आरबीआई/2026-27/150
एफआईडीडी.सीओ.एलबीएस.बीसी.सं.03/02.01.001/2026-27
19 जून 2026
अध्यक्ष/प्रबंध निदेशक/मुख्य कार्यपालक अधिकारी
सभी वाणिज्यिक बैंक - ऐसे विदेशी बैंक शामिल नहीं हैं
जो विदेशी बैंकों की पूर्णतः स्वाधिकृत समनुषंगी संस्था नहीं हैं।
सभी राज्य सहकारी बैंक
सभी जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक
महोदया/ महोदय,
अग्रणी बैंक योजना
कृपया अग्रणी बैंक योजना (एलबीएस) से संबंधित 01 अप्रैल 2025 का मास्टर परिपत्र एफआईडीडी.सीओ.एलबीएस.बीसी.सं.03/02.01.001/2025-26 देखें जिसमें एलबीएस के संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा समय-समय पर जारी किए गए संगत दिशानिर्देशों/ अनुदेशों का संकलन दिया गया है।
2. एलबीएस की व्यापक समीक्षा के बाद इस विषय पर संशोधित दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। ये दिशानिर्देश इस विषय पर रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किए गए सभी पूर्ववर्ती अनुदेशों का अधिक्रमण करते हैं।
भवदीया,
(निशा नम्बियार)
प्रभारी मुख्य महाप्रबंधक
अनुलग्नक: यथोक्त
पृष्ठभूमि
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा दिसंबर 1969 में अग्रणी बैंक योजना (एलबीएस) शुरू की गई थी ताकि प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र और अन्य क्षेत्रों में बैंक वित्त के प्रवाह को साकार करने और ग्रामीण क्षेत्र के समग्र विकास में बैंकों की भूमिका को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय को सुसाध्य बनाते हुए एक संरचित तंत्र प्रदान किया जा सके।
2. अग्रणी बैंक योजना का उद्देश्य
एलबीएस का उद्देश्य निम्नलिखित को हासिल करने के लिए इस योजना के तहत स्थापित मंच के माध्यम से बैंकों, सरकार और अन्य विकासकारी एजेंसियों की गतिविधियों का समन्वय करना हैः
क) समावेशी संवृद्धि को हासिल करने के लिए प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्रों को ऋण प्रवाह को बढ़ाना।
ख) वित्तीय सेवाओं के ऐक्सेस और उपयोग के स्तर में सुधार करते हुए वित्तीय समावेशन का गहनीकरण।
3. योजना का ढांचा
3.1 अग्रणी बैंक:
i. भारतीय रिज़र्व बैंक प्रत्येक जिले में एक वाणिज्यिक बैंक को अग्रणी बैंक के रूप में नामित करेगा, जो जि़ले में प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्रों को होने वाले ऋण प्रवाह में सुधार करने और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के लिए जि़ले के स्तर पर बैंकों, सरकार, नाबार्ड और अन्य हितधारकों के प्रयासों में समन्वय स्थापित करेगा।
ii. ज़िले-वार अग्रणी बैंकों की सूची अनुबंध-1 में दी गई है।
3.2 अग्रणी जि़ला प्रबंधक (एलडीएम):
प्रत्येक अग्रणी बैंक हरेक जिले में एक अग्रणी जि़ला प्रबंधक (एलडीएम) नियुक्त करेगा, जहां उसके पास अग्रणी बैंक का दायित्व है, जो जिले में अनन्य रूप से एलबीएस के कार्यान्वयन की देखरेख और समन्वय करेगा।
3.3 जि़ला विकास प्रबंधक (डीडीएम):
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) प्रत्येक जिले के लिए एक जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) नियुक्त करेगा जो ग्रामीण ऋण को बढ़ावा देने, वित्तीय समावेशन पहलों को लागू करने और जिले में कृषि और ग्रामीण विकास गतिविधियों का समर्थन करने के लिए नाबार्ड और जिला स्तरीय बैंकिंग और वित्तीय संस्थाओं के बीच संपर्क सूत्र के रूप में कार्य करेगा।
3.4 अग्रणी जि़ला अधिकारी (एलडीओ):
भारतीय रिज़र्व बैंक अपने एक अधिकारी को प्रत्येक जिले के लिए अग्रणी जिला अधिकारी (एलडीओ) के रूप में नामित करेगा। एलडीओ अग्रणी बैंक योजना के तहत जिला स्तर पर बैंक का प्रतिनिधित्व करेगा।
3.5 एसएलबीसी संयोजक बैंक:
i. भारतीय रिज़र्व बैंक ऐसे वाणिज्यिक बैंक को राज्य स्तरीय बैंकर समिति (एसएलबीसी) के संयोजक बैंक/ यूटी स्तरीय बैंकर समिति (यूटीएलबीसी) के संयोजक बैंक के रूप में नामित करेगा जिसकी शाखाओं की संख्या उस राज्य/ संघ राज्य-क्षेत्र में सबसे अधिक है।
ii. राज्य और संघ राज्य-क्षेत्र वार एसएलबीसी/ यूटीएलबीसी के संयोजक बैंकों की सूची अनुबंध-1 में दी गई है।
3.6 एसएलबीसी संयोजक:
राज्य/ संघ राज्य-क्षेत्र में एसएलबीसी संयोजक बैंक द्वारा बैंक के महाप्रबंधक को एसएलबीसी संयोजक के रूप में नामित किया जाएगा। महाप्रबंधक स्तरीय अधिकारी के न होने के मामले में संयोजक बैंक के अंचल प्रमुख (जिसका पद उप महाप्रबंधक के पद से कम न हो) को संयोजक के रूप में नामित किया जा सकता है।
4. अग्रणी बैंक योजना के अंतर्गत मंच
यह योजना प्रत्येक राज्य/ संघ राज्य-क्षेत्र में तीन स्तरीय संरचना के जरिए लागू की जाती है, यथा- मूल स्तर पर खंड स्तरीय बैंकर समिति (बीएलबीसी), ज़िला परामर्शदात्री समिति (डीसीसी) और मध्यम स्तर पर ज़िला स्तरीय समीक्षा समिति (डीएलआरसी), और शीर्ष स्तर पर एसएलबीसी/ यूटीएलबीसी। उक्त प्रत्येक मंच में मोटे तौर पर बैंक, सरकारी एजेंसियां और अन्य हितधारक शामिल हैं।
5. खंड स्तरीय बैंकर समिति (बीएलबीसी)
5.1 प्रयोजन
बैंकों, सरकार और क्षेत्र स्तरीय विकासकारी एजेंसियों के बीच खंड के स्तर पर समन्वय स्थापित करने के लिए जि़ले के प्रत्येक खंड में बीएलबीसी गठित की जाएगी। बीएलबीसी खंड संबंधी ऋण योजना तैयार करके उसके कार्यान्वयन का पुनरीक्षण करेगी। साथ ही, वह खंड के स्तर पर ऋण कार्यक्रमों को लागू करने के संबंध में आने वाले परिचालनगत मुद्दों को दूर करेगी।
5.2 बीएलबीसी की संरचना
i. ज़िले के अग्रणी ज़िला प्रबंधक (एलडीएम) द्वारा बीएलबीसी के संयोजन और अध्यक्षता की जाएगी। बीएलबीसी की सदस्यता में निम्नलिखित शामिल होंगेः (क) लघु वित्त बैंकों (एसएफबी), भुगतान बैंकों (पीबी), विदेशी बैंकों की पूर्ण स्वामित्व वाली समनुषंगी संस्थाओं (डब्ल्यूओएस), क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) और ज़िला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों (डीसीसीबी) सहित खंड में परिचालनरत सभी बैंकों के शाखा प्रबंधक; (ख) खंड विकास अधिकारी (बीडीओ), और (ग) खंड के तकनीकी अधिकारी, जैसे कृषि, उद्योग और सहकारी संस्थाओं के विस्तार अधिकारी। नियंत्रक कार्यालयों द्वारा एलडीएम को संबंधित जि़ले में खोली गई/ बंद की गई/ विलयित शाखाओं का ब्योरा सूचित किया जाना चाहिए ताकि बीएलबीसी बैठकों में उसका समुचित कवरेज किया जा सके।
ii. पंचायत समितियों के प्रतिनिधियों को ऋण आयोजना प्रक्रिया के लिए जानकारी (इनपुट) प्रदान करने के लिए छमाही अंतराल पर बैठकों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
iii. एलडीओ और बैंकों के नियंत्रक प्रमुख चुनिंदा रूप से बीएलबीसी बैठकों में भाग ले सकते हैं।
iv. डीडीएम को बीएलबीसी बैठकों में आमंत्रित किया जाएगा। हालांकि वे चयनित रूप से इन बैठकों में भाग ले सकते हैं, फिर भी वे ऐसी बैठकों में भाग लेंगे जिनमें खंड से संबंधित ऋण योजना को अंतिम रूप दिया जाता है।
v. खंड स्तरीय एसएचजी परिसंघ के प्रतिनिधियों, फाइनैन्शियल लिटरसी सेंटरों (एफएलसी) से जुड़े फाइनैन्शियल लिटरसी परामर्शदाताओं तथा आरएसईटीआई के निदेशकों को भी बीएलबीसी बैठकों में आमंत्रित किया जा सकता है।
5.3 बीएलबीसी बैठकों का आयोजन
i. बीएलबीसी की बैठकें यथासंभव तिमाही आधार पर आयोजि की जाएं। पूर्वोत्तर क्षेत्र के मामले में भौगोलिक और अन्य मज़बूरियों के मद्देनज़र बैठकों का आयोजन वर्ष में कम से कम दो बार किया जाए। इनमें से एक बैठक खंड से संबंधित ऋण योजना को अंतिम रूप देने के लिए सितंबर को समाप्त छमाही हेतु आयोजित की जाए और दूसरी बैठक मार्च को समाप्त छमाकी के लिए आयोजित की जाए जिसमें कार्यनिष्पादन की समीक्षा की जाए।
ii. बीएलबीसी बैठकों के लिए उदाहरण-स्वरूप कार्यसूची अनुबंध-2 में दर्शाई गई है।
iii. बीएलबीसी की बैठकें तिमाही की समाप्ति से 60 दिनों के भीतर आयोजित की जाएंगी। जिन मामलों में भौतिक सहभागिता करना कतिपय कारकों, जैसे दूरी संबंधी समस्याओं, प्राकृतिक आपदाओं, एकल व्यक्ति शाखाओं के समक्ष रहने वाली परिचालनगत समस्याओं, आदि की वजह से कठिन हो जाता है तो बैठकों का आयोजन वर्चुअल तरीके से किया जाए, या वर्चुअल सहभागिता की अनुमति दी जा सकती है। यदि किन्हीं आपवादिक कारणों से निर्धारित समय-सीमा के भीतर बैठक आयोजित नहीं की गई तो उसका आयोजन अगली तिमाही के अंत तक अनिवार्य रूप से आयोजित किया जाना चाहिए।
iv. बैठक के आयोजन से 10 दिन के भीतर बैठक का कार्यवृत्त (अनुबंध 10 में दिए गए फॉर्मेट के अनुसार) परिचालित किया जाना चाहिए। एलडीएम यह सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत निगरानी प्रणाली स्थापित करेगा कि बैठकों के दौरान चर्चा के परिणामस्वरूप कार्रवाई योग्य परिणाम हों, बैठक में लिए गए निर्णयों के कार्यान्वयन के लिए निश्चित समय सीमा हो और ऐसी कार्रवाई मदों की प्रगति पर नज़र रखी जाए।
v. बीएलबीसी बैठकों के संचालन की निगरानी डीसीसी द्वारा की जाएगी। बीएलबीसी ऐसे मुद्दों को व्यापक मंच पर चर्चा करने के लिए डीसीसी के सम्मुख रख सकती है जिनका समाधान खंड के स्तर पर नहीं हो रहा हो।
6. ज़िला परामर्शदात्री समिति (डीसीसी)
6.1 प्रयोजन
डीसीसी एलबीएस के तहत विकासात्मक गतिविधियों को सुसाध्य बनाने के लिए ज़िला स्तर पर समन्वय का एक मंच होगी। डीसीसी जिला ऋण योजना (डीसीपी) को तैयार करेगी और उसकी समीक्षा करेगी और उसे लागू करने में आने वाली परिचालनगत मुद्दों को हल करेगा।
6.2 डीसीसी की संरचना
i. जिला कलेक्टर (डीसी)/ जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) डीसीसी के अध्यक्ष होंगे।
ii. अग्रणी बैंक के अलावा, डीसीसी की सदस्यता के अंतर्गत उस जिले में परिचालन करने वाले सभी वाणिज्यिक बैंकों सहित सभी लघु वित्त बैंक, विदेशी बैंकों की पूर्णतः स्वाधिकृत समनुषंगी संस्थाएं, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, भुगतान बैंक, राज्य/ जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक, अग्रणी जिला अधिकारी, जिला विकास प्रबंधक, और राज्य सरकार के विभागों और संबद्ध एजेंसियां शामिल हैं।
iii. जिले में स्थित प्रत्येक बैंक डीसीसी बैठकों में भाग लेने के लिए एक जिला समन्वयक (डीसीओ), अर्थात आंचलिक/ क्षेत्रीय/ प्रशासनिक कार्यालय से वरिष्ठ स्तर पर एक नोडल अधिकारी को नामित करेगा। डीसीओ एलबीएस से संबंधित मामलों पर बैंक की सभी शाखाओं के साथ समन्वय करेंगे। बैंकों के नियंत्रक कार्यालयों द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि एलडीएम को डीसीओ के नाम और संपर्क विवरण की सूचना दी जाती है और इनमें परिवर्तन होने पर उसकी सूचना समय पर दी जाती है।
iv. जिले के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास और फेसिलिटेशन कार्यालय (एमएसएमई-डीएफओ) का निदेशक उन जिलों में आमंत्रिती होगा जहां एमएसएमई क्लस्टर स्थित हैं।
6.3 डीसीसी बैठकों का आयोजन
i. डीसीसी की बैठकें एलडीएम द्वारा तिमाही अंतराल पर आयोजित की जाएंगी।
ii. डीसीसी बैठकों में विचारार्थ कार्यसूची अनुबंध-3 में दी गई है।
iii. एलडीएम डीसीसी बैठकों (कैलेंडर वर्ष आधारित) का वार्षिक कैलेंडर तैयार करके बैठकों की तारीखों की सूचना अग्रिम रूप से सभी सदस्यों के बीच परिचालति करेगा, जिसकी समय-सीमा निम्नानुसार होगी:
| गतिविधि |
अनंतिम समय-सीमा |
| डीसीसी बैठकों का वार्षिक कैलेंडर तैयार करना |
हर वर्ष 15 जनवरी |
| बैठक की निर्धारित तारीख के बारे में अनुस्मारक देना और बैंकों द्वारा अग्रणी बैंक को डेटा प्रस्तुत किया जाना |
तिमाही के अंत से 15 दिन पहले |
| कार्यसूची सह पृष्ठभूमि पत्रों का वितरण |
तिमाही के अंत से 20 दिन तक |
| बैठक का आयोजन |
तिमाही के अंत से 60 दिनों के भीतर |
| सभी हितधारकों को बैठक का कार्यवृत्त भेजना |
बैठक के आयोजन की तारीख से 10 दिनों के भीतर |
iv. यदि कतिपय कारकों, जैसे दूरी की बाधाओं, प्राकृतिक आपदाओं आदि के कारण डीसीसी (जि़ला परामर्शदात्री समिति) की बैठकों में भौतिक रूप से भाग लेने में कठिनाई हो तो ऐसी बैठकें वर्चुअल तरीके से आयोजित की जाए, या वर्चुअल सहभागिता की अनुमति दी जाए। यदि इन बैठकों में डीसीओ द्वारा भाग नहीं लिए जाने के मामले बार-बार सामने आए तो उनकी सूचना आरबीआई के क्षेत्रीय कार्यालय को दे दी जानी चाहिए।
v. डीसीसी बैठकों का कार्यवृत्त अनुबंध-10 में दिए गए फॉर्मेट के अनुसार तैयार किया जाए। एलडीएम यह सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत निगरानी प्रणाली स्थापित करेगा कि बैठकों के दौरान चर्चा के परिणामस्वरूप कार्रवाई योग्य परिणाम हों, बैठक में लिए गए निर्णयों के कार्यान्वयन के लिए निश्चित समय सीमा हो और ऐसी कार्रवाई मदों की प्रगति पर निगरानी रखी जाए।
vi. विशिष्ट मुद्दों पर गहनता से काम करने और डीसीसी को विचारार्थ रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए डीसीसी स्तर पर उपयुक्त उप-समितियों का गठन किया जाए।
vii. डीसीसी द्वारा ऐसे मुद्दों पर एसएलबीसी को प्रतिक्रिया दी जानी चाहिए जिन पर व्यापक मंच पर चर्चा की जाने की ज़रूरत है ताकि उन पर राज्य के स्तर पर पर्याप्त ध्यान दिया जा सके।
7 जिला स्तरीय समीक्षा समिति (डीएलआरसी)
7.1 प्रयोजन
डीएलआरसी जन प्रतिनिधियों को अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए एक मंच के रूप में कार्य करने के अलावा पात्र क्षेत्रों को ऋण का प्रवाह बढ़ाने के लिए व्यावहारिक समाधान तैयार करने का एक मंच होगी। डीएलआरसी के लिए अपेक्षित है कि वह पुनरीक्षण मंच के रूप में कार्य करे, वहीं, डीसीसी समन्वय और कार्यान्वयन मंच के रूप में कार्य करेगी।
7.2 डीएलआरसी की संरचना
i. डीएलआरसी की बैठकों की अध्यक्षता डीसी/ डीएम करेंगे और इसमें डीसीसी के सदस्य भाग लेंगे। इन बैठकों में जनप्रतिनिधियों, अर्थात स्थानीय सांसदों/ विधायकों/ जिला पंचायत/ परिषद प्रमुखों को आमंत्रित किया जाएगा।
ii. मंच में राज्य अल्पसंख्यक आयोग, अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति (एससी/ एसटी) निगम के प्रतिनिधि और ग्रामीण ऋण के लाभार्थी-समूह के प्रतिनिधि शामिल होंगे। मंच में प्रगतिशील किसानों और स्थानीय उद्योगपतियों जैसे चुनिंदा क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले लोगों को विशेष आमंत्रिती के रूप में आमंत्रित करने पर भी विचार किया जा सकता है।
7.3 डीएलआरसी बैठकों का आयोजन
i. जन प्रतिनिधियों की सुविधा के अनुसार तिमाही आधार पर डीएलआरसी बैठकें आयोजित करने का दायित्व एलडीएम का होगा। जन प्रतिनिधियों को कार्यसूची के कागज-पत्र समय रहते दे देने चाहिए। यदि दूरी संबंधी बाधाओं, प्राकृतिक आपदाओं आदि जैसे कारकों के कारण भौतिक रूप से सहभागिता में कठिनाई हो तो इन बैठकों को वर्चुअल तरीके से आयाजित किया जाए, या वर्चुअल सहभागिता की अनुमति दी जाए।
ii. डीएलआरसी की बैठकों में चर्चा संबंधी कार्य-सूची अनुबंध-4 में दिया गया है।
iii. डीएलआरसी की बैठकों को डीसीसी बैठकों के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। जून तिमाही की डीएलआरसी, जहां तक संभव हो, पीएलपी-पूर्व बैठक से पहले आयोजित की जा सकती है, ताकि जन प्रतिनिधियों से जिलों की ऋण आवश्यकताओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सके।
iv. जन प्रतिनिधियों के प्रश्नों के उत्तर को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए और उन पर त्वरित रूप से कार्रवाई की जानी चाहिए।
v. डीएलआरसी बैठकों का कार्यवृत्त अनुबंध-10 में दिए गए फॉर्मेट के अनुसार तैयार किया जाए। डीएलआरसी के निर्णयों पर की गई अनुवर्ती कार्रवाई के संबंध में डीसीसी की बैठकों में चर्चा की जानी अपेक्षित है।
8. एलडीएम की भूमिका और बुनियादी संरचना सहायता
8.1 एलडीएम की भूमिका
डीसीसी और डीएलआरसी की बैठकें आयोजित करने के अलावा, एलडीएम के लिए परिकल्पित अन्य कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं:
i. ज़िला ऋण योजना (डीसीपी) के कार्यान्वयन की निगरानी
ii. जब कभी बकाया मुद्दों को हल करने की आवश्यकता पड़े तो उसके संबंध में डीडीएम/ एलडीओ/ सरकारी अधिकारियों की बैठकें आयोजित करना।
iii. बैंकों द्वारा फाइनैन्शियल लिटरसी सेंटरों (एफएलसी) और ग्रामीण स्व-रोजगार प्रशिक्षण संस्थानों (आरएसईटीआई) की स्थापना के लिए समन्वय करना।
iv. एफएलसी, बैंकों की ग्रामीण शाखाओं और सेंटर फॉर फाइनैन्शियल लिटरसी (सीएफएल) को वित्तीय साक्षरता शिविरों के आयोजन में आवश्यक सहयोग प्रदान करना।
v. एलबीएस संबंधी विभिन्न पहलुओं से अवगत कराने के लिए एनजीओ/ पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) को शामिल करते हुए बैंकों और सरकारी अधिकारियों के लिए वार्षिक कार्यशालाएं आयोजित करना।
vi. जागरूकता बढ़ाने, फीडबैक प्राप्त करने और शिकायत निवारण के संबंध में मार्गदर्शन प्रदान करने के प्रति जागरूकता पैदा करने की दृष्टि से बैंकों और अन्य हितधारकों के साथ समन्वय करते हुए जि़ले में, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में हर तिमाही में कम से कम एक सार्वजनिक बैठक आयोजित करना।
8.2 एलडीएम के लिए बुनियादी संरचना और संसाधन
i. चूंकि एलडीएम की भूमिका एलबीएस की प्रभावशीलता के लिए महत्वपूर्ण है, अतः उपयुक्त स्तर/ पर्याप्त वरिष्ठता वाले ऐसे अधिकारियों, जो अपेक्षित अभिक्षमता व नेतृत्व कौशल रखते हों, को एलडीएम के रूप में तैनात किया जाना चाहिए। यदि अग्रणी बैंकों द्वारा एक एलडीएम को एक जिले का दायित्व सौंपा जाए तो बेहतर होगा ताकि ऋण और वित्तीय समावेशन से संबंधित पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान दिया जा सके। केवल आपवादिक मामलों और वैध कारण होने पर एलडीएम को एक से अधिक जिलों का दायित्व सौंपने पर विचार किया जाए।
ii. अग्रणी बैंकों द्वारा एलडीएम कार्यालयों में तकनीकी स्टाफ सहित विशेष स्टाफ तैनात होने चाहिए। उन्हें स्टाफ की कमी, यदि कोई हो, की स्थिति से निपटने के लिए कुशल कंप्यूटर परिचालक/ परिचालकों को काम पर लागने के लिए अनुमति दी जानी चाहिए। एलडीएम को आवश्यक बुनियादी संरचना उपलब्ध कराई जाएगी, जैसे पृथक कार्यालय, उपस्कर, आईटी बुनियादी संरचना, डेटा कनेक्टिविटी। साथ ही, उन्हें अपने दायित्वों का निर्वहन प्रभावी तरीके से करने हेतु वाहन उपलब्ध कराया जाएगा। इसके अलावा, एलडीएम कार्यालयों के लिए पृथक बजट होना चाहिए जिससे कि वे विभिन्न क्षेत्र स्तरीय कार्यकलापों को पूरा कर सकें। एलडीएम कार्यालयों की मानव-शक्ति, बुनियादी संरचना, संसाधनों और बजट की पर्याप्तता की समीक्षा आवधिक रूप से की जानी चाहिए।
9 राज्य स्तरीय बैंकर समिति (एसएलबीसी)
9.1 उद्देश्य
राज्य के विकास के लिए एसएलबीसी राज्य सरकार, बैंकों, वित्तीय संस्थानों और अन्य संबंधित हितधारकों के प्रयासों में समन्वय को सुविधाजनक बनाने के लिए सर्वोच्च अंतर-संस्थागत मंच होगा। केंद्र शासित प्रदेशों में, सर्वोच्च मंच को यूटीएलबीसी कहा जाएगा। केंद्र शासित प्रदेशों में, इस सर्वोच्च मंच को यूटीएलबीसी कहा जाएगा।
9.2 एसएलबीसी की संरचना
i. एसएलबीसी फ़ोरम की सदस्यता में राज्य सरकार के संबंधित विभागों के प्रमुख, आरबीआई के क्षेत्रीय निदेशक, राज्य में बड़ी मौजूदगी वाले कमर्शियल बैंकों के राज्य प्रमुख, नाबार्ड के राज्य प्रमुख, एसएलबीसी संयोजक और आरआरबी, राज्य सहकारी बैंक और राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (एससीएआरडीबी) - पूर्व में भूमि विकास बैंक (एलडीबी) - के प्रमुख शामिल होंगे।
ii. एसएफ़बी के राज्य प्रमुखों, विदेशी बैंकों के डबल्यूओएस और निजी बैंक के राज्य प्रमुखों को बारी-बारी से आमंत्रित किया जाएगा। हालांकि, वार्षिक ऋण योजना (एसीपी) के शुभारंभ के समय सभी की उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी।
iii. मुख्यमंत्री/वित्त मंत्री/उद्योग मंत्री/कृषि मंत्री को एसएलबीसी की बैठकों को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। इसके अलावा, राज्य के मुख्यमंत्री (सीएम) से अनुरोध किया जाएगा कि वे वर्ष में कम से कम एक एसएलबीसी बैठक में भाग लें। यदि सीएम या मंत्री किसी भी कारण से उपस्थित नहीं हो पाते हैं, तो प्राथमिकता के साथ बैठक योजना के अनुसार ही आयोजित की जानी चाहिए।
iv. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति आयोग, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, खादी और ग्राम उद्योग आयोग (केवीआईसी), उद्योग निकायों, खुदरा व्यापारियों, निर्यातकों, किसान संघों आदि के वरिष्ठ पदाधिकारियों को बारी-बारी से आमंत्रित किया जाएगा।
v. नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता होने पर भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) और पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) को आमंत्रित किया जा सकता है। यदि वे मंच पर उपस्थित नहीं हैं, तो चर्चाओं से उत्पन्न होने वाले नीति संबंधी मुद्दों (यदि कोई हों) को उनके पास भेज दिया जाएगा।
vi. जब भी आवश्यक समझा जाए, भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (एसआईडीबीआई) के राज्य प्रमुख, आरएसईटीआई (आरसेटी) के राज्य निदेशक और एमएसएमई-डीएफ़ओ के प्रमुख को एसएलबीसी की बैठकों में आमंत्रित किया जा सकता है।
vii. एसएलबीसी जब भी आवश्यक समझे, डीसी/डीएम को अपनी बैठकों में आमंत्रित कर सकता है।
viii. एसएलबीसी कभी-कभी कृषि और एमएसएमई क्षेत्र के सतत विकास से संबंधित अध्ययनों में लगे शिक्षाविदों/शोधकर्ताओं को 'विशेष रूप से आमंत्रित' के रूप में अपनी बैठकों में आमंत्रित कर सकता है, ताकि चर्चाओं में मूल्यवर्धन किया जा सके और उन्हें राज्य के लिए उपयुक्त अध्ययनों से जोड़ा जा सके। कम आय वाले परिवारों को ऋण उपलब्ध कराने जैसी सफलता की कहानियाँ एसएलबीसी की बैठकों में प्रस्तुत की जाए।
ix. एसएलबीसी अपने विवेकानुसार, चर्चा किए जाने वाले एजेंडा मदों/मुद्दों के आधार पर, अपनी बैठकों में किसी अन्य प्रासंगिक व्यक्ति/संगठन को आमंत्रित कर सकता है।
9.3 एसएलबीसी बैठकों का संचालन
i. एसएलबीसी संयोजक तिमाही आधार पर एसएलबीसी की बैठकें आयोजित करेंगे।
ii. एसएलबीसी की बैठकों का एजेंडा अनुबंध 5 के अनुसार होगा।
iii. एसएलबीसी की बैठकों की सह-अध्यक्षता संयोजक बैंक के अध्यक्ष/प्रबंध निदेशक/कार्यपालक निदेशक और राज्य के मुख्य सचिव/ अतिरिक्त मुख्य सचिव/ प्रधान वित्त सचिव (राज्य सरकार में वित्त विभाग के प्रमुख)/विकास आयुक्त द्वारा की जाएगी।
iv. यदि एसएलबीसी संयोजक बैंक के प्रबंध निदेशक / मुख्य कार्यपालक अधिकारी / कार्यपालक निदेशक एसएलबीसी बैठकों में उपस्थित होने में असमर्थ हैं, तो आरबीआई के क्षेत्रीय निदेशक / राज्य प्रमुख बैठकों की सह-अध्यक्षता करेंगे।
v. एसएलबीसी मुख्य रूप से राज्य में प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र ऋण के प्रवाह और समग्र वित्तीय समावेशन से संबंधित नीतिगत और कार्यनीतिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेगा। शीर्ष मंच पर वित्तीय संस्थानों के प्रदर्शन में मौजूद कमियों की भी निगरानी की जाएगी।
vi. एसएलबीसी संयोजक बैंक वर्ष की शुरुआत में ही बैठकों का वार्षिक कैलेंडर (कैलेंडर वर्ष के आधार पर) तैयार करेंगे और तारीखों की अग्रिम सूचना के रूप में इसे सभी सदस्यों को वितरित करेंगे। बैठकें यथासंभव निर्धारित समय सारणी के अनुसार आयोजित की जानी चाहिए और समीक्षा के लिए डेटा निर्धारित समय सीमा के अनुसार प्राप्त किया जाना चाहिए। एसएलबीसी/ यूटीएलबीसी बैठकों का कैलेंडर तैयार करने के लिए व्यापक दिशानिर्देश निम्नलिखित हैं:
| गतिविधि |
(दिनांक) तक पूरा किया जाना है |
| एसएलबीसी/यूटीएलबीसी की बैठकों का कैलेंडर तैयार करना और सभी संबंधितों को इसकी सूचना देना। |
हर साल 15 जनवरी |
| बैठक की सटीक तारीख और बैंकों द्वारा एसएलबीसी को डेटा जमा करने के संबंध में अनुस्मारक |
तिमाही समाप्त होने से 15 दिन पहले |
| एसएलबीसी संयोजक बैंक द्वारा सूचना/डेटा प्राप्त करने की अंतिम तारीख |
तिमाही की समाप्ति से 15 दिन |
| कार्यसूची और पृष्ठभूमि पत्रों का वितरण |
तिमाही की समाप्ति से 20 दिन |
| बैठक का आयोजन |
तिमाही की समाप्ति के 45 दिनों के भीतर |
| बैठक का कार्यवृत्त सभी हितधारकों को अग्रेषित किया जाना |
बैठक आयोजित होने के 10 दिनों के भीतर |
| बैठक के निर्धारित कार्य बिंदुओं पर अनुवर्ती कार्रवाई |
कार्यवृत्त अग्रेषित करने के 30 दिनों के भीतर |
vii. बैठक की तारीख तय हो जाने के बाद एजेंडा पहले से ही वितरित कर दिया जाना चाहिए। यदि कुछ बैंक समय पर अपना डेटा अपडेट नहीं करते हैं या संबंधित प्रमुख, बैठक में उपस्थित नहीं होते हैं, तो एसएलबीसी संयोजक बैंक को आरबीआई के क्षेत्रीय कार्यालय को सूचित करते हुए चूककर्ता बैंकों के नियंत्रण कार्यालय को पत्र लिखना चाहिए, और बेहतर अनुशासन लाने के लिए एसएलबीसी की बैठकों में इस पर चर्चा की जाए।
viii. एसएलबीसी बैठक के कार्रवृत्तों के विवरण दर्ज करने का फ़ॉर्मेट अनुबंध-10 में दिया गया है। एसएलबीसी संयोजक एक सुदृढ़ निगरानी प्रणाली स्थापित करेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बैठकों के दौरान हुई चर्चाओं से कार्रवाई योग्य परिणाम प्राप्त हों, बैठक में लिए गए निर्णयों के कार्यान्वयन के लिए एक निश्चित समय सीमा हो और ऐसी कार्य योजनाओं की प्रगति पर नज़र रखी जाए।
ix. जिन मामलों में दूरी की बाधाओं या प्राकृतिक आपदाओं जैसे कारणों से सदस्यों का व्यक्तिगत रूप से शामिल होना मुश्किल हो, वहां आभासी (वर्चुअल) रूप से शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है।
9.4 एसएलबीसी की उप-समितियाँ
9.4.1 संचालन उप-समिति
एसएलबीसी में एक संचालन उप-समिति का गठन किया जाएगा जो विभिन्न हितधारकों से प्राप्त एजेंडा प्रस्तावों पर विचार-विमर्श करेगी और एसएलबीसी बैठकों के लिए एक संक्षिप्त एजेंडा को अंतिम रूप देगी।
9.4.2 अन्य उप-समितियाँ
i. अन्य विशिष्ट मुद्दों से संबंधित उप-समितियों का गठन निम्नानुसार किया जाएगा:
क. कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों पर उप-समिति (एससी-एए)
ख. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम एवं अन्य प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र (एससी-एमएसएमई एवं ओपीएस) संबंधी उप-समिति
ग. वित्तीय समावेशन और वित्तीय साक्षरता पर उप-समिति (एससी-एफ़आईएफ़एल)
घ. डिजिटल भुगतान पर उप-समिति (एससी-डीपी)
ii. उपर्युक्त पांच उप-समितियों के अतिरिक्त, संबंधित राज्यों द्वारा संबोधित किए जाने वाले विशिष्ट मुद्दों के आधार पर, आवश्यकतानुसार अन्य उप-समितियों का गठन किया जा सकता है।
9.4.3 उप-समितियों की संरचना
i. संचालन उप-समिति
संचालन उप-समिति की अध्यक्षता एसएलबीसी संयोजक करेंगे और इसमें प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को कवर करने वाले प्रमुख विभागों के वरिष्ठ राज्य सरकारी प्रतिनिधि शामिल होंगे, जैसे कि वित्त/संस्थागत वित्त, कृषि, उद्योग, आरबीआई और नाबार्ड के वरिष्ठ प्रतिनिधि और दो से तीन प्रमुख उपस्थिति वाले बैंक शामिल होंगे।
ii. कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों पर उप-समिति (एससी-एए)
क. इस मंच की अध्यक्षता एसएलबीसी/यूटीएलबीसी के प्रमुख सदस्य बैंक (कृषि उधार में उच्चतम हिस्सेदारी वाले)/कृषि आयुक्त/राज्य के कृषि विभाग के वरिष्ठ प्रतिनिधि द्वारा की जाएगी।
ख. अन्य सदस्यों में राज्य सरकार के वित्त विभाग और अन्य संबंधित विभागों, आरबीआई और नाबार्ड के प्रतिनिधि, साथ ही संयोजक बैंक और प्रमुख बैंकों के आंचलिक प्रमुख/उप प्रमुख शामिल होंगे।
ग. अन्य बैंकों के आंचलिक प्रमुखों/उप प्रमुखों को बारी-बारी से बैठक/बैठकों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
घ. जब भी ज़रूरी समझा जाए, खाद्य प्रसंस्करण (फ़ूड प्रोसेसिंग) और कृषि निर्यात को बढ़ावा देने वाली एजेंसियों को बैठकों में विशेष रूप से आमंत्रित किया जाए।
iii. एमएसएमई और अन्य प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र पर उप-समिति (एससी-एमएसएमई और ओपीएस)
क. इस मंच की अध्यक्षता एसएलबीसी/यूटीएलबीसी के एक प्रमुख सदस्य/ एमएसएमई विभाग/उद्योग विभाग के आयुक्त/ वित्त या संबंधित राज्य सरकार के अन्य प्रासंगिक विभाग के प्रमुख द्वारा की जाएगी।
ख. अन्य सदस्यों में आरबीआई, नाबार्ड, सिडबी, सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट (सीजीटीएमएसई), राज्य सरकार के वित्त विभाग, एसएलबीसी संयोजक बैंक के आंचलिक प्रमुख/उप प्रमुख और प्रमुख बैंकों के अधिकारी शामिल होंगे।
ग. अन्य बैंकों के आंचलिक प्रमुखों/उप प्रमुखों को बारी-बारी से बैठक/बैठकों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
घ. वित्तीय सेवाएं विभाग (डीएफएस), विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के राज्य प्रमुख, केवीआईसी/खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड (केवीआईबी), भारतीय निर्यात-आयात बैंक (ईएक्सआईएम बैंक), जिला उद्योग केंद्र (डीआईसी), खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई), कयर बोर्ड, नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी लिमिटेड (एनसीजीटीसी), नैबसंरक्षण (नाबार्ड की सहायक कंपनी) और प्रमुख सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) के प्रतिनिधियों को आवश्यकता के आधार पर आमंत्रित किया जा सकता है।
iv. वित्तीय समावेशन और वित्तीय साक्षरता पर उप-समिति (एससी-एफ़आईएफ़एल)
क. इस मंच की अध्यक्षता एसएलबीसी संयोजक / यूटीएलबीसी संयोजक / विकास आयुक्त / संबंधित राज्य के संस्थागत वित्त विभाग के प्रमुख करेंगे।
ख. अन्य सदस्यों में आरबीआई, नाबार्ड, वित्त विभाग और राज्य सरकार के अन्य संबंधित विभा गों के अधिकारी, तथा प्रमुख बैंकों और संयोजक बैंक के आंचलिक प्रमुख/उप प्रमुख शामिल होंगे।
ग. अन्य बैंकों के आंचलिक प्रमुखों/उप प्रमुखों को बारी-बारी से बैठक/बैठकों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
घ. राज्य निदेशक - आरएसईटीआई और वित्तीय साक्षरता केंद्रों (सीएफएल) को प्रायोजित करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को आवश्यकता के आधार पर आमंत्रित किया जा सकता है।
v. डिजिटल भुगतान पर उप-समिति (एससी-डीपी)
क. इस मंच की अध्यक्षता एसएलबीसी संयोजक या राज्य के किसी प्रमुख बैंक के आंचलिक प्रमुख द्वारा की जाएगी।
ख. अन्य सदस्यों में आरबीआई, नाबार्ड, वित्त विभाग और राज्य सरकार के अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी, राज्य स्तरीय कानून प्रवर्तन संस्था और प्रमुख बैंकों तथा संयोजक बैंक के आंचलिक प्रमुख/उप प्रमुख शामिल होंगे।
ग. अन्य बैंकों के आंचलिक प्रमुखों/उप प्रमुखों को बारी-बारी से बैठक/बैठकों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
घ. दूरसंचार क्षेत्र के प्रतिनिधियों को राज्य/केंद्र शासित प्रदेश की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार कनेक्टिविटी/बैंडविड्थ से संबंधित विशिष्ट मुद्दों पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है।
9.4.4 उप-समिति की बैठकों का संचालन
i. एसएलबीसी/यूटीएलबीसी की बैठकों से पहले, उप-समितियों की बैठकें एसएलबीसी संयोजक द्वारा तिमाही अंतराल पर बुलाई जाएंगी।
ii. उप-समितियों की बैठकों का एजेंडा अनुबंध 6 में दिया गया है। निर्धारित एजेंडा के अतिरिक्त, उप-समितियां एसएलबीसी द्वारा संदर्भित विशिष्ट मुद्दों पर विचार-विमर्श कर सकती हैं और अंतिम निर्णय के लिए सर्वोच्च मंच को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कर सकती हैं।
iii. उप-समिति की बैठकों के कार्यवृत्त रिकॉर्ड करने का फ़ॉर्मेट अनुबंध-10 में दिया गया है। उप-समितियों की बैठकों का कार्यवृत्त और कार्यवाही रिपोर्ट (एटीआर) एसएलबीसी/यूटीएलबीसी के समक्ष अभिलेख में दर्ज करने के लिए रखी जाएगी।
9.5 राज्य सरकार के साथ संपर्क
एसएलबीसी संयोजक बैंक राज्य के सभी बैंकों की गतिविधियों का समन्वय करेंगे और राज्य सरकार के अधिकारियों के साथ नियमित रूप से ऋण देने में आने वाली परिचालन समस्याओं पर चर्चा करेंगे, साथ ही बैंकिंग विकास के लिए आवश्यक सहायता प्रदान करेंगे और अधिक वित्तीय समावेशन के उद्देश्य को प्राप्त करने में सहयोग करेंगे। एसएलबीसी संयोजक बैंकों को संबंधित राज्य सरकारों/अन्य सरकारी विभागों के साथ सड़क/डिजिटल कनेक्टिविटी, अनुकूल कानून व्यवस्था, निर्बाध बिजली आपूर्ति, पर्याप्त सुरक्षा आदि जैसी बाधाओं को उठाना चाहिए, ताकि पर्याप्त बैंकिंग कवरेज सुनिश्चित किया जा सके और अधिक वित्तीय समावेशन प्राप्त किया जा सके।
9.6 एसएलबीसी कार्यालय - अवसंरचना एवं संसाधन
एसएलबीसी के सचिवालय/कार्यालय पर्याप्त रूप से सुसज्जित होना चाहिए ताकि एसएलबीसी संयोजक प्रभावी ढंग से कार्य कर सके। संयोजक बैंक एसएलबीसी से संबंधित कार्यों के लिए विशेष रूप से पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन उपलब्ध कराएगा।
10. ऋण योजना
10.1 ऋण योजनाओं की तैयारी
i. एलबीएस के तहत, ऋण नियोजन के लिए एक बॉटम-अप दृष्टिकोण की परिकल्पना की गई है। विभिन्न क्षेत्रों के लिए ब्लॉकवार/गतिविधिवार क्षमता का अनुमान लगाया जाएगा, ताकि तदनुसार ऋण योजनाएं तैयार की जा सकें।
ii. डीडीएम किसी जिले की क्षमता संबद्ध ऋण योजना (पीएलपी) तैयार करेगा, जिसमें दीर्घकालिक भौतिक क्षमता, अवसंरचना की उपलब्धता, विपणन सुविधाएं और सरकार की नीतियों/कार्यक्रमों आदि को ध्यान में रखते हुए बैंक ऋण के माध्यम से विकास की मौजूदा क्षमता का आकलन किया जाएगा। नाबार्ड यह सुनिश्चित करेगा कि पीएलपी व्यावहारिक और लागू करने योग्य हों ताकि बैंक शाखा ऋण योजना (बीसीपी) तैयार करते समय इनका लाभ उठा सकें। पीएलपी में टिकाऊ कृषि पद्धतियों, नवोन्मेषी कृषि प्रणालियों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और किसान बाजारों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाना चाहिए।
iii. एलडीएम द्वारा प्रत्येक वर्ष जून में एक पूर्व-पीएलपी बैठक आयोजित की जाएगी, जिसमें बैंक, सरकारी एजेंसियां और अन्य हितधारक भाग लेंगे और ऋण क्षमता (क्षेत्र/गतिविधि के अनुसार), पिछले एक वर्ष में जिले में हुए प्रमुख वित्तीय और सामाजिक-आर्थिक विकास और पीएलपी में शामिल की जाने वाली प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श करेंगे। अगले वर्ष के लिए पीएलपी तैयार करने हेतु डीडीएम को हितधारकों से आवश्यक जानकारी प्राप्त करने हेतु रूपरेखा प्रस्तुत करनी चाहिए। अगले वर्ष के लिए पीएलपी की तैयारी हर साल सितंबर तक पूरी कर लेनी है।
iv. आरआरबी, डीसीसीबी और एससीएआरडीएस के प्रधान कार्यालय, विदेशी बैंकों के डब्ल्यूओएस और बैंकों के नियंत्रण कार्यालय सहित एसएफबी, स्वीकृत ब्लॉक-वार/गतिविधि-वार क्षमता को अपनी सभी शाखाओं में परिचालित करेंगे ताकि उनके संबंधित शाखा प्रबंधक बीसीपी तैयार कर सकें। बैंकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी शाखाओं द्वारा शाखा/ब्लॉक योजनाओं को तैयार करने की प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाए।
v. प्रत्येक ब्लॉक के लिए एक बीएलबीसी बैठक बुलाई जाएगी जहां बीसीपी पर चर्चा की जाएगी और उन्हें ब्लॉक ऋण योजना बनाने के लिए एकत्रित किया जाएगा। एलडीएम और डीडीएम को योजना को अंतिम रूप देने में बीएलबीसी का मार्गदर्शन करना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि ब्लॉक ऋण योजना सरकारी प्रायोजित योजनाओं सहित गतिविधि-वार चिह्नित क्षमता के अनुरूप हो।
vi. जिले की सभी ब्लॉक ऋण योजनाओं को एलडीएम द्वारा समेकित करके जिला ऋण योजना (डीसीपी) का गठन किया जाएगा, जिसमें जिले की ऋण आवश्यकताओं का विश्लेषणात्मक मूल्यांकन शामिल होगा, जिसे जिले में कार्यरत सभी वित्तीय संस्थानों द्वारा अगले वित्तीय वर्ष में लागू किया जाएगा। ब्लॉक/जिला स्तर के लिए ऋण योजनाओं को अंतिम रूप देते समय, एलडीएम को पीएलपी के अतिरिक्त, पिछले वर्षों के लिए इन ऋण योजनाओं की उपलब्धियों के रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखना होगा। यदि योजना की पिछली वर्ष की उपलब्धियों से संबंधित संपूर्ण आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, तो पिछले वर्षों की इसी अवधि से संबंधित आंकड़ों पर विचार किया जा सकता है। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि ऋण योजनाएं महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ यथार्थवादी भी हों।
vii. बैंकों के आंचलिक /नियंत्रण कार्यालयों को वर्ष के लिए अपनी व्यावसायिक योजनाओं को अंतिम रूप देते समय, डीसीपी में किए गए अनुमानों को ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि ये आमतौर पर बैंकों के प्रदर्शन बजट को अंतिम रूप दिए जाने से काफी पहले संकलित किए जाते हैं।
viii. इसके बाद डीसीपी को अंतिम स्वीकृति/अनुमोदन के लिए एलडीएम द्वारा डीसीसी के समक्ष रखा जाएगा। सभी डीसीपी को अंततः राज्य स्तरीय वार्षिक ऋण योजना (एसीपी) में समेकित किया जाना चाहिए, जिसे एसएलबीसी संयोजक बैंक द्वारा तैयार किया जाएगा और प्रत्येक वर्ष 1 अप्रैल तक जारी किया जाएगा।
ix. प्रत्येक राज्य में बैंकों के नियंत्रण कार्यालयों को अपनी आंतरिक व्यावसायिक योजनाओं को एसीपी के साथ समन्वयित करना चाहिए।
10.2 ऋण योजनाओं के समक्ष प्रदर्शन की समीक्षा करना
i. ऋण योजनाओं के संबंध में प्रदर्शन की समीक्षा एलबीएस मंचों में निम्नानुसार की जाएगी:
| ब्लॉक स्तर पर |
खंड स्तरीय बैंकर समिति (बीएलबीसी) |
| जिला स्तर पर |
जिला परामर्शदात्री समिति (डीसीसी) और जिला स्तरीय समीक्षा समिति (डीएलआरसी) |
| राज्य स्तर पर |
राज्य स्तरीय बैंकर समिति (एसएलबीसी) |
ii. सभी सदस्य बैंकों को (क) एसीपी लक्ष्य (ख) एसीपी उपलब्धियां / संवितरण और (ग) एसीपी क्षेत्र / उप-क्षेत्रवार बकाया ऋण राशि पर डेटा एक ही प्रारूप, एलबीएस-एमआईएस (अनुबंध 7) में प्रस्तुत करना आवश्यक है। डेटा रिपोर्टिंग की प्रक्रिया और डेटा प्रवाह के प्रबंधन के लिए एसएलबीसी/यूटीएलबीसी संयोजक बैंकों, सदस्य बैंकों और एलडीएम द्वारा पालन की जाने वाली मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) अनुबंध-8 में दी गई है।
iii. रिपोर्ट किए गए आंकड़ों के आधार पर, बैंक समूहवार विवरण तिमाही आधार पर तैयार किए जाने चाहिए और समीक्षा के लिए सभी डीसीसी और एसएलबीसी बैठकों में रखे जाने चाहिए।
iv. एसएलबीसी, डीसीसी और बीएलबीसी में होने वाली चर्चाओं में एसीपी के तहत आवंटित लक्ष्यों के मुकाबले ऋण वितरण में बैंकों के प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
11. ऋण जमा अनुपात (सीडी अनुपात)
11.1 सीडी अनुपात की निगरानी
i. चूंकि सीडी अनुपात क्षेत्र में जुटाई गई जमा राशि के संबंध में वितरित ऋण का एक महत्वपूर्ण मापदण्ड है, इसलिए निम्नलिखित मापदंडों के आधार पर विभिन्न स्तरों पर इसकी निगरानी की जानी चाहिए:
| संस्था/स्तर |
सूचक |
| प्रधान कार्यालय के एकल बैंक |
Cu + RIDF |
| राज्य स्तर (एसएलबीसी) |
Cu + RIDF |
| जिला स्तर |
Cs# |
जहाँ:
Cu = उपयोग के स्थान के अनुसार ऋण
RIDF = ग्रामीण बुनियादी संरचना विकास निधि (आरआईडीएफ) के तहत राज्यों को प्रदान की गई कुल संसाधन सहायता
# यदि ऋण प्रस्ताव जिला स्तर पर प्राप्त होते हैं लेकिन बैंक के प्रधान कार्यालय/नियंत्रण कार्यालय/केंद्रीय प्रसंस्करण इकाइयों में संसाधित और स्वीकृत किए जाते हैं, और ऋण का उपयोग/वितरण जिलों में किया जाता है, तो इन्हें जिला स्तर पर स्वीकृत और उपयोग किए गए ऋण के रूप में माना जाएगा। इसलिए, सीडी अनुपात की गणना के लिए इन्हें जिला स्तर पर ध्यान में रखा जाए।
ii. सीडी अनुपात की गणना बकाया ऋण राशि के आधार पर की जाएगी।
11.2 बैंक स्तर पर निगरानी
अखिल भारतीय स्तर पर ग्रामीण और अर्ध-शहरी शाखाओं को मिलाकर देखें तो बैंकों को 60 प्रतिशत का सीईडी अनुपात प्राप्त करना आवश्यक है। हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि इस अनुपात को शाखावार, जिलावार या क्षेत्रवार अलग-अलग रूप से प्राप्त किया जाए, फिर भी बैंकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऋण वितरण में क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने के लिए विभिन्न राज्यों/क्षेत्रों के बीच अनुपातों में व्यापक असमानता से बचा जाए। कुछ जिलों में ऋण वितरण बहुत कम है, जिसके कारण आवश्यक बुनियादी ढांचे की कमी, विभिन्न क्षेत्रों की ऋण अवशोषित करने की अलग-अलग क्षमता आदि हैं। कुछ जिलों में ऋण वितरण बहुत कम है, जिसके कुछ कारण हैं आवश्यक बुनियादी ढांचे की कमी, विभिन्न क्षेत्रों की ऋण प्राप्त करने की अलग-अलग क्षमता आदि हैं। बैंक इन क्षेत्रों में अपनी शाखाओं के प्रदर्शन की समीक्षा कर सकते हैं और ऋण प्रवाह को बढ़ाने के लिए आवश्यक कदम उठा सकते हैं। जिले में ऋण प्रवाह को प्रभावित करने वाले कारकों पर डीसीसी फोरम में विस्तार से चर्चा की जा सकती है।
11.3 जिला और राज्य स्तर पर निगरानी
i. जिन जिलों में सीडी अनुपात 40 से 60 प्रतिशत के बीच है, उनकी निगरानी प्रदर्शन में सुधार के लिए डीसीसी द्वारा की जाएगी।
ii. जिन जिलों में पिछले वित्तीय वर्ष के लिए सीडी अनुपात 40 प्रतिशत से कम और एसीपी उपलब्धि 100% से कम है, वहां सीडी अनुपात की निगरानी के लिए डीसीसी की विशेष उप-समितियां (एसएससी), साथ ही एलडीएम संयोजक के रूप में, गठित की जाएंगी।
iii. एसएससी में उस क्षेत्र में कार्यरत बैंकों के डीसीओ, एलडीओ, डीडीएम, जिला योजना अधिकारी, या जिला प्रशासन की ओर से निर्णय लेने के लिए विधिवत रूप से अधिकृत डीसी/डीएम का प्रतिनिधि शामिल होगा।
iv. एसएससी, डीसीसी की मंजूरी से, सीडी अनुपात में सुधार के लिए एक निगरानी-योग्य कार्य योजना (एमएपी) तैयार करेगा। डीसीसी की बैठकों में एमएपी के कार्यान्वयन में हुई प्रगति की निगरानी की जाए।
v. जिन जिलों में सीडी अनुपात 20 प्रतिशत से कम होगा, उन्हें विशेष श्रेणी में रखा जाएगा। इन जिलों के लिए, एसएससी और एमएपी के गठन के अलावा, राज्य सरकार को बैंकों द्वारा ऋण देने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे और अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण के लिए लक्षित प्रयास करने होंगे, जबकि बैंक ऋण वितरण में सुधार के लिए जिम्मेदार होंगे।
vi. विशेष श्रेणी के जिलों में हुई प्रगति की निगरानी डीसीसी द्वारा की जाएगी और जिले में मौजूद बैंकों के कॉर्पोरेट कार्यालयों को इसकी रिपोर्ट दी जाएगी, ताकि बैंकों के प्रधान कार्यालय इन जिलों में सीईडी अनुपात में सुधार लाने पर विशेष ध्यान दे सकें।
vii. राज्य के सभी एसएससी से प्राप्त समेकित स्थिति रिपोर्ट को चर्चा/जानकारी के लिए एसएलबीसी की बैठकों में प्रस्तुत किया जाएगा।
12. उधार देने संबंधी अन्य दिशानिर्देश
सेवा क्षेत्र दृष्टिकोण (एसएए) को अप्रैल 1989 में उत्पादक उधार को बढ़ाकर और बैंक ऋण, उत्पादकता और बेहतर आय स्तरों के बीच प्रभावी संबंध स्थापित करके ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के नियोजित और व्यवस्थित विकास के लिए शुरू किया गया था।
i. सेवा क्षेत्र दृष्टिकोण (एसएए) के तहत, ग्रामीण या अर्ध-शहरी क्षेत्र में प्रत्येक बैंक शाखा को 15 से 25 गांवों के क्षेत्र में सेवा प्रदान करने के लिए नामित किया जाता है और शाखा अपने सेवा क्षेत्र की बैंक ऋण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जिम्मेदार होती है। सरकारी प्रायोजित योजनाओं के तहत ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों को पर्याप्त रूप से कवर करने के लिए, इन क्षेत्रों में बैंक शाखाएं ऐसी योजनाओं के तहत ऋण देने के लिए एसएए का पालन करेंगी। हालांकि बैंक शाखाओं के लिए अपने सेवा क्षेत्र में आने वाले पात्र ग्राहकों को सेवा प्रदान करना अनिवार्य है, वे अपने सेवा क्षेत्र के बाहर भी ऐसी योजनाओं के तहत ऋण देने के लिए स्वतंत्र हैं।
ii. बैंकों को सभी प्रकार के ऋणों के लिए व्यक्तिगत उधारकर्ताओं (स्वयं सहायता समूहों और संयुक्त देयता समूहों सहित) से ‘अदेयता प्रमाणपत्र' प्राप्त करने की प्रथा को समाप्त करना होगा, जिसमें सरकारी प्रायोजित योजनाओं के तहत दिए गए ऋण भी शामिल हैं, चाहे राशि कितनी भी हो, जब तक कि योजना में स्वयं ‘अदेयता प्रमाणपत्र’ प्राप्त करने का प्रावधान न हो।
iii. ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ऋण तक आसान पहुंच के लिए, बैंक समुचित सावधानी के एक वैकल्पिक फ्रेमवर्क का उपयोग कर सकते हैं, जिसमें अन्य बातों के अलावा, निम्नलिखित में से एक या अधिक शामिल हो सकते हैं:
a) साख सूचना कंपनियों (सीआईसी) के माध्यम से ऋण इतिहास की जांच।
b) उधारकर्ता द्वारा स्व-घोषणा या शपथ पत्र
c) सीईआरएसएआई पंजीकरण
d) सहकर्मी निगरानी
e) ऋणदाताओं के बीच सूचना साझाकरण
f) सूचना की खोज (स्वचालित समय सीमा के साथ अन्य उधारदाताओं को लिखने सहित)
13. बैंकिंग की पहुँच
i. एसएलबीसी संयोजक बैंकों को राज्य1 में सभी बैंक रहित ग्रामीण केंद्रों (यूआरसी) की पहचान करने और ऐसे सभी केंद्रों की अद्यतन सूची बनाए रखने की आवश्यकता है। बैंकों को उस स्थान/केंद्र को चुनने/इंगित करने में सुविधा प्रदान करने के लिए, जहां वे एक 'बैंकिंग आउटलेट' खोलना चाहते हैं, अद्यतन सूची प्रत्येक एसएलबीसी की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जानी चाहिए।
ii. टियर 5 और 6 केंद्रों2 में यूआरसी में कुल बैंकिंग आउटलेट्स के कम से कम 25 प्रतिशत खोलने के मानदंड का अनुपालन करने के लिए, बैंकों को 5000 से अधिक आबादी वाले उन गांवों को प्राथमिकता देनी चाहिए जहां कोई बैंकिंग आउटलेट नहीं है (अर्थात, टियर 5 केंद्र) और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ऐसे सभी गांवों को प्राथमिकता के आधार पर सीबीएस-सक्षम बैंकिंग आउटलेट से कवर किया जाए।
iii. टियर-6 केंद्रों के संबंध में, एसएलबीसी / यूटीएलबीसी संयोजक बैंक इन यूआरसी के कवरेज की निगरानी करेंगे और प्रमुख बैंकों को डीसीसी बैठकों में ऐसे केंद्रों के कवरेज में हुई प्रगति की समीक्षा करने हेतु सूचित करेंगे। संयोजक बैंकों को सदस्य बैंकों को यह भी सूचित करना चाहिए कि वे आरबीआई के सीआईएसबीआई पोर्टल पर जानकारी को तब अपडेट करें जब भी यूआरसी में बैंकिंग आउटलेट खोले जाएं।
iv. यूआरसी में बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने में हुई प्रगति पर चर्चा के दौरान सभी एसएलबीसी बैठकों में यूआरसी की अद्यतन सूची प्रस्तुत की जानी चाहिए।
v. एसएलबीसी/यूटीएलबीसी राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन कार्यनीति (एनएसएफआई): 2025-303 के तहत निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कार्यनीति की अवधि के दौरान उपयुक्त मध्यावधि लक्ष्यों के साथ एक कार्य योजना तैयार करेंगे और निरंतर आधार पर प्रगति की निगरानी करेंगे।
14. डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार और गहनता (ईडीडीपीई)
इस कार्यक्रम का उद्देश्य चिह्नित जिलों में प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षित, त्वरित, किफायती और सुविधाजनक तरीके से डिजिटल रूप से भुगतान करने/प्राप्त करने में सक्षम बनाना है। एसएलबीसी/यूटीएलबीसी इस कार्यक्रम के अंतर्गत राज्य के सभी जिलों को पूरी तरह से कवर करेंगे, यह तय करेंगे कि यह कार्य किस समय सीमा के भीतर पूरा किया जाएगा और प्रगति की बारीकी से निगरानी करके यह सुनिश्चित करेंगे कि योजना के अनुसार लक्ष्य प्राप्त किए जाएं।
15. क्षमता निर्माण और जागरूकता कार्यक्रम
i. आरबीआई के क्षेत्रीय कार्यालय, एसएलबीसी संयोजक बैंक के समन्वय से, जिला परिषदों के डीसी/डीएम और सीईओ को बैंकिंग मामलों और एलबीएस के विशिष्ट कार्यक्षेत्र और भूमिका के बारे में जागरूक करने का प्रयास करेंगे। एलबीएस के कार्यान्वयन से जुड़े सरकारी विभागों के परिचालन स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों, जैसे कि बीडीओ आदि को भी राज्य प्रशासनिक अकादमियों या इसी तरह के संस्थानों के माध्यम से इस तरह का अनुभव प्रदान किया जा सकता है।
ii. बैंक अधिकारियों को संबंधित अग्रणी बैंकों द्वारा आयोजित समान प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अवगत कराया जाना चाहिए।
iii. आरबीआई के क्षेत्रीय कार्यालय एलडीओ, एलडीएम और डीडीएम के लिए वार्षिक आधार पर क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करेंगे।
16. एसएलबीसी वेबसाइट पर सूचना का मानकीकरण
एसएलबीसी संयोजक बैंकों को एसएलबीसी वेबसाइट को बनाए रखना आवश्यक है, जहां एलबीएस और सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं से संबंधित सभी अनुदेश, राज्य/केंद्र शासित प्रदेश की प्रोफाइल, राज्यवार डेटा/बैंकवार प्रदर्शन, बैठकों के संचालन आदि की जानकारी जनता के लिए उपलब्ध कराई जाती है। इस प्रकार की सूचनाओं/आंकड़ों की सांकेतिक सूची अनुबंध 9 में दी गई है। एसएलबीसी राज्य के लिए प्रासंगिक समझी जाने वाली कोई भी अतिरिक्त जानकारी प्रकाशित कर सकते हैं। एसएलबीसी वेबसाइट को नियमित रूप से, कम से कम तिमाही आधार पर अपडेट किया जाना चाहिए।
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