प्रेस प्रकाशनी

‘कृषि कर्जमाफी – प्रभावशीलता और सीमाएं’ पर संगोष्ठी, 31 अगस्त 2017

31 अगस्त 2017

‘कृषि कर्जमाफी – प्रभावशीलता और सीमाएं’ पर संगोष्ठी, 31 अगस्त 2017

भारतीय रिज़र्व बैंक ने एक संगोष्ठी आयोजित की जिसका शीर्षक कृषि कर्जमाफी – प्रभावशीलता और सीमाएं था। उद्घाटन संबोधन गवर्नर उर्जित आर. पटेल द्वारा किया गया। इसके बाद इस क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुतियां की गईं। संगोष्ठी में चार सत्रों में अनुसंधान पेपरों की प्रस्तुतियां शामिल थी और शेष दो सत्रों में पैनल चर्चाएं की गईं जिनका विषय था (i) कृषि कर्जमाफी का राजकोष पर प्रभाव, और (ii) कृषि कर्जमाफी का बैंकिंग क्षेत्र पर प्रभाव।

पहले सत्र में विश्व बैंक के डॉ. मार्टिन खांज (पेपर/प्रस्तुति) ने तर्क दिया कि क्रेडिट आबंटन में कर्ज राहत से सक्षमता में सुधार होने के केवल सीमित साक्ष्य हैं, किंतु यह नैतिक जोखिम की समस्या उत्पन्न करता है और उधारकर्ताओं के क्रेडिट अनुशासन पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। उल्लेखनीय रूप से, कृषि उत्पादकता, ग्रामीण मजदूरी या परिवार उपभोग में सुधार के साक्ष्य नहीं मिले हैं।

दूसरे सत्र में इंडियन स्कूल ऑफ बिजनस, हैदराबाद के डॉ. कृष्णामूर्ति सुब्रमणियन और डॉ. प्रसन्ना तंत्री (पेपर/प्रस्तुति) ने पाया कि जबकि कर्ज राहत से दबावग्रस्त उधारकर्ताओं के ऋण अदायगी व्यवहार में सुधार होगा, इससे गैर-दबावग्रस्त उधारकर्ताओं के ऋण अदायगी व्यवहार पर बहुत कम प्रभाव है।

कृषि कर्जमाफीः राजकोष पर प्रभाव पर पैनल चर्चा जिसका संचालन डॉ. रविन्द्र एच. ढोलकिया, प्रोफेसर, आईआईएम, अहमदाबाद ने किया था, इसमें डॉ. विजय पॉल शर्मा, अध्यक्ष, कृषि लागत और मूल्य आयोग; श्री एच.आर. दवे, उप प्रबंध निदेशक, नाबार्ड; डॉ. समीरन चक्रवर्ती, प्रबंध निदेशक, मुख्य अर्थशास्त्री, सिटीग्रूप, इंडिया; और डॉ. पिनाकी चक्रवर्ती, प्रोफेसर और कार्यकारी निदेशक, राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त और नीति संस्थान शामिल थे। कुछ पैनल सदस्यों ने तर्क दिया कि हाल की कृषि कर्जमाफी से राज्यों की राजकोषीय स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और इससे आगे समग्र राजकोषीय जोखिम बढ़ सकते हैं।

चौथे सत्र में डॉ. आर. रामकुमार (पेपर/प्रस्तुति), डीन, स्कूल ऑफ डिपलपमेंट स्टडीज़, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई ने तर्क दिया कि बेहतर भूमि अभिलेख और भूमि सुधार वाले राज्य वर्ष 2008 की योजना के अंतर्गत लगभग सभी लाभार्थियों को पूरी कर्जमाफी प्रदान कर सके, जबकि अन्य राज्य तुलनात्मक रूप से कम लाभार्थियों को राहत उपलब्ध करा सके।

पांचवें सत्र में भारतीय रिज़र्व बैंक के स्टाफ द्वारा तीन प्रस्तुतियां की गई और उन्नत वित्तीय अनुसंधान और शिक्षण केंद्र (कफरल) के स्टाफ द्वारा एक प्रस्तुति की गई। परिदृश्य विश्लेषण के आधार पर श्री आर. राजेन्द्र ने कहा कि कर्जमाफी के कारण बढ़े हुए व्यय के वित्तपोषण से राज्य सरकारों के लिए चुनौती होने की संभावना है। वर्ष 2016 की कर्जमाफी योजना के अंतर्गत तमिलनाडु के दो जिलों के सर्वेक्षण के आधार पर सुश्री दीपा एस. राज और श्री एडविन प्रभू ने पाया कि कट-ऑफ रकबे के निकट, कर्जमाफी अवधि के बाद लाभार्थी किसानों की अपेक्षा गैर-लाभार्थी किसानों द्वारा क्रेडिट प्राप्त की अधिक संभावना है। डॉ. इंद्राणी मन्ना ने दिखाया कि कर्जमाफी सरकार के तुलन पत्र के लिए नुकसानदेह है, राजकोषीय अस्थिरता झटके, चाहे आकार में छोटे हों, उनका दीर्घावधि में प्रभाव पड़ता है। डॉ. निरुपमा कुलकर्णी ने कहा कि राज्य सरकारों की कर्जमाफी से कॉर्पोरेट उधारों के बहिर्गमन की संभावना है यदि राज्य ऋण निर्गमों से वित्तपोषित किए गए हों।

'कृषि कर्जमाफी: बैंकिंग क्षेत्र पर प्रभाव' पर पैनल चर्चा में शामिल पैनललिस्ट हैं: डॉ. नचिकेत मोर, निदेशक, इंडिया ऑफिस, बिल और मेलेंडा गेट्स प्रतिष्ठान; श्री पी. एस. जयकुमार, प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी निदेशक, बैंक ऑफ बड़ौदा; डॉ. साजिद जेड. चिनाय, भारतीय अर्थशास्त्री, जे.पी. मॉर्गन; और डॉ. सुधा नारायणन, एसोसिएट प्रोफेसर, इंदिरा गांधी अनुसंधान विकास संस्थान। डॉ. एम. एस. श्रीराम, प्रोफेसर, भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), बेंगलूरु पैनल चर्चा के लिए संचालक थे। उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह की कर्जमाफी से अल्पावधि में बैंकों को लाभ हो सकता है चूंकि सरकार कर्ज लेती है, वे आगे जाकर हानिकारक हो सकते हैं जब छूट क्रेडिट अनुशासन में बाधा डालती हैं, जिससे क्रेडिट प्रवाह में कमी हो जाती है। उन्होंने अर्थव्यवस्था में व्यापक कृषि संकट के मौलिक चालकों पर भी प्रकाश डाला।

अपनी समापन टिप्पणी में, उप-गवर्नर डॉ. विरल वी. आचार्य ने कहा कि कर्जमाफी किसानों के संकट के लिए एक अल्पकालिक उपाय हो सकती है और इसे भारतीय कृषि की समस्याओं के लिए दीर्घकालिक हल के रूप में नहीं माना जा सकता है। हमारे किसान समुदाय के एक स्थायी और दीर्घकालिक समाधान के लिए कृषि विपणन, मूल्य निर्धारण, ऋण और विस्तार प्रणाली, और एक खुले व्यापार व्यवस्था के क्षेत्रों में ठोस और जरूरी सुधारों की आवश्यकता है।

जोस जे. कट्टूर
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2017-2018/599


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