आरबीआई/एफआईडीडी/2026-27/404
एफआईडीडी.केंका.एफएसडी.बीसी.सं. 06/05.05.010/2026-27
19 जून 2026
भारतीय रिज़र्व बैंक [क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक – किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना] निदेश, 2026
बैंककारी विनियमन अधिनियम 1949 की धारा 21 और धारा 35ए के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों, और इस संबंध में उसे सक्षम बनाने वाली सभी शक्तियों का प्रयोग करते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक ने इस बात से संतुष्ट होकर, कि ऐसा करना सार्वजनिक हित और बैंकिंग नीति के हित में आवश्यक और उचित है, एतद्द्वारा निम्नलिखित निदेश जारी किए हैं।
अध्याय-।: प्रस्तावना
क. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
1. इन निदेशों को भारतीय रिज़र्व बैंक [क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक – किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना] निदेश, 2026 कहा जाएगा।
2. यह निदेश 1 जनवरी, 2027 से किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना के अंतर्गत स्वीकृत ऋणों पर लागू होंगे। उक्त तिथि से पूर्व स्वीकृत ऋण अपनी परिपक्वता / अगली नवीनीकरण तक वर्तमान प्रचलित दिशानिर्देशों के अधीन संचालित होते रहेंगे।
ख. उद्देश्य
3. यह निदेश केसीसी योजना के अंतर्गत बैंकिंग प्रणाली द्वारा पर्याप्त मात्रा में एवं ठीक समय में ऋण सहायता उपलब्ध कराए जाने की दृष्टि से जारी किए गए हैं ताकि कृषि और संबद्ध कार्यकलापों में संलग्न उधारकर्ताओं की कार्यशील पूंजी एवं निवेश क्रेडिट की आवश्यकताओं की पूर्ति, ऐसी सम्मिश्र सुविधा, जिसकी प्रक्रिया सरल और मानक हो, के माध्यम से की जा सके।
ग. प्रयोज्यता
4. यह निदेश बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 की धारा 5 के क्लॉज़ (जे ए) के तहत परिभाषित क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (जिन्हें सामूहिक रूप से और व्यक्तिगत रूप से ‘बैंक’ कहा गया है) पर लागू होंगे।
घ. परिभाषाएं / स्पष्टीकरण
5. इन निदेशों के प्रयोजन के लिए जब तक संदर्भ या विषय से अन्यथा अपेक्षित न हो, इसमें प्रयुक्त शब्दों का अर्थ निम्नानुसार होगा:
(1) ‘फसल ऋतु’ का तात्पर्य है उगाई गई फसलों की कटाई और विपणन तक की अवधि।
(2) ‘अल्पावधिक फसल’ से अभिप्रेत ऐसी फसलों से है जिनकी बुवाई से लेकर विपणन तक प्रत्याशित अवधि बारह माह तक की होती है।
(3) ‘दीर्घावधिक फसल’ का तात्पर्य ऐसी फसलों से है जो अल्पावधिक फसल नहीं है। दीर्घावधिक फसलों की फसल ऋतु यानी बुवाई से लेकर विपणन तक प्रत्याशित अवधि बारह माह से अधिक और अठारह माह तक की होती है।
(4) केसीसी योजना के प्रयोजन के लिए अल्पावधिक फसलों के लिए बारह माह और दीर्घावधिक फसलों के लिए अठारह माह की अवधि मानकीकृत की जाएगी।
(5) ‘सीमांत कृषक’ से अभिप्रेत एक हेक्टेयर तक की भूधारिता वाले कृषक हैं।
(6) ‘लघु कृषक’ का तात्पर्य एक हेक्टेयर से अधिक और दो हेक्टेयर तक की भूधारिता वाले कृषकों से है।
6. यदि इन निदेशों में प्रयुक्त शब्दों और अभिव्यक्तियों की परिभाषा यहां नहीं दी गई है और उनकी परिभाषा भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934, या बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949, में दी गई है तो उनका तात्पर्य वही होगा जो उक्त अधिनियमों में निर्धारित किया गया है।
अध्याय-II: ऋण- प्रयोजन, अवधि और सीमा
ङ. प्रयोजन और अवधि
7. केसीसी योजना के अंतर्गत बैंक पात्र उधारकर्ताओं को उनकी खेती और नीचे दर्शायी गयी अन्य आवश्यकताओं के लिए छह वर्ष की अवधि का ऋण एक सम्मिश्र सुविधा के रूप में प्रदान करेंगे:
(1) फसलों की खेती के लिए अल्पावधिक ऋण आवश्यकताएं;
(2) संबद्ध कार्यकलापों के लिए अल्पावधिक ऋण आवश्यकताएं, जिसकी सांकेतिक सूची नीचे सारणी में दी गई है:
| क्र.सं. |
संबद्ध कार्यकलाप |
प्रयोजन |
| (i) |
पशुपालन |
दुधारु पशुओं/ कुक्कुटादि पक्षियों/ छोटे रोमंथकों का पालन; उदाहरण के लिए, मवेशी, भैंस, ऊंट, याक, मिथुन, बकरी, भेड़, सूअर, खरगोश, आदि। |
| (ii) |
मछली पालन और जलकृषि |
मछली/ झींगा/ अन्य जलीय जंतुओं का पालन और पकड़ना; उदाहरण के लिए, मछली संवर्धन, सम्मिश्र/ एकीकृत मछली संवर्धन, बहु-संवर्धन (पॉलीकल्चर), रेसवे मछली संवर्धन, समुद्री पिंजड़ा पालन, जलाशय में पिंजड़ा/ पेनबद्ध पालन, आद्र भूमि मछली पालन, सजावटी मछली पालन, मछली एंग्लिंग, मछली बीज (सीड) पालन, लवण जल जलकृषि (झींगी/ मछली), झींगी पालन, झींगा पालन, मोती पालन, केकड़ा पालन, समुद्री शैवाल पालन, एक्वापोनिक्स, बॉयोफ्लॉक मछली पालन, बाईवाल्व पालन और खारा जलकृषि, आदि, और अंतर्देशीय/ समुद्री मछली पालन और जलकृषि से संबंधित अन्य कार्यकलापों से जुड़े अन्य उत्पादन। |
| (iii) |
अन्य संबद्ध कार्यकलाप |
रेशम उत्पादन, लाख पालन, मधुमक्खी पालन और इसी प्रकार के अन्य संबद्ध कार्यकलाप। |
(3) फसलोत्तर/ उत्पादनोत्तर व्यय;
(4) कृषकों की घरेलू खपत संबंधी आवश्यकताएँ;
(5) कृषि और संबद्ध कार्यकलापों से संबंधित परिसंपत्तियों के रखरखाव संबंधी व्यय, मृदा परीक्षण, मौसम का तात्कालिक पूर्वानुमान/ अन्य प्रौद्योगिकीय समर्थन सेवाएं और जैविक/ अच्छी कृषि प्रथाओं या अन्य सदृश प्रमाणन;
(6) फसल बीमा, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य बीमा और परिसंपत्ति बीमा;
(7) उत्पाद विपणन संबंधी ऋण; और
(8) कृषि और संबद्ध सेवाओं से संबंधित निवेश आवश्यकताएँ।
8. उपर्युक्त (1) से (7) तक के मदों में उल्लिखित सभी घटक सम्मिश्रित सुविधा की अल्पावधिक ऋण सीमा का भाग होंगे तथा सं. (8) में उल्लिखित मद इस सुविधा की दीर्घावधिक ऋण सीमा का भाग होगा।
9. छठे वर्ष के लिए निर्धारित अल्पावधिक ऋण सीमा और अनुमानित दीर्घकालिक ऋण सीमा दोनों मिलकर सम्मिश्रित अधिकतम अनुमेय सीमा (सीएमपीएल) होंगी और इसे केसीसी सीमा के रूप में हिसाब में लिया जाना है।
नोट: कृपया अनुबंध-I में दिए गए उदाहरण 1 और 2 का (घ) देखें।
10. केसीसी सीमा का अल्पावधिक घटक फसल की खेती और संबद्ध कार्यकलापों के प्रयोजन से आवर्ती नकदी ऋण सुविधा स्वरूप का होगा। इसमें डेबिट और क्रेडिट की संख्या के संबंध में कोई पाबंदी नहीं है।
च. फसलों की खेती के लिए कार्यशील पूंजी
11. पात्रता
निम्नलिखित फसल उत्पादन हेतु कार्यशील पूंजी ऋण प्राप्त करने के पात्र होंगे:
(1) कृषक (व्यक्ति/ संयुक्त उधारकर्ता), जो खेतिहर मालिक हैं;
(2) काश्तकार, अलिखित पट्टेदार, और बंटाईदार; तथा
(3) कृषकों/ खेतिहरों, जिनके अंतर्गत काश्तकार, अलिखित पट्टेदार, और बंटाईदार भी शामिल हैं, के स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) और संयुक्त देयता समूह (जेएलजी)।
12. आहरण सीमा का नियतन
(1) प्रत्येक फसल ऋतु से संबंधित आहरण सीमा निम्नलिखित का कुल योग होगी:
(i) मौजूदा फसल ऋतु की संबंधित फसल/ फसलों के वित्त मान (एसओएफ) [जैसा कि राज्य स्तरीय तकनीकी समिति (एसएलटीसी)/ ज़िला स्तरीय तकनीकी समिति (डीएलटीसी) द्वारा अधिसूचित किया जाता है] गुणित फसल क्षेत्र की मात्रा।
(ii) फसलोत्तर व्ययों और घरेलू खपत की आवश्यकताएँ की बाबत उपर्युक्त (i) का 10 प्रतिशत हिस्सा।
(iii) खेती परिसंपत्तियों की मरम्मत व रखरखाव, मृदा परीक्षण, मौसम संबंधी परामर्शिका और कृषि-विस्तार सेवा के अभिदान, सॉफ्टवेयर और डिजिटल परामर्श प्लेटफॉर्म संबंधी शुल्क, ड्रोन-आधारित फसल स्वास्थ्य सर्वेक्षण और फुहार सेवाओं, सुदूर संवेदन और उप-ग्रह आधारित फसल निगरानी सेवाओं, अन्य प्रौद्योगिकीय समर्थन सेवाओं, जैविक/ अच्छी कृषि प्रथा संबंधी प्रमाणन तथा इसी प्रकार की अन्य सेवाओं, जिनकी प्रकृति कार्यशील पूंजीगत व्यय की हो, की बाबत उक्त (i) का 20 प्रतिशत हिस्सा।
(iv) फसल बीमा, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य बीमा और परिसंपत्ती बीमा, यदि कोई हो, से संबंधित प्रीमियम।
(2) यदि कृषक बाद की किसी ऋतु के लिए फसल पद्धति को बदलता है तो आहरण सीमा की गणना उगाई जाने वाली प्रस्तावित फसलों को ध्यान में रखते हुए पुनर्निर्धारित की जाएगी।
(3) यदि कृषक द्वारा ऋण लेते समय, एसएलटीसी द्वारा किसी विशिष्ट फसल ऋतु के संबंध में वित्त मान अधिसूचित नहीं किया गया है तो बैंक पिछले मौसम के लिए लागू वित्त मान पर 10 प्रतिशत की आनुमानिक बढ़ोतरी लागू करते हुए बाद वाले ऋतु के लिए आहरण-योग्य सीमा निर्धारित करने पर विचार कर सकते हैं। तथापि, जिन मामलों में वित्त मान अधिसूचित है किंतु संशोधित नहीं हुआ है, तो वर्तमान वित्त मान ही लागू होगा।
(4) जिन फसलों को एसएलटीसी/ डीएलटीसी द्वारा निर्धारित किए गए वित्त मान के अंतर्गत शामिल नहीं किया गया है तो उनके संबंध में दिए गए ऋणों को केसीसी के बाहर रखा जाएगा। तथापि, ऐसी फसलों को एसएलटीसी/ डीएलटीसी द्वारा अधिसूचित वित्त मान के अंतर्गत शामिल किए जाने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए।
(5) केसीसी ऋण सीमा को निकटतम ₹1,000 में पूर्णांकित किया जाएगा।
(6) द्वितीय फसल ऋतु से, ऋण मंज़ूरी के समय, अल्पावधिक फसल ऋण के लिए अधिकतम अनुमेय सीमा (एमपीएल) की गणना पिछले फसल ऋतु की सीमा पर 10 प्रतिशत जोड़ते हुए की जाएगी, यदि किसी फसल ऋतु / वर्ष के दौरान एमपीएल की राशि आहरण सीमा से अधिक हो गई तो समीक्षा के दौरान एमपीएल का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा।
नोट: कृपया अनुबंध-I में दिए गए उदाहरण 1 और 2 में क (I), (II), (III) और (IV) देखें।
(7) सीमांत कृषक, भूमि के मूल्य से संबद्ध किए बिना, बैंक के आकलन के अनुसार ₹10,000 से ₹50,000 (फ्लेक्सी केसीसी) तक की ऋण सीमा के पात्र होंगे। ऋण सीमा का निर्धारण उगाई जाने वाली फसलों, गोदाम भंडारण संबंधी ऋण आवश्यकताओं, अन्य कृषि व्ययों, उपभोग आवश्यकताओं तथा कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों हेतु निवेश आवश्यकताओं के आधार पर किया जाएगा। इस आधार पर समेकित केसीसी सीमा छह वर्षों की अवधि के लिए निर्धारित की जाएगी। जहाँ फसल पद्धति और/ या वित्त मान में परिवर्तन के कारण अधिक ऋण सीमा की आवश्यकता हो, वहाँ उपबंध 12(1) से 12(6) के अनुसार ऋण सीमा निर्धारित की जा सकती है।
13. चुकौती अवधि
बैंक, चुकौती की अवधि, प्रयोज्य फसल ऋतु के अनुसार तय कर सकते हैं।
छ. संबद्ध कार्यकलापों की कार्यशील पूंजी
14. पात्रता
निम्नलिखित उधारकर्ता संबद्ध कार्यकलापों की कार्यशील पूंजी संबंधी अपेक्षाओं के लिए ऋण प्राप्त करने के पात्र होंगे:
(1) व्यक्ति / संयुक्त उधारकर्ताओं के रूप में पैरा 7(2) के अनुसार पशुपालनकर्ता कृषक, मछुआरे, मछली पालन और संबद्ध कार्यकलापों में संलग्न कृषक (जिनमें काश्तकार और बंटाईदार भी शामिल हैं)।
(2) उपर्युक्त के अनुसार व्यक्तियों के स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) / संयुक्त देयता समूह (जेएलजी)।
15. आहरण सीमा तय करना
(1) बैंक, संबंधित कार्यकलापों के लिए एसएलटीसी / डीएलटीसी द्वारा अधिसूचित वित्त मान तथा इकाइयों (एकड़/इकाई/पशु/पक्षी आदि) की संख्या के आधार पर, पैरा 12 में फसल उत्पादन हेतु कार्यशील पूंजी ऋण के लिए निर्धारित पद्धति के अनुरूप, संबद्ध कार्यकलापों के लिए आहरण सीमा निर्धारित करेंगे।
(2) जिन संबद्ध कार्यकलापों को राज्य की संबंधित एसएलटीसी/ डीएलटीसी द्वारा निर्धारित वित्त मान के अंतर्गत शामिल नहीं किया गया है उन्हें केसीसी ढांचे से बाहर रखा जाए। तथापि, ऐसे संबद्ध कार्यकलापों के वित्त मान को एसएलटीसी / डीएलटीसी द्वारा अधिसूचित संबद्ध किए जाने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।
(3) जिन मामलों में उधारकर्ता ने केसीसी ढांचे के तहत फसल की खेती और संबद्ध कार्यकलापों, दोनों के लिए ऋण लिया है, तो खपत संबंधी आवश्यकताए (10 प्रतिशत) से संबंधित अतिरिक्त घटक को केवल एक बार जोड़ा जाएगा; प्रत्येक गतिविधि के लिए पृथक रूप से नहीं।
नोट: कृपया अनुबंध-I में दिए गए उदाहरण 1 और 2 की मद ख (I), (II), (III) और (IV) देखें।
(4) संबद्ध कार्यकलापों के लिए कार्यशील पूंजी सीमा की आहरण शक्ति का निर्धारण, स्वीकृति की शर्तों के अनुसार एसओएफ/ स्टॉकों के नवीनतम मूल्यांकन/ प्राप्य-राशियों/ नकदी प्रवाह के आधार पर किया जाएगा।
16. चुकौती अवधि
बैंक, चुकौती अवधि का निर्धारण उधारकर्ता द्वारा किए जाने वाले कार्यकलाप से संबंधित नकदी प्रवाह / आय सृजन की प्रवृत्ति के अनुसार करेगा।
ज. कृषि और संबद्ध कार्यकलापों के लिए निवेशगत ऋण
17. पात्रता
उपर्युक्त पैरा 11 और 14 में वर्णित लाभार्थी कृषि और संबद्ध कार्यकलापों से संबंधित प्रयोजनों के लिए निवेशगत ऋण प्राप्त करने के लिए पात्र होंगे, उदाहरण के तौर पर:
(1) भूमि विकास
(2) लघु सिंचाई
(3) खेती/ मछली पालन, आदि के उपस्कर की खरीद
(4) पशु/ पक्षी शेड का निर्माण
(5) पशुधन की खरीद
(6) संबद्ध कार्यकलापों से संबंधित उपकरण की खरीद, और
(7) इसी प्रकार के अन्य प्रयोजन
18. सीमा तय किया जाना
(1) सावधिक ऋण सीमा का निर्धारण केसीसी सुविधा की अवधि के दौरान प्रस्तावित निवेश (निवेशों) तथा उधारकर्ता की चुकौती क्षमता के संबंध में बैंक द्वारा किए गए आकलन के आधार पर किया जाएगा।
नोट: कृपया अनुबंध-I में दिए गए उदाहरण 1 और 2 की मद ग (I), (II) और (III) देखें।
(2) किस्तों के आहरण की अनुमति निवेश की प्रकृति के आधार पर दी जाएगी।
19. चुकौती अवधि
सावधि ऋण घटक का पुनर्भुगतान, गतिविधि अथवा निवेश के प्रकार तथा निवेश ऋण के लिए बैंक की लागू ऋण नीति के अनुसार, छह वर्ष की अवधि के भीतर किया जाएगा। यदि निवेश की प्रकृति छह वर्ष से अधिक अवधि की है तो उस सावधि ऋण को केसीसी ढांचे से बाहर वाली अलग सुविधा के रूप में माना जाएगा।
अध्याय-III: सामान्य अनुदेश
झ. ब्याज दर
20. ब्याज दर भारतीय रिज़र्व बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक – अग्रिमों पर ब्याज दर) निदेश, 2025, दिनांक 28 नवंबर 2025, समय-समय पर यथासंशोधित, में विनिर्दिष्ट अनुसार और कृषि अग्रिमों पर प्रभारित किए जाने वाले ब्याज के संबंध में जारी किए जाने वाले अन्य संगत दिशानिर्देशों के अनुसार होगी।
21. बैंक, भारतीय रिज़र्व बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक – जमाराशियों पर ब्याज दर) निदेश, 2025 (17 जून 2026 की स्थिति के अनुसार अद्यतन), समय-समय पर यथा-संशोधित, में विनिर्दिष्ट अनुसार केसीसी नकदी ऋण खातों में न्यूनतम ऋण शेष राशि पर ब्याज का भुगतान करेंगे।
ञ. संपार्श्विक प्रतिभूति और मार्जिन
22. बैंक, प्रत्येक उधारकर्ता के लिए ₹2 लाख तक के कृषि ऋणों, जिनके अंतर्गत संबद्ध कार्यकलापों के ऋण भी शामिल हैं, के लिए संपार्श्विक प्रतिभूति और मार्जिन संबंधी अपेक्षाओं में छूट प्रदान करेंगे। तथापि, जहां तक संपार्श्विक प्रतिभूति-मुक्त सीमा तक के कृषि ऋणों के लिए संपार्श्विक प्रतिभूति के रूप में सोने और चांदी की स्वैच्छिक गिरवी का मामला है उसे कृषि ऋण को दिए जाने वाले संपार्श्विक प्रतिभूति-मुक्त ऋण संबंधी दिशानिर्देशों का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। ऐसे मामलों में बैंक उधारकर्ता से स्पष्ट घोषणा लेकर अपने पास रखेंगे। जहां तक संपार्श्विक प्रतिभूति-सीमा संबंधी आरबीआई के दिशानिर्देशों का प्रश्न है ये केवल द्वितीयक संपार्श्विक प्रतिभूति पर लागू होंगे और ये प्राथमिक प्रतिभूति पर या ऋण द्वारा वित्तपोषित प्रसंपत्तियों पर लागू नहीं होंगे।
23. बैंक, ₹2 लाख से अधिक के ऋणों के लिए संपार्श्विक प्रतिभूति और मार्जिन संबंधी अपेक्षाओं पर निर्णय अपनी ऋण नीति के अनुसार और आरबीआई द्वारा इस संबंध में समय-समय पर जारी किए जाने वाले दिशानिर्देशों का पालन करते हुए करेंगे।
24. फसलों/स्टॉक के हाइपोथिकेशन के विरुद्ध तथा वसूली हेतु टाई-अप व्यवस्था वाले केसीसी ऋणों में बैंक ₹3 लाख तक के ऋणों हेतु संपार्श्विक प्रतिभूति की आवश्यकता से छूट प्रदान कर सकते हैं।
ट. सीमाओं का विभाजन
25. इस बात को ध्यान में रखते हुए कि केसीसी के अंतर्गत अलग-अलग प्रकार के ऋणों की ब्याज दरें और चुकौती अवधि अलग-अलग होती हैं, अत: फसल की खेती और संबद्ध कार्यकलापों के मामले में अल्पावधिक नकदी ऋण सीमा-सह-बचत खाते के लिए अलग उप-सीमा तथा कृषि एवं संबद्ध कार्यकलापों के लिए दीर्घावधिक ऋण के रूप में इस सुविधा को विभाजित किया जाए। परिचालनगत सुविधा के लिए इन उप सीमाओं का रखरखाव सम्मिश्र केसीसी सुविधा के अंतर्गत अलग-अलग ऋण खातों के रूप में किया जाएगा।
ठ. अंतिम उपयोग की निगरानी
26. बैंक, मंज़ूरी की शर्तों के अनुसार क्षेत्रगत निरीक्षण करते हुए और/ या अपनी ऋण नीति के अनुसार अन्य तरीकों से उधारकर्ता द्वारा किए जाने वाले इस ऋण सुविधा के अंतिम उपयोग की सतत निगरानी सुनिश्चित करेंगे।
ड. समीक्षा और नवीकरण
27. बैंक, अपनी ऋण नीति के अनुसार फसल की खेती और संबद्ध कार्यकलापों से संबंधित अल्पावधिक सीमाओं की समीक्षा और नवीकरण करेंगे।
ढ. अन्य अनुदेश
28. बैंक, नए सिरे से दिए जाने वाले ऋण के आवेदन के संबंध में, अपनी ऋण नीति के अनुसार भूमि अभिलेख/ काश्तकारी प्रमाणपत्र/ समकक्ष प्रमाणपत्र को शामिल करते हुए एक-बार में दस्तावेज प्राप्त करेंगे। इस सुविधा की वैधता अवधि के दौरान प्रत्येक-बार समीक्षा करते समय, बैंक, प्रस्तावित कार्यकलाप/ कार्यकलापों के संबंध में उधारकर्ता (उधारकर्ताओं) से घोषणा-पत्र प्राप्त करेंगे।
29. बंटाईदार और मौखिक पट्टेदारों को दिए जाने वाले ऋणों के मामले में, बैंक, ऐसे उधारकर्ताओं द्वारा की जाने वाली फसलों की खेती के संबंध में स्थानीय प्रशासन/ पंचायती राज संस्थाओं द्वारा दिए जाने वाले प्रमाणपत्रों को स्वीकार करेंगे। जहां बंटाईदारों और मौखिक पट्टेदारों की पहचान और व्यावसायिक स्थिति के संबंध में प्रमाणन प्राप्त करने में कठिनाई हो तो, बैंक, ₹50,000 तक के ऋणों के मामले में ऐसे उधारकर्ताओं द्वारा अपने व्यवसाय की स्थिति (अर्थात जोत भूमि/ उगाई जाने वाली फसलों का ब्योरा) में प्रस्तुत किए गए शपथ पत्र को स्वीकार करेंगे।
30. प्रसंस्करण शुल्क, निरीक्षण प्रभार और अन्य प्रभारो, तत्संबंधी बैंक की नीति और लागू विनियामकीय दिशानिर्देशों, यदि कोई हों, के अनुसार तय किए जाएंगे।
31. केसीसी धारक को किसी प्रकार का फसल बीमा, परिसंपत्ति बीमा, दुर्घटना बीमा (जिसके अंतर्गत निजी दुर्घटना बीमा योजना शामिल है) या स्वास्थ्य बीमा प्राप्त करने का विकल्प उपलब्ध होगा और वह प्रीमियम का भुगतान केसीसी खाते के माध्यम से कर सकता है। लाभार्थियों को बीमा कवर की जानकारी प्रदान की जाएगी। आवेदन के स्तर पर ही उनसे केसीसी खाते के जरिए प्रीमियम का भुगतान करने हेतु स्पष्ट सहमति ली जानी चाहिए।
32. यदि बीमा (फसल बीमा, परिसंपत्ति बीमा और निजी दुर्घटना बीमा) का निधीयन केसीसी सुविधा के अंतर्गत किया जाता है तो ऋणदाता बैंक को तत्संबंधी आबंटन प्रदान किया जाएगा।
33. कृषक अपनी सुविधा के अनुसार, निम्नलिखित माध्यमों से ऋण सीमा का आहरण कर सकते हैं:
(1) बैंकिंग आउटलेट/ अंशकालिक बैंकिंग आउटलेट (जैसा कि भारतीय रिज़र्व बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक – शाखा प्राधिकरण) निदेश, 2025 दिनांक 28 नवंबर 2025 के में यथा-परिभाषित) और कारोबार प्रतिनिधि के माध्यम से परिचालन।
(2) अंतर-परिचालन व्यवस्था के अंतर्गत एटीएम/ माइक्रो-एटीएम/ पीओएस टर्मिनल, आदि के माध्यम से परिचालन।
(3) कृषि निविष्टियों से संबंधित डीलरों और मंडियों में मोबाइल आधारित लेनदेन।
(4) किसी अन्य अनुमत डिजिटल चैनल के माध्यम से परिचालन।
34. बैंक, खाताधारक से स्पष्ट सहमति प्राप्त करने के बाद, यूनिफ़ाइड पेमेंट इंटरफेस (कार्यशील पूंजी के ऋण के लिए), डेबिट कार्ड (भारतीय रिज़र्व बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक – क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड: निर्गम और संचालन) निदेश, 2025 के दिनांक 28 नवंबर 2025 में यथा-विनिर्दिष्ट), मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग, राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक निधि अंतरण (एनईएफटी), तत्काल सकल निपटान (आरटीजीएस), केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) या अन्य किसी विनियमित डिजिटल चैनल के माध्यम से केसीसी खातों में परिचालन को सक्षम करेंगे।
35. यदि कृषक, उपज के संबंध में माल-गोदाम की रसीद पर ऋण के लिए आवेदन करता है तो, बैंक, स्थापित प्रक्रिया व दिशानिर्देशों के अनुसार उस अनुरोध पर विचार करेंगे। ऐसे मामले में कृषक को दिए जाने वाले ऋण को अल्पावधिक केसीसी ऋण, यदि कोई हो तो, के साथ सहबद्ध कर दिया जाएगा, और ऐसे ऋण में बकाया राशि का समायोजन, माल-गोदाम की रसीद के जरिए प्रतिभूत ऋण के संवितरण के समय कर लिया जाएगा।
36. बैंक, केसीसी ऋणों पर ब्याज सब्वेन्शन और त्वरित चुकौती संबंधी प्रोत्साहन से संबंधित, समय-समय पर लागू, निदेशों का पालन करेंगे।
37. केसीसी योजना के अंतर्गत मंज़ूर किए गए ऋणों पर भारतीय रिज़र्व बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक – आस्ति वर्गीकरण, प्रावधानीकरण और आय निर्धारण) निदेश, 2025, दिनांक 28 नवंबर 2025, समय-समय पर यथा-संशोधित में यथा-उल्लिखित आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण और प्रावधानीकरण संबंधी विवेकपूर्ण मानदंड लागू होंगे।
अध्याय-IV: प्रकटीकरण, छूट और अन्य प्रावधान
ण. आंकड़ों की रिपोर्टिंग
38. बैंकों को निर्धारित रिपोर्टिंग प्रारूप के अनुसार नाबार्ड को केसीसी ऋणों पर डेटा जमा करना होगा।
त. छूट
39. रिज़र्व बैंक किसी कठिनाई को दूर करने बाबत या अन्य किसी औचित्यपूर्ण और पर्याप्त कारणवश किसी संस्था को इन निदेशों के सभी प्रावधानों या किसी प्रावधान से सामान्य रूप से या किसी निश्चित के लिए छूट दे सकता है जो कि रिज़र्व बैंक द्वारा निर्धारित की जाने वाली तत्संबंधी शर्तों के अधीन है।
थ. अन्य विधियों का लागू किया जाना वर्जित नहीं
40. इन निदेशों के प्रावधान वर्तमान समय में प्रवृत्त किन्हीं अन्य कानूनों, नियमों, विनियमों या निदेशों के प्रावधानों के अतिरिक्त न कि उनके अल्पीकरण में होंगे।
द. निर्वचन
41. इन निदेशों के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के प्रयोजन से या इन निदेशों के प्रावधानों को लागू करने या निर्वचन के संबंध में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए रिज़र्व बैंक, यदि उचित समझे तो इसमें शामिल मामलों के संबंध में आवश्यक स्पष्टीकरण जारी कर सकता है और रिज़र्व बैंक द्वारा इन निदेशों के किसी भी प्रावधान के संबंध में दिया जाने वाला निर्वचन अंतिम और बाध्यकारी होगा।
(निशा नम्बियार)
प्रभारी मुख्य महाप्रबंधक |