मास्टर निदेशों

मास्टर निदेश – विविध

भा.रि.बैंक/विमुवि/2015-16/14
एफ़ईडी मास्टर निदेश सं.19/2015-16

1 जनवरी 2016

सभी प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी-। बैंक और प्राधिकृत बैंक

महोदया / महोदय

मास्टर निदेश – विविध

भारतीय रिज़र्व बैंक ने आज की तारीख तक संशोधित संबंधित विनियमों के दायरे के भीतर अब तक जारी संबंधित ए.पी. (डीआईआर सीरीज) परिपत्रों को समेकित करते हुए मास्टर निदेश जारी किए हैं। इन परिपत्रों/ अनुदेशों को, वे लेनदेन के जिस श्रेणी में आते हैं, उन श्रेणियों के आधार पर मास्टर निदेशों में वर्गीकृत किया गया है। जिन अनुदेशों को अन्य किसी मास्टर निदेश में समाविष्ट नहीं किया गया है, उन अनुदेशों को इस मास्टर निदेश में समेकित किया गया है। परिपत्रों की सूची परिशिष्ट में दी गयी है।

2. भारतीय रिज़र्व बैंक इन विनियमों की रूपरेखा के भीतर विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 की धारा-11 के अंतर्गत प्राधिकृत व्यक्तियों को निदेश भी जारी करता है। ये निदेश प्राधिकृत व्यक्तियों द्वारा विनियमों के कार्यान्वयन को ध्यान में रखते हुए अपने ग्राहकों/ घटकों के साथ किए जाने वाले विदेशी मुद्रा कारोबार के तौर-तरीके निर्धारित करते हैं।

3. यह नोट किया जाए कि जब कभी आवश्यक हो, रिज़र्व बैंक विनियमों में अथवा प्राधिकृत व्यक्तियों द्वारा उनके ग्राहकों/ घटकों के साथ किए जाने वाले संबंधी लेनदेनों के तरीके में किसी परिवर्तन के संबंध में ए.पी. (डीआईआर सीरीज) परिपत्रों के जरिए प्राधिकृत व्यक्तियों को निदेश जारी करेगा। इसके साथ जारी मास्टर निदेश में साथ-साथ यथोचित रूप से संशोधन किया जाएगा।

भवदीय,

(बी.पी.कानूनगो)
प्रधान मुख्य महाप्रबंधक


मास्टर निदेश – विविध

1) अनिवासियों को विप्रेषण – स्त्रोत पर कर की कटौती

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा अनिवासियों को विप्रेषण भेजते समय पालन किए जाने वाले मौजूदा अनुदेशों में संशोधन किए जाने पर, भारतीय रिज़र्व बैंक ने यह स्पष्ट किया है कि बैंक द्वारा कर मुद्दों के संबंध में स्पष्टीकरण देने के लिए विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 के अंतर्गत अनुदेश जारी नहीं किए जाएंगे। प्राधिकृत व्यापारियों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे यथा लागू कर क़ानूनों की अपेक्षाओं का पालन करें।

2) अनिवासी भारतीयों, जो भारत में स्थायी रूप से रहने हेतु वापस लौटे हैं, द्वारा विदेश में अर्जित आय तथा परिसंपत्तियों की बिक्रीगत आगम राशि का प्रत्यावर्तन और उदारीकृत विप्रेषण योजना के तहत विप्रेषणों के जरिए विदेश में अर्जित आय तथा परिसंपत्तियों की बिक्रीगत आगम राशि का प्रत्यावर्तन – स्पष्टीकरण

(ए) विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम (फेमा), 1999 की धारा 6 की उप-धारा 4 के अनुसार भारत में निवासी कोई व्यक्ति विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति अथवा भारत से बाहर स्थित किसी अचल संपत्ति को धारित (होल्ड), स्वाधिकृत, अंतरित अथवा निविष्ट (invest) कर सकता है, यदि ऐसी (विदेशी) मुद्रा, प्रतिभूति अथवा संपत्ति ऐसे व्यक्ति द्वारा भारत से बाहर निवासी होने के दौरान अर्जित, धारित अथवा स्वाधिकृत की गयी हो अथवा भारत से बाहर के निवासी किसी व्यक्ति से विरासत में प्राप्त की गयी हो।

(बी) फेमा, 1999 की धारा 6 की उप-धारा 4 में निम्नलिखित लेनदेन शामिल हैं:

(i) ऐसे व्यक्ति द्वारा खोले और रखे गए विदेशी मुद्रा खाते, जब वह भारत से बाहर का निवासी था;

(ii) भारत से बाहर किए गए अथवा शुरू किए गए रोजगार अथवा व्यवसाय अथवा वोकेशन जब ऐसा व्यक्ति भारत से बाहर का निवासी था अथवा ऐसे व्यक्ति के भारत से बाहर निवासी रहने के दौरान किए गए निवेश अथवा ऐसे व्यक्ति के भारत से बाहर निवासी रहने पर प्राप्त उपहार अथवा विरासत से अर्जित आय;

(iii) भारत से बाहर के निवासी किसी व्यक्ति से विरासत स्वरूप अर्जित विदेशी मुद्रा, उससे हुई आय और उसके परिवर्तन अथवा प्रतिस्थापन अथवा उपचित राशि सहित भारत में निवासी किसी व्यक्ति द्वारा भारत से बाहर धारित विदेशी मुद्रा राशि।

(iv) भारत में निवासी कोई व्यक्ति विदेश स्थित अपनी सभी पात्र परिसंपत्तियों के साथ ही साथ ऐसी परिसंपत्तियों से हुई आय अथवा बिक्रीगत आमदनी, जो भारत लौटने पर हुई हो, को रिज़र्व बैंक की पूर्वानुमति के बगैर विदेश में भुगतान करने अथवा नए निवेश करने के लिए इस्तेमाल कर सकता है, बशर्ते ऐसे निवेशों की लागत और/अथवा तत्संबंध में प्राप्त उत्तरवर्ती भुगतान उसके द्वारा धारित पात्र परिसंपत्तियों के भाग के रूप में शामिल निधियों में से ही किया जाए और ऐसे लेनदेन फेमा के मौजूदा उपबंधों का उल्लंघन न करते हों।

(सी) कोई निवेशक उदारीकृत विप्रेषण योजना के तहत किए गए निवेशों पर उपचित आय रोक रख सकता है तथा पुनर्निवेशित कर सकता है।

3) भारत में निवासियों द्वारा रखा गया निवासी बैंक खाता – संयुक्त धारक – उदारीकरण

भारत में निवासी व्यक्तियों को निम्नलिखित शर्तों के तहत अनिवासी भारतीय घनिष्ठ रिश्तेदार (रिशतेदारों) को (समय-समय पर यथा संधोधित 3 मई 2000 की अधिसूचना सं॰ फेमा.5 के विनियम 2(vi) में यथा परिभाषित अनिवासी भारतीय और कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा-6 में यथा परिभाषित रिश्तेदार) निवासी बचत बैंक खातों में संयुक्त खाताधारक (खाताधारकों) के तौर पर ‘उनमें से कोई अथवा उत्तरजीवी’ के आधार पर शामिल करने की अनुमति दी गई है:

ए) ऐसे खाते को सभी प्रयोजनों के लिए निवासी बैंक खाता समझा जाएगा और निवासी खाते पर लागू सभी विनियम उस पर लागू होंगे।

बी) अनिवासी भारतीय घनिष्ठ रिश्तेदार से संबंधित चेक, लिखत, विप्रेषण, नकदी, कार्ड अथवा अन्य आमद राशि इस खाते में जमा होने के लिए पात्र नहीं होगी।

सी) अनिवासी भारतीय घनिष्ठ रिश्तेदार निवासी खाताधारक के लिए और उसकी ओर से घरेलू भुगतानों के लिए उक्त खाते का परिचालन करेगा और स्वयं के लिए कोई लाभ निर्मित करने हेतु उसका इस्तेमाल नहीं करेगा।

डी) जहाँ अनिवासी भारतीय घनिष्ठ रिश्तेदार ऐसे खाते का संयुक्त धारक बनता है जिसमें एक से अधिक निवासी खाताधारक हैं, वहाँ ऐसा अनिवासी भारतीय घनिष्ठ रिश्तेदार ऐसे सभी निवासी खाताधारकों का घनिष्ठ रिश्तेदार होना चाहिए।

ई) जहाँ किसी घटनावश, ऐसा अनिवासी खाताधारक उत्तरजीवी खाताधारक बन जाता है, वहाँ इसे वर्तमान विनियमों के अनुसार अनिवासी सामान्य रुपया खाते (NRO) के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।

एफ) अनिवासी खाताधारक का यह दायित्व होगा कि वह प्राधिकृत व्यापारी बैंक को ऐसे खाते को अनिवासी सामान्य रुपया खाते में वर्गीकृत करने के लिए सूचित करे और इस बाबत अनिवासी सामान्य रुपया खाते के लिए लागू विनियम ऐसे खाते पर लागू होंगे।

जी) उल्लिखित संयुक्त खाताधारक बनाने की सुविधा बचत बैंक खाते सहित अन्य सभी निवासी खातों के लिए दी जा सकती है।

यह सुविधा देते समय प्राधिकृत व्यापारी बैंक ऐसी सुविधा देने की आवश्यकता के प्रति स्वयं संतुष्ट हो ले और अनिवासी खाताधारक से विधिवत हस्ताक्षरित निम्नलिखित वचन पत्र प्राप्त करे:-

“मैं बचत बैंक/सावधि जमा/आवर्ती जमा/चालू खाता सं.......का संयुक्त खाताधारक हूँ जो श्री/श्रीमती/ सुश्री.........................................के नाम में है जो मेरे...................(रिश्तेदारी का स्वरूप) हैं। मैं वचन देता/ देती हूँ कि मैं उक्त खाते में जमा राशि का उपयोग विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999, उसके अंतर्गत निर्गमित नियमों/विनियमों के उपबंधों और समय-समय पर रिजर्व बैंक द्वारा जारी परिपत्रों/ अनुदेशों का उल्लंघन करते हुये किसी लेनदेन हेतु नहीं करूंगा/नहीं करूंगी। मैं यह भी वचन देता/देती हूँ कि यदि उक्त खाते से कोई लेनदेन फेमा, 1999 अथवा उसके तहत निर्मित नियमों/विनियमों का उल्लंघन करते हुये किया जाता है, तो उसके लिए मुझे उत्तरदायी माना जाएगा। मैं अपनी अनिवासी/निवासी की स्थिति में कोई परिवर्तन होने पर अपने बैंक को सूचित करूंगा/करूंगी”।

4) निवासी व्यक्तियों द्वारा अनिवासी भारतीय घनिष्ठ रिश्तेदारों के चिकित्सा व्ययों का भुगतान करना

जब अनिवासी भारतीय भारत में दौरे/यात्रा पर होता है और जहां अनिवासी भारतीय घनिष्ठ रिश्तेदार (समय-समय पर यथा संधोधित 3 मई 2000 की अधिसूचना सं॰फेमा.5/2000-आरबी के विनियम 2(vi) में यथा परिभाषित अनिवासी भारतीय और कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 6 में यथा परिभाषित रिश्तेदार) के संबंध में चिकित्सा व्ययों का भुगतान निवासी व्यक्ति द्वारा किया जाता है, ऐसे भुगतान, यद्यपि निवासी से निवासी को लेनदेन के स्वरूप के होने पर भी पूर्वोक्त 3 मई 2000 की अधिसूचना सं॰ फेमा. 16/2000-आरबी के विनियम 2(i) के तहत “उससे संबंधित सेवाएँ” शर्त के अंतर्गत कवर किए जाएंगे।

5) विदेश में जुटाई गई निधियों की भारत में रूटिंग (Routing)

(ए) भारतीय कंपनियों अथवा उनके प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी–I बैंकों को उनकी समुद्रपारीय होल्डिंग/ सहयोगी/ सहायक/समूह कंपनियों द्वारा ऐसे उधारों के लिए, संबंधित विनियमों में स्पष्ट रूप से अनुमत प्रयोजनों को छोड़कर, प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष गारंटी जारी करने अथवा आकस्मिक देयता सृजित करने अथवा किसी भी रूप में कोई प्रतिभूति देने के लिए अनुमति नहीं दी गई है।

बी) इसके अलावा, भारतीय कंपनियों की समुद्रपारीय होल्डिंग/ सहयोगी/सहायक/समूह कंपनियों द्वारा उपर्युक्त (i) में यथा उल्लिखित भारतीय कंपनियों अथवा उनके प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी–I बैंकों के समर्थन से विदेश में जुटाई गई निधियों का उपयोग भारत में तब तक नहीं किया जा सकता जब तक वह संबंधित विनियमों के तहत प्रदान की गई सामान्य अथवा विशिष्ट अनुमति के अनुरूप हो।

सी) भारतीय कंपनियाँ अथवा उनके प्राधिकृत व्यापारी श्रेणी–I बैंक इस प्रकार के स्ट्रक्चर का उपयोग करते हैं, अथवा ऐसा स्ट्रक्चर स्थापित करते हैं, जिसे उपर्युक्त का उल्लंघन हो, फेमा, 1999 के तहत स्वयं यथा विनिर्दिष्ट दंडात्मक कार्रवाई के लिए दायी होंगे।

6) विशेष जांच दल का गठन – सूचना का आदान-प्रदान (Sharing of information)

माननीय उच्चतम न्यायालय के 4 जुलाई 2011 के निर्णय के अनुसरण में भारत सरकार ने माननीय न्यायमूर्ति एम॰बी॰ शाह की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल का गठन किया है। इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित निदेश दिए हैं कि:

"राज्य की सभी एजेंसियों के अंग, विभाग और एजेंट, चाहे वे भारत संघ के स्तर पर हों, अथवा राज्य सरकार के, सांविधिक रूप से गठित एकल निकायों सहित किन्तु उन तक सीमित नहीं, और अन्य सांविधिक निकाय विशेष जांच दल के कार्यों में सभी आवश्यक सहयोग दें।

भारत संघ और जहां आवश्यक हो राज्य सरकार विशेष जांच दल द्वारा, उसकी पूर्ण क्षमता में, जांच कार्यों में सभी आवश्यक वित्तीय, सामग्री संबंधी, विधिक, राजनयिक और आसूचना गत संसाधनों की सहायता देंगे, चाहे ऐसी जांच अथवा उसका कोई भाग देश में किया जाए अथवा विदेश में किया जाए।" सभी प्राधिकृत व्यक्तियों को सूचित किया जाता है कि वे विशेष जांच दल द्वारा अपेक्षित सूचना/दस्तावेज़, जब भी अपेक्षा हो, उपलब्ध कराएं।

7) निष्क्रिय विदेशी मुद्रा जमाराशियों का क्रिस्टलीकरण (Crystallization of Inoperative Foreign Currency Deposits) - रिज़र्व बैंक (जमाकर्ता शिक्षण और जागरूकता निधि) योजना, 2014

रिज़र्व बैंक (जमाकर्ता शिक्षण और जागरूकता निधि) योजना, 2014 के साथ विदेशी मुद्रा खातों के संबंध में जारी अनुदेशों के संरेखीकरण (alignment) के उद्देश्य से, प्राधिकृत व्यापारी बैंकों को आवश्यक है कि वे विदेशी मुद्रा में मूल्यवर्गीकृत किसी खाते में निष्क्रिय जमाराशि को क्रिस्टलीकृत अर्थात जमाशेष को निम्नानुसार भारतीय रुपए में परिवर्तित करेंगे :

(ए) यदि विदेशी मुद्रा में मूल्यवर्गीकृत निश्चित परिपक्वता अवधि वाली कोई जमाराशि उसकी परिपक्वता की तारीख से 3 वर्षों के लिए निष्क्रिय बनी रहती है, तो तीसरे वर्ष के अंत में, प्राधिकृत बैंक विदेशी मुद्रा में मूल्यवर्गीकृत जमा खातेगत शेष को तद्दिनांक को प्रचलित विनिमय दर पर भारतीय रुपये में परिवर्तित करेगा। उसके पश्चात, जमाकर्ता या तो भारतीय रुपये में परिवर्तित उक्त जमा गत आगम राशि और उस पर उपचित ब्याज, यदि कोई हो, अथवा मूल जमा जो भारतीय रुपये में परिवर्तित की गई हो और भारतीय रुपये में परिवर्तित जमा गत आगम राशि पर प्राप्य ब्याज, यदि कोई हो, के समतुल्य विदेशी मुद्रा (भुगतान की तारीख को प्रचलित विनिमय दर पर आकलित) का दावा करने का हकदार होगा।

(बी) ऐसे मामले में जहां विदेशी मुद्रा में मूल्यवर्गीकृत कोई जमाराशि जिसकी परिपक्वता अवधि अनिश्चित हो, यदि ऐसी जमाराशि 3 वर्षों के लिए निष्क्रिय बनी रहती है {बैंक प्रभारों के लिए किए गए नामे (डेबिट) को परिचालन न माना जाए}, तो प्राधिकृत बैंक अपने पास जमाकर्ता के उपलब्ध अंतिम ज्ञात पते पर जमाकर्ता को तीन महीने का नोटिस देकर, विदेशी मुद्रा में मूल्यवर्गीकृत ऐसी जमाराशि को, नोटिस अवधि की समाप्ति पर प्रचलित विनियम दर पर भारतीय रुपये में परिवर्तित करेगा। उसके पश्चात, जमाकर्ता या तो भारतीय रुपये में परिवर्तित उक्त जमा गत आगम राशि और उस पर उपचित ब्याज, यदि कोई हो, अथवा मूल जमा जो भारतीय रुपये में परिवर्तित की गई हो और भारतीय रुपये में परिवर्तित जमा गत आगम राशि पर प्राप्य ब्याज, यदि कोई हो, के समतुल्य विदेशी मुद्रा (भुगतान की तारीख को प्रचलित विनिमय दर पर आकलित) का दावा करने का हकदार होगा।

8) अंतर-राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) के संबंध में परिचालनात्मक दिशानिदेश

विदेशी मुद्रा प्रबंध (अंतर-राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र) विनियमावली के अनुसार, अंतर-राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र में स्थापित किसी वित्तीय संस्था अथवा वित्तीय संस्था की शाखा जिसे सरकार अथवा विनियामक प्राधिकारी द्वारा उक्त रूप में माना गया हो, उसे भारत से बाहर का निवासी व्यक्ति माना जाएगा। इसलिए उसके द्वारा भारत में निवासी किसी व्यक्ति के साथ किए गए लेनदेन निवासी से अनिवासी के बीच किए गए लेनदेन माने जाएंगे और वे विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 तथा उसके अंतर्गत निर्मित नियमावलियों/ विनियमावलियों/ निदेशों के उपबंधों के तहत हुए लेनदेन माने जाएंगे।

इस सबंध में हुए वित्तीय लेनदेन का तात्पर्य भुगतान करने अथवा भुगतान प्राप्त करने, आहरण करने, विनिमय बिल अथवा प्रामिज़री नोट जारी करने अथवा परक्रामण करने, किसी प्रतिभूति का अंतरण करने अथवा किसी कर्ज़ को स्वीकारने से है। इसी प्रकार वित्तीय सेवाओं का तात्पर्य उन कार्यकलापों/गतिविधियों से है जो संसद अथवा सरकार अथवा संबन्धित वित्तीय संस्था को विनियमित करने की शक्तियाँ किसी विनियामक प्राधिकारी में निहित करने वाले संबन्धित अधिनियम के तहत वित्तीय संस्था द्वारा किए जाने के लिए अनुमत हों।

9) भारत में निवासी किसी व्यक्ति द्वारा विदेश में धारित परिसंपत्तियों (आस्तियों) का विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 के तहत नियमितीकरण

विदेश में धारित (held) अप्रकटित परिसंपत्तियों के मसले के निपटान के लिए भारत सरकार ने 'काला धन (अप्रकटित विदेशी आय और आस्ति) और कर अधिरोपण अधिनियम, 2015 (काला धन अधिनियम) 26 मई 2015 को अधिनियमित किया है। यह अधिनियम अप्रकटित आय, जो भारत में कर योग्य है, उसके एवं उससे अर्जित विदेशी परिसंपत्तियों के लिए अलग से कर अधिरोपण का उपबंध करता है।

2. भारत में निवासी व्यक्तियों द्वारा विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 का उल्लंघन करते हुए विदेश में धारित (हेल्ड) परिसंपत्तियों जिनके संबंध में घोषणा की जा चुकी है और काला धन अधिनियम (अप्रकटित विदेशी आय और आस्ति) और कर अधिरोपण अधिनियम, 2015 के उपबंधों के अंतर्गत जिस पर / जिन पर कर एवं दण्ड अदा कर दिया गया है, उनके प्रभावी रूप में निपटान हेतु यह स्पष्ट किया जाता है कि:

ए) घोषणाकर्ता द्वारा विदेश में धारित परिसंपत्ति जिसके संबंध में उसने काला धन अधिनियम के उपबंधों के अंतर्गत कर एवं दण्ड अदा कर दिया है, उसके विरुद्ध विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 के तहत कोई कार्यवाही लंबित नहीं रहेगी।

बी) ऐसी परिसंपत्ति की घोषणा करने की तारीख से 180 दिनों के भीतर उसके निपटान अथवा बैंकिंग चैनल से उसकी आगम राशि भारत लाने के लिए विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम के अंतर्गत अनुमति लेने की अपेक्षा नहीं होगी।

सी) यदि घोषणाकर्ता इस प्रकार घोषित परिसंपत्ति को धारण किए रखना चाहती/चाहता है, तो वह घोषणा करने की तारीख से 180 दिनों के भीतर भारतीय रिज़र्व बैंक को, आवेदनपत्र की तारीख को अनुमति लेना आवश्यक होने पर, आवेदन करेगी/करेगा। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ऐसे आवदेनपत्र/त्रों पर मौजूदा विनियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। यदि ऐसी अनुमति नहीं दी जा सकती है, तो रिज़र्व बैंक द्वारा अनुमति देने से मना करने की सूचना मिलने की तारीख से 180 दिनों के भीतर अथवा रिज़र्व बैंक द्वारा विस्तारित अवधि के भीतर संदर्भित परिसंपत्ति का निस्तारण करना होगा और प्राप्त आगम राशि को बैंकिंग चैनल से तत्काल भारत में वापस लाया जाएगा।


परिशिष्ट

क्र.सं. विषय ए.पी. (डीआईआर सीरीज) परिपत्र सं. तारीख
1 अनिवासियों को विप्रेषण – स्त्रोत पर कर की कटौती 151 30.06.2014
2 फेमा की धारा 6(4) पर स्पष्टीकरण; उदारीकृत विप्रेषण योजना के तहत विप्रेषणों के जरिए विदेश में अर्जित आय तथा परिसंपत्तियों की बिक्रीगत आगम राशि का प्रत्यावर्तन 37
90
19.10.2011
09.01.2014
3 भारत में निवासियों द्वारा संयुक्त धारक के रूप में अनिवासी भारतीय घनिष्ठ रिशतेदारों के साथ रखा गया निवासी बैंक खाता  09.01.2014
4 निवासी व्यक्तियों द्वारा अनिवासी भारतीय घनिष्ठ रिश्तेदारों के चिकित्सा व्ययों का भुगतान करना   20 16.09.2011
5 विदेश में जुटाई गई निधियों की भारत में रूटिंग (Routing) 41 25.09.2014
6 विशेष जांच दल का गठन – सूचना का आदान-प्रदान (Sharing of information) 30.07.2014
7 निष्क्रिय विदेशी मुद्रा जमाराशियों का क्रिस्टलीकरण - रिज़र्व बैंक (जमाकर्ता शिक्षण और जागरूकता निधि) योजना, 2014 136 28.05.2014
8 अंतर-राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) के संबंध में परिचालनात्मक दिशा निर्देश 31.03.2015
9 भारत में निवासी किसी व्यक्ति द्वारा विदेश में धारित परिसंपत्तियों (आस्तियों) का विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 के तहत नियमितीकरण 18 30.09.2015

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