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भारतीय रिज़र्व बैंक ने पीएसएस अधिनियम में संशोधनों को अंतिम रूप देन के लिए अंतर-मंत्रालयी समिति पर असहमति नोट जारी किया

19 अक्टूबर 2018

भारतीय रिज़र्व बैंक ने पीएसएस अधिनियम में संशोधनों को अंतिम रूप देन के लिए अंतर-मंत्रालयी समिति पर असहमति नोट जारी किया

भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधनों को अंतिम रूप देने के लिए सचिव, आर्थिक कार्य विभाग की अध्यक्षता में सरकार द्वारा अंतर-मंत्रालयी समिति बनाई गई थी। भारतीय रिज़र्व बैंक का इस समिति में प्रतिनिधित्व था।

समिति की प्रारूप रिपोर्ट सरकार द्वारा सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराई गई। भारतीय रिज़र्व बैंक के प्रतिनिधि ने समिति की कतिपय सिफारिशों पर असहमति नोट प्रस्तुत किया है, जिसकी प्रति सार्वजनिक सूचना हेतु नीचे प्रस्तुत की गई है।

असहमति नोट

  1. भुगतान प्रणालियां मुद्रा का सब-सेट है जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित किया जाता है। भुगतान और निपटान प्रणालियों पर मौद्रिक नीति तथा मौद्रिक नीति पर भुगतान और निपटान प्रणालियों का व्यापक प्रभाव भुगतान प्रणालियों के विनियमन के लिए सहायता उपलब्ध कराता है जो प्रणालियां मौद्रिक प्राधिकरण के पास हैं।

  2. भुगतान प्रणालियों के लिए अंतर्निहित बैंक खाता है जो बैंकिंग प्रणाली विनियमन के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आता है और इसका विनियमन भारतीय रिज़र्व बैंक के पास है।

  3. निपटान को अंतिम रूप देने के लिए निपटान प्रणालियों को अंततः भारतीय रिज़र्व बैंक में बैंकों के बही खातों में प्रदर्शित किया जाता है। इन संस्थाओं का विनियमन निपटान कार्य के साथ-साथ चलता है।

  4. कार्डों जैसी कतिपय भुगतान प्रणालियां हैं जिन्हें वैश्विक रूप से बैंकों द्वारा जारी किया जाता है। इन लिखतों पर दोहरा विनियमन वांछनीय नहीं होगा।

  5. भारत में, भुगतान प्रणाली पर बैंकों का प्रभुत्व है। एक ही विनियामक द्वारा बैंकिंग प्रणालियों और भुगतान प्रणाली का विनियमन भुगतान लिखतों में तालमेल उपलब्ध कराता है और सार्वजनिक विश्वास प्रेरित करता है।

  6. केंद्रीय बैंक द्वारा भुगतान प्रणाली का विनियमन स्थिरता के लिहाज से प्रबल अंतरराष्ट्रीय मॉडल है। इस प्रकार, केंद्रीय बैंक में भुगतान और निपटान प्रणालियों का विनियमन और पर्यवेक्षण होने से संपूर्ण लाभ सुनिश्चित होंगे।

  7. भारत में भुगतान प्रणालियों में किसी प्रकार की असक्षमता का कोई साक्ष्य नहीं देखा गया है। डिजिटल भुगतानों ने अच्छी और स्थिर प्रगति हासिल की है। भारत भुगतान प्रणालियों में नेता के रूप में अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल कर रहा है। इसको देखते हुए, सुचारू रूप से चल रही प्रणाली में किसी प्रकार का बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है।

  8. भुगतान विनियामक बोर्ड (पीआरबी) अवश्य ही रिज़र्व बैंक के पास रहना चाहिए और इसका प्रमुख भारतीय रिज़र्व बैंक गवर्नर होना चाहिए। इसमें 3 सदस्य हो सकते हैं जिन्हें क्रमशः सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा नामित किया जाए जिसमें बोर्ड के सहज परिचालन को सुनिश्चित करने के लिए गवर्नर का कास्टिंग वोट होना चाहिए। पीआरबी की क्षतिपूर्ति भी माननीय वित्त मंत्री द्वारा वित्त बिल में की गई घोषणाओं के अनुरूप नहीं है।

रिपोर्ट की कतिपय सिफारिशों पर पर भारतीय रिज़र्व बैंक की आम टिप्पणियां निम्नानुसार हैं।

पैराग्राफ सं.: रिपोर्ट के ब्यौरे असहमति
कार्यकारी सारांश – पैरा 8 पीआरबी एक स्वतंत्र विनियामक होना चाहिए। भारतीय रिज़र्व बैंक से बाहर भुगतान प्रणालियों के लिए विनियामक रखने का कोई मामला नहीं है।
वही - पीआरबी की संरचना। पीआरबी की संरचना वित्त मंत्री द्वारा वित्त बिल में की गई घोषणाओं के अनुरूप नहीं है।
पैरा 1.3 प्रस्तावित प्रारूप बिल के अंतर्गत प्रतिस्पर्धा, नवोन्मेष और ग्राहक संरक्षण मुख्य उद्देश्य होने चाहिए। प्रतिस्पर्धा, नवोन्मेष और ग्राहक संरक्षण पीएसएस अधिनियम के अंतर्गत की गई पहलों का हॉल मार्क हैं। आज, अधिकांश प्रगति नवोन्मष के कारण हुई है, बहु निवेशकों और अनगिनत प्रणालियों का अस्तित्व प्रतिस्पर्धा का प्रमाण है और अनेक ग्राहक संरक्षण उपाय पीएसएस अधिनियम के अंतर्गत की गई पहलों के परिणाम हैं। यदि कुछ विशिष्ट मुद्दे हैं जिनका प्रावधान करने की आवश्यकता है, तो तुलनात्मक रूप से नए कानून (अर्थात पीएसएस अधिनियम, 2007) में संशोधन करना नया अधिनियम बनाने से काफी आसान है।
पैरा 1.6 पीआरबी एक स्वतंत्र विनियामक होना चाहिए। वाटल समिति ने आरबीआई की समग्र संचरना के अंदर पीआरबी की स्थापना की सिफारिश की है जो आउटकम प्रदान करेगी जो अभी बदल गए हैं, किसी प्रकार के विचलन की जरूरत नहीं है और पीआरबी भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ रह सकता है।
पैरा 1.10 प्रणालीबद्ध रूप से महत्वपूर्ण भुगतान प्रणालियों से उत्पन्न चिंता का क्षेत्र। चूंकि बैंकों को भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित किया जाता है, रिज़र्व बैंक द्वारा संपूर्ण विनियमन ज्यादा प्रभावी होगा और संबंधित प्रणालियों के लिए मौजूदा बहु-विनियामक होने पर इसके परिणामस्वरूप अनुपालन लागत अधिक नहीं होगी। विश्व में लगभग सभी देशों में इस बदलाव को मान्यता दी गई है जिसने हाल में महत्व प्राप्त किया है।
पैरा 2.4 गैर-बैंकों को भुगतान प्रणालियों में एक्सेस और उनमें सहभागिता की आवश्यकता पर। वर्तमान में, गैर-बैंकों के पास भुगतान प्रणालियों की एक्सेस है जिन्हें बैंकों द्वारा परिचालित किया जाता है, वास्तव में ऐसी भी भुगतान प्रणालियां है जिन्हें गैर-बैंकों (उदाहरण के लिए एनपीसीआई और कार्ड कंपनियां तथा पीपीआई निर्गमकर्ता) द्वारा भी परिचालित किया जाता है, इसका संदर्भ इस रिपोर्ट के पैरा 2.8 में भी दिया गया है।
पैरा 2.9 केंद्रीय बैंक की इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थान के रूप में भूमिका जो निपटान कार्य उपलब्ध कराती है, को भुगतान क्षेत्र के विनियामक के रूप में उसकी भूमिका से अलग करना महत्वपूर्ण है। यह विनियामक की वह भूमिका है जिसमें मुख्य रूप से बैंक केंद्रिक होने से उभरने की आवश्यकता है। भुगतान प्रणालियां वास्तव में मुद्रा के लिए प्रौद्योगिकी आधारित विकल्प हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा मुद्रा का वितरण बैंकों के जरिए किया जाता है, इसका भुगतान प्रणालियों में तार्किक विस्तार से अच्छे परिणाम आ रहे हैं। फिनटेक कंपनियां और अन्य गैर-बैंक इस कार्य को अच्छी तरह से कर रही हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि गैर-बैंकों को किस प्रकार से भुगतान प्रणालियों के जरिए मुद्रा सृजित करने का कार्य सौंपा जा सकता है। यह स्मरण करने की आवश्यकता है कि बैंक भी भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से मुद्रा का वितरण करते हैं और वे अपनी स्वयं की मुद्रा सृजित नहीं कर सकते।
पैरा 2.13 से 2.17 भारतीय रिज़र्व बैंक के सुझावों का समिति द्वारा विश्लेषण मेरे तर्कों का सार सिफारिशों में नहीं आया है।
पैरा 3.2 पीआरबी और आरबीआई के बीच औपचारिक तंत्र मेरा विचार है कि परिचालनों को समेकित करने की जरूरत है, न कि समन्वित करने की। समन्वय भिन्न-भिन्न किंतु संबंधित कार्यों के लिए अपेक्षित होता है जो भुगतान प्रणालियों का मामला नहीं बनता है। यह इस बात को दुहराने का भी आधार है कि भारतीय रिज़र्व बैंक का गवर्नर प्रस्तावित पीआरबी का अध्यक्ष होना चाहिए।
पैरा 3.4 जोखिम आधारित विनियामक ढांचे के स्पष्ट संकेत पर। विनियामक द्वारा विनियमन के दृष्टिकोणों को विकसित करने की बेहतर अनुमति हो जिससे कि बदलते परिवेश का प्रभावी ढंग से समाधान किया जा सके।
पैरा 3.5 और 3.6 पीआरबी की प्रस्तावित व्यापक संरचना पर। नोट में दिए गए कारणों के लिए, मैं इन विचारों से सहमत नहीं हूं। यह भी उल्लेख किया जा सकता है कि पूरे विश्व में, भुगतान प्रणालियां विशेषकर खुदरा भुगतान प्रणालियां स्व-पर्याप्तता का सृजन नहीं करती हैं। यदि इसे भारत में हासिल किया जाना है, तो ये प्रणालियां अवहनीय बन सकती हैं, और इस प्रकार आम आदमी का समर्थन नहीं करेंगी जो इसके उद्देश्यों की भावना के विरूद्ध जाएगा।
पैरा 3.7 प्रारूप बिल में पीआरबी के लिए रेखांकित उद्देश्य। पीआरबी के उद्देश्यों को कानून के अधिदेश से बेहतर ढंग से टाला जा सकता है जो ज्यादा जरूरी लचीलापन उपलब्ध नहीं कराती है। विधि मंत्रालय के विचारों का भी अधिकारक्षेत्र द्वन्द्व में ध्यान रखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त, नवोन्मेष को सामान्यतः अधिदेशित नहीं किया जाता है, यह आवश्यकता के आधार पर विकसित हो जाता है।
पैरा 3.12.9 शिकायत समाधान के लिए एसएटी को विनिर्दिष्ट करने पर। यह स्पष्ट नहीं है कि भुगतान निपटान प्रणाली संबंधित मामलों तथा ऐसे ही और मामलों के समाधान के लिए एसएटी को क्यों लाया जा रहा है जब शेयर बाजार और प्रतिभूति बाजार भुगतान प्रणाली बिल के कार्यक्षेत्र में नहीं है।
सामान्य   यह उल्लेखनीय है कि भारतीय रिज़र्व बैंक इन बदलावों का स्वागत नहीं करता है और वास्तव में आवश्यक नए पीएसएस बिल के प्रति पूरी तरह से विरूद्ध नहीं है। तथापि, यह देखने की जरूरत है कि बदलावों से मौजूदा संस्थाएं अव्यवस्थित न हो जाएं और सुचारू रूप से कार्यरत और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संरचना में संभावित व्यवधान न आ जाए जहां तक भारत का संबंध है।

जोस जे. कट्टूर
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी : 2018-2019/929


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