21 अक्तूबर 2026
मौद्रिक नीति समिति की 5 से 7 अक्तूबर 2026 के दौरान हुई बैठक का कार्यवृत्त
[भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडएल के अंतर्गत]
भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडबी के अंतर्गत गठित मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तिरसठवीं बैठक 5 से 7 अक्तूबर 2026 के दौरान आयोजित की गई थी।
2. बैठक की अध्यक्षता श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर ने की तथा सभी सदस्य – डॉ. नागेश कुमार, निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक, इंस्टिट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट, नई दिल्ली; श्री सौगत भट्टाचार्य, अर्थशास्त्री, मुंबई; प्रोफेसर राम सिंह, निदेशक, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, दिल्ली; डॉ. पूनम गुप्ता, मौद्रिक नीति की प्रभारी उप गवर्नर और श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य, कार्यपालक निदेशक (भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडबी(2)(सी) के अंतर्गत केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित रिज़र्व बैंक के अधिकारी) इसमें उपस्थित रहें।
3. भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडएल के अनुसार, रिज़र्व बैंक मौद्रिक नीति समिति की प्रत्येक बैठक के चौदहवें दिन इस बैठक की कार्यवाहियों का कार्यवृत्त प्रकाशित करेगा, जिसमें निम्नलिखित शामिल होगा:
ए) मौद्रिक नीति समिति की बैठक में अपनाया गया संकल्प;
बी) मौद्रिक नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का वोट, जो उक्त बैठक में अपनाए गए संकल्प पर उस सदस्य द्वारा दिया जाएगा; और
सी) उक्त बैठक में अपनाए गए संकल्प पर धारा 45ज़ेडआई की उप-धारा (11) के अंतर्गत मौद्रिक नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का वक्तव्य।
4. वैश्विक और घरेलू स्तर पर हो रहे घटनाक्रमों को देखते हुए, एमपीसी ने स्टाफ के समष्टि-आर्थिक अनुमानों की विस्तार से समीक्षा की, जिसमें सर्वेक्षण परिणामों और हितधारकों के साथ परामर्श से प्राप्त निविष्टि शामिल थे। एमपीसी ने संभावना के विभिन्न जोखिमों से जुड़े वैकल्पिक परिदृश्यों की भी समीक्षा की। उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए और मौद्रिक नीति के रुख पर विस्तृत चर्चा के बाद, एमपीसी ने संकल्प अपनाया जिसे नीचे प्रस्तुत किया गया है।
संकल्प
5. श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक की अध्यक्षता में मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 63वीं बैठक 5 से 7 अक्तूबर 2026 तक आयोजित की गई। बैठक में एमपीसी के सदस्य डॉ. नागेश कुमार, श्री सौगत भट्टाचार्य, प्रो. राम सिंह, डॉ. पूनम गुप्ता और श्री इंद्रनील भट्टाचार्य ने भाग लिया।
6. उभरते समष्टि-आर्थिक और वित्तीय घटनाक्रमों तथा संभावना का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद, एमपीसी ने चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 25 आधार अंकों (बीपीएस) से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने के लिए सर्वसम्मति से वोट किया। परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5.25 प्रतिशत, तथा सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) दर और बैंक दर 5.75 प्रतिशत पर बनी रहेगी। एमपीसी ने मौद्रिक रुख को सुविचारित सख्ती (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) रुख में बदलने का भी निर्णय लिया।
संवृद्धि एवं मुद्रास्फीति संभावना
वैश्विक संभावना
7. अगस्त 2026 में आयोजित पिछली एमपीसी बैठक के बाद से, पश्चिम एशिया में संघर्ष पुनः आरंभ होने और इसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी अस्थिरता ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अनिश्चितता में रखा है। वैश्विक संवृद्धि आघात-सह बनी रही है। प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति में बढ़ोत्तरी के कारण सख्त मौद्रिक नीति की ओर रुख हुआ है। अमेरिकी फेड ने सितंबर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी की। इसके बाद फेड के वक्तव्य और प्रमुख प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण केंद्रीय बैंकों द्वारा दरों में सख्ती के कारण वैश्विक नीतिगत दरों में और बढ़ोतरी की प्रत्याशाएं मजबूत हुई हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में कड़े हालात और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में राजकोषीय स्थिरता की चिंताओं के कारण वैश्विक बॉण्ड प्रतिफल उच्च स्तर पर बने हुए हैं। पश्चिम एशिया के संघर्ष का कोई समाधान न निकलने के कारण, वैश्विक संभावना के लिए महत्वपूर्ण अधोगामी जोखिम बने हुए हैं, जिनमें वैश्विक वित्तीय स्थितियों का और अधिक सख्त होना, एआई-संबंधी आस्तियों का उच्च मूल्यन जारी रहना और उच्च सार्वजनिक ऋण शामिल हैं।
घरेलू संभावना
8. इन निरंतर वैश्विक बाधाओं के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था आघात-सह बनी हुई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अनुमानों के अनुसार, 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही, जो उम्मीद से अधिक थी। मजबूत निजी उपभोग और स्थिर निवेश, वस्तु निर्यात में सुधार और सेवा निर्यात में निरंतर तेजी ने संवृद्धि को समर्थन दिया। आपूर्ति पक्ष पर, विनिर्माण क्षेत्र में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। घरेलू और बाहरी मांग में तेजी के कारण सेवा क्षेत्र की गतिविधियां और अधिक मजबूत हुईं।
9. दूसरी तिमाही में, जुलाई-अगस्त के लिए उपलब्ध उच्च-आवृत्ति संकेतक घरेलू आर्थिक गतिविधि में निरंतर गति का संकेत देते हैं। घरेलू मांग आघात-सह बनी हुई है और मजबूत बाहरी मांग द्वारा सुसमर्थित है, जिसमें वस्तु निर्यात में दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है।
10. आगे चलकर, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता का घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव जारी रहेगा। यद्यपि ऊर्जा की कीमतें और आपूर्ति शृंखला का दबाव बना हुआ है, तथापि पश्चिम एशिया के चल रहे संघर्ष के बीच इनका निकटवर्ती रुख अनिश्चित है। आपूर्ति स्रोतों में सक्रिय विविधता लाकर उनके प्रतिकूल प्रभाव को नियंत्रित किया जा रहा है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी और मजबूत अल नीनो स्थितियां कृषि क्षेत्र की संभावना और ग्रामीण मांग के लिए जोखिम उत्पन्न करती हैं, हालांकि खाद्यान्न के पर्याप्त बफर और सरकार के सक्रिय नीतिगत हस्तक्षेपों से प्रभाव कम होने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, सेवाओं में निरंतर गति और व्यापक रूप से स्थिर रोजगार की स्थिति से शहरी मांग को समर्थन मिलने की संभावना है। मजबूत क्षमता उपयोग, मजबूत ऋण प्रवाह और अवसंरचना पर सरकार के जोर से निवेश गतिविधि को बनाए रखने की उम्मीद है। हालांकि सेवाओं के निर्यात के तेज बने रहने की उम्मीद है, लेकिन द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को वस्तु निर्यात को बढ़ावा देना होगा।
11. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की संवृद्धि दर 7.1 प्रतिशत अनुमानित है, जोकि दूसरी तिमाही में 7.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। 2027-28 की पहली तिमाही के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि 7.1 प्रतिशत अनुमानित है। जोखिम समान रूप से संतुलित हैं (चार्ट 1)।
12. अगस्त 2026 में सीपीआई मुद्रास्फीति जुलाई के 4.5 प्रतिशत से बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई। हालांकि यह वृद्धि मुख्य रूप से खाद्य और ईंधन समूहों में उच्च मुद्रास्फीति के कारण हुई है, लेकिन मूल मुद्रास्फीति भी बढ़ी है जो मूल्य दबावों के व्यापक होने के संकेत देती है। चीनी और प्याज जैसी कुछ वस्तुओं में उल्लेखनीय उछाल के साथ खाद्य कीमतों में वृद्धि अधिक व्यापक हो गई है। अगस्त में ईंधन मुद्रास्फीति में वृद्धि मुख्य रूप से प्रतिकूल आधार प्रभाव के कारण थी। अगस्त में मूल मुद्रास्फीति बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई और कीमती धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति 2.9 प्रतिशत हो गई। हेडलाइन सीपीआई में 4 प्रतिशत से अधिक मुद्रास्फीति दर्ज करने वाली वस्तुओं का भारित हिस्सा अगस्त में लगातार बढ़कर लगभग 37 प्रतिशत हो गया।
13. मुद्रास्फीति संबंधी सन्निकट संभावना से संकेत मिलता है कि मानसून में कमी, चल रहे अल-नीनो की स्थिति और उच्च ऊर्जा तथा अन्य वस्तुओं की कीमतों के कारण आपूर्ति पक्ष से दबाव जारी रहेगा, जिनका प्रभाव-विस्तार अभी भी जारी है। सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति 5.2 प्रतिशत अनुमानित है, जोकि दूसरी तिमाही में 4.9 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.0 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहना अनुमानित है (चार्ट 2)। वित्त वर्ष 2027-28 की पहली तिमाही के लिए मुद्रास्फीति 5.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है और जोखिम समान रूप से संतुलित हैं। 2026-27 के लिए मूल मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
मौद्रिक नीति निर्णय का औचित्य
14. एमपीसी ने कहा कि भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण वैश्विक परिस्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। फिर भी, भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। आर्थिक गति व्यापक बनी हुई है। अर्थव्यवस्था आघात-सह बने रहने की अपेक्षा है।
15. उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर, यह स्पष्ट है कि मुद्रास्फीति और उसकी संभावना पिछले वर्ष की तरह अनुकूल नहीं है, क्योंकि अगली तीन तिमाहियों में हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति औसतन लगभग 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है और इस वर्ष मूल मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इस स्थिति में, नीतिगत दर का पुनर्समायोजन करना अनिवार्य है।
16. आपूर्ति पक्ष की मुद्रास्फीति के संबंध में, मौद्रिक नीति मुख्य रूप से द्वितीयक प्रभावों (मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं और फर्म स्तर के मूल्य निर्धारण व्यवहार आदि) को कम करके काम करती है, जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से सामने आने में समय लगता है और उपलब्ध डेटा से अलग करना कठिन होता है। मुद्रास्फीति की प्रत्याशाओं और फर्म स्तर के मूल्य निर्धारण व्यवहार से संबंधित डेटा के अलावा, इस उद्देश्य के लिए मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण के संकेतक जैसे मूल मुद्रास्फीति और प्रसार सूचकांक का उपयोग किया जाता है। यद्यपि, यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि द्वितीय-चरण के प्रभावों और आपूर्ति पक्ष के दबावों (ऊर्जा तथा अन्य इनपुट के माध्यम से उत्पादन लागत में) के अप्रत्यक्ष प्रभाव के बीच अंतर करना कठिन है, क्योंकि ये दोनों ही इन संकेतकों में उपस्थित हैं। यद्यपि बढ़ी हुई मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं और मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण के कुछ प्रमाण हैं, तथापि मूल्य निर्धारण व्यवहार में आपूर्ति पक्ष के दबावों के समाहित होने के संकेत सीमित ही हैं।
17. इसी प्रकार, यद्यपि मांग पक्ष के दबाव के सीमित प्रमाण हैं, तथापि मौद्रिक और ऋण समुच्चय में मजबूत संवृद्धि के मद्देनजर जोखिम मौजूद हैं।
18. इन सभी कारकों पर विचार करते हुए, एमपीसी ने नीतिगत रेपो दर को 25 आधार अंकों से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने के लिए सर्वसम्मति से वोट किया। एमपीसी ने रुख को सुविचारित सख्ती (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) में बदलने का भी निर्णय लिया। यह केवल यह संकेत देता है कि मौजूदा स्थितियों को देखते हुए, निकट अवधि में दरों में कटौती की कोई गुंजाइश नहीं है और आगे की नीतिगत कार्रवाई केवल दरों में वृद्धि या ठहराव हो सकती है, जो बदलती परिस्थितियों और संभावना पर निर्भर करता है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी का चक्र कितना लंबा होगा और इसका दायरा क्या होगा, यह वास्तविक संवृद्धि और मुद्रास्फीति के रुझानों तथा संभावना पर निर्भर करेगा, विशेष रूप से अंतर्निहित मुद्रास्फीति, मूल्य दबावों के विस्तार और आपूर्ति झटके के दूसरे दौर के प्रभावों के साथ-साथ मांग के आवेगों के प्रभाव पर।
19. दो सदस्यों, डॉ. नागेश कुमार और प्रोफ़ेसर राम सिंह, का यह विचार था कि रुख को तटस्थ रखा जाना चाहिए।
20. एमपीसी मूल्य स्थिरता के अपने अधिदेश के प्रति प्रतिबद्ध है और मुद्रास्फीति को अपने लक्ष्य के साथ क्रमिक रूप से संरेखित करने का प्रयास करेगी।
21. एमपीसी की बैठक का कार्यवृत्त 21 अक्तूबर 2026 को प्रकाशित किया जाएगा।
22. एमपीसी की अगली बैठक 2 से 4 दिसंबर 2026 को निर्धारित है।
नीतिगत रेपो दर को 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने के संकल्प पर वोटिंग
| सदस्य |
वोट |
| डॉ. नागेश कुमार |
हाँ |
| श्री सौगत भट्टाचार्य |
हाँ |
| प्रो. राम सिंह |
हाँ |
| श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य |
हाँ |
| डॉ. पूनम गुप्ता |
हाँ |
| श्री संजय मल्होत्रा |
हाँ |
डॉ. नागेश कुमार का वक्तव्य
23. वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था द्वारा दर्ज की गई 7.8 प्रतिशत की जीडीपी संवृद्धि, जो पश्चिम एशिया संघर्ष और व्यापार नीति संबंधी निरंतर अनिश्चितताओं की पृष्ठभूमि में आई है, प्रभावशाली है और अर्थव्यवस्था की आघात-सहनीयता को रेखांकित करती है। पहली तिमाही की संवृद्धि को विनिर्माण क्षेत्र की 9.2 प्रतिशत की सुदृढ़ संवृद्धि का आधार मिला, जो रोजगार सृजन पर इसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों के कारण काफी उत्साहजनक है। ऐसे संकेत हैं कि संवृद्धि की यह गति दूसरी तिमाही में भी जारी है, जिसकी पुष्टि सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) की स्वस्थ दर से होती है, जो वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में 31.4 प्रतिशत की तुलना में वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में 34.3 प्रतिशत रही। यदि 290 आधार अंकों की यह उछाल बनी रहती है, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अच्छा होगा, जिससे निजी निवेश चक्र को गति मिलने और औद्योगिक संवृद्धि को बढ़ावा मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा। औद्योगिक ऋण में विस्तार भी इस मत का समर्थन करता है कि निजी निवेश चक्र अंततः गति पकड़ रहा है। इसी प्रकार, पूंजीगत वस्तु क्षेत्र पिछले 4 माह से दोहरे अंकों में संवृद्धि दर्ज कर रहा है, जो सुदृढ़ जीएफसीएफ और ऋण संवृद्धि के अनुरूप है। बड़ी आईटी कंपनियों/वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों की ओर से डेटा सेंटर के लिए अनेक बड़े निवेश प्रस्ताव आ रहे हैं, और जीसीसी देश में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहे हैं। अतः, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए संवृद्धि का अनुमान पिछली नीति के समय के 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया गया है।
24. वैश्विक व्यापार नीति संबंधी अनिश्चितताओं के बावजूद पण्य निर्यात ने भी सेवा निर्यात के साथ-साथ सुदृढ़ संवृद्धि दर्शाई है, जिससे चालू खाता घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 1 प्रतिशत के प्रबंधनीय दायरे में बनाए रखने में सहायता मिली है। रिज़र्व बैंक की एफसीएनआर(बी) योजना से अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) की जमाराशियों का पर्याप्त अंतर्वाह हुआ है, जो रुपये की विनिमय दर को स्थिर करने में सहायक होने के साथ-साथ 2026-27 में भुगतान संतुलन में उल्लेखनीय अधिशेष का कारण बनेगा। आगे चलकर, अन्य के साथ-साथ भारत-यूरोपीय संघ एफटीए, जिनके 2027 के आरंभ तक लागू होने की संभावना है, पहली बार भारतीय उत्पादों को वियतनाम और बांग्लादेश जैसे समकक्ष देशों के समान प्रतिस्पर्धात्मक अवसर देकर, विशेष रूप से श्रम-प्रधान वस्तुओं के भारत के निर्यात को बढ़ावा देंगे।
25. दूसरी ओर, मुद्रास्फीति की संभावना अनेक कारकों के संयोजन के कारण चुनौतीपूर्ण बनी हुई है, जिनमें अपर्याप्त मानसून, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, कीमती धातुओं की कीमतों का उच्च स्तर पर बने रहना और विनिमय दर में गिरावट शामिल हैं। इसके परिणामस्वरूप 2026-27 के लिए हेडलाइन मुद्रास्फीति के अनुमान को पिछली नीति के 5.0 प्रतिशत से 20 आधार अंक बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत और मूल मुद्रास्फीति के अनुमान को 10 आधार अंक बढ़ाकर 4.4 प्रतिशत किया गया है। यद्यपि मुद्रास्फीति मुख्यतः आपूर्ति-पक्ष के कारकों से प्रेरित है और न तो अर्थव्यवस्था में अति सक्रियता (ओवरहीटिंग) के और न ही सामान्यीकरण के कोई संकेत दिखाई देते हैं, तथापि मुद्रास्फीति संबंधी अपेक्षाओं का प्रबंधन करना महत्वपूर्ण है।
26. मुद्रास्फीति संबंधी अपेक्षाओं का प्रबंधन करने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, मैं रेपो दर में 25 आधार अंक की वृद्धि के पक्ष में वोट करता हूँ। निरंतर भू-राजनीतिक और व्यापार नीति संबंधी अनिश्चितताओं को देखते हुए, मेरा मत है कि तटस्थ रुख बनाए रखना उपयुक्त है।
श्री सौगत भट्टाचार्य का वक्तव्य
27. अगस्त ‘26 की समीक्षा के बाद से वैश्विक वित्तीय स्थितियाँ उल्लेखनीय रूप से सख्त हुई हैं। ऊर्जा की कीमतें फिर से बढ़ी हैं। अल नीनो के कारण मौसम में आए व्यवधानों से कई कृषि से संबंधित वस्तुओं, विशेष रूप से खाद्य तेलों, चीनी और कुछ हद तक अनाजों, की कीमतों में वृद्धि हुई है।
28. अधिकांश प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने वैश्विक समष्टि-वित्तीय स्थितियों के अनुरूप अपनी नीतिगत दरों को ऊर्ध्वगामी समायोजित किया है। जी-20 के अनेक देशों में बेंचमार्क प्रतिफल में तेज वृद्धि हुई है, और शोध रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि यह आंशिक रूप से निवेशकों द्वारा अब माँगे जा रहे बढ़ते टर्म प्रीमियम का परिणाम है।1
29. भारत में, अगस्त 2026 की समीक्षा के बाद से मुद्रास्फीति के कुछ ऊर्ध्वगामी जोखिम साकार होने लगे हैं। आँकड़े तेजी से यह संकेत दे रहे हैं कि कीमतों का दबाव आर्थिक प्रणाली में गहराई तक पैठ बना रहा है। थोक मूल्य सूचकांकों में दर्ज इनपुट कीमतें वर्ष-दर-वर्ष लगभग 9 प्रतिशत पर बनी हुई हैं। मीडिया रिपोर्टों और उद्यम सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि ये इनपुट लागतें उपभोक्ता कीमतों में अंतरित की जा रही हैं। यद्यपि ‘अंतर्निहित मुद्रास्फीति’ अब तक अपेक्षाकृत नरम रही है और परोक्ष रूप से कुछ अवशिष्ट माँग-कमज़ोरी का संकेत हो सकती है, तथापि सीपीआई मुद्रास्फीति के घटकों के रुझान दर्शाते हैं कि संभावित उत्पादन की तुलना में जो कथित शिथिलता थी – यदि वर्तमान में शिथिलता वास्तव में है भी – वह समाप्त होती प्रतीत होती है।
30. एमपीसी के संवृद्धि संबंधी पूर्वानुमान और आधिकारिक अनुमान वर्तमान आँकड़ों, बाज़ार रिपोर्टों, मीडिया समाचारों और भविष्योन्मुखी सर्वेक्षणों को पुष्ट करते हैं, जो यह संकेत देते हैं कि आर्थिक गतिविधि सुदृढ़ है और यह आगे भी बनी रहेगी। बैंक ऋण की उच्च संवृद्धि, जो पहले मुख्यतः खुदरा खंड और कुछ हद तक एमएसएमई तक सीमित थी, अब लगभग सभी क्षेत्रों और खंडों में फैल गई है।
31. तथापि, भारत का बाह्य संतुलन चिंता का विषय बना हुआ है। भुगतान संतुलन में कुछ कमज़ोरियाँ दिखाई देती हैं, विशेष रूप से वैश्विक वित्तीय परिवेश के सख्त होने को देखते हुए। कम से कम, ऋण पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने के लिए भारत और जी-7 की ब्याज दरों के बीच एक निश्चित अंतर बनाए रखना महत्वपूर्ण है। साथ ही, नीतिगत दर में अत्यधिक तेज़ समायोजन से संवृद्धि के एवं इस प्रकार संवृद्धि-प्रेरित पूंजी प्रवाह के बाधित होने का जोखिम है।
32. इस संदर्भ में, क्या भारत में समग्र मौद्रिक नीति परिवेश अब अत्यधिक निभावकारी हो गया है? मुद्रास्फीति संबंधी जोखिम और वित्तीय बाज़ार इसी ओर संकेत करते हैं। संवृद्धि इतनी आघात-सह है कि मुद्रास्फीति की उभरती निरंतरता पर अधिक निकटता से ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। वास्तविक ब्याज दरों का वर्तमान और अनुमानित स्तर मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक स्तरों के अनुरूप नहीं प्रतीत होता। वास्तविक प्राकृतिक ब्याज दर (वित्त वर्ष 2023-24 की चौथी तिमाही से संबंधित) का अनुमान 1.4-1.9 प्रतिशत लगाया गया है। इसकी पूरी संभावना है कि कोविड के तुरंत बाद की अवधि की तुलना में संभावित उत्पादन से वर्तमान उत्पादन की शिथिलता घट गई होगी।
33. अतः, समग्र सूचनाएँ इस समय मौद्रिक नीति को सख्त करने के पक्ष में एक सशक्त आर्थिक आधार का संकेत देती हैं, ताकि मुद्रास्फीति को विलंब के बजाय शीघ्र ही लक्ष्य के निकट लाया जा सके और मुद्रास्फीति अपेक्षाओं को नियंत्रित किया जा सके।
34. घरेलू वित्तीय स्थितियाँ उल्लेखनीय रूप से सख्त हुई हैं। इससे, एक हद तक, घरेलू मौद्रिक नीति के स्तर पर बड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता कम हो जाती है। अतः, मौद्रिक नीति समायोजन की मात्रा और गति पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है, ताकि इन कार्रवाइयों से उत्पन्न होने वाले अनेक ट्रेड-ऑफ़ – मुद्रास्फीति बनाम संवृद्धि, ऋण बनाम जमाराशियाँ, घरेलू बनाम बाह्य, आदि – के बीच संतुलन बनाया जा सके। इस अनिश्चित आर्थिक परिवेश में संभावित परिणामों की विस्तृत शृंखला से निपटने के लिए आँकड़ों पर आधारित दृष्टिकोण सर्वोत्तम है।
35. अतः, मैं नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंक की वृद्धि के पक्ष में वोट देता हूँ। मुद्रास्फीति के ऊर्ध्वगामी जोखिमों को देखते हुए, रुख को सुविचारित सख्ती (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) में बदलना भी उपयुक्त है।
प्रो. राम सिंह का वक्तव्य
36. पिछली एमपीसी बैठक के बाद से अधिकांश अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति का दबाव और प्रबल हुआ है, जिससे उनके मौद्रिक प्राधिकारणों ने सख्त (हॉकिश) रुख अपनाया है। घरेलू मुद्रास्फीति और उसका निकट-अवधि का प्रक्षेपपथ भी पहले जितना सौम्य नहीं रहा है। साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि पश्चिम एशिया संघर्ष के आरंभ होने के बाद से ईंधन, ऊर्जा और पण्य कीमतों के प्रत्यक्ष प्रभावों से आगे बढ़कर मुद्रास्फीति सामान्यीकृत हो गई है। उभरते साक्ष्य, परोक्ष प्रभावों (फर्मों द्वारा लागत में इन वृद्धियों को अपने द्वारा प्रदान की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में अंतरित करना) की ओर इशारा करते हैं । प्रसार सूचकांक और मूल मुद्रास्फीति का प्रक्षेपपथ कुछ साक्ष्य प्रदान करते हैं। सीपीआई बास्केट में 4 प्रतिशत से ऊपर बढ़ने वाली मदों की संख्या बढ़ी है। इस वित्तीय वर्ष के लिए मूल मुद्रास्फीति का अनुमान 4.4 प्रतिशत है। गैर-खाद्य, गैर-ईंधन मूल मुद्रास्फीति भी अगस्त 2026 में बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई, जिसका कम से कम आंशिक कारण उत्पादकों द्वारा अपनी बिक्री कीमतें बढ़ाना है। इसके अतिरिक्त, रिज़र्व बैंक के सितंबर के परिवार सर्वेक्षण में 3 माह की माध्यिका मुद्रास्फीति प्रत्याशा बढ़कर 9.9 प्रतिशत हो गई, जो परिवारों द्वारा जीवन-यापन की उच्चतर लागत की आशंका को दर्शाती है।
37. हेडलाइन सीपीआई पर इन प्रभावों का असर अब तक मध्यम रहा है। तथापि, मजबूत ऋण संवृद्धि से प्रेरित संभावित माँग-पक्ष के दबावों के साथ मिलकर, आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था के समक्ष आपूर्ति-पक्ष के दबावों के अधिक व्यापक होने का जोखिम है। हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति के उच्च बने रहने की संभावना है, जो अगली तीन तिमाहियों में औसतन लगभग 5.8 प्रतिशत रहेगी और एफआईटी सहन-सीमा बैंड के ऊपरी स्तर को छूने के निकट होगी। इसके अतिरिक्त, वर्तमान रेपो दर के स्तर पर, अनुमानित मुद्रास्फीति प्रक्षेपपथ वास्तविक दर को ऋणात्मक बना देगा, जिससे बचत-उपभोग संबंधी विकृत ट्रेड-ऑफ़ उत्पन्न होंगे।
38. मुद्रास्फीति के प्रक्षेपपथ को लक्ष्य की ओर पुनः संरेखित करने के लिए, और वास्तविक रेपो दर के दृष्टिकोण से, रेपो दर में सुविचारित वृद्धि आवश्यक है। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक दर वृद्धि की अवधि और मात्रा उभरती संवृद्धि-मुद्रास्फीति संभावना पर निर्भर करेगी। समय पर और प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने के लिए एमपीसी को मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण की गति के प्रति सतर्क रहना होगा। फिलहाल, क्रमिक और मामूली रेपो दर वृद्धि के पक्ष में तर्क है, न कि लंबे समय तक ऊँची दरों के पक्ष में।
39. मैं रुख को तटस्थ से सख्ती वाले रुख में बदलने के पक्ष में नहीं हूँ, क्योंकि इससे दर वृद्धि के लंबे चक्र का संकेत जा सकता है। इसके कारण हाल के दिनों की संवृद्धि-समर्थक मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों के लाभ निष्प्रभावी हो सकते हैं। वर्तमान मुद्रास्फीति मुख्यतः आपूर्ति-पक्ष के कारकों, ईंधन, खाद्य और पण्य कीमतों में वृद्धि तथा उनके प्रभावों के कारण है। आर्थिक अति सक्रियता (ओवरहीटिंग) के क्लासिक संकेत – जैसे मजदूरी-कीमत चक्र, या माँग-प्रेरित क्षमता का अत्यधिक विस्तार, या निजी उपभोग और पूंजीगत व्यय में असामान्य वृद्धि – काफी हद तक अनुपस्थित हैं। पहली तिमाही की संवृद्धि दर (7.8 प्रतिशत) हाल के वर्षों की औसत संवृद्धि दर (वित्त वर्ष 2021-22 से 2025-26 के दौरान 7.9 प्रतिशत) के अनुरूप है। आगामी तिमाहियों में संवृद्धि के नरम पड़ने की संभावना है, विशेष रूप से स्थावर संपदा और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में, क्योंकि जीएसटी का प्रोत्साहन धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। पीएमआई विनिर्माण और सेवाएँ, दोनों में नरमी के कुछ संकेत दिखाई देते हैं।
40. दरों में उल्लेखनीय वृद्धि की प्रत्याशाएँ न केवल वाहन, स्थावर संपदा और विवेकाधीन व्यय जैसे ब्याज दर-संवेदी क्षेत्रों में माँग को कमज़ोर कर सकती हैं, बल्कि निजी निवेश की हाल की गति को भी बाधित कर सकती हैं। सामान्य से कम वर्षा और अल नीनो के कारण कृषि क्षेत्र पर पड़े दबाव, बढ़ती इनपुट लागतों और वैश्विक अनिश्चितता के तुरंत बाद, दरों में उल्लेखनीय वृद्धि से बड़ी और छोटी फर्मों के लाभ मार्जिन और पूंजीगत व्यय योजनाओं की निरंतरता को आघात पहुँचेगा।
41. अतः, मैं रुख में बदलाव किए बिना रेपो दर में 25 आधार अंक की वृद्धि कर उसे 5.50 प्रतिशत करने के पक्ष में वोट देता हूँ।
श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य का वक्तव्य
42. प्रतिकूल बाह्य पृष्ठभूमि और अनियमित घरेलू मानसून के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपेक्षाओं से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है, आर्थिक गतिविधि का आधार सुदृढ़ है तथा 2026-27 में 7 प्रतिशत से अधिक संवृद्धि दर्ज करने की स्थिति में है।
43. तथापि, मुद्रास्फीति के स्तर पर चिंता के कारण मौजूद हैं। मुद्रास्फीति स्पष्ट रूप से बढ़ रही है, जो खाद्य और ईंधन की कीमतों से प्रेरित होकर आगामी तीन तिमाहियों में औसतन लगभग 5.8 प्रतिशत रहेगी। प्रसार सूचकांक से संकेत मिलता है कि सीपीआई बास्केट में 6 प्रतिशत से ऊपर मुद्रास्फीति का सामना कर रही मदों का भारित अंश अगस्त में उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। मूल मुद्रास्फीति (खाद्य और ईंधन को छोड़कर सीपीआई) भी वितरण में इसी प्रकार के बदलाव का संकेत देती है, यद्यपि कम परिमाण में। अंतर्निहित मुद्रास्फीति की गति भी ऊँची है, जैसा कि हाल के महीनों में भारित माध्यिका और छँटे हुए माध्य (ट्रिम्ड मीन) के माप से स्पष्ट है।2 इनकी पुष्टि सर्वेक्षण के नवीनतम दौर के निष्कर्षों से होती है, जो संकेत देते हैं कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में मुद्रास्फीति अपेक्षाएँ काफी अधिक हैं।3 इसके अतिरिक्त, रेस्तरां और पके हुए भोजन जैसे कुछ खंडों में इनपुट लागत के दबावों के प्रभाव-अंतरण के साक्ष्य बढ़ रहे हैं। पीएमआई सर्वेक्षण और उत्पादक मूल्य सूचकांक भी कुछ दबे हुए प्रभाव-अंतरण का संकेत देते हैं। आगे चलकर, विशेष रूप से माँग की स्थितियाँ सुदृढ़ होने पर, और अधिक प्रभाव-अंतरण की अपेक्षा है।
44. अतएव, कच्चे तेल और खाद्य कीमतों से उत्पन्न आपूर्ति-पक्ष के दबावों के शीघ्र कम होने की अल्प संभावना को देखते हुए, मुद्रास्फीति संभावना पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। माँग के सुदृढ़ बने रहने और मौद्रिक एवं ऋण समुच्चयों में सुदृढ़ वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, आपूर्ति और माँग दोनों कारकों की परस्पर क्रिया से आगामी अवधि में मुद्रास्फीति का दबाव काफी बढ़ सकता है। इसलिए, मेरा मत है कि “सतर्कता पूर्वाग्रह”4 को अलग रखकर इस समय प्रतीक्षा करने और देखने के बजाय पूर्व-निवारक रूप से कार्रवाई करना बेहतर है। तदनुसार, मैं नीतिगत दर में 25 आधार अंकों की वृद्धि के पक्ष में वोट करता हूँ। आगे चलकर, नीतिगत पथ के प्रक्षेपपथ पर उभरते समष्टि-आर्थिक घटनाक्रमों और आने वाले मुद्रास्फीति आँकड़ों के आधार पर विचार किया जाएगा। वर्तमान वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों को देखते हुए, निकट अवधि में दरों में कटौती कोई विकल्प नहीं है। इसलिए, मेरा मत है कि रुख को तटस्थ से सुविचारित सख्ती (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) में बदलना भी उपयुक्त है। जहाँ तटस्थ रुख तीनों नीतिगत विकल्पों (कटौती, वृद्धि और यथास्थिति) के अनुरूप है, वहीं सुविचारित सख्ती एक असंदिग्ध रूप से स्पष्ट संदेश देती है कि उभरती संभावना के आधार पर निकट अवधि में दर वृद्धि या यथास्थिति ही एकमात्र विकल्प हैं। संकेत देने के अलावा, इससे मौद्रिक नीति के प्राथमिक उद्देश्य के रूप में मूल्य स्थिरता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता भी पुनः पुष्ट होगी।
डॉ. पूनम गुप्ता का वक्तव्य
45. पिछली मौद्रिक नीति बैठक के बाद से वैश्विक पृष्ठभूमि निरंतर बदलती रही है, जिससे अनिश्चितता बढ़ी है। दो घटनाक्रम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं: पहला, पश्चिम एशिया संघर्ष का फिर से गति पकड़ना और तेल की कीमतों का निरंतर ऊँचे स्तर पर बने रहना; दूसरा, कुछ उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में सरकारों और निजी क्षेत्र की ओर से वित्तीय संसाधनों की अधिक माँग के कारण वैश्विक ब्याज दरों तथा उभरती बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं सहित अन्य देशों में निधीयन की लागत पर पड़ने वाले प्रभाव।
46. घरेलू स्तर पर, अर्थव्यवस्था ने असाधारण रूप से अच्छा प्रदर्शन किया है और 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जो अगस्त की मौद्रिक नीति बैठक में किए गए पूर्वानुमान से काफी अधिक है। अनेक उच्च-आवृत्ति संकेतक दूसरी तिमाही में भी संवृद्धि की गति का समर्थन करते हैं। इस बीच, मुद्रास्फीति, जो मुख्यतः खाद्य, ईंधन और स्वर्ण से प्रेरित है तथा जिसका मूल मुद्रास्फीति में सामान्यीकरण सीमित है, जुलाई में बढ़कर 4.5 प्रतिशत और अगस्त में और बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई। फलस्वरूप, एमपीसी ने मुद्रास्फीति के अपने पूर्वानुमान को ऊर्ध्वगामी संशोधित कर 5.2 प्रतिशत कर दिया है, जबकि 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि के पूर्वानुमान को बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया है। मुद्रास्फीति के तीसरी तिमाही में बढ़कर 6.0 प्रतिशत होने, फिर चौथी तिमाही में घटकर 5.7 प्रतिशत और अगले वर्ष की पहली तिमाही में 5.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
47. इस समय, मुद्रास्फीति मुख्यतः बाह्य आपूर्ति-पक्ष के आघातों से प्रेरित है, और इसके गहराई तक पैठ बनाने या मुद्रास्फीति अपेक्षाओं को प्रभावित करने के नगण्य संकेत हैं। फिर भी, अनुमानों में हेडलाइन मुद्रास्फीति के 6 प्रतिशत की ऊपरी सहनशीलता सीमा तक पहुँचने की संभावना दर्शाए जाने को देखते हुए, सामान्यीकरण के अधिक निर्णायक साक्ष्य की प्रतीक्षा करना उचित नहीं होगा, बल्कि इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि मौद्रिक नीति का प्रभाव विलंब से दिखाई देता है।
48. वास्तव में, महामारी के बाद की मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण अवधि में, जब भी मुद्रास्फीति निचली या ऊपरी सहन सीमा तक पहुँची या उसे पार कर गई, तब उचित नीतिगत कार्रवाई की गई। इससे ढाँचे की विश्वसनीयता बनाए रखने में सहायता मिली है और मुद्रास्फीति अपेक्षाएँ लक्ष्य के अनुरूप बनी रही हैं। अतः, और अधिक प्रतीक्षा करने के बजाय, बढ़ती मुद्रास्फीति और आघात-सह संवृद्धि को देखते हुए, मैं इस मौद्रिक नीति बैठक में नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंकों की वृद्धि के पक्ष में हूँ।
49. इस बीच, ईंधन और पण्य की ऊँची कीमतों से प्रेरित होकर, विश्व भर में मुद्रास्फीति संबंधी दबाव बढ़ रहे हैं। घरेलू स्तर पर, मौसम संबंधी प्रतिकूलताओं तथा वैश्विक तेल और पण्य कीमतों से हेडलाइन मुद्रास्फीति पर ऊर्ध्वगामी दबाव बने रहने की संभावना है। किसी बिंदु पर, इनपुट लागतों का आउटपुट कीमतों में अधिक प्रभाव-अंतरण हो सकता है। इन परिस्थितियों में, यह संभव है कि मुद्रास्फीति को निम्न रखने और मुद्रास्फीति अपेक्षाओं को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत दर में और वृद्धि की आवश्यकता पड़े। ऐसी कार्रवाइयों की गति, सीमा और अवधि, मुद्रास्फीति, उसके प्रसार तथा द्वितीयक प्रभावों के साक्ष्य संबंधी आने वाले आँकड़ों पर निर्भर करेगी।
50. अतः, मैं रुख को सुविचारित सख्ती (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) में बदलने का प्रस्ताव करती हूँ, जो भविष्य में ऐसी किसी भी आवश्यक कार्रवाई के अनुरूप होगा।
श्री संजय मल्होत्रा का वक्तव्य
51. अशांत वैश्विक पृष्ठभूमि के बीच, भारतीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय आघात-सहनीयता दर्शाई है। पूरे वर्ष 2026-27 के लिए संवृद्धि का अनुमान अब 7.1 प्रतिशत है, जो अगस्त के 6.7 प्रतिशत के अनुमान से 40 आधार अंक अधिक है।
52. तथापि, मुद्रास्फीतिक दबाव बढ़ रहे हैं। हेडलाइन सीपीआई के तीसरी तिमाही में सहन-सीमा बैंड के ऊपरी स्तर तक पहुँचने और अगली दो तिमाहियों में 5 प्रतिशत से काफी ऊपर बने रहने का अनुमान है।
53. प्रसार सूचकांक के संदर्भ में, मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण के संकेत बढ़ रहे हैं, क्योंकि अगस्त में सीपीआई बास्केट की 37 प्रतिशत वस्तुओं में मुद्रास्फीति 4 प्रतिशत से ऊपर थी – मार्च में यह मात्र 20 प्रतिशत थी। मूल मुद्रास्फीति जुलाई के 3.9 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 4.2 प्रतिशत हो गई, जबकि बहुमूल्य धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति अगस्त में 0.5 प्रतिशत की सुदृढ़ गति से प्रेरित होकर बढ़ी और 2.9 प्रतिशत हो गई। बहुमूल्य धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति से मापी गई अंतर्निहित मुद्रास्फीति के भी आने वाले महीनों में लक्ष्य से ऊपर जाने की संभावना है। यह पहले देखे गए सौम्य स्तरों से मुद्रास्फीति के सामान्य होने का संकेत देता है।
54. आपूर्ति-पक्ष की मुद्रास्फीति के लिए मौद्रिक नीति संबंधी प्रतिक्रिया की आवश्यकता के संबंध में, यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि मौद्रिक नीति मुख्यतः आपूर्ति आघात के द्वितीयक प्रभावों (मजदूरी संबंधी प्रत्याशाएँ और फर्म-स्तर पर कीमत निर्धारण व्यवहार) को सीमित करके कार्य करती है। द्वितीयक प्रभावों और आपूर्ति-पक्ष के दबावों के परोक्ष प्रभाव (ऊर्जा और अन्य निविष्टियों के माध्यम से उत्पादन लागत में) के बीच अंतर करना कठिन है, क्योंकि दोनों ही मूल मुद्रास्फीति में विद्यमान हैं।
55. इसी प्रकार, मौद्रिक और ऋण समुच्चयों में वृद्धि को देखते हुए माँग-पक्ष के दबावों के जोखिम भी हैं।
56. उपर्युक्त संवृद्धि-मुद्रास्फीति गतिकी को ध्यान में रखते हुए, मैं नीतिगत दर पर पुनर्विचार करना उपयुक्त मानता हूँ। तदनुसार, मैं नीतिगत दर में 25 आधार अंकों की वृद्धि के पक्ष में वोट करता हूँ। दर वृद्धि चक्र की अवधि तथा सीमा, वास्तविक संवृद्धि-मुद्रास्फीति घटनाक्रमों और संभावना, विशेष रूप से अंतर्निहित मुद्रास्फीति, कीमतों के दबावों के व्यापक होने, आपूर्ति आघात के द्वितीयक प्रभावों और माँग संबंधी आवेगों के प्रभाव पर निर्भर करेगी। फिर भी, मैं रुख को सुविचारित सख्ती (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) में बदलना उपयुक्त मानता हूँ, जिसका मूल संकेत यह है कि निकट अवधि में दरों में कटौती का विकल्प नहीं है और उभरती परिस्थितियों तथा संभावना के आधार पर, आगे की नीतिगत कार्रवाई केवल दर वृद्धि या यथास्थिति ही हो सकती है।
(ब्रिज राज)
मुख्य महाप्रबंधक
प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/1361
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