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प्रेस प्रकाशनी

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गवर्नर का वक्तव्य: 05 जून, 2026

5 जून 2026

गवर्नर का वक्तव्य: 05 जून, 2026

सुप्रभात एवं नमस्कार। पिछले कुछ महीनों के दौरान, बढ़ी हुई अनिश्चितता, प्रमुख व्यापार मार्गों एवं आपूर्ति शृंखलाओं के व्यवधानों, बाजारों में बढ़ी हुई अस्थिरता तथा सतर्क कारोबारी-भावना ने वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरूप तय हुआ है।

2. शुरुआत में, मैं यह रेखांकित करना चाहूँगा कि वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था का बुनियादी आधार, पूर्व के ऐसे ही प्रकरणों की तुलना में, वर्तमान में अपेक्षाकृत अधिक सुदृढ़ बना हुआ है। यद्यपि हमें विश्वास है कि हम इन आघातों का सामना न्यूनतम प्रतिकूल प्रभाव के साथ करने में सक्षम होंगे, तथापि यह आवश्यक है कि हम इन चुनौतियों का केवल सामना ही न करें, केवल उनका समाधान ही न करें, बल्कि उन्हें अपनी आघात-सहनीयता को और सुदृढ़ करने के अवसर के रूप में स्वीकारें।

3. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक गतिरोध के कारण वैश्विक आर्थिक संभावना अब भी अनिश्चितताओं से घिरी हुई है। ऊर्जा कीमतों में तीव्र वृद्धि तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान आर्थिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसे दुष्कर नीतिगत विकल्पों के बीच मौद्रिक नीति ने अधिक सतर्क रुख अपनाया है। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा मौद्रिक नीति को अधिक सख्त बनाने की दिशा में कदम उठाए जाने की संभावना है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से प्रेरित आशावादिता के कारण जहाँ इक्विटी बाजारों में मजबूती बनी हुई है, वहीं मुद्रास्फीति संबंधी नई चिंताओं तथा ऋण-संधारणीयता को लेकर जारी आशंकाओं के बीच वैश्विक बॉण्ड बाजारों में मंदी का रुझान बना हुआ है। जोखिम से बचाव की प्रवृत्ति तथा सुरक्षित निवेश साधनों की मांग के कारण विदेशी मुद्रा बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है और अनेक उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में अवमूल्यन की प्रवृत्ति देखी जा रही है।

मौद्रिक नीति समिति के निर्णय

4. मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने, नीतिगत रेपो दर पर विचार-विमर्श करने और इस संबंध में निर्णय लेने के लिए, 3, 4 और 5 जून को बैठक की। उभरते समष्टि आर्थिक एवं वित्तीय घटनाक्रमों तथा संभावना के विस्तृत आकलन के उपरांत, समिति ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ़) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा जाए; परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ़) दर 5.00 प्रतिशत तथा सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ़) दर एवं बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर बनी रहेगी। एमपीसी ने तटस्थ रुख अपनाने का भी निर्णय लिया।

5. अब मैं संक्षेप में इन निर्णयों के औचित्य को प्रस्तुत करूँगा।

6. समिति ने यह पाया कि पिछली मौद्रिक नीति बैठक के बाद से वैश्विक परिस्थितियाँ और प्रतिकूल हुई हैं तथा एक कमज़ोर युद्धविराम के बीच संघर्ष अभी भी जारी है। आपूर्ति शृंखलाओं में आए दीर्घकालिक व्यवधानों तथा उच्च ऊर्जा कीमतों के प्रतिकूल प्रभाव, कम होती संवृद्धि तथा अप्रैल की मौद्रिक नीति से मुद्रास्फीति के बढ़े हुए अनुमानों में लक्षित होते हैं।

7. वैश्विक आघातों के बावजूद सीपीआई-मुद्रास्फीति लक्ष्य के स्तर से नीचे बनी हुई है, क्योंकि घरेलू कीमतों पर इन आघातों का प्रभाव सीमित रहा है। जबकि आधारभूत अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2026-27 की तीसरी तिमाही में हेडलाइन मुद्रास्फीति सहन-स्तर की ऊपरी सीमा की ओर बढ़ सकती है; तथापि आपूर्ति संबंधी आघातों का प्रभाव चौथी तिमाही से क्रमशः कम होने की संभावना है। इस समय मुद्रास्फीति के अंतर्निहित दबाव संतुलित बने हुए हैं। तथापि, अपेक्षाओं और मजदूरी पर पड़ने वाले द्वितीयक प्रभावों के माध्यम से मुद्रास्फीति की बढ़ने की संभावना स्पष्ट रूप से मौजूद है, इसलिए इस संबंध में सावधान रहने की आवश्यकता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के असामान्य होने के पूर्वानुमान तथा एल-नीनो संबंधी जोखिमों के कारण संभावना भी अनिश्चित बनी हुई है।

8. संवृद्धि के संबंध में समिति ने उल्लेख किया कि उच्च ऊर्जा कीमतों तथा वैश्विक आपूर्ति संबंधी व्यवधानों का आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव-विस्तार पड़ रहा है। यद्यपि घरेलू मांग सुदृढ़ बनी हुई है तथा विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रों की गतिविधियां बढ़ रही हैं, तथापि उच्च आवृत्ति संकेतकों से, कुछ क्षेत्रों में गति के मंद पड़ने के प्रारंभिक संकेत प्राप्त हो रहे हैं।

9. समिति का यह मत है कि संघर्ष की अवधि एवं तीव्रता, उसके प्रभाव- विस्तार की व्यापकता तथा आपूर्ति शृंखलाओं के सामान्य होने की गति को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण मुद्रास्फीति एवं संवृद्धि के आधारभूत आकलन में बड़ा जोखिम विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त, दक्षिण-पश्चिम मानसून के असामान्य होने के पूर्वानुमान तथा एल नीनो के कारण खाद्य मुद्रास्फीति-संभावना भी अनिश्चित बनी हुई है। यद्यपि उच्च मुद्रास्फीति के जोखिम बढ़े हैं, एमपीसी का विचार है कि इस विषय में अधिक स्पष्टता आने तक प्रतीक्षा करना विवेकपूर्ण होगा। तदनुसार, एमपीसी ने नीतिगत दर को यथावत रखने के पक्ष में वोट किया। साथ ही, एमपीसी आंकड़ा-आधारित दृष्टिकोण अपनाते हुए मौजूदा परिस्थितियों पर सतत निगरानी रखेगी, जिसमें आपूर्ति-पक्षीय दबावों के कारण सामान्य मूल्य-स्तर तथा मुद्रास्फीति प्रत्याशा पर पड़ने वाले प्रभाव शामिल हैं। एमपीसी ने तटस्थ रुख को बनाए रखने का भी निर्णय लिया।

संवृद्धि और मुद्रास्फीति का आकलन

संवृद्धि

10. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी द्वितीय अग्रिम-अनुमान के अनुसार, निजी उपभोग तथा स्थायी निवेश में मजबूत वृद्धि के कारण वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक जीडीपी संवृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है।1 आपूर्ति-पक्ष की ओर से, विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्रों के सुदृढ़ प्रदर्शन ने संवृद्धि को प्रमुख रूप से समर्थन प्रदान किया है।

11. विभिन्न उच्च-आवृत्ति संकेतकों के अनुसार, संघर्ष आरंभ होने के बाद से घरेलू आर्थिक गतिविधियाँ सामान्यतः स्थिर बनी हुई हैं।2 भारत के विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र के पीएमआई संकेत देते हैं कि उक्त दोनों क्षेत्र अब भी आघात-सह बने हुए हैं तथा कारोबारी-अपेक्षाएँ अभी भी सकारात्मक बनी हुई हैं।3 मांग-पक्ष की दृष्टि से, विवेकाधीन व्यय से समर्थित निजी उपभोग मौजूदा रूप से आघात-सह बना हुआ है।4 लागत संबंधी दबावों के बावजूद स्थायी निवेश ने अपनी गति को बनाए रखा है।5 पण्य निर्यात ने अप्रैल 2026 में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की, जबकि मालभाड़ा एवं बीमा लागतें ऊँचे स्तर पर बनी रहीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधी चिंताओं के बावजूद सेवा निर्यात मजबूत बने हुए हैं, जो कि सतत-मांग को दर्शाता है। समग्र रूप से, अर्थव्यवस्था ने पर्याप्त आघात-सहनीयता का प्रदर्शन किया है तथा संघर्ष के परोक्ष प्रभावों का सफलतापूर्वक सामना किया है, यद्यपि लागत संबंधी दबावों का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।

12. इसके बाद, ऊर्जा तथा अन्य आदानों की कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति संबंधी व्यवधानों के संयुक्त प्रभाव से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल दबाव पड़ने की संभावना है। प्रभावित पण्यों के आयात स्रोतों में विविधीकरण से आपूर्ति-स्थिति में सुधार होने की संभावना तो है, किंतु इसकी लागत अधिक होगी। तथापि, संघर्ष की अवधि, आपूर्ति शृंखलाओं के सामान्य होने में लगने वाले समय तथा विभिन्न हितधारकों के बीच लागत-साझेदारी की व्यवस्था पर इसका समग्र-प्रभाव निर्भर करेगा। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का खुदरा उत्पादों की कीमतों पर प्रभाव पहले से ही परिलक्षित होने लगा है। इसके अतिरिक्त, दक्षिण-पश्चिम मानसून में अनुमानित कमी का कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण-मांग पर प्रभाव पड़ सकता है। तथापि, अन्य उपायों के साथ-साथ, फसल विविधीकरण, वर्षा-जल संग्रहण एवं संरक्षण, जलवायु-अनुकूल पद्धतियों तथा अल्पावधि फसलों को प्रोत्साहन देने संबंधी कार्यक्रमों एवं पहलों से इन प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में सहायता मिलने की संभावना है।

13. सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में निरंतर गति, जीएसटी-युक्तिकरण के सतत-प्रभाव तथा रोजगार की व्यापक रूप से स्थिर परिस्थितियों6 से शहरी उपभोग को बल मिलता रहेगा7, यद्यपि ऐसा हो सकता है कि बढ़ती मुद्रास्फीति से परिवारों की क्रय शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। सरकारी पूंजीगत व्यय के सुदृढ़ बने रहने की संभावना है।8 क्षमता उपयोग के उच्च स्तर9 तथा बैंकिंग10 एवं गैर-बैंकिंग स्रोतों से ऋण प्रवाह की निरंतर उपलब्धता कॉर्पोरेट निवेश के अनुकूल हैं, किंतु लागत में वृद्धि तथा बढ़ी हुई अनिश्चितता निवेशकों के रुझान को प्रभावित कर सकती है। कमजोर वैश्विक मांग तथा मालढुलाई की उच्च लागतें, पण्य निर्यात के लिए प्रतिकूल कारक हैं। दूसरी ओर, भारतीय सेवाओं की निरंतर सुदृढ़ मांग की पृष्ठभूमि में, सेवा निर्यातों11 की सतत-गति बने रहने की संभावना है।

14. सरकार द्वारा किए गए विभिन्न उपाय, जिनमें एमएसएमई तथा निर्यात क्षेत्रों को समर्थन, घरेलू गैस एवं कच्चे तेल के उत्पादन में वृद्धि के प्रयास, आयातित आदानों के स्थान पर देश में उत्पादित विकल्पों के उपयोग को प्रोत्साहन तथा महत्वपूर्ण आयातों में विविधीकरण शामिल हैं, बाह्य आघातों के प्रभाव का सामना करने में सहायता होंगे।

15. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि दर का अनुमान 6.6 प्रतिशत रखा गया है, जिसमें पहली तिमाही में 6.6 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.3 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.5 प्रतिशत तथा चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में लंबे समय तक बने रहने वाले व्यवधानों, वैश्विक वित्तीय बाजारों की अस्थिरता तथा मौसम संबंधी आघातों के कारण घरेलू-संवृद्धि-संभावना के कम होने का जोखिम हमारे सामने बना हुआ है।

मुद्रास्फीति

16. सीपीआई मुद्रास्फीति फरवरी 2026 में 3.2 प्रतिशत के स्तर से मामूली रूप से बढ़ने के बावजूद, मार्च और अप्रैल 2026 में लक्ष्य स्तर से नीचे(क्रमशः 3.4 प्रतिशत तथा 3.5 प्रतिशत) बनी रही। खाद्य मुद्रास्फीति में कुछ वृद्धि दर्ज की गई12, वहीं पेट्रोल एवं डीज़ल के खुदरा मूल्यों में मार्च और अप्रैल के दौरान कोई परिवर्तन न होने के कारण ईंधन मुद्रास्फीति नियंत्रित रही।13 मूल-मुद्रास्फीति14, मार्च-अप्रैल के दौरान, 3.7 प्रतिशत पर स्थिर बनी रही। बहुमूल्य धातुओं को छोड़कर, मूल मुद्रास्फीति इसी अवधि में, 2.1 से 2.2 प्रतिशत के दायरे में सीमित होकर काफी कम रही। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें (भारतीय बास्केट) अप्रैल-मई 202615 के दौरान औसतन लगभग 110 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहीं और ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वर्ष 2026-27 के दौरान औसत तेल कीमतें पिछले मौद्रिक नीति वक्तव्य में किए गए अनुमानों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक रह सकती हैं। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि तथा विभिन्न आदानों की कीमतों में बढ़ोत्तरी के परिणामस्वरूप अप्रैल 202616 में डबल्यूपीआई आधारित मुद्रास्फीति में भी तीव्र वृद्धि दर्ज की गई।

17. मुद्रास्फीति संभावना को देखने पर ज्ञात होता है कि, मई माह से17, वैश्विक कच्चे तेल की उच्च कीमतों का घरेलू पेट्रोल एवं डीज़ल के खुदरा मूल्यों पर आंशिक प्रभाव परिलक्षित होना प्रारंभ हो गया है। वाणिज्यिक एलपीजी, औद्योगिक कच्चे माल, रसायन, आधार-धातुओं, रबड़ तथा प्लास्टिक उत्पादों सहित विभिन्न आदानों की कीमतों में वृद्धि हुई है।18 आगामी महीनों में, जब व्यवसाय अपनी उच्च आदान लागतों से उपभोक्ताओं को प्रभावित करना आरंभ करेंगे, तब इन कारकों से सीपीआई मुद्रास्फीति बढ़ने का जोखिम उत्पन्न हो सकता है।

18. उपर्युक्त सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का अनुमान 5.1 प्रतिशत रखा गया है, जिसमें पहली तिमाही में 4.2 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 5.1 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 5.9 प्रतिशत तथा चौथी तिमाही में 5.4 प्रतिशत मुद्रास्फीति का अनुमान है। वर्ष 2026-27 के लिए मूल- मुद्रास्फीति का अनुमान 4.7 प्रतिशत रखा गया है। तथापि, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधानों19, वैश्विक पण्य-कीमतों से जुड़े आघातों20, दक्षिण-पश्चिम मानसून21 के भौगोलिक एवं कालगत वितरण संबंधी अनिश्चितताओं तथा एल-नीनो22 की परिस्थितियों के कारण इन अनुमानों के संबंध में मुद्रास्फीति बढ़ने का जोखिम बना हुआ है। दूसरी ओर, पर्याप्त खाद्यान्न-भंडार23 एवं जलाशय-स्तर एक संतोषप्रद स्थिति को दर्शाते हैं।

चलनिधि एवं वित्तीय बाजार की स्थिति

19. अप्रैल 2026 में संपन्न हुई पिछली मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद से, एलएएफ़ के अंतर्गत निवल स्थिति के आधार पर मापी गई, प्रणालीगत चलनिधि का औसत दैनिक अधिशेष 2.63 लाख करोड़ रहा है।24 बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त चलनिधि सुनिश्चित करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक ने सक्रिय रूप से, चलनिधि से जुड़े दीर्घकालिक25 तथा अल्पकालिक/अस्थायी26 उपायों को क्रियान्वित किया। इसके बाद, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा अधिशेष अंतरण के उपरांत सरकार की नकद शेषराशियों में होने वाली सामान्य कमी तथा मानसून के मौसम में चलन में रही मुद्रा की बैंकिंग प्रणाली में वापसी से निकट अवधि में बैंकिंग प्रणाली की चलनिधि को समर्थन मिलने की संभावना है।

20. अप्रैल की बैठक के बाद से, भारित औसत मांग दर नीतिगत गलियारे के भीतर कारोबार करती रही, जबकि अल्पावधि मुद्रा बाजार दरें, विशेष रूप से वाणिज्यिक पत्रों और जमा प्रमाणपत्रों की दरें, मई में पुनः दबाव में आने से पूर्व नरम हुईं।27 पश्चिम एशिया में युद्धविराम की घोषणा के बाद अप्रैल में सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल में कमी आई, लेकिन मई में इनमें फिर से मज़बूती देखी गई। मार्च-अप्रैल के दौरान ऋण बाजार में मौद्रिक संचरण धीमा हुआ, जिसके साथ जमा और ऋण दरों में कुछ वृद्धि हुई है।28

21. रिज़र्व बैंक यह सुनिश्चित करेगा कि अर्थव्यवस्था की उत्पादक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एवं मौद्रिक नीति के संचरण को सुगम बनाने के लिए बैंकिंग प्रणाली में उचित चलनिधि उपलब्ध रहे।

22. नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में सभी स्रोतों से प्राप्त ऋण में वर्ष-दर-वर्ष 15.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो कि एक वर्ष पूर्व इसी अवधि में 12.1 प्रतिशत थी। बाजार-आधारित वित्तपोषण महंगा होने के कारण, बैंक ऋण में वृद्धि मजबूत29 और व्यापक30 बनी रही।

वित्तीय स्थिरता

23. अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) की पूंजी पर्याप्तता, चलनिधि, परिसंपत्ति की गुणवत्ता और लाभप्रदता से संबंधित प्रणाली-स्तरीय वित्तीय संकेतक स्वस्थ बने हुए हैं, हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में लाभप्रदता में कुछ कमी आई है।31 इसी प्रकार, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के प्रणाली -स्तरीय मानदंडों भी मजबूत हैं, जिनकी पूंजी स्थिति पर्याप्त है और जीएनपीए अनुपात में सुधार हुआ है।32.

बाह्य क्षेत्र

24. अब मैं बाह्य क्षेत्र के विषय में बात करूँगा। वर्ष 2025-26 में, एक अशांत वैश्विक आर्थिक वातावरण के बीच, इसने ऊँचे शुल्कों और व्यापार से संबंधित अनिश्चितताओं की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया। ऊर्जा मूल्यों में वृद्धि और लगातार बनी हुई व्यापार नीति संबंधी अनिश्चितताएं, वर्ष 2026-27 में भारत के चालू खाता घाटा (सीएडी) के लिए उधर्वगामी जोखिम उत्पन्न करती रहेंगी। सेवा व्यापार में अधिशेष और अंतर्वाह विप्रेषण द्वारा कुछ राहत प्रदान करने की उम्मीद है।

25. बाह्य वित्तपोषण के संबंध में, 2025-26 में उत्साहित सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई)33 और उच्च शुद्ध एफडीआई, वैश्विक निवेशकों द्वारा भारत में लगातार रुचि को दर्शाते हैं। अप्रैल 2026 में एफडीआई प्रवाह भी प्रोत्साहनकारी रहे। हालांकि, 2026-27 में अब तक (2 जून तक), भारत में शुद्ध एफपीआई में मुख्य रूप से इक्विटी खंड में 13.7 अरब अमेरिकी डॉलर के बहिर्गमन देखा गया।34

26. 29 मई 2026 तक, भारत की विदेशी मुद्रा आरक्षित निधियाँ 682.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर थीं, जो आयात कवर (लगभग 11 महीने) और बाहरी ऋण (89.1 प्रतिशत) सहित आरक्षित पर्याप्तता के मानक मेट्रिक्स के संदर्भ में पर्याप्त था। विभिन्न नीतिगत पहलों से हमारे भुगतान संतुलन को मजबूत करने की आशा है। इनमें प्रमुख व्यापारिक भागीदारों35 के साथ हालिया करारों, बीमा क्षेत्र को 100 प्रतिशत एफडीआई के लिए खोलना, इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम, ऊर्जा परिवर्तन पर जोर, भूमि-सीमा वाले देशों के लिए एफडीआई प्रतिबंधों में ढील, ईसीबी ढांचे का उदारीकरण और कई अन्य शामिल हैं।

27. विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए आज मुझे कुछ उपायों की भी घोषणा करनी है।

  • सबसे पहले, 'पूर्णतः सुलभ मार्ग' (एफ़एआर) के अंतर्गत सरकारी प्रतिभूतियों के लिए, हम 15-, 30- और 40- वर्ष की अवधि वाली सरकारी प्रतिभूतियों की सभी नई जारी होने वाली प्रतिभूतियों को शामिल करके 'विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियाँ' के दायरे को बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा, 'सामान्य मार्ग' के अंतर्गत एफ़पीआई निवेश के लिए अल्पावधि निवेश, संकेन्द्रण और अलग-अलग प्रतिभूतियों से जुड़ी सीमाएं हटाई जा रही हैं। सरकार द्वारा आज सुबह दिए गए कर लाभों के साथ-साथ इन उपायों से सरकारी उधारी के लिए विदेशी पूंजी आकर्षित करने में मदद मिलनी चाहिए।

  • दूसरा, सेबी पंजीकरण के बिना प्रतिभूति बाज़ार में ट्रेड होने वाले इक्विटी लिखतों में एनआरआई और ओसीआई के निवेश की सीमा बढ़ाई जा रही है। साथ ही, यही सुविधा भारत के बाहर रहने वाले सभी व्यक्तियों (पीआरओआई) को भी एनआरआई और ओसीआई के बराबर दी जा रही है।

  • तीसरा, पीएसयू द्वारा ईसीबी को बढ़ावा देने के लिए 30 सितंबर 2026 तक रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप की सुविधा दी जाएगी।

  • चौथा, एडी बैंकों को नए 3-5 वर्ष के एफ़सीएनआर (बी) जमाराशि जुटाने के लिए पूरी हेजिंग लागत उठाने की वैसी ही सुविधा 30 सितंबर 2026 तक दी जाएगी।

  • पांचवां, निर्यात आय की वसूली की समय-सीमा को वापस नौ महीने करने का प्रस्ताव है।

28. हालांकि इन उपायों से हमारे भुगतान का संतुलन के मज़बूत होने की उम्मीद है, फिर भी हम निर्यात को और बढ़ावा देने तथा पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने और प्रोत्साहित करने के लिए सही नीतिगत बदलाव करते रहेंगे।

29. जैसा कि मैंने कई बार कहा है, हमारी विनिमय दर नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। हम किसी विशेष स्तर या दायरे को लक्षित नहीं करते; बल्कि हम विनिमय दर को बाज़ार की ताकतों से तय होने देते हैं। हालांकि, हमारे अनुभव से पता चलता है कि कभी-कभी इसमें उतार-चढ़ाव हो सकते हैं – प्रायः सट्टेबाजी के दबाव के कारण, विशेषकर जब बहुत ज़्यादा अनिश्चितता हो - जो बुनियादी स्थितियों के अनुरूप नहीं होते और आर्थिक गतिविधियों में रुकावट डालते हैं। हालांकि हमारा उद्देश्य बाजार से जुड़े बदलावों का विरोध करना नहीं है, लेकिन हम अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करेंगे और बाजार में अव्यवस्थित हलचल को रोकेंगे। जहां हमारे विदेशी मुद्रा आरक्षित निधि बाहरी झटकों से निपटने के लिए एक मज़बूत सुरक्षा कवच का काम करते हैं, वहीं आवश्यकता पड़ने पर प्रभावी ढंग से निपटने के लिए हमारे पास कई तरह के विनियामक और बाजार-आधारित उपाय भी मौजूद हैं। इस संबंध में, हम सतर्क हैं और बाजार की स्थिति को सुचारू बनाए रखने के लिए प्रत्येक आवश्यक कदम उठाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

समापन टिप्पणियाँ

30. अंततः, पश्चिम एशिया संघर्ष के किसी भी सार्थक समाधान के अभाव में वैश्विक आर्थिक स्थितियां और भावनाएं लगातार तनावपूर्ण बनी रहीं। यद्यपि इनका घरेलू संवृद्धि -मुद्रास्फीति की संभावना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, इस समय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत है। हम देश की समष्टि आर्थिक मूलभूत स्थितियों को और सुदृढ़ करने हेतु उपाय करते हुए, इन चुनौतियों से निपटने के लिए नीतियां लागू करेंगे।

31. धन्यवाद। नमसकर। जय हिन्द।

(ब्रिज राज)   
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/386


1 वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में वास्तविक जीडीपी में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में निजी उपभोग तथा सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीएफ़सीएफ़) में क्रमशः 8.7 प्रतिशत तथा 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आपूर्ति-पक्ष में, आधारभूत मूल्यों पर योजित सकल मूल्य(जीवीए) में वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। विनिर्माण क्षेत्र में 13.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि सेवा क्षेत्र में 9.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

2 अप्रैल 2026 में जीएसटी ई-वे बिलों की संख्या में 11.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि मई 2026 में टोल संग्रहण में 12.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। अप्रैल 2026 में जीएसटी राजस्व में 8.7 प्रतिशत की सुदृढ़ वृद्धि हुई। अप्रैल 2026 में घरेलू हवाई माल-परिवहन में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। मई 2026 में मोटर वाहन (खुदरा) बिक्री में 5.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्ष 2025-26 के दौरान पत्तन माल-परिवहन में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

3 मई 2026 में सेवा क्षेत्र का पीएमआई अप्रैल 2026 के 58.8 के स्तर से बढ़कर 59.8 हो गया। माल-परिवहन, डिजिटल समाधान, ई-कॉमर्स, मनोरंजन तथा सूचना प्रौद्योगिकी जैसी सेवाओं की उच्च मांग ने इस वृद्धि को समर्थन प्रदान किया। भारत का विनिर्माण पीएमआई अप्रैल 2026 के 54.7 से बढ़कर मई 2026 में 55.0 हो गया।

4 मार्च-अप्रैल 2026 के दौरान दोपहिया वाहनों तथा ट्रैक्टरों की खुदरा बिक्री में क्रमशः 20.5 प्रतिशत तथा 16.4 प्रतिशत की द्विअंकीय वृद्धि दर्ज की गई। अप्रैल-मई 2026 के दौरान, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत कार्य की मांग 31.0 प्रतिशत घट गई।

5 वर्ष 2025-26 की दूसरी छमाही के दौरान अवसंरचना क्षेत्र को प्रदत्त ऋण में 9.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई (वर्ष 2025-26 पहली छमाही में यह वृद्धि 1.9 प्रतिशत थी)। दूसरी छमाही के दौरान पूंजी-वस्तुओं के उत्पादन तथा आयात में क्रमशः 14.2 प्रतिशत और 13.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आईआईपी अवसंरचना एवं निर्माण-कार्य क्षेत्र में दूसरी छमाही के दौरान 10.0 प्रतिशत की सुदृढ़ वृद्धि दर्ज की गई जिसकी पुष्टि इस अवधि में इस्पात खपत तथा सीमेंट उत्पादन में क्रमशः 7.6 प्रतिशत और 9.6 प्रतिशत की सुदृढ़ वृद्धि से भी होती है। सूचीबद्ध गैर-सरकारी गैर-वित्तीय कंपनियों (4,613 कंपनियों के आधार पर) की अचल आस्तियों में दूसरी छमाही के दौरान 6.0 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में 8.7 प्रतिशत के उच्च आधार पर यह वृद्धि दर्ज की गई थी।

6 आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफ़एस) के मासिक आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 में अखिल भारतीय बेरोजगारी दर 5.2 प्रतिशत के निम्न स्तर पर बनी रही।

7 अप्रैल में, यात्री वाहनों की खुदरा तथा थोक बिक्री में क्रमशः 11.5 प्रतिशत और 24.6 प्रतिशत की द्विअंकीय वृद्धि दर्ज की गई।

8 वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में 11.5 प्रतिशत वृद्धि का किया गया है। प्रभावी पूंजीगत व्यय (जिसमें राज्यों को पूंजीगत व्यय हेतु प्रदान की जाने वाली अनुदान सहायता भी शामिल है) में 22.1 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान किया गया है। बड़े केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (सीपीएसई) तथा चार प्रमुख सरकारी संस्थाओं द्वारा किए गए पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) में अप्रैल 2026 के दौरान वर्ष-दर-वर्ष आधार पर 63 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

9 भारतीय रिज़र्व बैंक के त्रैमासिक क्रयादेश पुस्तक, स्टॉक और क्षमता उपयोग सर्वेक्षण (ओबीआईसीयूएस) के प्रारंभिक परिणामों के अनुसार, वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र का क्षमता उपयोग (सीयू) 75.2 प्रतिशत रहा, जो इसके दीर्घकालिक औसत 74.0 प्रतिशत से अधिक था।

10 अप्रैल 2026 में वस्त्र, रसायन, आधार धातु, रत्न एवं आभूषण तथा इंजीनियरिंग वस्तुओं के बैंक ऋण में वर्ष-दर-वर्ष आधार पर क्रमशः 8.3 प्रतिशत, 16.1 प्रतिशत, 17.7 प्रतिशत, 26.0 प्रतिशत तथा 30.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

11 सेवा निर्यात में मार्च 2026 में 7.2 प्रतिशत तथा अप्रैल 2026 में 12.7 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

12 सीपीआई के खाद्य एवं पेय पदार्थ समूह में मुद्रास्फीति फरवरी 2026 के 3.3 प्रतिशत से बढ़कर मार्च और अप्रैल 2026 में क्रमशः 3.7 प्रतिशत तथा 4.0 प्रतिशत हो गई।

13 ईंधन के अंतर्गत ‘बिजली, गैस एवं अन्य ईंधन’ समूह तथा ‘व्यक्तिगत परिवहन उपकरणों हेतु ईंधन एवं स्नेहक’ वर्ग शामिल हैं। ईंधन के मामले में मुद्रास्फीति मार्च एवं अप्रैल में क्रमशः 0.9 प्रतिशत तथा 0.4 प्रतिशत के सीमित स्तर पर रही।

14 मूल-सीपीआई से आशय खाद्य एवं पेय पदार्थ समूह तथा ईंधन (अर्थात् ‘बिजली, गैस एवं अन्य ईंधन’ समूह और ‘व्यक्तिगत परिवहन उपकरणों हेतु ईंधन एवं स्नेहक’ वर्ग) को छोड़कर गणना किए गए सीपीआई से है।

15 पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) के अनुसार, भारतीय कच्चे तेल बास्केट (आईसीबी) एक व्युत्पन्न बास्केट है, जिसमें प्रत्येक माह भारतीय रिफाइनरियों द्वारा आयातित स्वीट ग्रेड (ब्रेंट डेटेड) तथा सॉर ग्रेड (ओमान एंड दुबई एवरेज) कच्चे तेल शामिल होते हैं। अप्रैल 2026 के लिए आईसीबी अनुपात 61.02 : 38.98 तथा मई 2026 के लिए 70 : 30 था। आईसीबी की औसत कीमत अप्रैल में 114.5 अमेरिकी डॉलर तथा मई में 106.2 अमेरिकी डॉलर रही।

16 डबल्यूपीआई मुद्रास्फीति मार्च के 3.9 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल में 8.3 प्रतिशत हो गई, क्योंकि सूचकांक में माह-दर-माह आधार पर 3.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो वर्तमान शृंखला (2011-12 = 100) में अब तक की सर्वाधिक मासिक वृद्धि है।

17 मई 2026 के दौरान पेट्रोल एवं डीज़ल की कीमतों में संचयी रूप से क्रमशः 7.4 प्रतिशत तथा 8.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिससे शीर्षक सीपीआई मुद्रास्फीति में लगभग 36 आधार अंकों का योगदान होने का अनुमान है।

18 अप्रैल 2026 के दौरान रबड़ एवं प्लास्टिक उत्पादों, आधार धातुओं, रसायन एवं रासायनिक उत्पादों तथा वस्त्रों के विनिर्माण से संबंधित डब्ल्यूपीआई में क्रमशः 1.4 प्रतिशत, 3.3 प्रतिशत, 3.4 प्रतिशत तथा 2.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

19 संघर्ष प्रारंभ होने से पूर्व, उक्त जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले पोत वैश्विक समुद्री कच्चे तेल व्यापार तथा परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों के समुद्री व्यापार का क्रमशः लगभग 35 प्रतिशत और 20 प्रतिशत हिस्सा वहन करते थे। इसके अतिरिक्त, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के वैश्विक व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत भाग भी इसी मार्ग से संचालित होता था।

20 विश्व बैंक का पण्य मूल्य सूचकांक मार्च-मई 2026 के दौरान 30.3 प्रतिशत बढ़ा। वर्ष-दर-वर्ष आधार पर, मई 2026 में इस सूचकांक में 40.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

21 29 मई 2026 को, भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) द्वारा जारी पूर्वानुमान के अनुसार, देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून दीर्घावधि औसत (एलपीए) के 90 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया गया, जिसमें मॉडल-आधारित त्रुटि की सीमा ±4 प्रतिशत है।

22 भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम के दौरान एल-नीनो परिस्थितियों के उभरने की संभावना है। संयुक्त राज्य अमेरिका के नेशनल ओशिएनिक एंड एट्मोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने मई-जुलाई 2026 के दौरान एल-नीनो के उभरने की 82 प्रतिशत संभावना व्यक्त की है। साथ ही, इसके दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक 96 प्रतिशत संभावना के साथ बने रहने का अनुमान है।

23 16 मई 2026 की स्थिति के अनुसार, चावल तथा गेहूँ का भंडार क्रमशः 695.5 लाख टन (बफर मानक का 5.1 गुना) तथा 465.1 लाख टन (बफर मानक का 6.2 गुना) था।

24 एलएएफ के अंतर्गत औसत दैनिक निवल अवशोषण मार्च 2026 के 1.7 लाख करोड़ से बढ़कर अप्रैल 2026 में 3.9 लाख करोड़ हो गया, किंतु इसके पश्चात मई 2026 में घटकर 1.7 लाख करोड़ रह गया। जून 2026 में (3 जून तक) प्रणालीगत चलनिधि का औसत स्तर 1.3 लाख करोड़ रहा।

25 भारतीय रिज़र्व बैंक ने मई 2026 में 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर की दीर्घावधि विदेशी मुद्रा क्रय/विक्रय स्वैप नीलामी आयोजित की।

26 अप्रैल में संपन्न हुई पिछली एमपीसी की बैठक के बाद से 3 जून 2026 तक 11 परिवर्ती दर रेपो (वीआरआर) तथा 2 परिवर्ती दर प्रतिवर्ती रेपो (वीआरआरआर) परिचालन किए गए।

27 डबल्यूएसीआर, नीतिगत रेपो दर से, औसतन 4 आधार अंक नीचे रही। अप्रैल की मौद्रिक नीति के बाद से 3 माह के खजाना बिलों की दर, 3 माह के जमा-प्रमाणपत्रों की दर तथा 3 माह के वाणिज्यिक पत्रों की दर क्रमशः औसतन 5.34 प्रतिशत, 6.75 प्रतिशत तथा 6.99 प्रतिशत रहीं, जबकि फरवरी और अप्रैल की मौद्रिक नीति बैठकों के दौरान उक्त दरें क्रमशः 5.32 प्रतिशत, 7.16 प्रतिशत तथा 7.45 प्रतिशत थीं।

28 नीतिगत रेपो दर में संचयी रूप से 125 आधार अंकों (बीपीएस) की कटौती के परिणामस्वरूप, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) की भारित औसत उधार दर (डबल्यूएएलआर) फरवरी 2025 से अप्रैल 2026 की अवधि के दौरान नए रुपये ऋणों पर 83 आधार अंक तथा बकाया-ऋणों पर 89 आधार अंक कम हुई। जमा पक्ष में, नए जमा पर भारित औसत घरेलू मीयादी जमा दर (डबल्यूएडीटीडीआर) में 85 आधार अंकों की कमी आई, जबकि इसी अवधि के बकाया-जमा के संबंध में यह दर 50 आधार अंक कम हुई।

29 15 मई 2026 की स्थिति के अनुसार, बैंक ऋण में वर्ष-दर-वर्ष आधार पर 16.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि एक वर्ष पूर्व यह वृद्धि 9.8 प्रतिशत थी।

30 क्षेत्रवार आँकड़े खुदरा तथा सेवा क्षेत्र की ओर ऋण प्रवाह में सुदृढ़ वृद्धि का संकेत देते हैं। एमएसएमई क्षेत्र में ऋण की संधारणीय वृद्धि तथा बड़े उद्योगों को दिए जाने वाले ऋण में बढ़ोत्तरी के कारण औद्योगिक ऋण में और मजबूती आई। कृषि ऋण में भी स्थिर गति से वृद्धि जारी रही।

31 एससीबी मानदंड: अप्रैल 2025 से अप्रैल 2026 के बीच बकाया-ऋण तथा जमा में वर्ष-दर-वर्ष आधार पर क्रमशः 16.52 प्रतिशत तथा 12.09 प्रतिशत की वृद्धि हुई। मार्च 2026 में प्रणाली-स्तरीय जोखिम-भारित आस्तियों की तुलना में पूंजी अनुपात (सीआरएआर) 17.68 प्रतिशत रहा, जो न्यूनतम विनियामकीय स्तर से पर्याप्त रूप से अधिक था। अनर्जक आस्तियों (एनपीए) के अनुपात में और सुधार हुआ (जीएनपीए अनुपात मार्च 2025 के 2.22 प्रतिशत की तुलना में मार्च 2026 में घटकर 1.73 प्रतिशत हो गया, जबकि एनएनपीए अनुपात मार्च 2025 के 0.50 प्रतिशत से घटकर मार्च 2026 में 0.40 प्रतिशत हो गया)। मार्च 2026 के अंत में एलसीआर 123.70 प्रतिशत रहा, जो सुदृढ़ चलनिधि बफर को दर्शाता है। मार्च 2026 में आस्तियों पर प्रतिलाभ (आरओए) तथा इक्विटी पर प्रतिलाभ (आरओई) वार्षिकीकृत रूप में क्रमशः 1.33 प्रतिशत और 13.06 प्रतिशत रहे। मार्च 2026 में निवल ब्याज मार्जिन 3.26 प्रतिशत रहा (मार्च 2025 में यह 3.46 प्रतिशत था)। एससीबी के निवल लाभ की वृद्धि दर वर्ष 2025 के 14.67 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2026 में 6.0 प्रतिशत रह गई। इसी अवधि में एनआईएम में 20 आधार अंकों की कमी (3.46 प्रतिशत से 3.26 प्रतिशत) दर्ज की गई, जो लाभप्रदता पर बढ़ते दबाव का संकेत देती है।

32 एनबीएफ़सी मानदंड: मार्च 2026 में एनबीएफसी क्षेत्र का कुल सीआरएआर 24.70 प्रतिशत तथा टियर-I सीआरएआर 22.86 प्रतिशत रहा, जो न्यूनतम विनियामक आवश्यकताओं से काफी अधिक था। जीएनपीए अनुपात मार्च 2025 के 2.25 प्रतिशत से घटकर मार्च 2026 में 1.83 प्रतिशत हो गया, जबकि एनएनपीए अनुपात भी मार्च 2025 के 0.98 प्रतिशत से घटकर मार्च 2026 में 0.81 प्रतिशत रह गया। इस क्षेत्र का आरओए मार्च 2025 के 2.90 प्रतिशत से मामूली रूप से घटकर मार्च 2026 में 2.56 प्रतिशत हो गया। एनआईएम, मार्च 2025 के 4.55 प्रतिशत से बढ़कर मार्च 2026 में 4.56 प्रतिशत हो गया।

33 भारत में सकल एफ़डीआई प्रवाह, वर्ष 2025-26 में 17.3 प्रतिशत बढ़कर 94.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुँच गया, जबकि वर्ष 2024-25 के दौरान यह 80.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। वर्ष 2024-25 में निवल एफडीआई अंतर्वाह 1.0 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 7.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया था।

34 1 अप्रैल से 2 जून 2026 की अवधि के दौरान, इक्विटी तथा ऋण क्षेत्र का निवल बहिर्वाह क्रमशः 13.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तथा 0.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा।

35 यूके तथा न्यूज़ीलैंड के साथ व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोशिएशन (ईएफ़टीए) तथा ओमान के साथ व्यापार समझौते क्रमशः 1 अक्टूबर 2025 और 1 जून 2026 से प्रभावी हो चुके हैं। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता संपन्न हो चुका है। संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौते की घोषणा फरवरी 2026 में की गई थी, जिसके संबंध में अप्रैल 2026 से पुनः वार्ताएँ जारी हैं। इसके अतिरिक्त, कनाडा, पेरू, मेक्सिको, बहरीन, क़तर तथा दक्षिण कोरिया सहित कई अन्य देशों के साथ व्यापार समझौते भी विचाराधीन हैं।


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