रभावित क्षेत्रों का मूल्यांकन किया जाए ताकि यथोचित राहत उपायों की रूपरेखा तैयार की जा सके और उसका कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सके।

3.3.2 ऐसे क्षेत्रों में जहां आपदा काफी गंभीर हो राज्य स्तरीय बैंकर समिति / जिला परामर्शदात्री समिति द्वारा विशेष रूप से गठित कार्य-दल / उप समिति के द्वारा यथा निर्णीत रुप में साप्ताहिक/ पाक्षिक बैठकों में वहां आरंभ किए गए राहत उपाय (उपायों) की आवधिक समीक्षा की जानी चाहिए।

3.4 व्यापकता

यह मास्टर निदेश ऐसे किसानों / ऋणदाताओं पर भी लागू होंगे जो राज्य सरकार / प्राधिकरणों द्वारा घोषित प्राकृतिक आपदा से प्रभावित हुए हैं और दिशानिर्देशों के तहत सुविधाओं का लाभ उठाने को इच्छुक हैं।

3.5 राष्‍ट्रीय आपदा की घोषणा

3.5.1 यह मानी हुई बात है कि प्राकृतिक आपदाओं की घोषणा करना सार्वभौमिक सरकार (केन्‍द्र /राज्‍य सरकारों) के डोमेन में आता है। राज्‍य सरकारों से प्राप्‍त इनपुट से पता चलता है कि प्राकृतिक आपदा घोषित करने और घोषणाएं/ प्रमाणपत्र जारी करने के संबंध में कोई एकसमान क्रियाविधि प्रचलन में नहीं है। इन घोषणाओं/ प्रमाणपत्रों के नाम भिन्‍न-भिन्‍न राज्‍यों में भिन्‍न-भिन्‍न हैं जैसे अन्‍नेवारी, पैसेवारी, गिर्दावारी, आदि। इसके बावजूद, बैंकों द्वारा ऋणों के पुनर्निर्धारण को समाहित कराते हुए राहत उपाय देने के संबंध में एक सामान्‍य सूत्र यह बना है कि मूल्‍यांकित फसल हानि 33 प्रतिशत या अधिक होनी चाहिए। इस हानि का मूल्‍यांकन करने के लिए जहां कुछ राज्‍य फसल उपज में हानि निर्धारित करने के लिए फसल कटाई प्रयोग संचालित करते हैं वहीं अन्‍य राज्‍य आंखों देखें अनुमान/ देखी गई स्थिति का सहारा लेते हैं।

3.5.2 घोर आपदा की स्थिति, जैसे व्‍यापक स्‍तर पर बाढ, आदि, जहां अधिकांशत: यह स्‍पष्‍ट हो कि अधिकतर खड़ी फसल नष्‍ट हो गई है और / या भूमि एवं अन्‍य आस्तियों को व्‍यापक क्षति पहुंची है, ऐसे मामलों पर राज्य स्तरीय बैंकर समिति / जिला परामर्शदात्री समिति की आयोजित विशेष बैंठकों में राज्‍य सरकार / जिला प्राधिकारियों द्वारा चर्चा की जानी चाहिए जिनमें संबंधित सरकारी पदाधिकारी / जिलाधिकारी फसल कटाई प्रयोग के माध्‍यम से ‘अन्‍नेवारी’ (फसल हानि का प्रतिशत - चाहे नाम कुछ भी दिया जाए) का अनुमान न लगाने के कारण स्‍पष्‍ट करेंगे और प्रभावित जनता को राहत उपलब्‍ध कराने का निर्णय आंखों देखें अनुमान / देखी गई स्थिति के आधार पर करने की आवश्यकता को स्‍पष्‍ट करेंगे।

3.5.3 तथापि, दोनों ही मामलों में, जिला परामर्शदात्री समिति / राज्य स्तरीय बैंकर समिति को इन घोषणाओं पर सक्रिय कार्रवाई करने से पूर्व स्वयं को इस बात से पूर्णतया आश्वस्त कर लेना चाहिए कि फसल हानि 33 प्रतिशत या अधिक हुई है।

अध्‍याय - IV
वर्तमान ऋणों की पुनर्संरचना/ पुनर्निर्धारण

प्राकृतिक आपदा की स्थिति में आर्थिक व्यवसाय की क्षति और आर्थिक आस्तियों की हानि के कारण प्रभावित लोगों की चुकौती क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो जाती है। अतः वर्तमान ऋणों का पुनर्निर्धारण करते हुए ऋण की चुकौती में राहत देना आवश्यक हो जाता है।

4.1 कृषि ऋण : अल्पावधि उत्पादन ऋण (फसल ऋण)

4.1.1 प्राकृतिक आपदा होने के समय जो ऋण अतिदेय थे, उनको छोड़कर सभी अल्पावधि ऋण पुनर्निर्धारण के पात्र होंगे। प्राकृतिक आपदा की घटना वाले वर्ष में अल्पावधि ऋण का देय मूल धन और ब्याज को भी मीयादी ऋण में परिवर्तित किया जा सकता है।

4.1.2 आपदा की गंभीरता, आर्थिक आस्तियों की हानि और विपत्ति की गंभीरता के आधार पर पुनर्निर्धारित ऋण की चुकौती अवधि अलग-अलग हो सकती है। यदि हानि 33 प्रतिशत और 50 प्रतिशत के बीच है तो अधिकतम 2 वर्ष (1 वर्ष की अधिस्थगन अवधि सहित) तक की चुकौती अवधि की अनुमति दी जानी चाहिए। यदि फसल हानि 50 प्रतिशत या उससे अधिक है तो चुकौती अवधि अधिकतम 5 वर्ष (1 वर्ष की अधिस्थगन अवधि सहित) तक बढ़ाई जा सकती है।

4.1.3 सभी पुनर्निर्धारित ऋण खातों में अधिस्थगन अवधि कम से कम एक वर्ष होनी चाहिए। बैंकों को ऐसे पुनर्निर्धारित ऋणों पर अतिरिक्त संपार्श्विक जमानत की मांग नहीं करनी चाहिए।

4.2 कृषि ऋण- दीर्घावधि (निवेश) ऋण

4.2.1 वर्तमान मीयादी ऋण की किस्‍तों का उधारकर्ता की चुकौती क्षमता और प्राकृतिक आपदा के निम्‍नलिखित स्‍वरूप को ध्‍यान में रखकर पुनर्निर्धारण करना होगा अर्थात्

4.2.1.1 ऐसी प्राकृतिक आपदाएं जिनके कारण केवल उस वर्ष की फसल को ही क्षति पहुंची हो और उत्‍पादक आस्तियों को क्षति नहीं पहुंची हो, बैंक प्राकृतिक आपदा के वर्ष के दौरान किस्‍त के भुगतान का पुनर्निर्धारण कर सकते हैं और ऋण अवधि को एक वर्ष बढ़ा सकते हैं। इस व्‍यवस्‍था के अंतर्गत पूर्ववर्ती वर्षों में जानबूझकर न चुकाई गई किस्‍तें पुनर्निर्धारण की पात्र नहीं होंगी। उधारकर्ताओं द्वारा ब्‍याज भुगतान को भी बैंक आस्‍थगित कर सकते हैं।

4.2.1.2 ऐसी प्राकृतिक आपदाएं जिनसे उत्‍पादक आस्तियों को आंशिक रूप से अथवा पूर्णतया क्षति पहुंची हो और उधारकर्ताओं को नये ऋण की जरूरत हो, वहां ऋण अवधि बढ़ाते हुए पुनर्निर्धारण करने का निर्णय उधारकर्ता की समग्र चुकौती क्षमता की तुलना में उसकी कुल देयता (पुराने मीयादी ऋण, पुनर्निर्धारित फसल ऋण, यदि कोई हो और दिया जा रहा नया फसल ऋण / मीयादी ऋण) में से सरकारी एजेंसियों से प्राप्‍त सब्सिडी, बीमा योजनाओं, आदि के अंतर्गत उपलब्‍ध क्षतिपूर्ति को घटाते हुए किया जा सकता है। जहां पुनर्निर्धारित / नये मीयादी ऋण की कुल चुकौती अवधि मामला-दर-मामला आधार पर अलग-अलग होगी, वहीं सामान्‍यतया यह 5 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।

4.3 अन्‍य ऋण

4.3.1 राज्य स्तरीय बैंकर समिति / जिला परामर्शदात्री समिति द्वारा आपदा की गंभीरता के आधार पर अन्‍य सभी ऋणों (अर्थात कृषि ऋणों के अलावा) जैसे सम्‍बद्ध कार्यकलापों के लिए दिए जाने वाले और ग्रामीण कारीगरों, व्‍यापारियों, माइक्रो/लघु औद्योगिक यूनिटों अथवा अत्‍यधिक गंभीर स्थितियों में मध्‍यम उद्यमों को दिए जानेवाले ऋण के मामलों में सामान्‍य पुनर्निर्धारण जरूरी है अथवा नहीं इसके बारे में निर्णय लिए जाने की आवश्‍यकता है। यदि ऐसा निर्णय लिया जाता है तो जहां सभी ऋणों की वसूली विनिर्दिष्‍ट अवधि के लिए स्‍थगित की जानी चाहिए वहीं बैंकों को ऐसे प्रत्‍येक मामले में अलग-अलग उधारकर्ता की आवश्‍यकता का निर्धारण करना होगा और उसके खाते के स्‍वरूप, चुकौती क्षमता और नये ऋणों की आवश्‍यकता के आधार पर अलग-अलग बैंक द्वारा यथोचित निर्णय लिया जाना चाहिए।

4.3.2 किसी यूनिट को उसके पुनर्वास हेतु ऋण देते समय बैंकों के समक्ष मुख्‍य रूप से विचारणीय बात यह होगी कि पुनर्वास कार्यक्रम को कार्यान्वित करने के बाद उद्यम की व्यवहार्यता कितनी रहेगी।

4.4 आस्ति वर्गीकरण

पुनर्निर्धारित ऋणों के आस्ति वर्गीकरण की स्थिति निम्नानुसार होगी:

4.4.1 अल्‍पावधि ऋणों तथा दीर्घावधि ऋणों के पुनर्निर्धारित अंश को चालू देय राशियां माना जाए तथा उन्‍हें अनर्जक आस्तियों के रूप में वर्गीकृत करने की आवश्‍यकता नहीं है। उसके बाद इन नए मीयादी ऋणों के आस्ति वर्गीकरण संशोधित शर्तों से नियंत्रित होंगे। इस पर भी, बैंकों से अपेक्षित है कि वे ऐसे पुनर्निर्धारित मानक अग्रिमों के लिए बैंकिंग विनियमन विभाग1 द्वारा समय-समय पर निर्धारित रूप में उच्‍चतर प्रावधान करें। इसके अलावा, 'मानक संपत्ति' के रूप में वर्गीकृत ऐसे पुनर्निर्धारित खातों से ब्याज आय डीबीआर दिशानिर्देशों में निर्धारित मानदंडों के अनुसार पहचानी जाएगी।

4.4.2 पुनर्निर्धारित न की गई शेष देय राशि के आस्ति वर्गीकरण पर मूल शर्तें और इसकी स्‍वीकृति की शर्तें यथावत लागू रहेंगी। इसके फलस्वरूप, उधारदाता बैंक द्वारा उधारकर्ता से प्राप्‍य राशि को विभिन्न आस्ति वर्गीकरण श्रेणियों जैसे “मानक, अवमानक, संदिग्ध और हानि” के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाएगा।

4.4.3 यदि कोई अतिरिक्त वित्त हो तो उन्हें "मानक आस्ति" के रूप में माना जाएगा और भविष्य में उसके आस्ति वर्गीकरण पर स्‍वीकृति की शर्तें लागू होंगी।

4.4.4 यह सुनिश्चित करने के उद्देश्‍य से कि प्रभावित व्‍यक्तियों को राहत प्रदान करने में बैंक समुचित रूप से सक्रिय हैं, प्राकृतिक आपदा के दिन को पुनर्निर्धारित खाते के आस्ति वर्गीकरण का लाभ केवल तभी उपलब्‍ध हो सकेगा यदि प्राकृतिक आपदा के घोषित होने की तारीख से तीन माह की अवधि के भीतर पुनर्निर्धारण का कार्य पूरा किया गया हो। घोर प्राकृतिक आपदा की स्थिति में जब राज्य स्तरीय बैंकर समिति / जिला परामर्शदात्री समिति के विचार में शाखाओं के लिए सभी ऋणों को पुनर्निर्धारित करने के लिए उक्‍त अवधि पर्याप्‍त प्रतीत न होती हो तब उन्‍हें इस अवधि को बढ़ाये जाने हेतु कारणों का उल्लेख करते हुए नाबार्ड से संपर्क करना चाहिए। इन अनुरोधों को प्रत्येक मामले की योग्यता के आधार पर उसपर विचार किया जाएगा।

4.4.5 वे खाते, जिनका प्राकृतिक आपदाओं के कारण दूसरी बार या उससे अधिक बार पुनर्निर्धारण हुआ हों, पुनर्संरचना के बाद उसी आस्ति वर्गीकरण संवर्ग में बने रहेंगे। तदनुसार, पुनर्निर्धारित मानक आस्ति को प्राकृतिक आपदा के कारण बाद में पुनर्निर्धारित किए जाने की आवश्‍यकता होने पर उसे दूसरे पुनर्निर्धारण का मामला नहीं माना जाएगा अर्थात मानक आस्ति वर्गीकरण को बनाए रखने की अनुमति दी जाएगी। तथापि, पुनर्निर्धारण संबंधी अन्‍य सभी मानदंड लागू होंगे।

4.5 बीमा से प्राप्‍त रकम को उपयोग में लाना

4.5.1 यद्यपि ऋणों के पुनर्निर्धारण से संबंधित उपर्युक्‍त उपाय किसानों को राहत पहुंचाने के उद्देश्‍य से हैं, वहीं सिद्धांतत: बीमा से प्राप्‍त रकम द्वारा उनकी हानियों की क्षतिपूर्ति हो जानी चाहिए। कृषि, सहयोग एवं किसान कल्‍याण विभाग, कृषि मंत्रालय, द्वारा जारी आदेशों के अनुसार प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) खरीफ 2016 से वर्तमान योजनाओं जैसे राष्‍ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) और संशोधित राष्‍ट्रीय कृषि बीमा योजना (एमएनएआईएस) का स्‍थान लेगी। प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के अंतर्गत अधिसूचित क्षेत्रों में अधिसूचित फसलों हेतु सभी मौसमी कृषि ऋणों (एसएओ) को विनिर्दिष्‍ट उदाहरणों2 में फसलोत्‍तर जोखिमों सहित फसल चक्र के सभी चरणों के लिए बीमा सुरक्षा अनिवार्यतः प्रदान की गयी है। फसल बीमा के लिए बैंकों द्वारा युनिफाईड पोर्टल जो www.agri-insurance.gov.in पर उपलब्‍घ है में किसानों के ब्‍यौरों की प्रविष्टि करनी होगी ताकि बीमाकृत फसल, कटौती किए गए प्रीमियम, आदि की व्‍याप्ति का मूल्‍यांकन करने में सुविधा हो सके।

4.5.2 प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में ऋणों का पुनर्निर्धारण करते समय बैंकों को यदि बीमा कंपनी से कोई राशि प्राप्‍य हो तो बीमा की आय को भी हिसाब में लेना चाहिए। जहां उधारकर्ताओं को नया ऋण स्वीकृत किया गया है, ऐसे मामलों में उन्‍हें इस आय को ‘पुनर्निर्धारित खातों’ में समायोजित कर लेना चाहिए। तथापि, उन मामलों में जहां दावे की प्राप्ति निश्चित है, बैंक सहानुभूति पूर्वक कार्य करते हुए बीमे से संबंधित दावों की प्राप्ति की प्रतीक्षा किए बिना पुनर्संरचना पर विचार कर सकते हैं तथा नए ऋण स्वीकृत कर सकते हैं।

अध्‍याय - V
नए ऋण प्रदान करना

5.1 नए ऋण मंजूर करना

5.1.1 एक बार राज्य स्तरीय बैंकर समिति / जिला परामर्शदात्री समिति द्वारा ऋणों के पुनर्निर्धारण का निर्णय ले लिए जाने पर अल्‍पावधि ऋणों के ऐसे परिवर्तन किए जाने तक, बैंक, प्रभावित किसानों को नया फसल ऋण दे सकते हैं जो वर्तमान दिशानिर्देशों3 के अनुसार उस फसल हेतु वित्‍त के स्‍तर और कृषि–जोत पर आधारित होगा।

5.1.2 कृषि और संबद्ध गतिविधियों (पॉल्‍ट्री, मत्‍स्‍यपालन, पशुपालन, आदि) के संबंध में विभिन्‍न प्रकार के प्रयोजनों, जैसे वर्तमान आर्थिक आस्ति (आस्तियों) की मरम्‍मत और/ अथवा नयी आस्ति (आस्तियों) के क्रय के लिए दीर्घावधि ऋणों हेतु भी बैंक सहायता की आवश्‍यकता हो सकती है। इसी प्रकार, प्राकृतिक आपदा से प्रभावित क्षेत्र में ग्रामीण कारीगरों, स्‍वरोजगार में लगे व्‍यक्तियों, माइक्रो और लघु औद्योगिक यूनिटों, आदि को अपनी आजीविका को बनाए रखने के लिए नए क्रेडिट की आवश्‍यकता पड़ सकती है। बैंक स्‍वयं ही अन्‍य बातों के साथ-साथ, प्रभावित उधारकर्ताओं की ऋण आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए दिए जाने वाले नए ऋण का आकलन कर ऋण की मात्रा निर्धारित कर सकते हैं और ऋण मंजूर करने के लिए यथोचित क्रियाविधि का पालन कर सकते हैं।

5.1.3 बैंक वर्तमान उधारकर्ताओं को बिना किसी संपार्श्विक जमानत के 10,000 तक के खपत ऋण भी मंजूर कर सकते हैं। तथापि, उक्‍त सीमा को बैंक के विवेक पर 10,000/- से अधिक भी किया जा सकता है।

5.2 निबंधन एवं शर्तें

5.2.1 गारंटी, जमानत और मार्जिन

5.2.1.1 व्यक्तिगत गारंटी न होने के कारण से ऋण देने से मना नहीं किया जाना चाहिए। यदि बाढ़ से हुई क्षति अथवा विनाश के कारण बैंक की मौजूदा जमानत कम हो गई हो तो केवल अतिरिक्त नई जमानत न होने के कारण से सहायता के लिए मना नहीं किया जाएगा। जमानत (मौजूदा तथा नए ऋण से प्राप्त की जानेवाली आस्ति) का मूल्य ऋण की राशि से कम होने पर भी नया ऋण प्रदान किया जाना चाहिए। नए ऋणों के लिए बैंक को सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाना चाहिए।

5.2.1.2 यदि व्यक्तिगत जमानत / फसल को दृष्टिबंधक रख कर फसल ऋण (जिसे मीयादी ऋण में परिवर्तित किया गया है) पहले दिया गया हो, तथा उधारकर्ता परिवर्तित ऋण के लिए जमानत के रूप में भूमि का अधिकार (चार्ज) / बंधक प्रस्तुत करने में असमर्थ हो तो केवल भूमि को जमानत के रूप में प्रस्तुत न कर पाने की उसकी असमर्थता के आधार पर उन्हें परिवर्तन सुविधा से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए। यदि उधारकर्ता भूमि के बंधक / अधिकार (चार्ज) की जमानत पर पहले ही एक मीयादी ऋण ले चुका है, तो बैंक को परिवर्तित मीयादी ऋण के लिए द्वितीय चार्ज से संतुष्ट हो जाना चाहिए। परिवर्तन सुविधाएँ प्रदान करने हेतु बैंक तृतीय पक्ष की गारंटियों पर जोर न दें।

5.2.1.3 यदि भूमि जमानत के रूप में रखी गई हो, तो मूल-टाइटल रिकार्ड न होने पर उन किसानों, जिनके विलेख तथा ऐसे पंजीकृत बंटाईदार जिनको जारी पंजीयन प्रमाणपत्रों के रूप में टाइटल, के सबूत गुम हो गए हों, को वित्तपोषण करने हेतु राजस्व विभाग के प्राधिकारियों द्वारा जारी प्रमाणपत्र स्वीकार किये जा सकते हैं। संविधान की छठी अनुसूची द्वारा कवर किए गए क्षेत्रों में, जिसमें भूमि, समुदाय के स्वामित्व में है, समुदाय प्राधिकरणों द्वारा जारी प्रमाण पत्र स्वीकार किया जा सकता है।

5.2.1.4 मार्जिन आवश्यकताओं में छूट दी जाए या फिर संबंधित राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त अनुदान / सब्सिडी को मार्जिन समझा जाये।

5.3 ब्याज दर

5.3.1 ब्याज की दरें भारतीय रिज़र्व बैंक के मास्टर निदेशों (ऋणों एवं अग्रिमों पर ब्याज दर) निदेशों के अनुसार होंगी। तथापि, बैंकों से अपेक्षा की जाती है कि उधारकर्ताओं की कठिनाइयों पर वे अपने विवेकाधीन दायरे में उदारता का रूख अपनाएं तथा आपदा से प्रभावित लोगों के साथ सहानुभूतिपूर्वक पेश आएँ। चूकवाली वर्तमान बकाया राशि के संबंध में कोई दण्डात्मक ब्याज नहीं लगाया जाएगा। बैंकों को चाहिए कि ब्याज प्रभारों के चक्रवृद्धि आकलन को समुचित रूप से स्थगित करें। बैंक कोई दण्डात्मक ब्याज न लगाएं तथा परिवर्तित / पुनर्निर्धारित ऋणों के संबंध में यदि कोई दण्डात्मक ब्याज लगाया जा चुका हो तो उसमें छूट देने पर विचार करें। प्राकृतिक आपदा के स्वरूप एवं गंभीरता के आधार पर राज्य स्तरीय बैंकर समिति / जिला परामर्शदात्री समिति को उधारकर्ता को दी जा सकने वाली ब्याज दर रियायत पर विचार करना चाहिए ताकि राहत प्रदान करने के दृष्टिकोण के बारे में बैंकों के बीच एकरूपता हो।

5.3.2 जैसा कि समय-समय पर भारत सरकार4 द्वारा अधिसूचित किया गया है, किसानों को अल्पावधि फसल ऋण और प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने के लिए पुनर्निर्धारण की ऋण राशि पर पहले वर्ष के लिए बैंकों को प्रति वर्ष 2 प्रतिशत की दर से ब्याज सबवेंशन उपलब्ध कराया जाएगा। ऐसे पुनर्निर्धारित ऋणों पर दूसरे वर्ष से ब्याज की सामान्य दर लागू होगी।

अध्‍याय - VI
अन्य अनुषंगी राहत उपाय

6.1 अपने ग्राहक को जानिए (केवाईसी) मानदंड - रियायत

यह मानना होगा कि बडी आपदा में विस्‍थापित अथवा प्रतिकूल रूप से प्रभावित अधिकांश व्‍यक्तियों को अपने सामान्‍य पहचान संबंधी तथा व्‍यक्तिगत रिकार्ड मिल नहीं पाते हैं। ऐसे मामलों में फोटो एवं बैंक अधिकारियों के समक्ष हस्‍ताक्षर अथवा अंगूठे के निशान के आधार पर छोटा खाता खोला जा सकता हैं। उपर्युक्त अनुदेश उन मामलों पर लागू होंगे जहां खाते में शेष 50,000/- अथवा प्रदान की गई राहत की राशि (यदि अधिक हो) से अधिक न हो और वर्ष के दौरान खाते में कुल जमा 1,00,000/- अथवा प्रदत्‍त राहत राशि (यदि अधिक हो) से अधिक न हो।

6.2 बैंकिंग सेवा तक पहुँच

6.2.1 ऐसे क्षेत्र जहां बैंक शाखाएँ प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हुई हैं वहां बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक/ नाबार्ड के संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय को सूचित करते हुए अस्थायी परिसर से परिचालन कर सकते हैं। अस्थायी परिसर में 30 दिन से अधिक समय बने रहने के लिए बैंक उपयुक्त प्राधिकारियों से विशिष्ट अनुमोदन प्राप्त करें। बैंकों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अनुषंगी कार्यालय, विस्तार काउंटर स्‍थापित करके या मोबाइल बैंकिंग सुविधाओं द्वारा प्रभावित क्षेत्रों को बैंकिंग सेवाएं प्रदान की जाएं तथा उसकी सूचना भारतीय रिज़र्व बैंक/ नाबार्ड को भी दी जाए।

6.2.2 प्रभावित लोगों की तत्काल नकदी आवश्यकता को पूरा करने हेतु एटीएम के कार्य को फिर से शीघ्र चालू करने या ऐसी सुविधाएं उपलब्ध करवाने हेतु वैकल्पिक व्यवस्था बनाने को उचित महत्व दिया जाए।

6.2.3 बैंकों द्वारा प्रभावित व्‍यक्तियों के हालात सुधारने के लिए अपने विवेकानुसार किए जाने वाले अन्‍य उपाय हो सकते हैं - एटीएम शुल्‍क की माफी देना, एटीएम आहरण सीमा बढ़ाना, ओवरड्राफ्ट शुल्‍क की माफी देना /सावधि जमाराशियों पर अवधिपूर्व आहरण संबंधी दंड से छूट देना /क्रेडिट कार्ड / अन्‍य ऋण किस्‍तों के भुगतान के लिए विलंब शुल्‍क की माफी देना और क्रेडिट कार्ड धारियों को अपनी बकाया शेष राशि को 1-2 वर्षों में भुगतान योग्‍य ईएमआई में परिवर्तित करने का विकल्‍प देना। इसके अतिरिक्त, प्रभावित व्‍यक्तियों को हुई कठिनाई को देखते हुए सामान्य ब्याज को छोड़कर किसान ऋण खाते में नामे डाले गए सभी प्रभारों की माफी दी जा सकती है।

अध्‍याय - VII
दंगे और गड़बड़ी : दिशानिर्देशों की प्रयोज्यता

दंगे और गड़बड़ी की स्थिति में दिशानिर्देशों की प्रयोज्यता

7.1 भारतीय रिज़र्व बैंक जब भी बैंकों को दंगे / गड़बड़ी से प्रभावित लोगों को पुनर्वास सहायता प्रदान करने के लिए कहे तब इस प्रयोजनार्थ बैंकों द्वारा उक्त दिशानिर्देशों का व्यापक रूप से पालन किया जाए। तथापि, यह सुनिश्चित किया जाए कि केवल सही व्यक्ति, जो कि राज्य प्रशासन द्वारा यथोचित रूप से दंगे / गड़बड़ी से प्रभावित व्यक्तियों के रूप में पहचाने गये हो, को ही दिशानिर्देशों के अनुसार सहायता उपलब्ध करवायी जाती है। बड़े पैमाने पर दंगों की स्थिति में जहां राज्य / क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों को प्रभावित किया जाता है और राज्य प्रशासन दंगा / गड़बड़ी से प्रभावित व्यक्तियों की पहचान करने की स्थिति में नहीं हो और एसएलबीसी के विशिष्ट निर्णय के अधीन, 'वास्तविक व्यक्तियों' की पहचान करने की ज़िम्मेदारी बैंकों को दे दी गई है।

7.2 राज्य सरकार से अनुरोध / सूचना प्राप्त होने पर भारतीय रिज़र्व बैंक/ नाबार्ड द्वारा बैंकों को सूचना जारी किए जाने के बाद बैंकों द्वारा उनकी शाखाओं को अनुदेश जारी किए जाते हैं। इस कारण दंगों से प्रभावित लोगों को सहायता प्रदान करने में सामान्यतः विलंब हो जाता है। प्रभावित लोगों को तत्काल सहायता सुनिश्चित करने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि दंगे / गड़बड़ी होने पर जिलाधिकारी अग्रणी बैंक अधिकारी को जिला परामर्शदात्री समिति की बैठक, यदि आवश्यक हो, बुलाने के लिए तथा दंगों / गड़बड़ी से प्रभावित क्षेत्रों में जान-माल की हानि पर एक रिपोर्ट जिला परामर्शदात्री समिति को प्रस्तुत करने हेतु कह सकता है। यदि जिला परामर्शदात्री समिति संतुष्ट होती है कि दंगे / गड़बड़ी के कारण जान-माल की व्यापक हानि हुई है, तो दंगे / गड़बड़ी से प्रभावित लोगों को उपर्युक्त दिशानिर्देशों के अनुसार राहत प्रदान की जाए। कुछ मामलों में, जहाँ जिला परामर्शदात्री समितियाँ नहीं है, जिलाधिकारी राज्य के राज्य स्तरीय बैंकर समिति के संयोजक को प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने हेतु विचार करने के लिए बैंकरों की एक बैठक बुलाने के लिए अनुरोध कर सकता है। जिलाधिकारी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट तथा उस पर जिला परामर्शदात्री समिति / राज्य स्तरीय बैंकर समिति द्वारा लिये गये निर्णय को रिकार्ड किया जाए और उसे बैठक के कार्य-विवरण में शामिल किया जाए। बैठक की कार्यवाही की एक प्रति भारतीय रिज़र्व बैंक के संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय को प्रेषित की जाए।


परिशिष्ट

मास्‍टर निदेश – भारतीय रिज़र्व बैंक (प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपाय) निदेश, 2018

मास्टर निदेश हेतु संकलित परिपत्रों की सूची

क्र.सं. परिपत्र सं. तारीख विषय
1. ग्राआऋवि.सं.पीएस.बीसी.06/पीएस.126-84 02.08.1984 प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपायों के लिए संशोधित दिशानिर्देश
2. ग्राआऋवि.सं.पीएलएफएस.बीसी.38/पीएस126-91/92 21.09.1991 दंगों / सांप्रदायिक गड़बड़ी, इत्यादि से प्रभावित लोगों को बैंकों से सहायता
3. ग्राआऋवि.सं.पीएलएफएस.बीसी.59/05.04.02/92-93 06.01.1993 प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपायों हेतु दिशानिर्देश - (उपभोग ऋण)
4. ग्राआऋवि.सं.पीएलएफएस.बीसी.128/05.04.02/97-98 20.06.1998 प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों के लिए राहत उपाय - कृषि अग्रिम
5. ग्राआऋवि.पीएलएफएस.बीसी.सं.42/05.02.02/2005-06 1.10.2005 बैंकिंग प्रणाली से कृषि और संबंधित गतिविधियों के लिए ऋण उपलब्ध कराने के संबंध में परामर्शदात्री समिति
6. विसविवि.सं.एफएसडी.बीसी.12/05.10.001/2015-16 21.8.2015 प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकोंद्वारा राहत उपायों के लिए दिशानिर्देश
7. विसविवि.सं.एफएसडी.बीसी.27/05.10.001/2015-16 30.06.2016 प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपायों के लिए दिशानिर्देश-बीमा आय का उपयोग
8. मास्‍टर निदेश विसविवि.केंका.एफएसडी.बीसी.सं.8/05.10.001/2017-18 03.07.2017 मास्‍टर निदेश – भारतीय रिज़र्व बैंक (प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपाय) निदेश 2017
9. नाबार्ड संदर्भ सं.एनबी.डीओआर.एसटी/1790/पॉलिसी-ए-10/2015-16 26.08.2015 प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों द्वारा राहत उपाय हेतु दिशानिर्देश

1 आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण और प्रावधानीकरण पर विवेकपूर्ण दिशानिर्देशों पर बैंकिंग विनियमन विभाग के मास्‍टर निदेश

2 परिचालन दिशानिर्देश – कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा पीएमएफबीवाई जारी

3 मास्टर परिपत्र – किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना

4 अल्पावधि फसल ऋणों पर ब्याज सबवेन्शन योजना में शामिल करने के अधीन


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