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भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति पर रिपोर्ट – 2019-20

29 दिसंबर 2020

भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति पर रिपोर्ट – 2019-20

भारतीय रिज़र्व बैंक ने आज बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 36 (2) के अनुपालन में एक सांविधिक प्रकाशन, भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति रिपोर्ट – 2019-20 जारी किया। यह रिपोर्ट 2019-20 और 2020-21 की अब तक की अवधि के दौरान सहकारी बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं सहित बैंकिंग क्षेत्र के कार्यनिष्पादन को प्रस्तुत करती है।

इस वर्ष की रिपोर्ट का व्यापक विषय बैंकिंग और गैर-बैंकिंग क्षेत्रों पर COVID-19 का प्रभाव और आगे के उपाय है। रिपोर्ट के मुख्य अंश नीचे दिए गए हैं:

  • 2019-20 और 2020-21 की पहली छमाही के दौरान, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) ने 2018-19 में बदलाव (टर्न अराउंड) के बाद हासिल किए गए लाभ को समेकित किया।

  • एससीबी की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (जीएनपीए) अनुपात मार्च 2019 के अंत में 9.1 प्रतिशत से घटकर मार्च 2020 के अंत में 8.2 प्रतिशत और सितंबर-2020 के अंत में 7.5 प्रतिशत पर आ गया।

  • एससीबी की जोखिम भारित परिसंपत्तियों की तुलना में पूंजी (सीआरएआर) अनुपात मार्च 2019 के अंत में 14.3 प्रतिशत से मजबूत होकर मार्च 2020 के अंत में बढ़कर 14.7 प्रतिशत और सितंबर 2020 के अंत तक 15.8 प्रतिशत हो गया, जोकि आंशिक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्पूंजीकरण और दोनों सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों द्वारा बाजार से पूंजी जुटाने से प्राप्त सहायता के कारण हुई।

  • पिछले दो वर्षों में घाटे के बाद एससीबी का निवल लाभ 2019-20 में बदल गया; 2020-21 की पहली छमाही में, उनके वित्तीय कार्यनिष्पादन को अधिस्थगन, परिसंपत्ति वर्गीकरण में ठहराव और लाभांश को पुनः कारोबार में लगाकर मजबूत किया गया था।

  • रिज़र्व बैंक ने COVID-19 के प्रभावों को कम करने के लिए विभिन्न नीतिगत उपाय किए ; इसके विनियामक दायरे को वैधानिक संशोधनों द्वारा सुदृढ़ किया गया था, जिसने इसे सहकारी बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफ़सी) और आवास वित्त कंपनियों (एचएफ़सी) पर अधिक अधिकार दिया है; और इसने अपने पर्यवेक्षी ढांचे को संभालने के लिए कई पहल की हैं।

  • वसूली की प्रक्रिया ने दिवालिया एवं शोधन अक्षमता कोड (आईबीसी) के माध्यम से बड़े खातों के समाधान के साथ कर्षण प्राप्त किया; वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्रचना एवं प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (सरफेसी) ने भी वसूली की प्रक्रिया को सहायता प्रदान की।

  • न्यून जमा अभिवृद्धि और ऋण में मंद विस्तार के कारण शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) की तुलन पत्र संवृद्धि 2019-20 में मंद हुई; जबकि उनकी आस्ति गुणवत्ता खराब हो गई, बढ़े हुए प्रावधानिकरण के कारण निवल घाटा हुआ।

  • लाभप्रदता और आस्ति गुणवत्ता दोनों के मामले में, राज्य सहकारी बैंकों के कार्यनिष्पादन में सुधार हुआ।

  • एनबीएफसी का समेकित तुलन-पत्र 2019-20 में ऋण और अग्रिमों में करीबी अवरुद्ध संवृद्धि के कारण कम हो गया हालांकि 2020-21 की पहली छमाही में कुछ सुधार दिखाई दिए; आस्ति गुणवत्ता में मामूली गिरावट के बावजूद, एनबीएफसी क्षेत्र मजबूत पूंजीगत बफ़रों के साथ लचीला बना हुआ है।

  • रिपोर्ट में भारत के वित्तीय क्षेत्र के लिए विकासशील संभावनाओं पर कुछ परिप्रेक्ष्य भी प्रस्तुत किए गए हैं।

(योगेश दयाल) 
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2020-2021/844


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