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भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति संबंधी रिपोर्ट 2016-17

21 दिसंबर 2017

भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति संबंधी रिपोर्ट 2016-17

भारतीय रिज़र्व बैंक ने आज 2016-17 में भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति पर सांविधिक रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट 2016-17 के दौरान बैंकिंग क्षेत्र के कार्यनिष्पादन और प्रमुख नीतिगत उपायों को प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट में सहकारी बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों का विश्लेषण भी किया गया है। रिपोर्ट की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:-

• बैंकों, विशेष रूप से सरकारी क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी), का वित्तीय निष्पादन का ग्राफ नीचे रहा क्योंकि अनर्जक आस्तियों के कारण उन्हें अधिक प्रावधान करने पड़े। फलस्वरूप, पीएसबी लगातार दूसरे वर्ष निवल घाटे की स्थिति में रहे। वर्ष के दौरान निजी क्षेत्र के बैंकों के लाभ में भी मामूली वृद्धि दर्ज की गयी।

• इन चुनौतियों के बावजूद, रिज़र्व बैंक ने अपनी विनियामकीय और पर्यवेक्षी नीतियों को इस प्रकार लागू किया है ताकि बैंकिंग प्रणाली को सुदृढ़, समुत्थानशील और समावेशी बनाना सुनिश्चित किया जा सके। संशोधित त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) फ्रेमवर्क के प्रावधानों को 1 अप्रैल 2017 से लागू किया गया ।

• वर्ष 2016-17 के दौरान, मई 2016 में भारत में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, (आईबीसी) का अधिनियमन एक युगांतकारी परिवर्तन रहा है। आईबीसी के अधिनियमन के बाद, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 में संशोधन करते हुए रिज़र्व बैंक को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी चूक के मामले में बैंकिंग कंपनी या बैंकिंग कंपनियों को आईबीसी के प्रावधानों के तहत दिवाला समाधान प्रक्रिया प्रारंभ करने का निदेश जारी कर सके।

• इसके अलावा, सरकार ने अक्टूबर 2017 में बड़े पैमाने पर बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की योजना घोषित की है जिससे बड़ी मात्रा में दबावग्रस्त अग्रिमों की समस्या से जूझ रहे पीएसबी को पुनर्जीवन प्रदान किया जा सके।

• अधिक सक्षम और ग्राहक-अनुकूल भुगतान और निपटान प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए कई नये नीतिगत उपाय किए गए। प्री-पेड भुगतान लिखतों (पीपीआई) पर मास्टर दिशानिर्देश जारी किए गए।

• यह उम्मीद की जाती है कि लघु वित्त बैंकों एवं भुगतान बैंकों को परिचालन योग्य बनाने से वित्तीय समावेशन एजेंडा को अधिक बल मिलेगा।

• प्राय: खराब वित्तीय स्थिति से जूझती रही सहकारी संस्थाओं ने भी आशान्वित करने वाली तस्वीर पेश की है। वर्तमान में जारी समेकन के प्रयासों की बदौलत शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) के तुलन-पत्र के आकार में विस्तार हुआ और साथ ही 2016-17 में लाभप्रदता बेहतर हुई। शीर्ष स्तर की दीर्घावधि ग्रामीण ऋण सहकारी संस्थाओं के कार्य-निष्पादन में काफी सुधार हुआ, जबकि अल्पावधि ग्रामीण ऋण सहकारी संस्थाओं ने समय के साथ-साथ बेहतर प्रदर्शन किया, जिसमें राज्य सहकारी बैंक (एसटीसीबी) एवं जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (डीसीसीबी) शामिल हैं। प्राथमिक कृषि ऋण सोसाइटी (पीएसीएस), जो अल्पावधि सहकारी ऋण संरचना का आधारभूत टिअर है, में हानि बरकरार रही।

• ऋण और अग्रिमों में अच्छी संवृद्धि से 2016-17 के दौरान गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) का समेकित तुलन-पत्र का आकार बढ़ा। हालांकि, आस्तियों की गुणवत्ता में गिरावट के साथ उनकी लाभप्रदता में भी गिरावट हुई। वर्ष 2016-17 में ऋण और अग्रिमों के कारण अखिल भारतीय वित्तीय संस्थानों (एआईएफआई) के समेकित तुलन-पत्र बढ़े, और ब्याज खर्च की वृद्धि में संयम से उनके परिचालनगत लाभ अनुपात में सुधार हुआ।

• वर्ष 2017-18 की पहली छमाही के दौरान, विमुद्रीकरण के बाद पारेषण में हुए सुधार के साथ-साथ बैंक क्रेडिट में संयमित तेजी देखी गयी। दबावग्रस्त आस्तियां एक उच्च स्तर पर स्थिर हो गई हैं, जबकि आस्तियों पर प्रतिलाभ के रूप में दर्शायी गई लाभप्रदता भी स्थिर रही।

• रिपोर्ट उन प्रमुख चुनौतियों की ओर इशारा करती है जिनसे भारत में वित्तीय क्षेत्र के दृष्टिकोण को आकार मिलना संभावित है, जिनमें शामिल हैं:-

  • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 में लगातार सुधार के तहत दबावग्रस्त आस्तियों का समाधान;

  • ऋण वृद्धि को फिर से बल देने के लिए बैंक के तुलन-पत्रों को सुदृढ़ बनाना;

  • लेखांकन व्यवहारों में कमियों को दूर करने के उद्देश्य से बैंकों के लिए मजबूत लेखा मानकों का विकास करना;

  • विभेदीकृत बैंकिंग को बढ़ावा देना तथा थोक और दीर्घकालिक वित्तपोषण तक इसके विस्तार के लिए संभावना की तलाश करना;

  • डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना और प्रौद्योगिकी-सक्षम वित्तीय सेवाओं का प्रबंधन करना; तथा

  • वित्तीय प्रणाली के प्रतिरोध को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से साइबर सुरक्षा जोखिमों का प्रबंधन करना।

जोस जे. कट्टूर
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2017-2018/1710


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