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प्रेस प्रकाशनी

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विकासात्मक और विनियामक नीतियों पर वक्तव्य

6 फरवरी 2026

विकासात्मक और विनियामक नीतियों पर वक्तव्य

यह वक्तव्य (i) विनियमन; (ii) भुगतान प्रणाली; (iii) वित्तीय समावेशन; (iv) वित्तीय बाजार; और (V) क्षमता निर्माण से संबंधित विभिन्न विकासात्मक और विनियामक नीति उपायों को निर्धारित करता है।

I. विनियमन

1. विनियमित संस्थाओं (आरई) द्वारा वित्तीय उत्पादों और सेवाओं का विज्ञापन, विपणन और बिक्री

किसी भी विनियमित संस्था द्वारा वित्तीय उत्पादों और सेवाओं का गलत बिक्री करना ग्राहकों तथा स्वयं संस्था दोनों के लिए गंभीर परिणाम ला सकता है। यह आवश्यक है कि बैंक काउंटरों पर बेची जा रही अन्य पक्षकार के उत्पाद एवं सेवाएँ, ग्राहकों की आवश्यकताओं के अनुरूप हों तथा व्यक्तिगत ग्राहकों की जोखिम सहनशीलता के अनुपात में हों। अतः विनियमित संस्थाओं को वित्तीय उत्पादों एवं सेवाओं के विज्ञापन, विपणन और बिक्री संबंधी व्यापक निर्देश जारी करने का निर्णय लिया गया है। इस संबंध में निर्देशों का मसौदा शीघ्र ही सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया जाएगा।

2. ऋण वसूली एवं वसूली एजेंटों के नियुक्ति में विनियमित संस्थाओं का आचरण

वर्तमान में, वसूली एजेंटों की नियुक्ति के संबंध में तथा ऋण वसूली के पहलुओं से संबंधित आचरण के मामले में, विनियमित संस्थाओं (आरई) के विभिन्न श्रेणियों के लिए भिन्न-भिन्न निर्देश लागू हैं। अब यह निर्णय लिया गया है कि वसूली एजेंटों की नियुक्ति तथा ऋण वसूली से संबंधित अन्य पहलुओं पर वर्तमान आचरण संबंधी सभी निर्देशों की समीक्षा एवं समन्वय किया जाए। तदनुसार, इस संबंध में शीघ्र ही मसौदा निर्देश सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किए जाएंगे।

3. डिजिटल लेनदेन में ग्राहक दायित्व सीमा के ढांचे की समीक्षा

अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन में ग्राहकों के देयताओं को सीमित करने से संबंधित वर्तमान निर्देश 2017 में जारी किए गए थे, जो ग्राहक के शून्य / सीमित देयताओं के परिदृश्यों और समय-सीमा से संबंधित हैं। इन निर्देशों के जारी होने के बाद से, बैंकिंग क्षेत्र में प्रौद्योगिकी और भुगतान प्रणालियों को तेज़ी से अपनाने के मद्देनजर, मौजूदा निर्देशों की समीक्षा की गई है। तदनुसार, छोटे मूल्य के धोखाधड़ीपूर्ण लेनदेन की स्थिति में प्रतिपूर्ति के लिए एक ढांचे सहित, संशोधित निर्देशों का मसौदा शीघ्र ही सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया जाएगा।

4. बैंकों द्वारा स्थावर संपदा न्यास (आरईआईटी) को ऋण प्रदान करना

भारत में स्थावर संपदा न्यास (आरईआईटी) तथा अवसंरचना परियोजनाओं न्यास (आईएनवीआईटी) की अवधारणा इस उद्देश्य से की गई थी कि पूर्ण एवं परिचालनात्मक स्थावर संपदा एवं अवसंरचना परियोजनाओं में बैंकों की निधि को मुक्त किया जा सके, जिसके लिए संस्थागत एवं खुदरा निवेशकों की समूहित निधियों के माध्यम से ऐसे जोखिमों का पुनर्वित्तपोषण किया जाए। इन उद्देश्यों के अनुरूप, आरंभ से ही वाणिज्यिक बैंकों को इन संस्थाओं को ऋण देने की अनुमति नहीं थी। हालांकि बाद में बैंकों द्वारा आईएनवीआईटी को ऋण देने की अनुमति दी गई, लेकिन अब तक आरईआईटी को ऋण देने की अनुमति नहीं थी। समीक्षा के पश्चात् एवं सूचीबद्ध आरईआईटी के लिए मजबूत विनियामक एवं अभिशासन ढांचे के अस्तित्व को ध्यान में रखते हुए, यह प्रस्तावित है कि वाणिज्यिक बैंकों को उचित विवेकपूर्ण सुरक्षा के अधीन आरईआईटी को वित्त प्रदान करने की अनुमति दी जाए। आईएनवीआईटी को ऋण देने संबंधी वर्तमान दिशानिर्देशों को भी आरईआईटी को ऋण देने के लिए प्रस्तावित विवेकपूर्ण सुरक्षाओं के साथ समानता स्थापित करने के लिए समायोजित किया जा रहा है। इस संबंध में शीघ्र ही निदेशों का मसौदा सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया जाएगा।

5. यूसीबी के लिए उधार मानदंडों की समीक्षा

हाल के वर्षों में, यूसीबी के उधार परिचालन में अधिक लचीलापन प्रदान करने के उद्देश्य से कई विनियामक उपाय किए गए हैं। अब यह प्रस्तावित है कि यूसीबी द्वारा गैर- जमानती ऋणों; नाममात्र सदस्यों को उधार देने की समय-सीमा; तथा आवास ऋणों के लिए अवधि एवं ऋण स्थगन आवश्यकताओं पर लागू वर्तमान विनियामक मानदंडों का तर्कसंगत ढंग से समीक्षा की जाए। प्रस्तावित समीक्षा में, अन्य बातों के साथ-साथ, पिछले कुछ वर्षों में यूसीबी के कुल ऋण एवं अग्रिमों में हुए वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, विवेकपूर्ण अनुशासन बनाए रखते हुए स्तरीकृत एवं सरलीकृत दृष्टिकोण अपनाया जाएगा। इस संबंध में शीघ्र ही निदेशों का मसौदा सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया जाएगा।

6. सार्वजनिक निधि का उपयोग न करने वाले और ग्राहक संपर्क न रखने वाले पात्र एनबीएफसी ('टाइप I एनबीएफसी' सहित) के लिए पंजीकरण से छूट

एनबीएफसी के लिए पैमाने-आधारित विनियामक ढांचा, उन एनबीएफसी के लिए भिन्न विनियामक व्यवहार की परिकल्पना करता है जो सार्वजनिक निधि का उपयोग नहीं करते और कोई ग्राहक संपर्क नहीं रखते है। उनकी विशिष्ट प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, इन एनबीएफसी पर वर्तमान में लागू विनियमों की समीक्षा की गई है। उनके तुलनात्मक रूप से बहुत कम प्रणालीगत जोखिम प्रोफाइल को ध्यान में रखते हुए, यह प्रस्तावित है कि ऐसी टाइप-I एनबीएफसी, जिनकी संपत्ति का आकार 1,000 करोड़ से अधिक न हो, को कतिपय निर्दिष्ट शर्तों के अधीन रिज़र्व बैंक के साथ पंजीकरण की आवश्यकता से छूट दी जा सकती है। प्रस्तावित छूट इन एनबीएफसी के लिए अनुपालन आवश्यकताओं को कम करेगी। तदनुसार, हितधारकों से प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए शीघ्र ही संशोधन निदेशों का मसौदा जारी किया जाएगा।

7. एनबीएफसी शाखा प्राधिकरण निदेश -2025 में संशोधन

वर्तमान विनियामक आवश्यकताओं के अनुसार, स्वर्ण संपार्श्विक के एवज में उधार देने के व्यवसाय में कार्यरत एनबीएफसी-निवेश एवं ऋण कंपनियाँ (आईसीसी) जिनकी 1,000 से अधिक शाखाएँ हैं, नई शाखाएँ खोलने के लिए आरबीआई की पूर्व अनुमति प्राप्त करने के लिए बाध्य हैं। एनबीएफसी-आईसीसी पर लागू व्यापक विवेकपूर्ण एवं अभिशासन ढांचे को ध्यान में रखते हुए, ऐसी एनबीएफसी द्वारा शाखाएँ खोलने के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता को समाप्त करने का प्रस्ताव है। इस संबंध में हितधारकों से टिप्पणियाँ प्राप्त करने के लिए शीघ्र ही निर्देशों का मसौदा जारी किया जाएगा।

II. भुगतान प्रणाली

8. "डिजिटल भुगतान में धोखाधड़ी रोकने के लिए सुरक्षा उपायों की खोज" पर चर्चा पत्र

पिछले दशक में, भारत में डिजिटल भुगतान अभूतपूर्व गति से विस्तारित हुए हैं, जो व्यक्तियों और व्यवसायों द्वारा वित्तीय लेनदेन करने के तरीके में संरचनात्मक परिवर्तन को दर्शाते हैं। हालांकि, इसके साथ ही निर्दोष ग्राहकों को निशाना बनाने वाली धोखाधड़ी की गतिविधियों में बढ़ती परिष्कृतता भी देखी गई है। सुरक्षित और संरक्षित तरीके से डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के उद्देश्य के अनुरूप, डिजिटल भुगतान में समन्वित सुरक्षा उपायों - जैसे विलंबित ऋण का परिचय, वरिष्ठ नागरिकों जैसे विशिष्ट उपयोगकर्ता वर्गों के लिए अतिरिक्त प्रमाणीकरण आदि के परिचय की खोज करने हेतु एक चर्चा पत्र जारी करने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित उपायों का उद्देश्य धोखाधड़ी को कम करना और ग्राहक सुरक्षा को मजबूत करना है।

III. वित्तीय समावेशन

9. अग्रणी बैंक योजना में संशोधन

भारतीय रिज़र्व बैंक ने अग्रणी बैंक योजना (एलबीएस) के वर्तमान दिशा-निर्देशों की विस्तृत समीक्षा की है। योजना के परिचालनगत पहलुओं को सुचारू बनाने के उद्देश्य से अब योजना पर निर्देशों का एक व्यापक समूह जारी करने का प्रस्ताव है। संशोधित योजना में, एलबीएस के उद्देश्यों और उन्हें प्राप्त करने के लिए आवश्यक ढांचे को स्पष्ट रूप से निर्धारित करने का प्रस्ताव है। संशोधित दिशा-निर्देशों से योजना की प्रभावशीलता में वृद्धि की उम्मीद है। शीघ्र ही सार्वजनिक परामर्श के लिए मसौदा परिपत्र जारी किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, रिज़र्व बैंक बैंक-वार एलबीएस डेटा की रिपोर्टिंग के लिए एक एकीकृत पोर्टल आरंभ करेगा, जो वर्तमान में विभिन्न पोर्टलों पर बंटा हुआ है। इससे डेटा की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार होने तथा एलबीएस के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बेहतर अंतर्दृष्टि प्रदान करने की आशा है।

10. किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के दिशा-निर्देशों में संशोधन

भारतीय रिज़र्व बैंक ने व्याप्ति का विस्तार, परिचालनगत पहलुओं को सुगम बनाने और उभरती आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से केसीसी योजना की व्यापक समीक्षा की है। अब बैंकों को इस योजना पर संशोधित निर्देश का एक समूह जारी करने का प्रस्ताव है, जिसमें कृषि एवं सहायक गतिविधियों से संबंधित निर्देशों का एकीकरण किया जाएगा। प्रस्तावित दिशा-निर्देशों में, अन्य बातों के अलावा, फसल ऋतु का मानकीकरण, केसीसी की अवधि को छह वर्ष तक बढ़ाना, प्रत्येक फसल ऋतु के लिए आहरण सीमा को वित्त के पैमाने (एसओएफ़) के साथ संरेखित करना तथा प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेपों पर व्यय को शामिल करना शामिल है। दिशा-निर्देशों का मसौदा शीघ्र ही जारी किया जाएगा।

11. बैंकों द्वारा कारोबार प्रतिनिधियों (बीसी) के उपयोग से संबंधित दिशानिर्देशों की समीक्षा

कारोबार प्रतिनिधि, वित्तीय सेवाओं तक अंतिम मील तक पहुँच के महत्वपूर्ण सुविधाकर्ता के रूप में कार्य कर रहे हैं, विशेष रूप से अल्पसेवित, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के संबंध में। रिज़र्व बैंक ने रिज़र्व बैंक, डीएफ़एस, आईबीए और नाबार्ड के अधिकारियों वाली एक समिति का गठन किया था, जिसका उद्देश्य उनके परिचालन की व्यापक जांच करना और उनकी दक्षता में सुधार के लिए उपयुक्त सिफारिशें करना था। समिति की सिफारिशों के आधार पर, संबंधित विनियामक दिशानिर्देशों की समीक्षा की जा रही है, और संशोधन दिशानिर्देशों का मसौदा शीघ्र ही सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किए जाएँगे।

12. संपार्श्विक रहित ऋण सीमा में 10 लाख से 20 लाख तक की वृद्धि

औपचारिक ऋण तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने, उद्यमिता को समर्थन देने तथा सीमित संपार्श्विक वाले सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (एमएसई) के लिए अंतिम चरण तक ऋण वितरण को मजबूत करने के उद्देश्य से, एमएसई के लिए संपार्श्विक रहित ऋण की सीमा 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख करने का निर्णय लिया गया है। उपरोक्त प्रावधान एमएसई उधारकर्ताओं के लिए 1 अप्रैल 2026 या उसके बाद स्वीकृत या नवीनीकृत सभी ऋणों पर लागू होंगे। इस संबंध में शीघ्र ही निर्देश जारी किए जाएंगे।

IV. वित्तीय बाज़ार

13. कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार का विकास

एक सक्रिय डेरिवेटिव्स बाजार ऋण जोखिमों के कुशल प्रबंधन में सहायता कर सकता है, कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में चलनिधि एवं दक्षता में सुधार कर सकता है तथा विभिन्न रेटिंग वाले कॉर्पोरेट बॉन्ड जारी करने में सुविधा प्रदान कर सकता है। 1 फरवरी 2026 को केंद्रीय बजट भाषण में घोषणा की गई थी कि कॉर्पोरेट बॉन्ड पर कुल रिटर्न स्वैप तथा कॉर्पोरेट बॉन्ड सूचकांकों पर डेरिवेटिव्स की शुरुआत की जाएगी। तदनुसार, ऋण सूचकांकों पर डेरिवेटिव्स तथा कॉर्पोरेट बॉन्ड पर कुल रिटर्न स्वैप शुरू करने के लिए एक विनियामक ढांचा शीघ्र ही सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिए जारी किया जाएगा।

14. प्राधिकृत व्यापारियों के विदेशी मुद्रा लेनदेन

विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम(फेमा), 1999 के तहत अधिकृत बैंकों और एकल प्राधिकृत व्यापारियों की पहुँच विदेशी मुद्रा बाजार में बाजार बनाने, तुलन-पत्र प्रबंधन तथा जोखिमों के बचाव के लिए होती हैं। घरेलू एवं वैश्विक स्तर पर वर्तमान बाजार पद्धतियों एवं आवश्यकताओं के मद्देनजर, ऐसे प्राधिकृत व्यापारियों (एडी) के लिए सुविधाओं को शासित करने वाले विनियामक ढांचे की समीक्षा की गई है और उसे युक्तिसंगत और परिष्कृत किया गया है। संशोधित ढांचा इन एडी को विदेशी मुद्रा उत्पादों, जोखिम प्रबंधन एवं प्लेटफॉर्मों के संबंध में अधिक लचीलापन प्रदान करता है। इस संबंध में शीघ्र ही मसौदा निदेश सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किए जाएंगे।

15. ऋण प्रतिभूतियों में एफपीआई निवेश के लिए स्वैच्छिक प्रतिधारण मार्ग की समीक्षा

स्वैच्छिक प्रतिधारण मार्ग (वीआरआर) को भारतीय ऋण बाजारों में दीर्घकालिक निवेश ब्याज वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) द्वारा निवेश के लिए एक अतिरिक्त चैनल प्रदान करने के उद्देश्य से मार्च 2019 में रिज़र्व बैंक द्वारा शुरू किया गया था। वर्षों से, बैंक ने परिचालनगत लचीलेपन और व्यवसाय करने में सुगमता में सुधार लाने के लिए इस मार्ग को पुनर्निर्धारित किया है। वीआरआर के तहत एफपीआई द्वारा सक्रिय निवेश हो रहा है, और 2.5 लाख करोड़ की वर्तमान निवेश सीमा का 80 प्रतिशत से अधिक उपयोग किया जा चुका है। वीआरआर के तहत निवेश सीमाओं की उपलब्धता के बारे में पूर्वानुमान सुनिश्चित करने और व्यवसाय करने में आगे सुगमता बढ़ाने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया है कि (क) अब वीआरआर के तहत निवेश को सामान्य मार्ग के तहत एफपीआई निवेश सीमा के अंतर्गत गिना जाएगा; और (ख) वीआरआर के तहत निवेश करने वाले एफपीआई को कतिपय अतिरिक्त परिचालनगत लचीलेपन प्रदान किए जाएंगे। आवश्यक निदेश अलग से जारी किए जाएंगे।

V. क्षमता निर्माण

16. मिशन सक्षम – यूसीबी क्षेत्र के लिए क्षमता निर्माण

प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंक (यूसीबी) वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने और बैंक रहित क्षेत्रों की सेवा करने के लिए महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। उनके अगले चरण के विकास को सुनिश्चित करना उनमें मजबूत कौशल और योग्यताओं के साथ-साथ तकनीकी क्षमताओं और परिचालनात्मक आघात- सहनीयता के विकास पर निर्भर करेगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, भारतीय रिज़र्व बैंक शीघ्र ही मिशन सक्षम (सहकारी बैंक क्षमता निर्माण) — एक क्षेत्रव्यापी क्षमता निर्माण और प्रमाणन ढांचा शुरू करने जा रहा है। क्षेत्र के क्षमता निर्माण को बड़ी संख्या में भौतिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के साथ-साथ एक मापनीय ज्ञान अर्जित करने के मंच के माध्यम से कार्यान्वित किया जाएगा, जो सभी कार्यक्रमों में लगभग 1.40 लाख प्रतिभागियों को शामिल करेगा। रिज़र्व बैंक इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सहभागी यूसीबी के निकट स्थित स्थानों पर आयोजित करने का प्रयास करेगा और जहाँ तक संभव हो, सामग्री की प्रस्तुति क्षेत्रीय भाषाओं में की जाएगी। यह मिशन यूसीबी के समावेशक (अंबरेला) संगठन और राष्ट्रीय/राज्य संघ के साथ साझेदारी में आगे बढ़ाया जाएगा।

(ब्रिज राज)   
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2025-2026/2055


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