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मध्य-तिमाही मौद्रिक नीति समीक्षा : जून 2012

18 जून 2012

मध्य-तिमाही मौद्रिक नीति समीक्षा : जून 2012

मौद्रिक और च‍लनिधि संबंधी उपाय

वर्तमान समष्टि आर्थिक स्थिति के आकलन के आधार पर यह निर्णय लिया गया है कि -

  • अनुसूचित बैंकों का आरक्षित नकदी निधि अनुपात अपरिवर्तित रखा जाए तथा उसे उनकी निवल मांग और समय देयताओं के 4.75 प्रतिशत पर बनाए रखा जाए और,

  • चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत नीति रिपो दर को 8 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा जाए।

परिणामत: चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत रिवर्स रिपो रेट 7.0 प्रतिशत पर अपरिवर्तित बना रहेगा और सीमान्‍त स्‍थायी सुविधा दर तथा बैंक दर 9 प्रतिशत पर बने रहेंगे।

प्रस्‍तावना -

2. अप्रैल में रिज़र्व बैंक के वार्षिक नीति वक्‍तव्‍य की घोषणा के समय से वैश्विक समष्टि आर्थिक और वित्‍तीय परिस्थितियों में गिरावट आयी है। साथ ही घरेलू समष्टि आर्थिक स्थिति के बारे में भी कई तरह की गंभीर चिंताएं पैदा हुई हैं। वर्ष 2011-12 में वृद्धि में पर्याप्‍त गिरावट आयी है, साथ ही हेडलाइन मुद्रास्‍फीति धारणीय वृद्धि के लिए अपेक्षित उपयुक्‍त स्‍तर से ऊपर बनी हुई है। महत्‍त्वपूर्ण बात यह है कि खुदरा मुद्रास्‍फीति भी बढ़ रही है।

3. रिज़र्व बैंक ने अप्रैल में नीति दरों में 50 आधार अंकों की कमी करके नीति दर में कमी लाने का काम समय से पहले ही आरंभ कर दिया था। यह निर्णय इस आधार-भूमि पर अवलंबित था कि मुद्रास्‍फीति के प्रबंधन के लिए अत्‍यंत महत्‍त्वपूर्ण राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया, आपूति पक्ष से जुड़े अन्‍य उपायों के साथ-साथ कार्यशील हो जाएगी। वृद्धि और मुद्रास्‍फीति के वर्तमान सहसंबंधों के बारे में हमारा आकलन यह है कि गतिविधियों मेक्ष मंदी के लिए कई कारक उत्‍तरदायी हैं, विशेषत: निवेश के मामले में, तथा इसमें ब्‍याज दरों की भूमिका अपेक्षाकृत छोटी है। परिणामत: इस समय नीति ब्‍याज दर में और कटौती करने से, वृद्धि में मदद मिलने के बजाय मुद्रास्‍फीति का दबाव और बढ़ सकता है।

वैश्विक अर्थव्‍यवस्‍था

4. यूरो क्षेत्र की सरकारी ऋण की समस्‍या का वैश्विक रिकवरी पर दुष्‍प्रभाव पड़ना जारी है। थोड़े समय के लिए अपेक्षाकृत शांति के बाद, जो यूरोपीय केंद्रीय बैंक द्वारा भारी मात्रा में च‍लनिधि उपलब्‍ध कराए जाने का सूचक है, सरकारी ऋण समस्‍या के दीर्घकालिक समाधान और बैंकिंग क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता के बारे में नई चिंताएं पैदा हुई हैं। हाल के आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि अमेरिकी आर्थिक रिकवरी कमजोर पड़ रही है। प्रमुख उभरती और विकासशील अर्थव्‍यवस्‍थाओं में वृद्धि की गति कम हो रही है। वैश्विक वृद्धि में कमी आने से वस्‍तुओं की कीमतें बढ़ी हैं, साथ ही जोखिम से बचने की प्रवृत्ति में वृद्धि तथा उसके परिणामस्‍वरूप पूंजी प्रवाह में कमी आने से उभरती और विकासशील अर्थव्‍यवस्‍थाओं पर (भारत सहित) बड़ा प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा यदि कोई बड़ा आघात लगेगा तो उन्‍नत अर्थव्‍यवस्‍थाओं के केंद्रीय बैंकों को संभवत: दुबारा आर्थिक सहायता उपलब्‍ध कराने का काम करना पड़ेगा। इसका उभरती और विकासशील अर्थव्‍यवस्‍था में, विशेषत: भारत जैसे तेल आयातक देशों पर, वस्‍तुओं की कीमतों में सं‍भावित उछाल के माध्‍यम से, वृद्धि और मुद्रास्‍फीति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

घरेलू अर्थव्‍यवस्‍था

वृद्धि

5. वर्ष 2011-12 में, विभन्नि तिमाहियों में आर्थिक गतिविधि क्रमश: कम होती गयी तथा चौथी तिमाही में वृद्धि कम होकर 5.3 प्रतिशत तक पहुंच गयी, यद्यपि पूरे वर्ष के लिए वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत थी। आपूर्ति पक्ष की ओर से औद्योगिक उत्‍पादन की गति में कमी और विशेष रूप से मांग पक्ष की ओर से कमजोर निवेश का वृद्धि में कमी आने में योगदान रहा है। अप्रैल 2012 में औद्योगिक उत्‍पादन सूचकांक केवल 0.1 प्रतिशत बढ़ा। विनिर्माण क्रय प्रबंधकों के सूचकांक से यह संकेत मिला कि औद्योगिक गतिविधि में विस्‍तार हो रहा है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि विस्‍तार की गति में पर्याप्‍त कमी आई है।

6. इस परिप्रेक्ष्‍य में यह आकलन करना संगत होगा कि ऊंची ब्‍याज दरों का आर्थिक वृद्धि पर कितना दुष्‍प्रभाव पड़ रहा है। आकलनों से यह संकेत मिलता है कि वास्‍तविक प्रभावी बैंक उधार ब्‍याज दरें यद्यपि बढ़ी हैं, फिर भी वे वर्ष 2003-08 के उच्‍च वृद्धि के चरण के ब्‍याज दर स्‍तरों से अपेक्षाकृत कम हैं। इससे संकेत मिलता है कि वृद्धि में कमी लाने में ब्‍याज दरों से भिन्‍न कारक ज्‍यादा योगदान दे रहे हैं।

7. इसके अलावा पिछले कुछ महीनों से रुपये के मूल्‍यह्रास का एक प्रभाव यह है कि विदेशी उत्‍पादकों की तुलना में देशी उत्‍पादकों को प्रतिस्‍पर्धा में लाभ मिला है। समय बीतने के साथ-साथ इसके परिणामस्‍वरूप निर्यातों में वृद्धि होगी और आयातों की मात्रा घटेगी तथा इस प्रकार यह मांग को बढ़ाने का काम करेगी।

मुद्रास्‍फीति -

8. वर्ष 2011-12 के दौरान हेडलाइन थोक मूल्‍य सूचकांक मुद्रास्‍फीति दर सितंबर 2011 के 10.0 प्रतिशत की उच्‍चतम दर से घटकर मार्च 2012 में 7.7 प्रतिशत हो गयी। तथापि, वर्ष 2012-13 में अब तक, अनंतिम आंकड़ों से संकेत मिलता है कि यह अप्रैल महीने के 7.2 प्रतिशत से धीरे-धीरे बढ़ते हुए मई में 7.6 प्रतिशत पर पहुंच गयी है तथा इसके मुख्‍य प्रेरक खाद्यान्‍न और र्इंधन की कीमतें रही हैं। प्राथमिक खाद्यान्‍न वस्‍तु मुद्रास्‍फीति जनवरी महीने के (-) 0.7 प्रतिशत से बढ़कर मई में 10.7 प्रतिशत हो गयी जिसका सर्वप्रमुख कारण सब्जियों की कीमतों में तेजी से वृद्धि है। प्रोटीन संबंधी मुद्रास्‍फीति दो अंकों में बनी रही। खाद्यान्‍नों की कीमतों का हेडलाइन मुद्रास्‍फीति में बहुत अधिक योगदान रहा, लेकिन वर्तमान वर्ष में मुद्रास्‍फीति की स्थिति तय करने में  दक्षिण-पश्चिम मानसून की भी भूमिका बनी रहेगी।

9. कच्‍चे तेल की अंतरराष्‍ट्रीय कीमतों में अप्रैल 2012 के स्‍तर से काफी गिरावट आयी है, लेकिन रुपये के मूल्‍यह्रास से थोक मूल्‍यों पर पड़ने वाले प्रभावों को काफी हद तक समंजित करने में मदद मिली है। इसके अलावा वैश्विक स्‍तर पर कच्‍चे तेल के वर्तमान अपेक्षाकृत कम स्‍तर पर भी पेट्रोलियम उत्‍पादों की नियंत्रित कीमतों के संबंध में बहुत कम वसूली की स्थिति बनी हुई है। मुद्रास्‍फीति के मामले में सकारात्‍मक बात यह है कि कोर मुद्रास्‍फीति (गैर-खाद्यान्‍न विनिर्मित उत्‍पाद) कम होने लगी है।

10. उपभोक्‍ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्‍फीति (नई श्रृंखला की माप के अनुसार आधार वर्ष 2010) फरवरी के 8.8 प्रतिशत से बढ़कर मार्च में 9.4 प्रतिशत तथा अप्रैल में और बढ़कर 10.4 प्रतिशत हो गयी। महत्‍त्वपूर्ण बात यह है कि उपभोक्‍ता मूल्‍य सूचकांक मुद्रास्‍फीति, खाद्यान्‍न और ईंधन को छोड़कर भी दो अंकों में बनी रही जिससे यह संकेत मिलता है कि थोक मूल्‍य आधारित मुद्रास्‍फीति में कमी का प्रभाव खुदरा स्‍तर पर अंतरित नहीं हुआ है।

11. कोर मुद्रास्फीति में कमी को ध्यान में न लेते हुए अत्यधिक वृध्दि की मंदी के परिदृश्य में थोक और खुदरा दोनों स्तरों पर समग्र मुद्रास्फीति जारी रहना, भारी अपूर्ति बाधाओं और कठिन मुद्रास्फीति अपेक्षाओं की ओर संकेत करते हैं। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल के मूल्यों का घरेलू मूल्यों में पास-थ्रु के अभाव में पेट्रोल उत्पादों का उपभोग मज़बूत बना हुआ है। यह मूल्य संकेतों को बिगाड़ते है और समग्र माँग में आवश्यक समायोजन को रोकते हैं। इसके फलस्वरुप सरकार पर पड़नेवाला आर्थिक सहायत का भार ऐसे समय पर पड़ना जब सार्वजनिक निवेश पर हासकारी प्रभाव है जिससे सार्वजनिक और निजी दोनों में निवेश को पुन:जीवित करना आनिवार्य हो जाता है। वृध्दि में मंदी के बावजूद बढ़ता चालू खाता घाटा (सीएडी) मॉग - आपूर्ति असंतुलन और आपूर्ति की रुकावटों का तुरंत समाधान करने के लिए एक संकेत देता है।

चलनिधि स्थितियॉं

12. हालांकि मुद्रा आपूर्ति (एम3) वृध्दि कुछ हद तक अनुमानित सीमा के भीतर रही फिर भी ऋण वृध्दि अनुमानित दर से अधिक है। उल्‍लेखनीय रूप से जमा-वृध्दि और ऋण-वृध्दि में बढ़ता अंतर चलनिधि दबावों को बढ़ा रहा है। तथापि खुले बाज़ार परिचालनों (ओएमओ) ने नीति रिपो दर के आस पास ओवर नाईट मॉंग मुद्रा के स्थिरिकरण के कारण दर्शाए गए अनुसार काफी हद तक चलनिधि स्थितियों को सुगम बनाया है। चलनिधि को और आगे बढ़ाने तथा बैंकों द्वारा निर्यात क्षेत्र में ऋण प्रवाह बढ़ाने के लिए प्रोत्‍साहित करने हेतु रिज़र्व बैंक ने निर्यात ऋण पुनर्वित की सीमा को बैंकों के बकाया निर्यात ऋण के 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। इससे सीआरआर में लगभग 50 आधार अंकों की कटौती के समतूल्‍य लगभग 300 बिलियन की अतिरिक्‍त चलनिधि जारी होने की संभावना है।

बाह्य क्षेत्र

13. वर्ष 2011-12 के दौरान वैश्विक आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियों के बिगड़ते परिदृश्‍य में बढ़ते सीएडी ने रूपये पर गिरावट का दबाव डाला। पूँजीगत अंतर्वाह मंद बने रहने से अप्रैल के बाद से रूपये का और अधिक मूल्‍यह्रास हुआ। पूँजीगत अंतर्वाह में बढ़ोतरी की संभावना वैश्विक स्थितियॉं, खासकर यूरो क्षेत्र परिस्थिति का विश्‍वसनीय समाधान और घरेलू निवेश वातावरण में सुधार इन दोनों पर ही निर्भर है।

मार्गदर्शन

14. वृध्दि-मुद्रास्फिति में उभर रही सक्रियता, ब्‍याज दरों पर रिज़र्व बैंक के दृष्टिकोण को प्रभावित करना जारी रखेगी। कोर मुद्रास्फिति सामान्‍य हुई है जो मॉंग स्थितियों और निम्‍न मूल्‍यन शक्ति को दर्शाते है। तथापि, हेडलाईन और खुदरा मुद्रास्फिति दोनों बढ़ रहे है जिसका असर मुद्रास्‍फीति प्रत्‍याशाओं पर हो रहा है। भविष्‍य की कार्रवाईयॉं बाह्य और घरेलू गतिविधियों के निरंतर आकलन जो मुद्रास्‍फीति जोखिमों को कम करती है, पर निर्भर होगी।

15. चलनिधि का प्रबंधन ही प्राथमिकता बनी हुई है। चलनिधि स्थितियॉं सुगमता का स्‍तर प्राप्‍त कर लेने पर भी रिज़र्व बैंक चलनिधि दबावों को कम करने के लिए जरूरत पड़ने पर खुले बाज़ार परिचालनों का प्रयोग जारी रखेगा।

16. अंतत: यह देखते हुए कि वैश्विक स्थिति अंशांत है, रिज़र्व बैंक किसी भी प्रतिकूल गतिविधियों का त्‍वरित और उचित उपाय करने और उपलब्‍ध सभी साधनों का प्रयोग करने के लिए तत्‍पर है।

सबीता बाडकर
सहायक प्रबंधक

प्रेस प्रकासनी : 2011-2012/2008


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