प्रेस प्रकाशनी

भारतीय रिज़र्व बैंक सामयिक पेपर खंड 37-सं.1 और 2: 2016

2 मई 2018

भारतीय रिज़र्व बैंक सामयिक पेपर खंड 37-सं.1 और 2: 2016

भारतीय रिज़र्व बैंक ने आज अपने सामयिक पेपरों का 37वां खंड जारी किया। आरबीआई सामयिक पेपर रिज़र्व बैंक की अनुसंधान पत्रिका है और इसमें इसके स्टाफ का योगदान होता है तथा यह लेखकों के विचार प्रतिलक्षित करता है। इस अंक में चार लेख और दो पुस्तकों की समीक्षा दी गई है।

लेख

1. भारत में मौद्रिक नीति अंतरणः क्या वैश्विक स्पिल-ओवर से फर्क पड़ता है?

माइकल देबब्रत पात्र, सितिकांत पटनाइक, जॉयस जॉन और हरेन्द्र कुमार बेहरा द्वारा लिखे गए इस पेपर में भारत में मौद्रिक नीति अंतरण पर अपारंपरिक मौद्रिक नीतियों के प्रभाव की जांच करने के लिए वैश्विक स्पिल-ओवर्स का सूचक विकसित करने हेतु डायनेमिक फैक्टर मॉडल का उपयोग किया गया है। टाइम-वैरिंग पैरामीटर वेक्टर ऑटोरिग्रेशन (टीवीपी-वीएआर) मॉडल के अनुमान दर्शाते हैं कि मुद्रा और क्रेडिट बाजारों के माध्यम से मौद्रिक नीति अंतरण वैश्विक स्पिल-ओवर्स से अप्रभावित है। तथापि, ऋण बाजार में अंतरण प्रभावित हुआ है जिसमें सामयिक ओवरशूटिंग और ओवर-करेक्शन हुआ है किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि बाजार की सूक्ष्मसंरचना पर प्रबल प्रभाव पड़ा है और इससे मीन रिवर्शन हुआ है। स्पिल-ओवर्स के प्रति विदेशी मुद्रा और इक्विटी बाजार की उच्च संवेदनशीलता के बावजूद, घरेलू मौद्रिक नीति का कोई सांख्यिकीय प्रबल साक्ष्य नहीं है जो यह दिखाए कि वैश्विक स्पिल-ओवर्स के कारण कर्षण (ट्रैक्शन) घट रहा है।

2. भारत में आस्ति गुणवत्ता और मौद्रिक अंतरण

जॉयस जॉन, अर्घ्य कुसुम मित्रा, जनक राज और देब प्रसाद रथ द्वारा लिखा गया यह पेपर भारत में मौद्रिक अंतरण पर बैंकों की आस्ति गुणवत्ता के प्रभाव का आलकन करता है। इसे निवल ब्याज मार्जिन (एमआईएम) के निर्धारक तत्वों के विस्तृत विश्लेषण के माध्यम से करने का प्रयास किया गया है। अवधि (2010-11 की पहली तिमाही से 2017-18 की पहली तिमाही तक) के लिए तिमाही आंकड़ों और डायनेमिक पैनल डेटा रिग्रेशन का उपयोग करते हुए, इस अध्ययन में निष्कर्ष दिया गया है कि क्रेडिट जोखिम जिसे सकल अनर्जक आस्ति (एनपीए) अनुपात और दबावग्रस्त आस्ति अनुपात (एनपीए और पुनर्संरचित आस्तियां) द्वारा अलग-अलग प्रोक्सी के रूप में प्रस्तुत किया गया है, का अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के एनआईएम पर सांख्यिकीय रूप से उल्लेखनीय और सकारात्मक प्रभाव पड़ा है जो यह दर्शाता है कि आस्ति गुणवत्ता में गिरावट से मौद्रिक अंतरण में बाधा पहुंची।

3. परिचालन लक्ष्य अस्थिरताः मौद्रिक नीति अंतरण के लिए इसके निहितार्थ

राजेश कावेड़िया और सितिकांत पटनाइक द्वारा लिखा गया यह पेपर प्रकाश डालता है कि मौद्रिक नीति के परिचालन लक्ष्य में अस्थिरता से किसी भी नीति ब्याज दर के लिए चलनिधि के प्रति पहुंच लागत के बारे में अनिश्चितता बढ़ सकती है और इस प्रकार आवधिक प्रीमियम और दीर्घकालिक ब्याज दरें बढ़ जाती हैं। पेपर के अनुभवजन्य अनुमान दर्शाते हैं कि भारित औसत कॉल दर (डब्ल्यूएसीआर) – भारत में मौद्रिक नीति का परिचालन लक्ष्य – में दैनिक बदलाव में सशर्त अस्थिरता अन्य ब्याज दरों जैसे तीन-छह माह, छह माह, नौ माह, बारह माह, दो वर्षीय और दस वर्षीय परिपक्वता वाले सरकारी पेपरों पर सांकेतिक प्रतिफलों में दैनिक बदलाव में अस्थिरता पर उदार किंतु सांख्यिकीय रूप से उल्लेखनीय प्रभाव डालती है। क्रेडिट बाजार में, डब्ल्यूएसीआर अस्थिरता में 1 प्रतिशत अंक की वृद्धि (तिमाही मानक विचलन के संबंध में आकलित) बैंक उधार दरों में लगभग 26 आधार अंकों तक की वृद्धि अनुमानित की गई है।

4. मिश्रित बारंबारता व्यवस्था में भारतीय जीवीए वृद्धि का पूर्वानुमान (नाउकास्टिंग)

इंद्रजीत रॉय, अनिर्बन सान्याल और आलोक कुमार घोष द्वारा लिखा गया यह पेपर भारत के लिए तिमाही वास्तविक गैर-कृषि सकल संवृद्धित मूल्य (जीवीए) वृद्धि का वर्तमान में पूर्वानुमान लगाने का प्रयास करता है, इसमें दो भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों को अपनाते हुए डायनेमिक फैक्टर मॉडल का उपयोग किया गया है। टर्निंग पॉइंट एनैलिसिस और लचीली नेट फ्रेमवर्क का उपयोग करते हुए बहु-स्तरीय चर चयन को अपनाया गया है जिससे कि चरों का चयन करते समय ओवर-फिटिंग समस्या पर काबू पाया जा सके। पेपर निष्कर्ष निकालता है कि अपरिपक्व मॉडलों की तुलना में नाउकास्टिंग फ्रेमवर्क का उपयोग करते हुए एक तिमाही आगे के पूर्वानुमान सटीकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। अन्य उच्चतर फैक्टर मॉडलों और अपरिपक्व मॉडलों की तुलना में दो फैक्टर वाला मॉडल सबसे सटीक पाया गया है। जब मॉडल में स्टॉकास्टिक अस्थिरता शुरू की जाती है तो पूर्वानुमान कार्यनिष्पादन में थोड़ा सुधार होता है।

पुस्तक समीक्षाएं

उपर्युक्त चार लेखों के अतिरिक्त, सामयिक पेपरों के इस अंक में दो पुस्तकों की समीक्षाएं भी दी गई हैं :

  • राधेश्याम वर्मा ने ईमाद ए. मूसा की पुस्तक “कंटेम्परेरी इश्यूज इन द पोस्ट क्राइसिस रेग्यूलेटरी लैंड्सकेप” की समीक्षा की जो यह प्रकाश डालती है कि बैंकिंग क्षेत्र के लिए वैश्विक विनियामकीय व्यवस्था वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से काफी बदल गई है, जिसमें आशा उत्पन्न हो गई है कि बैंकिंग प्रणालियां जो इन विनियमों का अनुपालन करती हैं, वे भविष्य में अधिक आघात सहनीय और अच्छी होनी चाहिए।

  • सोनम चौधरी केनिथ रोगोफ की पुस्तक “द कर्स ऑफ कैश” जो यह जांच करती है कि आधुनिक युग में मुद्रा की क्या भूमिका है और यह कैसे मंदी से निबटने में मौद्रिक नीति को सीमित कर सकती है।

जोस जे. कट्टूर
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2017-2018/2882


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