7 अक्तूबर 2026
गवर्नर का वक्तव्य, 7 अक्तूबर 2026
सुप्रभात और नमस्कार। आप सभी को मेरा अभिवादन और आने वाले त्यौहारों के मौसम के लिए हार्दिक शुभेच्छाएँ।
2. सितंबर में पश्चिम एशिया संघर्ष के अचानक फिर से बढ़ने तथा इसके परिणामस्वरूप वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अस्थिरता ने वैश्विक आर्थिक धारणा को प्रभावित किया है और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता को बढ़ाया है। यद्यपि वैश्विक संवृद्धि अब भी आघात-सह बनी हुई है, तथापि पिछले वर्ष की तुलना में वर्ष 2026 में इसकी गति धीमी रहने का अनुमान है। ऊर्जा लागत में लगातार वृद्धि और खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी के कारण वैश्विक मुद्रास्फीति में तीव्र वृद्धि का अनुमान है, जिसके चलते प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा मौद्रिक नीति को और सख्त किए जाने की संभावना है। व्यापार संबंधी बनी हुई अनिश्चितता, उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में बॉन्ड प्रतिफल में वृद्धि और डॉलर के मजबूत होने से वैश्विक वित्तीय बाजारों की धारणा अस्थिर और संवेदनशील बनी हुई है। वैश्विक वित्तीय स्थितियों में और सख्ती, एआई स्टॉक्स के उचित मूल्यांकन को लेकर अनिश्चितता तथा पश्चिम एशिया संघर्ष का कोई समाधान न निकल पाना, वैश्विक आर्थिक संभावना के लिए महत्वपूर्ण अधोगामी जोखिम उत्पन्न करते हैं।
मौद्रिक नीति समिति के निर्णय
3. इस वैश्विक पृष्ठभूमि में, मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने इस महीने की 5, 6 और 7 तारीख को बैठक कर नीतिगत रेपो दर पर विचार-विमर्श किया और निर्णय लिया। उभरते हुए समष्टि आर्थिक और वित्तीय घटनाक्रमों तथा उनकी संभावना के विस्तृत आकलन के बाद, एमपीसी ने चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ़) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंकों की वृद्धि करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत करने के पक्ष में सर्वसम्मति से वोट किया। परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुवधा (एसडीएफ़) दर 5.25 प्रतिशत पर और सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ़) दर तथा बैंक दर 5.75 प्रतिशत पर समायोजित हो गए हैं। एमपीसी ने 4-2 के बहुमत से अपने रुख को सुविचारित सख्ती (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) रुख में बदलने का भी निर्णय लिया।
4. अब मैं इन निर्णयों के औचित्य के बारे में संक्षेप में बताना चाहूँगा।
5. एमपीसी ने उल्लेख किया कि भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण वैश्विक परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं। इसके बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ बनी हुई है तथा आर्थिक गतिविधियों की गति व्यापक आधार पर बनी हुई है। इसके अलावा, अर्थव्यवस्था के आघात-सह बने रहने की उम्मीद है।
6. एमपीसी ने आगे यह भी देखा कि उपलब्ध आंकड़ों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि मुद्रास्फीति और उसकी संभावना पिछले वर्ष की तरह अनुकूल नहीं है। अगले तीन तिमाहियों में हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति के औसतन लगभग 5.8 प्रतिशत रहने तथा इस वित्तीय वर्ष में मूल मुद्रास्फीति के 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। ऐसे में, नीतिगत दर को पुन: समायोजित करना आवश्यक है।
7. आपूर्ति-पक्ष की मुद्रास्फीति के संबंध में, एमपीसी ने उल्लेख किया कि मौद्रिक नीति मुख्य रूप से दूसरे चरण के प्रभावों (मुद्रास्फीति प्रत्याशाएं और फर्मों के मूल्य-निर्धारण व्यवहार आदि) को सीमित करने के माध्यम से कार्य करती है। इन प्रभावों को सामने आने में समय लगता है और उपलब्ध आंकड़ों से इन्हें अलग करके देखना कठिन होता है। मुद्रास्फीति प्रत्याशाएं और फर्मों के मूल्य-निर्धारण व्यवहार से संबंधित आंकड़ों के अलावा, मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण को दर्शाने वाले संकेतकों, जैसे मूल मुद्रास्फीति और प्रसार सूचकांकों, का भी इस उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाता है। हालांकि, यह ध्यान में रखना होगा कि दूसरे चरण के प्रभावों और आपूर्ति-पक्ष के दबावों (ऊर्जा और अन्य इनपुट के माध्यम से उत्पादन लागत) के अप्रत्यक्ष प्रभाव के बीच अंतर करना कठिन है, क्योंकि ये दोनों ही उक्त संकेतकों में परिलक्षित होते हैं। आपूर्ति-पक्ष के दबावों के मूल्य-निर्धारण व्यवहार में शामिल होने के सीमित संकेत हैं, यद्यपि मुद्रास्फीति प्रत्याशा में वृद्धि और मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण के कुछ प्रमाण दिखाई दे रहे हैं।
8. इसी प्रकार, मांग-पक्ष के दबावों के सीमित प्रमाण होने के बावजूद, मौद्रिक और ऋण समुच्चयों में सुदृढ़ वृद्धि को देखते हुए जोखिम बने हुए हैं।
9. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, एमपीसी ने नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंकों की वृद्धि कर इसे 5.50 प्रतिशत करने के पक्ष में सर्वसम्मति से वोट किया। एमपीसी ने अपने रुख को सुविचारित सख्ती में बदलने का भी निर्णय लिया। एमपीसी ने रेखांकित किया कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, निकट अवधि में दर को कम करने की कोई गुंजाइश नहीं है और बदलती परिस्थितियों और संभावना के आधार पर आगे की नीतिगत कार्रवाई में दर को या तो बढ़ाया जा सकता है अथवा यथास्थिति बनाए रखी जा सकती है। दर-वृद्धि के चक्र की अवधि और उसकी सीमा वास्तविक संवृद्धि-मुद्रास्फीति संबंधी घटनाक्रमों और संभावना पर निर्भर करेगी। इसमें विशेष रूप से अंतर्निहित मुद्रास्फीति, मूल्य दबावों के व्यापक होने की सीमा और आपूर्ति आघात संबंधी दूसरे चरण के प्रभावों तथा मांग संबंधी प्रोत्साहनों के प्रभाव को ध्यान में रखा जाएगा।
संवृद्धि और मुद्रास्फीति का आकलन
संवृद्धि
10. वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच घरेलू आर्थिक गतिविधियों ने आघात सहनीयता दिखाई है, जो कि 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी संवृद्धि के 7.8 प्रतिशत होने से स्पष्ट है। संवृद्धि को आघात-सह निजी उपभोग और सुदृढ़ निवेश गतिविधियों से समर्थन मिला, वहीं निवल निर्यात का योगदान भी सकारात्मक बना रहा।
11. अब तक उपलब्ध उच्च-आवृत्ति संकेतकों से संकेत मिलता है कि दूसरी तिमाही में आर्थिक गतिविधियों की गति बनी हुई है, हालांकि पिछली तिमाही की तुलना में इनमें कुछ कमी आई है। दक्षिण-पश्चिम मानसून¹ के कमजोर और असमान रहने के बावजूद,1 खरीफ बुवाई अपने सामान्य स्तर से कुछ अधिक रही है,2 हालांकि यह पिछले वर्ष की तुलना में मामूली रूप से कम है। लागत संबंधी दबावों के बावजूद विनिर्माण गतिविधि अच्छी बनी हुई है, जैसा कि आईआईपी और पीएमआई3 से संकेत मिलता है। मजबूत घरेलू और बाहरी मांग के कारण सेवा क्षेत्र की गतिविधियां स्थिर और व्यापक आधार पर बनी रहीं।4 2026-27 की दूसरी तिमाही में विनिर्माण पीएमआई और सेवा पीएमआई दोनों ही विस्तारकारी क्षेत्र में बने रहे, हालांकि उक्त विस्तार की गति पहली तिमाही की तुलना में धीमी हुई।5 दूसरी तिमाही में निजी उपभोग व्यापक रूप से सुदृढ़ बना रहा और इसे विवेकाधीन खर्च से लगातार समर्थन मिला।6 स्थायी निवेश सुदृढ़ बना हुआ है जो कि कई तत्संबंधी संकेतकों से स्पष्ट है।7 हालांकि, गैर-टिकाऊ वस्तुओं और घरेलू हवाई-यात्री यातायात जैसे कुछ क्षेत्रों में कमजोरी देखी गई।8 बाजार पहुंच के विस्तार और विविधीकरण पर ध्यान देने के साथ, जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान वाणिज्य निर्यात में दो अंकों की वृद्धि दर्ज की गई। जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान सेवा निर्यात में भी तीव्र वृद्धि दर्ज की गई।9
12. आगे, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों का घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर कुछ प्रभाव पड़ने की आशंका है। इसके अलावा, कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून तथा सुदृढ़ एल नीनो परिस्थितियां आगामी रबी सीजन और ग्रामीण मांग को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, गैर-कृषि गतिविधियों में संभावित मजबूती ग्रामीण उपभोग को समर्थन देती रहेगी। सेवा-क्षेत्र में बनी हुई गति और व्यापक रूप से स्थिर रोजगार परिस्थितियों से शहरी मांग को बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद है। सरकार द्वारा अवसंरचना पर लगातार किए जा रहे खर्च, निजी पूंजीगत व्यय में सुधार और मजबूत ऋण-प्रवाह से निवेश गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। सेवा निर्यात के मजबूत बने रहने की उम्मीद है, जबकि हाल ही में परिचालित किए गए द्विपक्षीय व्यापार समझौतों से वाणिज्य निर्यात को समर्थन मिलना चाहिए। लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक तनावों, अंतरराष्ट्रीय पण्य कीमतों में वृद्धि, वैश्विक व्यापार में अतिरिक्त व्यवधान और वैश्विक वित्तीय स्थितियों में सख्ती से उत्पन्न प्रतिकूल परिस्थितियां संवृद्धि की संभावना पर प्रभाव डाल सकती हैं। इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है; जहां उसके दूसरी तिमाही में 7.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है। संवृद्धि के पूर्वानुमान में 40 आधार अंकों की बढ़ोत्तरी, महत्वपूर्ण प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद आर्थिक गतिविधियों की मजबूती को और रेखांकित करती है। 2027-28 की पहली तिमाही के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। जोखिम समान रूप से संतुलित हैं।
मुद्रास्फीति
13. सीपीआई मुद्रास्फीति जुलाई के 4.5 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त 2026 में 4.8 प्रतिशत हो गई। यह मुख्यतः खाद्य-पदार्थ10 और ईधन11 घटकों में अधिक मुद्रास्फीति के कारण हुआ। खाद्य-पदार्थों की कीमतों में वृद्धि अधिक व्यापक हुई है, साथ ही चीनी12 और प्याज13 जैसी कुछ वस्तुओं की कीमतों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अगस्त में, मुख्यतः प्रतिकूल आधार प्रभावों के कारण, ईधन मुद्रास्फीति में भी मामूली वृद्धि हुई। लगातार तीन महीनों तक 3.9 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रहने के बाद, अगस्त में मूल14 मुद्रास्फीति भी बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई। बहुमूल्य धातुओं को छोड़कर, मूल मुद्रास्फीति अगस्त में बढ़कर 2.9 प्रतिशत हो गई। बढ़ती कीमतों के दबावों के व्यापक होने के संकेत प्रसार-सूचकांक में भी दिखाई दिए, क्योंकि अगस्त 2026 में 4 प्रतिशत से अधिक मुद्रास्फीति दर्ज करने वाली वस्तुओं की भारित हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 37 प्रतिशत हो गई।15
14. मुद्रास्फीति की निकट अवधि संभावना के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून16 की कमी, एल निनो स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों17 में उच्च अस्थिरता के कारण आपूर्ति पक्ष से दबाव जारी रहेगा। तेल के अलावा, खाद्य घटक के भीतर विभिन्न वस्तुओं पर मूल्य दबाव बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।18 इसके अलावा, मुद्रास्फीति के सामान्यीकृत होने के प्रारंभिक संकेत भी मूल मुद्रास्फीति में वृद्धि और सीपीआई बास्केट के बड़े खंड में उच्च मुद्रास्फीति से स्पष्ट हैं।
15. सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति 5.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें दूसरी तिमाही में 4.9 प्रतिशत; तीसरी तिमाही में 6.0 प्रतिशत; और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत है। 2027-28 की पहली तिमाही के लिए मुद्रास्फीति 5.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें जोखिम संतुलित हैं। 2026-27 के लिए मूल मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
चलनिधि और वित्तीय बाजार स्थितियां
16. अगस्त और सितंबर के दौरान, पूंजी अंतर्वाह को आकर्षित करने के लिए उठाए गए हालिया उपायों के कारण प्रणालीगत चलनिधि में काफी वृद्धि हुई। एलएएफ़ के अंतर्गत निवल स्थिति द्वारा मापे गए अनुसार, अगस्त 2026 में पिछली एमपीसी बैठक के बाद से प्रणालीगत चलनिधि, औसतन दैनिक अधिशेष ₹5.9 लाख करोड़ पर रही।19 चलनिधि अवशोषित करने के उपायों20 और तिमाही अग्रिम कर बहिर्वाह के संयोजन ने सितंबर में अधिशेष चलनिधि को कम किया।
17. अधिशेष चलनिधि स्थितियों के मद्देनजर, हाल की अवधि में भारित औसत मांग दर, मुख्य रूप से पॉलिसी कॉरिडोर के निचले आधे हिस्से में कारोबार करती रही।21 अगस्त-सितंबर में अल्पकालिक मुद्रा बाजार दरें, विशेष रूप से वाणिज्यिक पत्रों और जमा प्रमाणपत्रों की दरें, में उल्लेखनीय रूप से कमी आई।22 अगस्त के मध्य से सितंबर तक सरकारी प्रतिभूति प्रतिफल सख्त हुए, जिसका कारण पश्चिम एशिया में नए भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक बांड प्रतिफल में वृद्धि और कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि था। जुलाई-अगस्त के दौरान जमा और ऋण दरों में असमान गति के परिणामस्वरूप ऋण बाजार में संचरण दिखाई दिया।23 फिर भी, ऋण संवृद्धि अभी भी क्षेत्रों के अनुसार मजबूत24 और व्यापक25 रूप से बनी हुई है।
18. आगे चलकर, भारतीय रिज़र्व बैंक चलनिधि प्रबंधन उपकरणों के एक उपयुक्त मिश्रण का उपयोग करेगा और भारित औसत मांग दर (डबल्यूएसीआर) को नीतिगत रेपो दर के साथ संरेखित करने का प्रयास करेगा।
वित्तीय स्थिरता
19. अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) की पूंजी पर्याप्तता, चलनिधि, परिसंपत्ति गुणवत्ता और लाभप्रदता से संबंधित प्रणाली-स्तरीय वित्तीय मापदंड लगातार मजबूत बने हुए हैं।26 इसी तरह, एनबीएफसी के प्रणाली-स्तरीय मापदंड भी स्वस्थ हैं।27
बाह्य क्षेत्र
20. बाह्य क्षेत्र के संबंध में, तो भारत का चालू खाता घाटा (सीएडी), 2026-27 की पहली तिमाही में बाह्य झटकों के बावजूद मामूली रहा और स्थायी स्तर से काफी नीचे था।28 मज़बूत सेवा व्यापार अधिशेष29 और निवल विप्रेषण प्राप्तियों30 के बावजूद, जुलाई 2026 में माल व्यापार घाटे में वृद्धि के कारण सीएडी बढ़ गया। मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक सामान और कच्चे तेल के आयात में वृद्धि के कारण, भारत का माल व्यापार घाटा जुलाई-अगस्त 2026 में 58.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जो जुलाई-अगस्त 2025 में 55.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर था।31 आगे चलकर, वैश्विक व्यापार संवृद्धि में मंदी32, ऊंचे ऊर्जा मूल्य और लगातार व्यापार नीति अनिश्चितताएं, 2026-27 में भारत के चालू खाता घाटे के लिए ऊधर्वगामी जोखिम पेश करती हैं। सेवा व्यापार अधिशेष में अपेक्षित की गई तेजी, मजबूत आवक विप्रेषण और भारत-यूके व्यापार समझौते के साथ-साथ प्रमुख व्यापार साझेदारों के साथ हाल के द्विपक्षीय समझौतों के कार्यान्वयन भी भारत के बाह्य क्षेत्र को आघात सहनीयता प्रदान करेंगे।
21. बाहरी वित्तपोषण के संबंध में, अप्रैल-अगस्त 2026 के दौरान अंतर्वाह के साथ निवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 13.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जो एक वर्ष पहले 9.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक था, जिसका कारण उच्च सकल अंतर्वाह और बाह्य एफडीआई की वृद्धि में धीमापन था।33 मजबूत सकल एफडीआई, भारत में वैश्विक निवेशकों की रुचि का प्रतिबिंब है।34 जबकि अप्रैल- 5 अक्टूबर 2026 के दौरान विदेशी संविभाग निवेश (एफपीआई) में 10.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का शुद्ध बहिर्वाह दर्ज किया गया, जून 2026 की नीति में उठाए गए पूंजी प्रवाह उपायों ने अंतर्वाह का समर्थन किया; परिणामस्वरूप, 2026-27 में भुगतान संतुलन में स्वस्थ अधिशेष दर्ज होने की आशा है।35
22. भारत की विदेशी मुद्रा आरक्षित निधि36, लगभग 11 महीने का आयात कवर और बाहरी ऋण कवर 94.4 प्रतिशत के साथ मुद्रा आरक्षित निधि पर्याप्तता के मानक मापदंडों के संदर्भ में अब भी पर्याप्त बने हुए हैं।
23. हम विनिमय दर में आवश्यक समायोजन सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं जो अंतर्निहित समष्टि आर्थिक मूलभूत तत्वों के अनुरूप हों और अत्यधिक अस्थिरता को रोकें।
अतिरिक्त उपाय
24. मैं अपने वक्तव्य को समाप्त करने से पहले, दो अतिरिक्त उपायों की घोषणा करना चाहता हूँ।
25. पहला, हम एनबीएफ़सी खाता समेककों के बीच अंतर-परिचालनीयता की अनुमति दे रहे हैं, जिससे एक खाता समेकक के माध्यम से सभी खाता समेककों से वित्तीय जानकारी का समेकन संभव होगा। हम सेबी द्वारा विनियमित डिपॉजिटरीज़ को उनके समेकित खाता विवरण (सीएएस) में जमा खातों से संबंधित जानकारी शामिल करने में भी सुविधा प्रदान कर रहे हैं। ये उपाय 31 दिसंबर 2026 तक लागू किए जाएंगे।
26. दूसरा, तेजी से बदलती वित्तीय बाजार गतिशीलता के जवाब में, हम वित्तीय बाजारों के लिए एक तकनीकी परामर्शदाता समिति का गठन करेंगे। यह समिति वित्तीय बाजारों से संबंधित नीति और परिचालनात्मक मामलों पर बाजार सहभागियों और अन्य हितधारकों के साथ संरचित जुड़ाव के लिए एक मंच के रूप में कार्य करेगी।
समापन टिप्पणी
27. सारांश में, पश्चिम एशिया संघर्ष, प्रशुल्क से संबंधित अनिश्चितताएं, उच्च बॉन्ड प्रतिफल और एआई शेयरों के मूल्यांकन में अनियंत्रित सुधार के जोखिम, वैश्विक आर्थिक भावनाओं को चिंताजनक बनाए हुए हैं, जिससे उभरते बाजारों पर जोखिम-विमुख रुझान प्रबल हैं। जबकि ये कारक घरेलू संवृद्धि -मुद्रास्फीति संभावना पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं, भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित आघात- सहनीयता और शक्ति इन चुनौतीपूर्ण समयों से गुजरने में मदद कर रही है। हम ऐसी नीतियां लागू करेंगे जो इस आघात- सहनीयता में और वृद्धि करें। इसलिए, हम मूल्य और वित्तीय स्थिरता के लिए प्रयास करेंगे क्योंकि दोनों लंबे समय तक सतत संवृद्धि के लिए आवश्यक हैं।
28. धन्यवाद। नमस्कार और जय हिन्द।
(ब्रिज राज)
मुख्य महाप्रबंधक
प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/1266
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