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मास्टर निदेशों

मास्टर निदेश - अपने ग्राहक को जानिए (केवाईसी) निदेश, 2016 (04 मई 2023 को संशोधित)

भारिबैं/बैंविवि/2015-16/18
डीबीआर.एएमएल.बीसी.सं.81/14.01.001/2015-16

25 फरवरी 2016
(04 मई 2023 को संशोधित)
(28 अप्रैल 2023 को संशोधित)
(10 मई 2021 तक संशोधित)
(01 अप्रैल 2021 तक संशोधित)
(23 मार्च 2021 तक संशोधित)
(18 दिसंबर 2020 तक संशोधित)
(20 अप्रैल 2020 तक संशोधित)
(01 अप्रैल 2020 तक संशोधित)
(09 जनवरी 2020 तक संशोधित)
(09 अगस्त 2019 तक संशोधित)
(29 मई 2019 तक संशोधित)

मास्टर निदेश - अपने ग्राहक को जानिए (केवाईसी) निदेश, 2016

अनुक्रमणिका
प्रस्तावना
अध्याय – I
प्रारंभिक
अध्याय – II
सामान्य
अध्याय – III
ग्राहक स्वीकरण नीति
अध्याय – IV
जोखिम प्रबंधन
अध्याय V
ग्राहक पहचान क्रि‍यावि‍धि ‍(सीआईपी)
अध्‍याय VI
ग्राहक के संबंध में समुचित सावधानी प्रक्रिया (सीडीडी)
भाग I – व्‍यक्तियों के मामले में सीडीडी प्रक्रिया
भाग II - एकल स्‍वामित्‍व वाली फर्मों के लिए सीडीडी उपाय
भाग III – विधिक संस्थाओं के लिए सीडीडी उपाय
भाग – IV हिताधिकारी स्वामी की पहचान
भाग – V धारणीय समुचित सावधानी
भाग VI – संवर्धित और सरलीकृत समुचित सावधानी प्रक्रिया
अध्‍याय VII
अभिलेख प्रबंधन
अध्याय VIII
वित्तीय आसूचना इकाई –इंडिया (एफ़आईयूआईएनडी) को रिपोर्टिंग कीअपेक्षाएँ
अध्याय IX
अंतरराष्ट्रीय करारों के तहत अपेक्षाएँ/ बाध्यताएँ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से संपर्क
अध्याय X
अन्य अनुदेश
अध्‍याय XI
निरसन प्रावधान
अनुबंध I
अनुबंध II
अनुबंध III
अनुबंध IV
परिशिष्ट
मास्टर निदेश जारी होने के बाद आंशिक रूप से प्रतिस्थापित परिपत्रों की सूची

1प्रस्तावना

बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों को धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग (एमएल))/आतंकवादी वित्तपोषण (टीएफ) के लिए एक चैनल के रूप में प्रयोग किए जाने से रोकने के लिए और वित्तीय प्रणाली की अखंडता एवं स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए, विभिन्न नियमों तथा विनियमों को निर्धारित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ), जो 1989 में अपने सदस्य अधिकार क्षेत्र के मंत्रियों द्वारा स्थापित एक अंतर-सरकारी निकाय है, इस निकाय द्वारा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की अखंडता के लिए धन शोधन, आतंकवादी वित्तपोषण और अन्य संबंधित खतरों से निपटने के लिए मानक निर्धारित किए जाते हैं और कानूनी, विनियामक एवं परिचालन उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन को बढ़ावा दिया जाता है। भारत, एफ़एटीएफ़ का सदस्य होने के नाते, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की अखंडता की रक्षा के उपायों को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत में, धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 और धन-शोधन निवारण (अभिलेखों का रखरखाव) नियम, 2005, के माध्यम से धन-शोधन-रोधी (एएमएल) और आतंकवाद के वित्तपोषण का मुकाबला करने (सीएफटी) पर कानूनी ढांचा तैयार किया जाता है। भारत सरकार द्वारा समय-समय पर यथासंशोधित पीएमएल अधिनियम, 2002 और पीएमएल नियम, 2005 के प्रावधानों के अनुसार, विनियमित संस्थाओं (आरई) को खाता-आधारित संबंध स्थापित करके या अन्यथा लेनदेन करते समय कुछ ग्राहक पहचान प्रक्रियाओं का पालन करने और उनके लेनदेन की निगरानी करने की आवश्यकता होती है।

2. तदनुसार, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35ए, बैंककारी विनियमन अधिनियम (एएसीएस), 1949, पूर्वोक्त अधिनियम की धारा 56, के साथ पठित भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45जेए, 45के और 45एल, भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम 2007 (2007 का अधिनियम 51) की धारा 18 के साथ पठित धारा 10 (2), विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 की धारा 11(1), धन शोधन निवारण (अभिलेख रखरखाव) नियम, 2005 का नियम 9(14) और इस संबंध में रिज़र्व बैंक को अधिकार प्रदान करने वाले अन्य सभी कानूनों द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा इस बात से संतुष्ट होने पर कि ऐसा करना जनहित में आवश्यक और समीचीन है, एतदद्वारा इसके बाद निर्दिष्ट निदेश जारी किए जाते हैं।

अध्याय – I

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ

(क) इन निदेशों को भारतीय रिज़र्व बैंक (अपने ग्राहक को जानिए (केवाईसी)) निदेश, 2016 कहा जाएगा।

(ख) ये निदेश उसी दिन से लागू होंगे, जिस दिन इन्हें भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट पर रखा जाएगा।

2. प्रयोज्यता

(क) इन निदेशों के प्रावधान, जब तक कि अन्यथा विनिर्दिष्ट न किया गया हो, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित सभी संस्थाओं, खास तौर से नीचे मद सं. 3(ख)(xiii) में पारिभाषित संस्थाओं पर लागू होंगे।

(ख) ये निदेश विनियमित संस्थाओं (आरई) की सभी विदेश स्थित शाखाओं और बहुलांश धारित अनुषंगियों पर भी उस सीमा तक लागू होंगे, जहां तक वे मेजबान देश के स्थानीय क़ानूनों से विसंगत न हों, बशर्ते कि:

  1. जहां लागू कानून और विनियम इन निदेशों के कार्यान्वयन का निषेध करते हों, वहाँ इसकी सूचना भारतीय रिज़र्व बैंक को दी जाए।

  2. यदि भारतीय रिज़र्व बैंक और मेजबान देश के विनियामकों द्वारा निर्दिष्ट केवाईसी/ एएमएल मानकों में कोई अंतर हो तो विनियमित संस्थाओं की शाखाओं/ विदेशी अनुषंगियों को दोनों में से ज्यादा सख्त विनियम अपनाने होंगे।

  3. विदेश में निगमित बैंकों की शाखाओं/ अनुषंगियों को दोनों, यानि कि, भारतीय रिज़र्व बैंक और उनके गृह देश के विनियामकों द्वारा विनिर्दिष्ट मानकों में से ज्यादा सख्त विनियम अपनाने होंगे।

बशर्ते कि यह नियम अध्याय VI की धारा 23 में बताए गए ‘छोटे खातों’ पर लागू नहीं होगा।

3. परिभाषाएं

जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, इन निदेशों में दिए गए शब्दों के अर्थ वही होंगे, जो नीचे दिए गए हैं :

(क) धन शोधन नि‍वारण अधि‍नि‍यम (पीएमएलए), 2002 और धन शोधन नि‍वारण (अभिलेखों का रखरखाव) नि‍यम, 2005 में सम्मिलित शब्दों के दिए गए अर्थ:

i. 2“आधार संख्या", का आशय है आधार (वित्तीय और अन्य सहायिकियों, प्रसुविधाओं और सेवाओं का लक्ष्यित परिदान) अधिनियम, 2016 (2016 का 18) की धारा (2) के खंड (क) में दिया गया अर्थ।

ii. क्रमशः “अधिनियम” और “नियम” का आशय है धन शोधन नि‍वारण अधि‍नि‍यम (पीएमएलए), 2002 और धन शोधन नि‍वारण (अभिलेखों का रखरखाव) नि‍यम, 2005 और उनमें किए गए संशोधन।

iii. 3”अधिप्रमाणन”, आधार प्रमाणीकरण के संदर्भ में, आधार की धारा 2 की उपधारा (सी) के तहत परिभाषित प्रक्रिया का अर्थ है आधार (वित्तीय और अन्य सहायिकियों, प्रसुविधाओं और सेवाओं का लक्ष्यित परिदान) अधिनियम, 2016

iv. हिताधिकारी स्वामी (बीओ)

क. जहां ग्राहक कोई कंपनी है, वहां हिताधिकारी स्वामी वह प्राकृतिक व्यक्ति है, जो अकेले या किसी के साथ मिलकर, या एक अथवा एकाधिक विधिक संस्था के जरिए कार्य करता है एवं जिसके पास नियंत्रक स्वामित्व हैं या जो किसी और माध्यम से नियंत्रण रखता है।

स्पष्टीकरण - इस उपखंड के प्रयोजन के लिए

1. 4“नियंत्रणकारी स्वामित्व हित’’ का अर्थ है कंपनी के 10 प्रतिशत से अधिक शेयर या पूंजी या लाभ का स्वामित्व या हकदारी।

2. “नियंत्रण’’ शब्द में शेयरधारिता या प्रबंधन अधिकार या शेयरहोल्डर समझौते या वोटिंग समझौते के कारण प्राप्त अधिकार के तहत अधिकांश निदेशकों की नियुक्ति या प्रबंधन का नियंत्रण या नीति निर्णय लेना सम्मिलित है।

ख. जहां ग्राहक कोई भागीदारी फ़र्म है, वहां हिताधिकारी स्वामी वह/वे नैसर्गिक व्यक्ति है/हैं, जो अकेले या किसी के साथ मिलकर, या एक अथवा एकाधिक विधिक संस्था के जरिए, भागीदारी फार्म की पूंजी या लाभ में से 15 प्रतिशत से ज्यादा का स्वामित्व या हकदारी रखते हों।

ग. जहां ग्राहक कोई अनिगमित संस्था या व्यक्तियों का निकाय है, वहां हिताधिकारी स्वामी वह/वे नैसर्गिक व्यक्ति है/हैं, जो अकेले या किसी के साथ मिलकर, या एक अथवा एकाधिक विधिक संस्था के जरिए, पूंजी या लाभ में से 15 प्रतिशत से ज्यादा का स्वामित्व या हकदारी रखते हों।

स्पष्टीकरण: ‘व्यक्तियों के निकाय’ में सोसाइटी शामिल हैं। जब उपर्युक्त मद (क), (ख) या (ग) के अंतर्गत किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान न की जा सकती हो, तब हिताधिकारी स्वामी वह प्राकृतिक व्यक्ति होगा जो वरिष्ठ प्रबंधन अधिकारी के पद को धारण किए हो।

घ. 5जहां ग्राहक कोई न्यास है, वहां हिताधिकारी स्वामी/स्वामियों की पहचान में ट्रस्ट निर्माता, ट्रस्टी, न्यास में 10% या उससे अधिक के लाभार्थी और कोई अन्य नैसर्गिक व्यक्ति जो किसी नियंत्रण शृंखला या स्वामित्व द्वारा न्यास पर अंतिम प्रभावी नियंत्रण रखता है, की पहचान को शामिल किया जाएगा।

v. 6“प्रमाणित प्रति” - विनियमित इकाई द्वारा प्रमाणित प्रति प्राप्त करने का अर्थ होगा कि ग्राहक द्वारा प्रस्तुत आधार नंबर होने का प्रमाण, जहां ऑफलाइन सत्यापन नहीं किया जा सकता है या आधिकारिक रूप से वैध दस्तावेज़ की प्रतिलिपि की तुलना मूल के साथ की गई हो और इसे प्रतिलिपि पर विनियमित संस्था के प्राधिकृत अधिकारी द्वारा अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार दर्ज किया गया हो।

बशर्ते कि विदेशी मुद्रा प्रबंधन (जमा) विनियम, 2016 {फेमा5 (आर)} में गैर-निवासी भारतीयों (एनआरआई) और भारतीय मूल के व्यक्तियों (पीआईओ) के मामले में, वैकल्पिक रूप से, मूल सत्यापित प्रति, निम्नलिखित में से किसी एक द्वारा प्रमाणित किया गया हो, प्राप्त किया जा सकता है:

  • भारत में पंजीकृत अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की विदेशी शाखाओं के अधिकृत अधिकारी,

  • विदेशी बैंकों की शाखाएं जिनके साथ भारतीय बैंक संबंध रखते हैं,

  • विदेश में नोटरी पब्लिक,

  • कोर्ट मजिस्ट्रेट,

  • न्यायाधीश,

  • जिस देश में गैर-निवासी ग्राहक रहता है, वहां भारतीय दूतावास/ कांसुलेट जनरल

vi. “सेंट्रल केवाईसी रिकॉर्ड्स रजिस्ट्री" (सीकेवाईसीआर) का आशय उक्त नियम के नियम 2(1) के अंतर्गत यथा पारिभाषित संस्था से है, जो किसी ग्राहक से केवाईसी रिकॉर्ड्स को डिजिटल रूप में प्राप्त, भंडारित तथा सुरक्षित रखती है और उपलब्ध कराती है।

vii. “पदनामित निदेशक’’ का आशय विनियमित संस्था द्वारा पीएमएल अधिनियम के अध्‍याय IV और नियम के अधीन अपेक्षित समस्‍त प्रतिबद्धताओं का समग्र अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए नामित व्‍यक्ति से है और इनमें निम्‍नलिखित सम्मिलित है:

  1. यदि विनियमित संस्था कोई कंपनी है तो प्रबंध निदेशक या निदेशक बोर्ड द्वारा सम्यक रूप से प्राधिकृत पूर्णकालिक निदेशक;

  2. प्रबंध भागीदार यदि रिपोर्ट करने वाली विनियमित संस्था भागीदारी फर्म है;

  3. यदि रिपोर्ट करने वाली विनियमित संस्था कोई स्‍वत्‍वधारित प्रतिष्ठान है तो स्‍वत्‍वधारी;

  4. यदि रिपोर्ट करने वाली विनियमित संस्था कोई न्‍यास है तो प्रबंधन्‍यासी;

  5. यदि विनियमित संस्था अनिगमित संगठन अथवा व्यक्तियों का निकाय हो तो यथास्थिति कोई व्‍यक्ति या व्‍यष्टि (Individual) जो विनियमित संस्था का नियंत्रण और कार्यों का प्रबंधन करता हो, और

  6. सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के संबंध में ऐसा व्‍यक्ति जो वरिष्ठ प्रबंधन या समतुल्य रूप में ‘पदनामित निदेशक’ के रूप में पदनामित हों।

स्‍पष्‍टीकरण - इस खंड के प्रयोजन के लिए 'प्रबंध निदेशक' और 'पूर्णकालिक निदेशक' शब्दों के वही अर्थ होंगे जो कंपनी अधिनियम, 2013 में दिया गया है।

viii. 7"डिजिटल केवाईसी" का अभिप्राय है ग्राहक की लाइव फोटो कैप्चर करना और आधिकारिक रूप से वैध दस्तावेज या आधार संख्या होने का प्रमाण, जहां ऑफ़लाइन सत्यापन नहीं किया जा सकता है, साथ ही उस स्थान का अक्षांश और देशांतर भी होना चाहिए जहां उक्त लाइव फोटो अधिनियम में दिए गए प्रावधानों के अनुसार रिपोर्टिंग संस्था (आरई) के किसी प्राधिकृत अधिकारी द्वारा ली जा रही हो।

ix. 8"डिजिटल हस्ताक्षर" का अर्थ वही होगा जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) की धारा (2) की उपधारा (1) के खंड (पी) में इसे दिया गया है।

x. 9“समतुल्य ई-अभिलेख"का अभिप्राय है किसी अभिलेख का इलेक्ट्रॉनिक समतुल्य, जिसे ऐसे अभिलेख जारी करने वाले प्राधिकारी द्वारा वैध डिजिटल हस्ताक्षर सहित जारी किया गया हो और जिसमें सूचना प्रौद्योगिकी (डिजिटललॉकर सुविधाएं देने वाले मध्यस्थों द्वारा सूचना का संरक्षण और प्रतिधारण) नियम, 2016 के नियम 9 के अनुसार ग्राहक के डिजिटल लॉकर खाते में जारी अभिलेख शामिल हैं।

xi. 10“समूह” – शब्द "समूह" का वही अर्थ होगा जो आयकर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 286 की उप-धारा (9) के खंड (ई) में दिया गया है।

xii. 11“अपने ग्राहक को जानिए (केवाईसी) आइडेंटिफायर" का अभिप्राय है किसी ग्राहक को केंद्रीय केवाईसी अभिलेख रजिस्ट्री द्वारा दी गई अद्वितीय संख्या या कोड।

xiii. 12“'गैर लाभ अर्जक संगठन' (एनपीओ)” का अर्थ है कोई इकाई या संगठन, आयकर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 2 के खंड (15) में निर्दिष्ट धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए गठित, जो सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 या किसी समान राज्य के तहत ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत है कानून या कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 8 के तहत पंजीकृत कंपनी।

xiv. 'आधिकारिक रूप से वैध दस्तावेज़' (ओवीडी) का अभिप्राय पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, 13आधार संख्या होने का प्रमाण, भारत के चुनाव आयोग द्वारा जारी मतदाता पहचान पत्र, राज्य सरकार के किसी अधिकारी द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित नरेगा के तहत जारी जॉब कार्ड और एनपीआर द्वारा जारी पत्र जिसमें नाम और पता दिया गया हो।

बशर्ते कि,

क. जहां ग्राहक ओवीडी के रूप में आधार संख्या होने का अपना प्रमाण प्रस्तुत करता है, वह इसे ऐसे रूप में प्रस्तुत कर सकता है जैसे कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण द्वारा जारी किया जाता है।

ख. 14जहां ग्राहक द्वारा प्रस्तुत ओवीडी में अद्यतन पता नहीं है, निम्नलिखित दस्तावेज या उसके समतुल्य ई-दस्तावेज को पते के प्रमाण के सीमित उद्देश्य के लिए ओवीडी माना जाएगा:-

i. किसी भी सेवा प्रदाता का यूटिलिटी बिल (बिजली, टेलीफोन, पोस्ट-पेड मोबाइल फोन, पाइप्ड गैस, पानी का बिल) जो दो महीने से अधिक पुराना नहीं है;

ii. संपत्ति या नगरपालिका कर रसीद;

iii. पेंशन या परिवार पेंशन भुगतान आदेश (पीपीओ) जो सरकारी विभागों या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा सेवानिवृत्त कर्मचारियों को जारी किए जाते हैं, यदि उसमें पता दिया गया है;

iv. राज्य सरकार या केंद्र सरकार के विभागों, सांविधिक या विनियामक निकायों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, अनुसूचितवाणिज्यिक बैंकों, वित्तीय संस्थानों और सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा जारी किए गए नियोक्ता से आवास के आवंटन का पत्र और ऐसे नियोक्ताओं को आधिकारिक आवास आवंटित करने के साथ अनुमति और अनुज्ञप्ति समझौते;

ग. ग्राहक ऊपर ‘ख” मे दिए गए दस्तावेजों को जमा करने के तीन महीने की अवधि के भीतर वर्तमान पते के साथ ओवीडी प्रस्तुत करेगा

घ. जहां विदेशी नागरिक द्वारा प्रस्तुत ओवीडी में पते का विवरण नहीं होता है, ऐसे मामले में विदेशी न्याय क्षेत्र के सरकारी विभागों द्वारा जारी दस्तावेज और भारत में विदेश&