वित्तीय बाजार

सुचारू ढ़ंग से कार्य करने वाले, चलनिधि युक्त और लचीले वित्तीय बाजार मौद्रिक नीति अंतरण और भारत के विकास के वित्तपोषण में अपरिहार्य जोखिमों के आवंटन और अवशोषण में सहायता करते हैं।

भाषण


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कॉरपोरेट ऋण बाजार : समय की मांग – पुनरावलोकन

गुड मॉर्निंग देवियों और सज्जनों !

2. कॉर्पोरेट कर्ज बाजार पर इस शिखर वार्ता के आयोजन के लिए में केयर रेटिंग को धन्यवाद देता हूँ । जैसा कि मै देख रहा हूँ, सेमीनार की विषयवस्तु अत्यंत व्यापक है और हमें इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व कर रहे कुछ उत्कृष्ट वक्ताओं को सुनने का अवसर मिल रहा है और उनके विचारों को जानना काफी रोचक होगा। एक नियामक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक में किसी बाजार के विकास के संबंध में हम अपना स्वतंत्र दृष्टिकोण रखते हैं, लेकिन बाजार के प्रतिभागियों को सुनना हमारे लिए हमेशा मायने रखता है क्योंकि मुद्दों पर विचार-विमर्श करके ही हम किसी व्यावहारिक समाधान तक पहुंच सकते हैं। मुझे विश्वास है कि आज़ यहाँ होने वाले चिंतन–मनन से हमें काफी कुछ सीखने को मिलेगा।

भारत में कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार - वर्तमान स्थिति

3. हाल के वर्षों में भारतीय कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार में, संख्या और राशि दोनों मामले में, कुछ वृद्धि हुई है। मार्च 2011 के अंत में बकाया इशूज की जो संख्या 12,155 थी, दिसम्बर 2014 के अंत तक बढ़कर 18,664 हो गई । इसी अवधि के दौरान बकाया राशि 8895 बिलियन रू० से बढ़कर 16,485 बिलियन रू० हो गई। विविध प्रकार के जो बॉण्ड जारी किए गए उनमें नियत दर बॉण्ड, फ्लोटिंग रेट बॉण्ड, स्ट्रक्चर्ड नोट्स और अन्य प्रकार शामिल हैं, जबकि संख्या और मूल्य दोनों में नियत दर बॉण्ड अधिकतम रहे। इन इशूज की एक विशेषता यह रही है कि लगभग सभी इशू वित्तीय क्षेत्र की संस्थाओं द्वारा किये गए थे। हमारे कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार की एक और विशेषता यह है कि यहाँ प्राइवेट प्लेसमेंट अधिक चलन में है। पब्लिक इशू जो 2010-11 में 94.51 बिलियन रू० थे, 2013-14 में बढ़कर 423.83 मिलियन रू० हो गए, हालांकि चालू वर्ष में यह कम होकर फ़रवरी 2015 तक 90.49 बिलियन रू० रह गया। प्राइवेट प्लेसमेंट वर्ष 2010-11 में 2187.85 बिलियन रू०, 2011-12 में 2612.82 बिलियन रू०, 2012-13 में 36.1462 बिलियन रू०, 2013-14 में 2760.54 बिलियन रू० और चालू वर्ष में दिसम्बर 2014 तक 2692.45 बिलियन रू० था। द्वितीयक बाजार ट्रेडिंग 2010-11 में 6053 बिलियन रू०, 2011-12 में 5938 बिलियन रू०, 2012-13 में 7386 बिलियन रू०, 2013-14 में 9708 बिलियन रू० और चालू वर्ष में फ़रवरी 2015 तक 10043 बिलियन रू० था।

4. हालांकि ऊपर बताए गए आंकड़ों से कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार की गतिविधि की संख्या और मात्रा में एक स्वस्थ विकास का संकेत मिलता है, सरकारी बॉण्ड बाजार की तुलना में कॉर्पोरेट बॉण्ड बाजार अल्पविकसित है। नीचे तालिका में कुछ प्रमुख एशियाई देशों के बीच मार्च 2013 के अनुसार सरकारी बॉण्ड और कॉरपोरेट बॉण्ड की एक तुलनात्मक स्थिति सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में दी गई है, जो कुछ प्रमुख एशियाई देशों की तुलना में भारत की स्थिति बहुत कम दर्शाती है।

सकल घरेलू उत्पाद मार्च 2013 के प्रतिशत के रूप में सरकार और कंपनियों के बॉन्ड्स
जीडीपी के % के रूप में कर्ज़ सरकार कॉर्पोरेट कुल
पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना 33.1 13.0 46.2
हाँग काँग 37.8 31.4 69.2
इन्डोनेशिया 11.4 2.3 13.7
रिपब्लिक ऑफ कोरिया 48.7 77.5 126.2
मलेशिया 62.4 43.1 105.5
फ़िलीपिन्स 32.2 4.9 37.1
सिंगापुर 53.1 37.0 90.1
थाइलैंड 58.6 15.9 74.4
वियतनाम 19.8 0.7 20.5
भारत 49.1 5.4 54.5

भारतीय कॉर्पोरेट ऋण बाजार - एक पहेली

5. इस प्रकार भारत में कॉर्पोरेट ऋण बाजार काफी रहस्यपूर्ण रहा है। हम उन समस्याओं की बात करते रहते हैं जो इसकी प्रगति में बाधक हैं और उनके समाधान पर भी बात करते हैं। फिर भी, कई प्रयासों के बावजूद इस क्षेत्र में सीमित प्रगति हुई है और मानो किसी तरह का गुरुत्वाकर्षण है जो हमें नीचे की ओर खींचे हुए है। कॉरपोरेट बॉण्ड और 2005 के प्रतिभूतिकरण पर आर एच पाटील समिति की रिपोर्ट आई जिसने हम सभी के लिए एक संदर्भ स्रोत का कार्य किया है। तथापि, कॉर्पोरेट ऋण क्षेत्र के विकास में हुई प्रगति अधिक संतोषजनक नहीं रही है और जाहिर तौर पर इस विषय पर फिर से बात करने की आवश्यकता है। कई सुझाव दिए गए हैं - कुछ मिश्रित सफलता के साथ लागू भी किए गए हैं।

6. फिर भी, जैसा कि पहले कहा गया है, ऋण बाजार काफी हद तक वित्तीय संस्थानों तक ही सीमित है, और इसमें कॉरपोरेट्स ज़्यादा नहीं हैं। इस सीमित परिधि के भीतर भी सार्वजनिक इशू की संख्या कम है और ऋण पत्र के प्राइवेट प्लेसमेंट को ही पसंद किया जाता है। यह पहेली का वह शुरुआती बिंदु है जिसका विश्लेषण करने की जरूरत है।

7. पहेली का एक अन्य हिस्सा हमारी अपने उपलब्धि से संबंधित है। वित्तीय वर्ष 2008 में हमारी विकास दर लगभग 10 प्रतिशत थी और, चूँकि वित्तपोषण कोई समस्या नहीं थी, उस वर्ष हमारे निवेश का अनुपात 38.1% था। देखने पर ग़लती से ऐसा लग सकता है कि कॉर्पोरेट ऋण बाजार में विकास के अभाव के बारे में भी चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं है। आखिर, क्या हमने 38.1% की निवेश दर नहीं पायी है? समस्या बड़ी नहीं प्रतीत होने का कारण यह है कि हम अपनी क्षमता से बहुत कम स्तर पर काम कर रहे हैं । हम समझ नहीं रहे हैं कि दीर्घकालिक संसाधनों में कमी निवेश के रास्ते में गंभीर बाधा बन सकती है। इसलिए, सवाल यह पूछा जाना चाहिए हम इस स्थिति में कब तक रह सकते हैं।

8. अगले पांच साल तक 8-10% के औद्योगिक विकास और बुनियादी ढांचे के विकास दोनों के लिए हमें बड़ी मात्रा में वित्तपोषण की दरकार है। वर्तमान में औद्योगिक विकास ठहराव के चरण में है और नीति कार्रवाई से सम्बद्ध विविध कारणों से बुनियादी ढांचा संतोषजनक स्तर से काफी नीचे है और धन के लिए मांग वास्तव में अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँची है। जाहिर है हमें इसके कारण अति-संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए और इस अवधि में हमें अपने कॉर्पोरेट ऋण बाजार को विकसित करने के लिए संरचनाओं के निर्माण का काम करना चाहिए।

कॉर्पोरेट ऋण बाजार को विकसित करने की आवश्यकता

9. सरकार द्वारा धन लगाने की अपनी सीमाएँ हैं क्योंकि राजकोषीय जिम्मेदारी संबंधी लक्ष्य धनराशि पाने के लिए बहुत कम गुंजाइश छोड़ता है। यद्यपि वाणिज्यिक बैंक कॉर्पोरेट और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों की निवेश संबंधी जरूरतों को पूरा करते हैं,उनकी भी अपनी सीमाएँ हैं। हमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और बाह्य उधारी से समर्थन मिला है, लेकिन उनकी अपनी गति और आकार है। जब वैश्विक ब्याज दरें कम हों, बाह्य वाणिज्यिक उधारी एक अच्छा तरीका है। लेकिन हमारे विदेशी ऋण के कुपरिणाम महत्वपूर्ण हैं, और चूंकि हम विभिन्न क्षेत्रों में बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) की अनुमति देते रहे हैं, विदेशी ऋण का स्तर लगातार बढ़ रहा है जिससे चुकौती की समस्याएँ आएंगी। अपने सहजज्ञान से हम अनुमान लगा सकते हैं कि लंबी अवधि के लिए धन जुटाने की इस प्रक्रिया में पूंजी बाजार उत्तरोत्तर अधिक प्रासंगिक होता जाएगा।

10. अर्थशास्त्रियों की दलील है कि पर्याप्त आकार के कॉर्पोरेट ऋण बाजार के अभाव में कोई अर्थव्यवस्था अनावश्यक रूप से बड़े आकार के बैंकिंग प्रणाली की ओर जाती है। इसका एक परिणाम यह भी होता है कि ऋण बाजार का एक बड़ा हिस्सा, मुक्त बाजार की शक्तियों के बिना, जरूरत से ज्यादा विनियमित किया जाता है। इस तरह का असंतुलन वांछनीय नहीं है क्योंकि इससे क्रोनी पूंजीवाद, बैंकों द्वारा खराब ऋण देने और कंपनियों द्वारा लापरवाह निवेश करने के लिए अनुकूलतम परिस्थितियों का निर्माण होता है। बैंक वित्त के बजाय कॉरपोरेट बॉण्ड के माध्यम से संसाधनों के वित्त पोषण से उधारकर्ताओं के मन में बेहतर ऋण अनुशासन की भावना आती है क्योंकि चूक की घटनाएं तुरंत पकड़ ली जाती हैं और सार्वजनिक डोमेन में रख दी जाती हैं। प्रकटीकरण संबंधी अपेक्षाएं डिफ़ॉल्ट या देरी से भुगतान को हतोत्साहित करने का बड़ा कारण बनती हैं। यह देखा गया है कि किसी डिफ़ॉल्ट के अनर्जक आस्तियों के रूप में पहचाने जाने के लिए 90 दिनों की अवधि के विनियामक मानदंड को उधारकर्ताओं द्वारा देय तिथि से 89वें दिन तक चुकौती रोक कर रखने का उपाय मान लिया जाता है। दूसरी ओर, कॉरपोरेट बॉण्ड के जारीकर्ता द्वारा एक भी दिन का डिफ़ॉल्ट बाजार में डिफ़ॉल्ट के रूप में मान लिया जाएगा और डिफ़ॉल्ट की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो जाएगी। इसके अलावा, इस तरह की जानकारी/जोखिम बाह्य क्रेडिट रेटिंग और क्रेडिट डेरिवेटिव कारोबार में भी रियल टाइम आधार पर दिखाई देती है । बैंक वित्त में ऋण का मूल्य निर्धारण भी बेअसर हो जाता है क्योंकि ऋण सुविधाएं ऋण लेने की पात्रता के आधार पर ही नहीं, बल्कि बैंकों और उनके उधारकर्ताओं के बीच संबंधों के आधार पर भी दी जाती हैं। । कॉर्पोरेट बॉण्ड के माध्यम से वित्त पोषण द्वारा इस तरह की विकृतियों को काफी हद तक दूर किया जा सकता है, क्योंकि निवेशक कम ऋण पात्रता वाले इशूज के लिए उच्च ब्याज दर (कूपन) की मांग करेंगे तथा बुनियादी रूप से मजबूत और ठोस व्यापार वाले उधारकर्ता वित्तपोषण की कम लागत के द्वारा पुरस्कृत किए जाएंगे। इस प्रकार एक कुशल, अच्छी तरह से विकसित और तरल कॉर्पोरेट ऋण बाजार के कई फायदे हैं।

11. भारत जैसे देश के लिए, जहां धन की आवश्यकता व्यापक पैमाने पर, और सतत वृद्धिशील है, विकसित ऋण बाजार उदा. कॉर्पोरेट ऋण बाजार के महत्व को सर्वत्र स्वीकार किया गया है और हालांकि हाल ही में विनियामक और नीति के मोर्चे पर विभिन्न उपाय शुरू किए गए हैं, देश में कॉर्पोरेट ऋण बाजार की काफी हद तक अप्रयुक्त क्षमता को विकसित करने और उसका संवर्धन करने के लिए बाजार के सभी सहभागियों की ओर से ठोस प्रयास किया जाना आवश्यक है।

विशेषज्ञ समितियां

12. भारत में, उत्तरोत्तर, बैंक वित्तपोषण फंडिंग पैटर्न की तुलना में कॉर्पोरेट वित्तपोषण आवश्यकताओं का अध्ययन करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अनेक समितियों और कार्य-दलों को स्थापित किया गया था। इनमे से मुख्य थे चोरे समिति, टंडन समिति आदि। इन समितियों ने समान रूप से सिफारिश की है कि अल्पकालीन आवर्ती व्यय के लिए बैंक वित्त पर कॉर्पोरेट की निर्भरता को कम करने की आवश्यकता है। चोरे समिति ने विशेष रूप से सिफारिश की है कि बैंक वित्त पर सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों में मध्यम और बड़े ऋण लेने वालों की अति-निर्भरता को कम करने की जरूरत है।

13. अभी हाल ही में, कॉरपोरेट बांड्स पर श्री आर एच पाटील की अध्यक्षता में स्थापित एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति ने दिसंबर 2005 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है और उसमें कई सिफारिशें की गई हैं। इनमें स्टैम्प शुल्क संरचना और जारी करने की लागतों को युक्तिसंगत बनाने, स्रोत पर कर की कटौती, प्रतिभूतिकरण को प्रोत्साहित करने, कॉरपोरेट बॉण्ड में रेपो और सीडीएस, जारीकर्ता और निवेशक आधार बढ़ाने, जारी करने की प्रक्रियाओं को सरल बनाने की जरूरत आदि सिफ़ारिशें की गई हैं।

14. वर्ष 2009 में वित्तीय क्षेत्र के सुधारों पर समिति (सीएफ़एसआर) (अध्यक्ष: डॉ रघुराम जी. राजन) ने भी कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार के लिए बाधा बन रहे मुद्दों पर विचार किया और समान प्रकार की कई सिफारिशें की हैं। कुछ प्रमुख सिफ़ारिशें थीं कारोबार से संबंधित सभी विनियमन सेबी के दायरे में लाना जहां विभिन्न एजेंसियां एकाधिक विनियामकों के दायरे में आती हैं, उन संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय में सुधार, वित्तीय क्षेत्र में सुधार पर एक कार्यदल की स्थापना, जिसके अध्यक्ष के रूप में वित्त मंत्री हों। समिति ने कॉर्पोरेट वित्तपोषण के लिए अनुक्रमण शैली (सिक्वेन्सिंग अप्रोच) की सिफारिश की थी जिसके लिए कई लापता बाजारों का विकास करना होगा तथा कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार के स्वस्थ विकास के लिए अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों का पूरक विकास करना होगा।

वर्तमान मुद्दे

15. कॉर्पोरेट ऋण बाजार कुछ प्रमुख समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इस सेगमेंट के सुधार और विकास के लिए इनका समाधान जरूरी है। इनमें प्रमुख मुद्दे हैं:

क) चलनिधि की स्थिति जितनी ही दयनीय होगी, कॉर्पोरेट ऋण बाजार उतना ही सतही होगा। कॉर्पोरेट बॉण्ड बाजार में चलनिधि की कमी निवेशकों की सहभागिता को हतोत्साहित करती है। भारतीय बॉण्ड बाजार में ट्रेड की दो विशेषताएं हैं, चुनिंदा मैच्योरिटीज में ट्रेडिंग तथा निवेशकों की लिखतों को “खरीद कर होल्ड कर के रखने की प्रवृति” और इन दोनों से चलनिधि में बाधा होती है। यहाँ पेंशन फंडों, भविष्य निधियों और बीमा कंपनियों की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है। इन कंपनियों के लिए आवश्यक है कि ये कुछ और कदम उठाएं और अपने पोर्टफोलियो का प्रबंधन करने में अधिक तत्परता दिखाएं। उनके निवेश के दायरे केवल एए और उससे ऊपर की प्रतिभूतियों तक ही सीमित नहीं होने चाहिए। इससे बाजार में काफी उछाल आएगा।

ख) कम निवेशक आधार – कॉर्पोरेट ऋण बाजार का निवेशक आधार केवल बैंकों, बीमा कंपनियों, भविष्य निधियों, पेंशन निधियों और प्राइमरी डीलर्स तक सीमित है । आस्ति वर्ग के रूप में बॉण्डों की जानकारी और समझ के अभाव के कारण खुदरा सहभागिता कम बनी रहती है। निवेशक आधार का विस्तार करने के लिए नवोन्मेषी उपाय खोजना अति आवश्यक है। फण्ड मैनेजमेंट उद्योग खुदरा निवेशकों को कॉर्पोरेट ऋण में निवेश के लिए महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

ग) सरकारी ऋण की अधिमानता – देश में गवर्नमेंट पेपर्स की भारी आपूर्ति कॉर्पोरेट ऋण बाज़ारों के विकास की एक महत्वपूर्ण बाधा है। सरकार द्वारा ऋण लिया जाना और उस प्रक्रिया में गवर्नमेंट पेपर्स की आपूर्ति साल दर साल बढ़ती हुई देखी जा रही है। हमने देखा है कि सरकार राजकोषीय घाटे को पूर्ण स्तर पर नियंत्रित करने के लिए प्रगामी रूप से प्रयास कर रही है, जिससे बाजार पर दबाव कम होगा। इसके अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा क्रमिक रूप से एसएलआर को कम करने का प्रयास हो रहा है जो कॉर्पोरेट ऋण बाजार के लिए सकारात्मक हो सकता है।

घ) सीमित लिखत और उत्पाद – बाजार में ऐसे विविध प्रकार के लिखत और उत्पाद उपलब्ध होना आवश्यक है, जो अपने प्रतिभागियों की विविध आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। भारत के सन्दर्भ में इनका अभाव है, जिसके कारण इन बाज़ारों का विकास बाधित हो रहा है। सीडी और आईआरएफ कुछ ऐसे लिखत हैं जो हाल में आए हैं और इनके विकास की अपेक्षा है। आईआरएफ बाजार में कुछ उछाल आया है, जो अच्छा संकेत है। कॉर्पोरेट ऋण लिखतों के प्रतिभूतिकरण से बाजार को काफी गति मिलेगी क्योंकि इससे जोखिम अंतरण और निवेश में विविधता में सुधार होगा तथा उधारकर्ताओं को चलनिधि उपलब्ध होगी।

ङ) बाजार का इन्फ्रास्ट्रक्चर भी एक ऐसा कारक है, जो कॉर्पोरेट बॉण्ड मार्केट में ट्रेडिंग को प्रभावित करता है और इससे बाजार में पारदर्शिता और जीवंतता आती है। सरकारी प्रतिभूति बाजार में पहले से उपलब्ध बुनियादी सुविधाएं, उदा. स्क्रीन आधारित स्वचालित आर्डर मैचिंग, केंद्रीकृत समाशोधन तथा निपटान, निगोसिएटेड डीलिंग सिस्टम आदि निश्चित रूप से द्वितीयक बाजार ट्रेडिंग में सहायक होंगे, बाजार की पारदर्शिता और चलनिधि में वृद्धि करेंगे और वैज्ञानिक जोखिम मूल्य निर्धारण को विकसित करेंगे। कॉर्पोरेट बाँडों के लिए क्रेडिट रेटिंग प्रणाली में सुधार लाने और लोअर ग्रेट रेटिंग के लिए बाजार को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है, क्योंकि ये बाजार में बाधा उत्पन्न करते हैं।

च) बॉण्ड जारी करने की सुगमता- बैंक ऋणों की तुलना में बॉण्ड जारी करना काफी लागत वाला कार्य माना जाता है। जारीकर्ता कॉर्पोरेट ऋण बाजार की तरफ मुड़ें, इसके लिए बॉण्ड जारी करने की लागत और सुगमता में सुधार लाना होगा। लिस्टिंग और डिस्क्लोजर अपेक्षाओं और प्रक्रियाओं को सरल बनाना होगा और उसकी जटिलताओं में कमी लानी होगी। इश्यूज का आकार, उनका स्केल और जारी होने की अवधि में सुधार आवश्यक है, और इसे पब्लिक आफर द्वारा और भी आकर्षक बनाए जाने की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान में प्राइवेट प्लेसमेंट अधिक लोकप्रिय है। आशा है कि रीइश्यू के माध्यम से बॉण्ड इश्यूज को समेकित करने से चलनिधि में सुधार होगा और द्वितीयक बाजार लेनदेनों को प्रोत्साहन मिलेगा।तथापि, एक साथ मोचनों की संख्या में एकदम से वृद्धि न हो, इसका ध्यान रखना पड़ेगा क्योंकि इससे चलनिधि का दबाव उत्पन्न हो जाएगा।

छ) बाजार बनाना – किसी भी बाजार का उत्थान और विकास ऐसे बाजार बनाने वालों पर निर्भर करता है जो क्रय और विक्रय दोनों भाव उपलब्ध करा सकते हैं। सरकारी प्रतिभूति बाज़ार में इनकी संख्या काफी है, किन्तु कॉर्पोरेट बॉण्ड के क्षेत्र में इनकी कमी है। बाजार बनाने वाले केवल जोखिम ही नहीं अपनाते हैं, बल्कि उनके कारण बाजार को विविधता भी प्राप्त होती है। इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हम सरकारी प्रतिभूति बाजार में प्राइमरी डीलर्स की ही तरह कॉर्पोरेट बॉण्ड बाजार में अण्डरराइटर्स और बाजार बनाने वालों का एक वर्ग विकसित करें ।

नीतिगत पहलें

16. कॉर्पोरेट बॉण्ड मार्केट को प्रभावित करने वाले इन मुद्दों से निपटने के लिए हम क्या कर रहे हैं ? इन मुद्दों के समाधान के लिए पॉलिसी के स्तर पर कई उपाय किए जा रहे हैं। सरकार, रिजर्व बैंक, सेबी और अन्य एजेंसियों द्वारा कॉर्पोरेट ऋण बाजार का विकार करने की दिशा में हाल में उठाए गए कुछ कदम निम्नानुसार हैं।

क) ट्रेड रिपोर्टिंग प्लेटफार्म: पारदर्शिता में सुधार लाने के लिए कॉर्पोरेट बॉण्ड, कॉमर्शियल पेपर, सर्टिफिकेट आफ डिपाजिट, नॉन कनवर्टीबल डिबेंचर और प्रतिभूतित ऋण के लिए ओवर द काउंटर ट्रेडिंग के लिए रिपोर्टिंग प्लेटफार्म स्थापित किए गए हैं। कुछ दिनों पहले तक कॉर्पोरेट बॉण्डों में ट्रेड की रिपोर्टिंग तीन अलग अलग स्थानों पर की जाती थी (एफआईएमएमडीए का एफटीआरएसी, एनएसई तथा बीएसई के रिपोर्टिंग प्लेटफार्म)। यद्यपि, एकाधिक रिपोर्टिंग प्लेटफार्म उपलब्ध थे, अधिकांश ट्रेड एफआईएमडीए प्लेटफार्म पर रिपोर्ट किए गए और स्टाक एक्सचेंज के समाशोधन गृहों के माध्यम से समाशोधित किए गए। 01 अप्रैल 2014 से कॉर्पोरेट बॉण्ड में द्वितीयक बाजार ट्रेड्स और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विनियमित संस्थाओं से प्रतिभूतित ऋण की रिपोर्टिंग शेयर बाज़ारों में शिफ्ट कर दी गई है।

ख) पूलिंग अकाउंट : शेयर बाज़ारों के समाशोधन ग्रहों के आरबीआई में पूलिंग फण्ड अकाउंट रखने की अनुमति दी गई है ताकि कॉर्पोरेट बॉण्ड में ट्रेड्स का डीवीपी–आई ( DvP-I) आधारित निपटान किया जा सके।

ग) कॉर्पोरेट बॉण्ड में रिपो : भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वर्ष 2010 में कॉर्पोरेट बॉण्डों में रिपो की अनुमति भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विनयमित और अन्य स्वीकृत संस्थाओं को दी गई थी। न्यूनतम हेयरकट अपेक्षाओं में कटौती के रूप में तथा 1 वर्ष से कम मूल परिपक्वता वाले सीपी, सीडी और एनसीडी जैसे अल्प आवधिक लिखतों को अनुमति देकर पात्र सम्पार्श्विक की सूची को विस्तृत कर के दिशानिर्देशों में और ढील दी गई है। अनुसूचित शहरी सहकारी बैंकों को भी निर्धारित शर्तों का पालन करने की शर्त पर रिपो बाजार में भाग लेने की अनुमति दी गई है।

घ) कॉर्पोरेट बाण्ड्स पर क्रेडिट डिफाल्ट स्टैप्स (सीडीएस): कॉर्पोरेट बॉण्ड पर सीडीएस को अनुमति दी गई है, ताकि कॉर्पोरेट बॉण्ड धरण करने से सम्बद्ध ऋण जोखिम से बचाव किया जा सके। मार्केट फीडबैक के आधार पर सीपी, सीड़ी और एनसीडी जैसे अल्पकालिक और गैर सूचीबद्ध, लेकिन रेटेड कॉर्पोरेट बॉण्डों को भी एलीजिबल रेफरेन्स आब्लीगेशन्स के रूप में अनुमति दी गई है।

ड़) कॉर्पोरेट बॉण्ड में बैंकों और प्राथमिक डीलरों कि सहभागिता को प्रोत्साहन देना :

i) जुलाई 2014 में बैंकों को 7 वर्ष की न्यूनतम परिपक्वता वाले दीर्घकालिक बॉण्डों को जारी करने की अनुमति दी गई है, ताकि वे निम्नलिखित को ऋण देने के लिए स्रोत जुटा सकें।क) इन्फ्रास्ट्रक्चर उप क्षेत्रों में दीर्घकालिक परियोजनाएं और ख) किफ़ायती आवास परियोजनाएं। इन बॉण्डों को निवल मांग और समय देयताओं तथा समायोजित निवल बैंक क्रेडिट एएनबीसी की गणना से छूट प्रदान की गई है। अतएव इन्हें सीआरआर/एसएलआर या प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण अपेक्षाओं के अधीन नहीं रखा गया है।

ii) भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को अनुदेश जारी किए हैं कि वे खुदरा निवेशकों को पब्लिक इशूएन्स के माध्यम से टियर II पूंजी जुटाने पर विचार कर सकते हैं।

iii) कॉर्पोरेट ऋण में स्टैंडअलोन प्राइमरी डीलर्स की सक्रिय सहभागिता को प्रोत्साहन देने के लिए निवेश के मानदण्डों में इस प्रकार रियायत दी गई है - कुछ सीमाओं के अधीन कॉल मनी मार्केट से उधार ली गई निधियों का निवेश करने की अनुमति, अन्य प्राथमिक डीलरों/बैंकों/वित्तीय संस्थाओं के टियर II बॉण्डों में निवेश की सीमा एनओएफ के 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत किया जाना, और इंटर कॉर्पोरेट डिपाज़िट उधार की सीमा को एनओएफ के 75% से बढ़ाकर 50% किया जाना।

iv) बैंकों तथा स्टैंड अलोन प्राथमिक डीलरों को कॉर्पोरेट बॉण्डों में स्वामित्वपूर्ण ट्रेड करने के लिए स्टॉक एक्सचेंजों की प्रत्यक्ष सदस्यता लेने की अनुमति दी गई है।

v) बैंकों द्वारा ऋण में संवृद्धि- हाल में एक नीति घोषणा के अनुसार यह प्रस्ताव किया गया है कि बैंकों को कॉर्पोरेट बॉण्डों को आंशिक ऋण संवृद्धि का प्रस्ताव देने की अनुमति दी जाए। इसे वित्तपोषित और गैर-वित्तपोषित बुनियादी सुविधा परियोजनाओं के लिए ऋण सुविधाओं के माध्यम से किया जा सकता है किंतु गारंटी के माध्यम से नहीं। इस संबद्ध में अंतिम अनुदेश शीघ्र ही जारी किए जाने की अपेक्षा है।

च) विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई):

i) निवेश सीमाओं को युक्तिसंगत बनाया जाना : एफपीआई निवेश सीमाओं को युक्तिसंगत बनाया गया है, जिसके द्वारा वर्तमान सीमाओं और उपप्रभागों को दो व्यापक श्रेणियों - सरकारी प्रतिभूतियों और कॉर्पोरेट बाण्ड में मिला दिया गया है। 25 बिलियन यूएसडी ओवरआल कैप बनाए रखने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों (10 बिलियन यूएसडी) और डेटेड प्रतिभूतियों (10 बिलियन यूएसडी) में एफ़पीआई के लिए उपसीमाओं और अन्य श्रेणियों को मिला दिया गया है। कॉर्पोरेट बाण्ड के मामले में पात्र विदेशी निवेशकों के लिए 1 बिलियन यूएसडी, विदेशी पोर्टफोलियों निवेशकों के लिए 25 बिलियन यूएसडी तथा दीर्घावधिक इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉण्ड में एफपीआई के लिए 25 बिलियन यूएसडी की अधिकतम सीमा का विलय कर दिया गया है और कॉर्पोरेट बाण्ड के लिए ओवरआल कैप 51 बिलियन यूएसडी को बनाए रखा गया है ।

ii) कर्ज सीमा के आबंटन को युक्तिसंगत बनाना: नीलामी के जरिए कॉर्पोरेट बॉण्ड बाजार में कर्ज सीमा आबंटित करने की प्रणाली को परिवर्तित कर दिया गया है। संशोधित योजना के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशक अब कॉर्पोरेट ऋण-सीमा खरीदे बिना ही तब तक निवेश कर सकते हैं, जब तक ओवरआल निवेश 90% न हो जाए। इसके बाद बची हुई सीमाओं के आबंटन के लिए नीलामी प्रणाली आरंभ की जाएगी। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप, अब एफपीआई द्वारा निवेश पर प्रतिबंध कॉर्पोरेट ऋण श्रेणी में एफआईआई द्वारा किए गए निवेशों/धारित सीमाओं पर लागू नहीं होंगे, जब तक टैप पर सीमाएं उपलब्ध हैं।

iii) विदहोल्डिंग कर की दर: इन्फ्रास्ट्रक्चर ऋण बान्डों पर उधार पर ब्याज भुगतान पर विदहोल्डिंग कर की दर, रुपए में मूल्यवर्गित दीर्घावधिक इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉण्ड में अनिवासी द्वारा किए गए निवेश और भारतीय कम्पनियों द्वारा जारी बान्डों में एफआईआई द्वारा निवेश पर ब्याज पर कर की दर को 20 प्रतिशत से घटा कर 5 प्रतिशत कर दिया गया है।

iv) विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक से संबंधित नए विनियम: भारतीय पूंजी बाज़ारों में निवेश करने के इच्छुक विदेशी संस्थाओं के लिए सरल पंजीकरण प्रक्रिया और परिचालनात्मक ढांचा स्थापित करने के लिए हाल ही में सेबी ने नए एपीआई विनियम अधिसूचित किए हैं। नए विनियम एफआईआई और नवीन निवेशक वर्ग के लिए मौजूदा सेबी विनियमों का स्थान लेंगे। एफपीआई में एफआईआई, उनके उप-खाते और पात्र संस्थागत निवेशक सभी शामिल हैं।

v) 2015-16 के बजट में कॉर्पोरेट बॉण्ड और सरकारी प्रतिभूतियों से विदेशी निवेशकों की आय के संबंध में 5% की घटी हुई कर दर लागू होने की अवधि 31.05.2015 से बढ़ाकर 30.06.2017 किया जाना प्रस्तावित है।

ज) आईआईएफसीएल द्वारा ऋण संवर्धन: संघ के 2013-14 के बजट में यह उल्लेख किया गया है कि आईआईएफसीएल बॉण्ड इश्यूज़ की क्रेडिट रेटिंग को बढ़ाने के लिए आंशिक क्रेडिट गारंटी उपलब्ध कराएगा, जिससे इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक निधियों का उपयोग किया जा सकेगा। वर्तमान में आईआईएफसीएल अपनी ऋण संवर्धन पहल के अंतर्गत पाइलट ट्रांजेक्श्न कर रहा है।

झ) अंतर्राष्ट्रीय वित्त कार्पोरेशन (आईएफसी) द्वारा रूपी लिंक्ड ऑफशोर बॉण्ड की शुरुआत : भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्वास का संकेत देने तथा भारत में अमेरिकी डालर के प्रवाह को प्रोत्साहित करने के लिए, आईएफसी को यह अनुमति दी गई थी कि वह 1 बिलियन यूएसडी की रकम के लिए रूपी लिंक्ड ओवरसीज़ बाण्ड फ्लोट करे। आईएफसी को बहुत अच्छा रिसपांस मिला है और आईएफबी द्वारा लिमिट का पूरा उपयोग कर लिया गया है।

i) आईएफसी द्वारा घरेलू स्तर पर बॉण्ड जारी किया जाना: आईएफसी को इन्फ्रास्ट्रक्चर वित्तपोषण के लिए भारत में 15000 करोड़ रु. मूल्य के बॉण्ड जारी करने के लिए अनुमोदन दिया गया है। इससे दीर्घकालिक कॉर्पोरेट बॉण्ड के लिए बेंचमार्क यिल्ड का विकास करने में सहायता भी मिलेगी।

आगे की राह

17. भविष्य में हम उम्मीद करते हैं कि बैंकों द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर तथा आवासीय परियोजनाओं को समर्थन देने के लिए दीर्घावधिक बॉण्ड जारी करने के लिए हम बैंकों का मार्गदर्शन करेंगे और उससे कॉर्पोरेट ऋण बाजार के विकास में विशेष तौर पर तेजी आएगी। इसके अलावा, बासल III ढांचा के अन्तर्गत पूंजी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए, बैंक टियर II बॉण्डों के अलावा अपने अतिरिक्त टियर 1 बॉण्डों से बाजार का दोहन करेंगे। इन सबके परिणामस्वरूप क्वाजी गवर्नमेंट यील्ड कर्व का अवतरण हो सकता है, जो कॉर्पोरेट इशू के लिए बेंचमार्क का कार्य कर सकती हैं। जब विस्तृत एक्सपोजर से संबंधित बासल III ढांचा लागू होगा, और जैसे-जैसे बैंक कॉर्पोरेट सेक्टर को प्रत्यक्ष ऋण देने में अपनी अधिकतम सीमा पर पहुचेंगे, कॉर्पोरेट भी बाजार से ऋण लेने की दिशा में आगे बढ़ेंगे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अपेक्षित ठोस आर्थिक विकास भी कॉर्पोरेट सेक्टर को बाजार का रुख करने के लिए मजबूर करेगा। इन सबको दृष्टिगत रखते हुए, सक्रिय कॉर्पोरेट कर्ज बाजार में पहुँचने के लिए हमें स्वयं को निम्नलिखित उपायों के साथ तैयार रखना होगा;

क) कर्ज बाजार को संस्थाबद्ध करने के लिए विनियामक और प्रशासकीय सुधार,

ख) ऐसे मार्केट मेकर्स को शामिल करना जो दो-तरफा बिड-आस्क कोट्स उपलब्ध करा सकें,

ग) निवेशक आधार का संवर्धन,

घ) बेहतर रिपोर्टिंग, सेटलमेंट और क्लियरिंग प्लेटफॉर्म के द्वारा इन बाज़ारों की कार्यकुशलता में वृद्धि करना;

ङ) सूचना में सामंजस्य के अभाव को कम करने पर ज़ोर

निष्कर्ष

18. निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कर्ज बाजार निसंदेह देश के वित्तीय बाज़ारों का बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है और देश में निधीयन की भारी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इन बाज़ारों का सक्रिय होना अपरिहार्य है। मुझे विश्वास है कि इस सम्मेलन की कार्यवाहियों और इसमें की गई चर्चाओं से कार्रवाई के लिए स्पष्ट सुझाव उभर कर सामने आएंगे तथा इशुज के संबंध में स्पष्टता प्रदान करेंगे।

19. अपना समय और ध्यान देकर सुनने के लिए आप सभी का धन्यवाद।
होटल ताज महल पैलेस, कोलाबा, मुंबई में आयोजित “केयर रेटिंग ऋण बाजार शिखर वार्ता – 2015” में श्री आर गांधी, उपगवर्नर का उदघाटन भाषण। सुश्री अनुपम सोनल द्वारा की गई सहायता के लिए कृतज्ञता व्यक्त की जाती हैं।
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