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प्रेस प्रकाशनी

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भारतीय रिज़र्व बैंक बुलेटिन – दिसंबर 2025

22 दिसंबर 2025

भारतीय रिज़र्व बैंक बुलेटिन – दिसंबर 2025

आज, रिज़र्व बैंक ने अपने मासिक बुलेटिन का दिसंबर 2025 अंक जारी किया। बुलेटिन में द्वि-मासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य (दिसंबर 2025), चार भाषण, चार आलेख और मौजूदा आँकड़े शामिल हैं।

चार आलेख इस प्रकार हैं: I. अर्थव्यवस्था की स्थिति; II. सरकारी वित्त 2025-26: एक अर्ध-वार्षिक समीक्षा; III. जीवीए के लिए समग्र अग्रणी संकेतक – भारत के लिए विनिर्माण; IV. न्यूरल नेटवर्क का उपयोग करते हुए भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच सुरक्षित आस्ति अस्थिरता को समझना

I. अर्थव्यवस्था की स्थिति

वैश्विक अनिश्चितता अपने बहुत ऊंचे स्तरों से और नीचे आ गई। बाजार के बढ़े हुए मूल्यांकन को लेकर चिंताओं के कारण बड़े इक्विटी बाजारों में उतार-चढ़ाव देखने को मिले। वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में आघात-सह घरेलू मांग के साथ, भारतीय अर्थव्यवस्था पिछली छह तिमाहियों में सबसे तेज़ गति से बढ़ी। नवंबर के उच्चावृत्ति संकेतक दर्शाते हैं कि सुदृढ़ मांग-स्थितियों के साथ समग्र आर्थिक गतिविधि बनी रही। हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति मामूली वृद्धि के साथ निचले सहनशीलता स्तर के नीचे ही बनी रही। वित्तीय स्थितियां सामान्य रहीं, और वाणिज्यिक क्षेत्र में वित्तीय संसाधनों का प्रवाह मजबूत बना रहा। कम व्यापार घाटे, सुदृढ़ सेवा निर्यात और मजबूत विप्रेषण प्राप्तियों के कारण भारत का चालू खाता घाटा, वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में कम हुआ।

II. सरकारी वित्त 2025-26: एक अर्ध-वार्षिक समीक्षा

अमृता बसु, आकाश राज, हर्षिता यादव, देबप्रिय साहा, आयूषी खंडेलवाल, अनूप के सुरेश, श्रोमोना गांगुली और अत्रि मुखर्जी द्वारा

यह आलेख वर्ष 2025-26 की प्रथम छमाही के सरकारी वित्त की समीक्षा प्रस्तुत करता है। यह प्राप्तियों और व्यय के साथ-साथ सकल राजकोषीय घाटे और केंद्र और राज्यों द्वारा उसके वित्तपोषण के रुझानों का विश्लेषण करता है। वर्ष 2025-26 की पहली और दूसरी तिमाही के लिए सामान्य सरकारी वित्त (केंद्र और राज्य) संबंधी अनुमान भी प्रस्तुत किए गए हैं।

मुख्य बातें:

  • वर्ष 2025-26 की पहली छमाही के दौरान केंद्र की प्राप्तियाँ सामान्यतः उनके बजट-अनुमानों के अनुरूप थीं। कर प्राप्तियों में कमी की भरपाई आंशिक रूप से मजबूत गैर-कर राजस्व के साथ-साथ गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियों से हुई। व्यय के मामले में, केंद्र ने अपने राजस्व व्यय को नियंत्रित किया जबकि पूंजीगत व्यय में वृद्धि लगातार सुदृढ़ बनी रही।

  • वर्ष 2025-26 की पहली छमाही के दौरान राज्यों की प्राप्तियों में बढ़ोत्तरी कर और गैर-कर स्त्रोतों के कारण हुई, जबकि केंद्र से मिलने वाले अनुदान में कमी आई। व्यय के मामले में, राज्यों ने 2025-26 की पहली छमाही के दौरान राजस्व व्यय की गति बनाए रखी, जबकि उनके पूंजीगत व्यय में सुधार देखा गया।

  • केंद्र और राज्य, दोनों ने अपने व्यय की गुणवत्ता में सुधार देखा, जो कि पूंजीगत परिव्यय अनुपात में कम राजस्व व्यय से परिलक्षित होता है।

III. जीवीए के लिए समग्र अग्रणी संकेतक – भारत के लिए विनिर्माण

अनिर्बन सन्याल, शिवांगी मिश्र और संजय सिंह द्वारा

भारत की योजित सकल मूल्य में विनिर्माण क्षेत्र की लगभग 17 प्रतिशत की हिस्सेदारी है और देश की विकास गतिकी में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अग्रणी कारोबारी चक्र संकेतक आर्थिक गतिविधि में बदलाव संबंधी अग्रिम संकेत प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण साधन के रूप में कार्य करते हैं। इस संदर्भ में, यह आलेख तिमाही आधार पर विनिर्माण क्षेत्र के लिए एक संयुक्त अग्रणी संकेतक (सीएलआई) का परिचय प्रदान करता है, जिसे क्षेत्र के कारोबार चक्र में परिवर्तनों की प्रत्याशा करने और अल्पावधि आर्थिक आकलन को सुदृढ़ करने के लिए बनाया गया है।

मुख्य बातें:

  • संवृद्धि-दर-चक्र पद्धति के आधार पर दो चरण की प्रक्रिया के माध्यम से सीएलआई तैयार की गई है।

  • अग्रणी संकेतक, घरेलू मांग, मुद्रास्फीति गतिकी, सर्वेक्षण आधारित मनोभावों, औद्योगिक ऋण प्रवाह, अनिश्चितता मेट्रिक्स और वैश्विक समष्टि-आर्थिक प्रवृत्तियों से सम्मिलित चर के एक समूह पर आधारित होता है।

  • यादृच्छिक वन और एक्सजीबोस्ट मॉडल के माध्यम से चयनित और इन्वर्स-स्टैंडर्ड-डिवियेशन भार का उपयोग करते हुए एकत्रित उच्च आवृत्ति संकेतक, जीवीए-उत्पादन वृद्धि दर चक्र के साथ एक स्थिर अग्रणी संबंध प्रदर्शित करते हैं।

  • प्रस्तावित सीएलआई के कारोबारी चक्र के टर्नअराउंड बिन्दु एक तिमाही तक जीवीए विनिर्माण के संवृद्धि दर चक्र के साथ एक अग्रणी संबंध दर्शाता है। प्रस्तावित सीएलआई का अग्रणी संबंध कोविड-पूर्व अवधि और महामारी के बाद की बहाली अवधि में सुदृढ़ता दर्शाती है।

IV. न्यूरल नेटवर्क का उपयोग करते हुए भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच सुरक्षित आस्ति अस्थिरता को समझना

अंकन घोष, बिपुल घोष और संध्या कुरुगंती द्वारा

स्वर्ण, चांदी, कच्चे तेल और यूएस ट्रेजरी जैसी सुरक्षित आस्तियों ने बाजार में अस्थिरता की अवधि के दौरान लंबे समय तक स्थिरता के स्थिरक के रूप में कार्य किया है। हाल के वर्षों में, बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने इस बात की पुनर्पुष्टि की कि ये आस्तियां अनिश्चितता के समय कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, जिससे उनके अस्थिरता संबंधी व्यवहार में नए पैटर्न का पता चलता है। इस अध्ययन से पता चलता है कि भू-राजनीतिक आघातों के प्रति प्रमुख सुरक्षित आस्तियां कैसे प्रतिक्रिया करती हैं और इन जटिल, अरैखिक गतिकी का पूर्वानुमान करने में न्यूरल नेटवर्क मॉडलों की प्रभावशीलता की जांच करती है।

मुख्य बातें:

  • कच्चे तेल की कीमतों की अस्थिरता भू-राजनीतिक व्यवधानों के लिए सबसे संवेदनशील है, जो वैश्विक आपूर्ति मार्गों पर अपनी निर्भरता और क्षेत्रीय संघर्षों के प्रति भेद्यता को दर्शाता है।

  • वित्तीय तनाव के समय स्वर्ण एक विश्वसनीय सुरक्षित स्थान के रूप में अपनी प्रतिष्ठा को रेखांकित करते हुए मजबूत मूल्य स्थिरता प्रदर्शित करता रहा है।

  • चांदी और यूएस ट्रेजरी प्रतिभूतियां मध्यम प्रतिक्रियाएं दिखाती हैं, जोकि औद्योगिक मांग कारकों और पारंपरिक निवेशकों के सुरक्षा की ओर स्थानांतरण को संतुलित करती है।

  • न्यूरल नेटवर्क आधारित मॉडल, विशेष रूप से वे जो देश-विशिष्ट भू-राजनीतिक जोखिम सूचकांकों को एकीकृत करते हैं, परंपरागत अर्थमितीय दृष्टिकोण की तुलना में आस्ति अस्थिरता का अधिक सटीक पूर्वानुमान प्रदान करते हैं।

बुलेटिन के आलेखों में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के हैं और ये भारतीय रिज़र्व बैंक के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

(ब्रिज राज)   
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2025-2026/1750


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