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रिज़र्व बैंक बुलेटिन - फरवरी 2021

28 फरवरी 2021

रिज़र्व बैंक बुलेटिन - फरवरी 2021

भारतीय रिज़र्व बैंक ने आज अपने मासिक बुलेटिन के फरवरी 2021 के अंक को जारी किया। बुलेटिन में मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2020-21: मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) का संकल्प 3-5 फरवरी 2021, एक भाषण, चार लेख और वर्तमान सांख्यिकी शामिल हैं।

चार लेख हैं: I. अर्थव्यवस्था की स्थिति; II. भारत में बैंक ऋण की क्षेत्रवार विनियोजन: हाल की गतिविधियां; III. ओवरनाइट अनुक्रमित स्वैप (ओआईएस) दरों से मौद्रिक नीति के भविष्य के मार्ग का आकलन; IV. क्या बाजार अधिक जानते हैं? पीबीआर के लेंस के माध्यम से भारत का बैंकिंग क्षेत्र।

I. अर्थव्यवस्था की स्थिति

मुख्य बातें:

  • भारत में, COVID-19 की घटनाओं में कमी होने के कारण आर्थिक गतिविधियां में उत्साह बन रहा है, और चल रहे वैक्सीन रोलआउट ने नियंत्रित किए हुए आशावाद को मुक्त किया है।

  • कुल मांग के सभी इंजनों में उत्तेजना बनने लगी है; केवल निजी निवेश की कार्रवाई गायब है और इसके जीवित होने के लिए समय उपयुक्त है।

  • चलनिधि के व्यापक उपाय, प्रणाली में मौद्रिक और वित्तीय स्थितियों को आसान बनाना दर्शाते हैं।

II. भारत में बैंक ऋण का क्षेत्रवार विनियोजन: हाल की गतिविधियां

क्षेत्रवार ऋण डेटा का विश्लेषण अर्थव्यवस्था के विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों को ऋण के प्रवाह में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। यह लेख COVID-19 महामारी से पहले की अवधि के दौरान बैंक ऋण की क्षेत्रवार विनियोजन में हुए विकास का विश्लेषण करता है और उनकी तुलना COVID-19 अवधि के दौरान, अर्थात अप्रैल-नवंबर 2020-21 के घटनाक्रमों से करता है।

मुख्य बातें:

  • बैंक ऋण वृद्धि, जिसने 2019-20 में मंदी को देखा, COVID -19 से प्रेरित लॉकडाउन के मद्देनजर 2020-21 में एक और झटका लगा, लेकिन धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधि के फिर से शुरू होने के साथ, हाल की अवधि में कृषि और सेवा क्षेत्रों को ऋण में तेजी दर्ज की गई।

  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पीएसबी) हाल के समय में कृषि और सेवा क्षेत्रों के लिए ऋण में तेजी से वृद्धि के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार रहे हैं।

  • औद्योगिक क्षेत्र में भी, मध्यम उद्योगों को ऋण वृद्धि ने सरकार और रिज़र्व बैंक द्वारा उठाए गए कई उपायों के सकारात्मक प्रभाव को इंगित किया है।

  • अनुभवजन्य अनुमानों से संकेत मिलता है कि गैर-खाद्य ऋण एक अंतराल के साथ ब्याज दरों में बदलाव के प्रति संवेदनशील है, उद्योग और सेवा क्षेत्रों के साथ अधिक संवेदनशीलता प्रदर्शित करता है।

III. ओवरनाइट अनुक्रमित स्वैप (ओआईएस) दरों से मौद्रिक नीति के भविष्य के मार्ग का आकलन करना

मौद्रिक नीति अपेक्षा के उपाय के रूप में ओवरनाइट अनुक्रमित स्वैप (ओआईएस) दर का उपयोग साहित्य में लोकप्रियता हासिल कर रहा है। यह लेख, लॉयड (2018) की कार्यप्रणाली को अपनाते हुए, अनुभवजन्य परीक्षण करता है कि क्या 03 अगस्त 1999 से 31 मई 2019 की अवधि के लिए अलग-अलग कार्यकालों (1 महीने से लेकर 10 वर्ष तक) के भारत में ऑनशोर ओआईएस व्यापार बाजार प्रतिभागियों की अल्पकालिक ब्याज दरों की अपेक्षाओं के लिए कुशल उपाय है।

मुख्य बातें:

  • यह लेख ओआईएस स्थिर दर और अस्थिर ओवरनाइट संदर्भ दर के बीच अंतर के रूप में पूर्ववर्ती (एक्स पोस्ट) "अतिरिक्त रिटर्न" की गणना करता है।

  • एक वर्ष तक के अवधि के ओआईएस व्यापारों के अतिरिक्त रिटर्न कम थे जोकि 2 आधार अंकों (बीपीएस) और 20 बीपीएस के बीच रहे, जो दर्शाता है कि ये ओआईएस दरें औसतन, मौद्रिक नीति के भविष्य का एक उचित संकेत थे।

  • विशेष रूप से, 1, 9 और 12 महीने की अवधि की ओआईएस दरें इन अवधियों के अतिरिक्त रिटर्न सहित भविष्य में अल्पकालिक ब्याज दरों की अपेक्षाओं को अधिक सटीक रूप से मापने के रूप में उभरा है, जो औसतन, शून्य से काफी अलग नहीं है।

  • अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर, भारत में ओआईएस दरों को मौद्रिक नीति की दिशा के विश्वसनीय भविष्यवक्ता के रूप में पाया जाता है, यदि नीति के निर्धारित समय में बदलाव न हो।

IV. क्या बाजार अधिक जानते हैं? पीबीआर के लेंस के माध्यम से भारत का बैंकिंग क्षेत्र

बैंक मूल्य का एक उपयुक्त माप क्या है? इस लेख में तर्क दिया गया है कि बैंकों के बही की तुलना में मूल्य अनुपात (पीबीआर) को भारतीय संदर्भ में बैंक की स्थिति और स्थिरता को बेहतर ढंग से समझने के लिए बैंक मूल्य के वैकल्पिक उपाय के रूप में माना जा सकता है।

मुख्य बातें:

  • जबकि पूंजी पर्याप्तता अनुपात, जेड-स्कोर और लाभप्रदता जैसे कई संकेतक हैं, उनमें से कोई भी व्यापक रूप से बैंकों के अंतर्निहित व्यापार मॉडल की व्यवहार्यता को शामिल नहीं करता है। इसके अलावा, इस तरह के मानक संकेतक अक्सर बैंकों के स्थिति में बुनियादी परिवर्तन को प्रतिबिंबित किए बिना विनियामक वातावरण में बदलाव के कारण बदलते हैं।

  • ऋण मध्यस्थता के माध्यम से, बैंक उधारकर्ताओं के मालियत पर निजी जानकारी जैसे बहुमूल्य अमूर्त संपत्ति उत्पन्न करते हैं और उनके साथ दीर्घकालिक बैंकिंग संबंध विकसित करते हैं। चूंकि बैंकिंग कारोबार कड़े प्रविष्टि आवश्यकताओं और विनियमों के अधीन है, अवलंबी बैंकों की बाजार में अधिक पहुंच है। ये कारक बैंक के फ्रैंचाइज़ी मूल्य में योगदान करते हैं, जिसे इसके बही की तुलना में मूल्य अनुपात द्वारा कैप्चर किया जा सकता है।

  • लेख में पाया गया है कि पीबीआर में भिन्नताएँ वित्तीय और आर्थिक चक्रों के साथ संबंध रखती हैं। पीबीआर लाभप्रदता और बैंकों की व्यवहार्यता से संबंधित संकेतकों के साथ भी घनिष्ठ संबंध साझा करता है। चूंकि यह उच्च-आवृत्ति के आधार पर उपलब्ध है, तुलन-पत्र संबंधी आंकड़ो के विपरीत, बैंकों का पीबीआर नीतिगत उद्देश्यों के लिए एक उपयोगी मेट्रिक होने का वादा करता है।

(योगेश दयाल) 
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2020-2021/1172


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